किसान आंदोलन: 'पीएम ने कहा मैं एक फ़ोन कॉल की दूरी पर, लेकिन अगले दिन नेटवर्क ठप'

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

किसान संगठनों का कहना है कि ये सरकार पर निर्भर करता है कि वो तीनों नए कृषि क़ानूनों पर किसान संगठनों से दोबारा बातचीत फिर से शुरू करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाए. किसान नेताओं का ये भी कहना है कि दोबारा बातचीत किस तरह शुरू होगी इसका पूरा दारोमदार सरकार पर ही है.

गाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के महासचिव आशीष मित्तल ने बीबीसी से कहा कि ये सरकार पर ही निर्भर करता है कि वो किसानों के सामने वार्ता के लिए कोई बेहतर प्रस्ताव रखे.

इस पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार किसानों से बातचीत का सिलसिला ख़त्म नहीं करना चाहती है. उनका ये भी कहना था कि वो किसानों की बात सुनने के लिए सिर्फ़ 'एक फ़ोन कॉल की दूरी' पर हैं.

आशीष मित्तल कहते हैं कि किसान प्रधानमंत्री के विचारों का सम्मान करते हैं. लेकिन साथ ही वो पूछते हैं, "सरकार किसानों को कैसे संतुष्ट कर पाएगी कि जो प्रधानमंत्री कह रहे थे वो सच है. जिस दिन मोदी जी ने कहा कि वो एक फ़ोन काल की दूरी पर हैं, अगले दिन ही किसानों के प्रदर्शनस्थलों के आसपास एक बड़े दायरे में नेटवर्क की सेवाएं ठप कर दी गयीं. हम कैसे विश्वास करें?"

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर का कहना है कि "किसानों को गुमराह किया जा रहा है."

उन्होंने एक राज्य का उल्लेख करते हुए कहा कि इस राज्य के किसानों के बीच ग़लत जानकारियाँ परोसी जा रही हैं. उनका इशारा पंजाब की तरफ़ था.

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शुक्रवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान हस्तक्षेप करते हुए उनका कहना था, "मैंने ये साफ़ कर दिया है कि अगर सरकार कृषि क़ानूनों में संशोधन करने को तैयार है तो उसका क़तई ये मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि इन क़ानूनों में कमियाँ हैं. किसान संगठन अभी तक ये बता नहीं पाए हैं कि क़ानून में कमियाँ क्या हैं."

तोमर ने ये भी कहा कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आधारित मंडी व्यवस्था बनाए रखने के पक्ष में है. उनका कहना था कि नए क़ानून किसानों को अधिकार देते हैं कि वो अपनी पैदावार को मंडियों के अलावा भी कहीं और बेच सकते हैं.

तोमर कहना था, "अगर मंडियों के बाहर अपनी उपज बेचेंगे तो किसानों को मंडियों में लगने वाला कर भी नहीं देना पड़ेगा."

तोमर का कहना था कि किसानों को मंडियों में लगने वाले कर के ख़िलाफ़ आंदोलन करना चाहिए था. उनका कहना था, "सरकार किसानों को उनकी उत्पाद लागत से 50 प्रतिशत ज़्यादा का न्यूनतम समर्थन मूल्य दे रही है. इसके अलावा एक लाख करोड़ रूपए किसानों के लिए आत्मनिर्भर पैकेज के तहत आवंटित किये गए हैं."

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जय किसान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक आवीक साहा बीबीसी से कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से जो कुछ हो रहा है, उसके बाद अब सरकार को स्पष्ट करना चाहिए वो किसानों के आन्दोलन को किस रूप में देखती है.

वो कहते हैं, "सरकार को अपने आप में ये स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वो किसानों के आन्दोलन को एक आपराधिक कृत्य मानती है या वो इसे एक लोकतांत्रिक तरीका मानती है. सरकार को इसे मूंछ की लड़ाई नहीं बनाते हुए कानूनों पर किसानों की आपत्ति को भी गंभीरता से लेना चाहिए."

