आंदोलन कर रहे किसान 15 अगस्त को नहीं आएँगे दिल्ली, लेकिन सुरक्षा कड़ी

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या किसान स्वतंत्रता दिवस को अलग से ट्रैक्टर रैली निकालेंगे? इसे लेकर दिल्ली पुलिस ने देश की राजधानी की सरहदों पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम कर लिए हैं. हालाँकि किसान संगठनों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर उनकी रैलियाँ निकलेंगी ज़रूर. लेकिन वो रैलियाँ दिल्ली नहीं आएँगी.
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सारे एहतियाती क़दम उठाए जा रहे हैं. उनका कहना था कि किसान संगठनों ने आश्वस्त किया है कि दिल्ली में उस दिन किसी भी तरह का कोई आयोजन नहीं किया जाएगा.
इसी साल गणतंत्र दिवस पर किसानों की दिल्ली में रैली के दौरान हिंसक घटनाएँ हुईं थीं. किसानों के हुजूम और पुलिस बलों के बीच राजधानी की सड़कों पर कई जगहों पर संघर्ष हुआ था. इसमें कई घायल हुए थे जबकि एक किसान के मौत हो गई थी. इस बार पुलिस ज़्यादा सतर्क है.

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रैली की अनुमति नहीं मांगी
अधिकारी का कहना है कि पिछली बार रैली की इजाज़त इसलिए दी गई थी, चूँकि किसान नेताओं ने आश्वासन दिया था कि रैली शांतिपूर्ण रहेगी. लेकिन वो कहते हैं कि 26 जनवरी को आंदोलन नेताओं के हाथ से निकल गया और भीड़ पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहा.
इस बार न तो किसानों ने इसकी अनुमति मांगी और न ही दिल्ली पुलिस उन्हें इसकी अनुमति देती.
इससे पहले जंतर मंतर पर किसानों ने 'किसान संसद का संचालन' करना शुरू किया था और कहा था कि जब तक संसद का मॉनसून सत्र चलेगा, तब तक वो किसानों की 'सामानांतर संसद' चलाते रहेंगे. लेकिन संसद का सत्र 11 अगस्त को ही अचनाक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया. किसानों ने भी अब जंतर मंतर पर चल रही अपनी 'समानांतर संसद' को ख़त्म कर दिया है.

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ट्रैक्टर रैली निकालेंगे किसान
किसान संगठनों का पहले कहना था कि वो स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर जंतर मंतर पर चल रही किसानों की संसद के दौरान ध्वजारोहण करेंगे.
लेकिन भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के आशीष मित्तल ने बीबीसी को बताया कि संसद का सत्र ख़त्म होते ही किसानों ने भी जंतर मंतर के इलाक़े को ख़ाली कर दिया था.
भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि स्वतंत्रता दिवस के दिन दिल्ली की सरहदों पर धरना दे रहे किसान अपने-अपने धरना स्थलों पर ध्वजारोहण करेंगे और फिर वहाँ से ट्रैक्टर रैली भी निकालेंगे.
ये आयोजन ग़ाज़ीपुर, सिंघु और खेड़ा पर भी किया जाएगा. ध्वजारोहण के बाद किसान अपने ट्रैक्टर लेकर सड़कों पर निकलेंगे, लेकिन दिल्ली की सीमा को पार कर शहर में दाख़िल नहीं होंगे.
मित्तल कहते हैं, "जुलूस तो निकलेगा. पूरे भारत में किसान ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, हल और कृषि में इस्तेमाल होने वाले दूसरे उपकरणों को लेकर झाँकियाँ निकालेंगे. ये आयोजन पूरे भारत में होगा. ज़िला, प्रखंड और पंचायत स्तर पर. लेकिन दिल्ली में नहीं होगा."
किसान संगठनों का कहना है कि हरियाणा और पंजाब के किसान सिंघु बॉर्डर पर आएँगे, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे. उसी तरह राजस्थान के किसान खेड़ा बॉर्डर तक आएँगे, फिर वहाँ से वापस अपने इलाक़ों में रैली की शक्ल में जाएँगे.

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हरियाणा के 7 ज़िलों में मंत्री नहीं फहराएंगे झंडा
बीकेयू का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ग़ाज़ीपुर बॉर्डर तक आने वाले किसान भी वापस अपने अपने ज़िलों में रैली की शक्ल में लौटेंगे.
खेड़ा बॉर्डर पर मौजूद संयुक्त किसान मोर्चा के संजय माधव कहते हैं कि सभी किसानों को बता दिया गया है कि किन बातों का ध्यान रखना है. वो कहते हैं कि कोई अप्रिय घटना नहीं घटेगी.
राकेश टिकैत के अनुसार स्वतंत्रता दिवस की ख़ुशी मनानी चाहिए और किसान अपने ट्रैक्टर पर अगर तिरंगे लहराकर निकलते हैं तो "ये ख़ुशी की बात है."
लेकिन किसानों के रुख़ को देखते हुए हरियाणा के सात ज़िलों में कोई भी मंत्री झंडा नहीं फहराएगा. उन ज़िलों के उपायुक्त झंडा फहराएँगे. इन ज़िलों में ज़ींद भी है, जहाँ किसानों को ट्रैक्टर लेकर बड़ी तादात में जमा होने का आह्वान किया गया है. ये आह्वान हरियाणा और ख़ास तौर पर ज़ींद के किसानों ने किया है.
ज़ींद के अलावा सोनीपत, झज्जर, कुरुक्षेत्र, सिरसा, रोहतक और कैथल में भी ज़िले के उपायुक्त ही ध्वजारोहण करेंगे. हरियाणा के मुख्य सचिव के कार्यालय से इसका औपचारिक अध्यादेश भी जारी कर दिया गया है.
"हम टूटने वाले नहीं हैं"
भारतीय किसान यूनियन का कहना है कि ज़ींद का आह्वान उनकी यूनियन ने नहीं किया है, लेकिन वो इसका समर्थन ज़रूर कर रहे हैं. बीकेयू का कहना है इस माह की शुरुआत से ही भारतीय जनता पार्टी ने 'तिरंगा यात्रा' शुरू की है, जबकि किसान ये यात्रा 15 अगस्त से शुरू करेंगे.
आशीष मित्तल ने बीबीसी से बात करते हुए आरोप लगाया कि सरकार किसानों के आंदोलन को ख़त्म करने के लिए "तरह तरह के हथकंडे अपना रही है."
उनका कहना था, "सरकार भी इंतज़ार की मुद्रा में है और किसान भी. अगर उन्हें बात करने की कोई जल्दी नहीं है तो हमें भी नहीं है. वो अगर सोच रहे हैं कि किसान थक कर वापस चले जाएँगे तो वो उन्होंने देख लिया है. इतने दबाव के बाद भी किसान अपनी मांगों पर अडिग हैं. वो हमें तोडना चाहते हैं लेकिन हम उनसे टूटने वाले नहीं हैं."
बीकेयू का कहना है कि तीन नए कृषि क़ानूनों की वापसी के अलावा किसान सरकार के किसी और फ़ॉर्मूले पर तैयार हो ही नहीं सकते.
पिछले साल से ही पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत देश के कई और हिस्सों से आए किसान कृषि से जुड़े तीन क़ानूनों को लेकर दिल्ली की यूपी-हरियाणा से लगती सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
बीच में केंद्र सरकार के साथ किसानों के प्रतिनिधियों ने कई दौर की बातचीत की. लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.
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