महिला ने क्यों लगाई पति के स्पर्म कलेक्शन के लिए कोर्ट में गुहार

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वडोदरा स्थित स्टर्लिंग हॉस्पिटल ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश पर कोविड-19 से पीड़ित एक मरीज़ के स्पर्म या वीर्य को सरंक्षित कर लिया है.
कोर्ट ने ये आदेश इस मरीज़ की पत्नी की याचिका पर दिया.
हालांकि मरीज़ का स्पर्म संरक्षित करने के बाद गुरुवार को उनकी मौत हो गई.
इससे पहले महिला के वकील निलय एच पटेल ने बीबीसी को बताया था कि ''महिला के पति की कोविड-19 की वजह से तबीयत काफ़ी बिगड़ गई है. वो चाहती थीं कि उनके पति का स्पर्म सुरक्षित रख लिया जाए. उन्होंने अस्पताल से ये इच्छा ज़ाहिर की. अस्पताल ने इसके लिए पति की सहमति को आवश्यक बताया. लेकिन दिक्क़त ये थी कि उनके पति इसकी सहमति देने की हालत में नहीं थे. इस हाल में महिला ने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.''
वकील निलय पटेल के अनुसार, इस दंपती की शादी को लगभग आठ महीने हुए हैं और वो कनाडा में रहते थे. इस व्यक्ति के पिता की तबीयत ख़राब होने के कारण दोनों मियाँ-बीवी कनाडा से वडोदरा आ गये थे, जहाँ ये व्यक्ति कोविड से संक्रमित हो गए. इस व्यक्ति की उम्र लगभग 30 साल थी.

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स्टर्लिंग अस्पताल के ज़ोनल डायरेक्टर अनिल नांबियार ने बीबीसी को बताया कि ये कोविड मरीज़ हमारे अस्पताल में क़रीब 45 दिन पहले आये थे.
उनका कहना था, ''हाल के दिनों में उनके कई अंगो ने काम करना बंद कर दिया. इस बारे में हमने मरीज़ के परिवार को सूचित कर दिया था. मरीज़ के ज़िन्दा रहने की संभावना बहुत कम है. उसके बाद मरीज़ की पत्नी ने हमसे पूछा कि क्या मरीज़ का स्पर्म कलेक्ट किया जा सकता है? जब ये सवाल हमारे सामने आया तो डॉक्टरों की टीम ने ये विचार किया कि क्या ये प्रक्रिया संभव है और क्या क़ानूनी तौर पर ये सही होगा.''

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वो बताते हैं कि मरीज़ की सहमति के बग़ैर ऐसा करना ग़लत होता. हम लोगों ने विचार-विमर्श करके ये निष्कर्ष तो निकाल लिया कि TESE प्रक्रिया के तहत मरीज़ के शरीर से स्पर्म निकाला जा सकता है, लेकिन अब ये सवाल था कि इसकी अनुमति कैसे मिलेगी, जिसके बाद इस महिला ने कोर्ट का रूख़ किया और कोर्ट ने कुछ ही मिनटों में इसकी अनुमति दे दी और हमने भी स्पर्म कलेक्शन में देर नहीं की और उसे संरक्षित करने की प्रक्रिया को पूरा कर लिया.
अब महिला के ऊपर निर्भर करता है कि वो कब आईवीएफ़ या एआरटी की प्रक्रिया अपनाना चाहती हैं.
आईवीएफ़ तकनीक के ज़रिए अंडाणु और शुक्राणुओं को प्रयोगशाला में एक परखनली के भीतर मिलाया जाता है. इसके बाद बने भ्रूण को माँ के गर्भ में डाला जाता है.

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