उनका ये भी कहना था, "राज्यसभा में कृषि मंत्री कहते हैं कि सिर्फ पंजाब के किसानों को ग़लत जानकारी दी जा रही है और वहां के किसानों को दुष्प्रचार के माध्यम से नए कृषि क़ानून के प्रति भ्रमित किया जा रहा है जबकी सभी राज्यों में फैलता जा रहा है. चाहे हरियाणा हो, उत्तर प्रदेश हो या फिर मध्य और दक्षिण भारत के राज्य हों."

लेकिन भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने स्पष्ट किया है कि जब तक सरकार गिरफ़्तार किसानों को रिहा नहीं करती, किसान संगठन वार्ता की टेबल पर सरकार के प्रतिनिधियों के साथ नहीं बैठेंगे.

जय किसान आन्दोलन संगठन हो, भारतीय किसान यूनियन हो या अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा, ये सभी संगठन संयुक्त किसान मोर्चा के घटक हैं जिसमें लगभग 40 किसान संगठन शामिल हैं. मोर्चा ने पहले कहा था कि वो किसी भे नेता या राजनीतिक दल को अपने मंच पर जगह नहीं देगा. लेकिन सरकार का आरोप है कि किसान संगठन विपक्षी दलों के इशारे पर आन्दोलन कर रहे हैं.

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मोर्चा के एक नेता दर्शन पाल के अनुसार, "आंदोलन पूर्णतः किसानों का आंदोलन है और किसानों पर लग रहे सभी बेबुनियाद आरोपो को हम खारिज करते है. यह आंदोलन शुरू से ही पूर्ण रूप से अराजनीतिक रहा है व अराजनीतिक रहेगा. किसी भी राजनीतिक दल के नेता को सयुंक्त किसान मोर्चा का मंच नहीं दिया जाएगा. राजनीतिक दलों एवं नेताओं का किसान आंदोलन को समर्थन स्वागतयोग्य है परंतु किसी भी स्थिति में सयुंक्त किसान मोर्चा के मंच पर जगह नहीं दी जाएगी."

सरकार से वार्ता के कई दौर के बावजूद किसान नेता एक बिंदु पर जमे हुए हैं. वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके एजेंडे में सिर्फ एक बिंदु है. वो है क़ानून वापसी. इससे कम में वो किसी बात पर राज़ी नहीं हैं और यहीं आकर पेंच फँस गाया है.

ये पूछने पर कि क्या सरकार और किसान संगठन कभी ज़िद छोड़ेंगे, अवीक साहा कहते हैं कि किसान संगठनों ने अपना स्टैंड स्पष्ट रूप से सरकार के सामने रख दिया है जिसमे कोई शक़ की गुंजाइश नहीं है.

वो कहते हैं कि आन्दोलन में शामिल किसान बहुत सब्र के साथ बैठे हुए हैं. साहा कहते हैं, "हमें कोई जल्दी नहीं है. हम जल्दबाज़ी से सोच ही नहीं रहे हैं. हम लंबा इंतज़ार करने को भी तैयार हैं. अब सरकार को ही तय करना है कि वो अपना शक्ति प्रदर्शन करना बंद करे और रास्ता निकालने की सोचे."

अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के आशीष मित्तल का आरोप है कि सरकार अपनी ज़िद की वजह से अब दबाव में आ गयी है. वो कहते हैं कि किसान संगठन नए कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के अलावा किसी और चीज़ पर समझौता नहीं करेंगे.

कृषि अर्थशास्त्री देवेंन्द्र शर्मा कहते हैं कि कृषि क़ानून के विरोध के ज़रिये किसानों का दशकों से अन्दर सुलग रहा ग़ुस्सा बाहर आया है.

उनका कहना है कि कृषि से होने वाली आमदनी में दशकों से यथास्थिति बनी हुई है या फिर काफ़ी गिरावट देखने को मिली है. यही वजह है कि आन्दोलन महा-पंचायतों से निकलकर पंचायतों के स्तर पर फैल चुका है.

उन्हें नहीं लगता कि कृषि क़ानूनों को लेकर कोई बीच का रास्ता निकल पायेगा.

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