पंजाब में कांग्रेस क्या आत्महत्या करने पर तुली हुई है?

इमेज स्रोत, TWITTER
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चल रही रस्साकशी एक बार फिर सुर्ख़ियों में है और अटकलों का बाज़ार गर्म है.
जहाँ एक तरफ़ ये कयास लगाए जा रहे हैं कि सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जा सकता है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व अमरिंदर सिंह और सिद्धू के साथ मिलकर काम करने का फॉर्मूला तलाशने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि पार्टी के पंजाब मामलों के प्रभारी एआईसीसी महासचिव हरीश रावत कह चुके हैं कि अमरिंदर सिंह 2022 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे.
अटकलें ये भी लगाई जा रही हैं कि अगर सिद्धू को कांग्रेस में कोई अहम भूमिका नहीं मिलेगी तो वे आम आदमी पार्टी में भी जा सकते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
रिश्तों में खींचतान पुरानी
सिद्धू और सिंह के बीच की लड़ाई 2017 में पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनते ही शुरू हो गई थी. अमरिंदर 2017 के विधानसभा चुनाव के समय सिद्धू को कांग्रेस में लाने के पक्ष में नहीं थे.
शायद अमरिंदर सिद्धू को अपने ख़िलाफ़ एक चुनौती के रूप में देख रहे थे. लेकिन यह साफ़ था कि सिद्धू का कांग्रेस में प्रवेश गाँधी परिवार के आशीर्वाद से हुआ था और 2017 का चुनाव जीतने पर अमरिंदर सिंह को सिद्धू को कैबिनेट मंत्री बनाना पड़ा.
दोनों के बीच की खींचतान तब बढ़ी जब सिद्धू में यह घोषणा की कि वे प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बनने के लिए पाकिस्तान जाएंगे.
अमरिंदर ने सिद्धू को इस बात पर पुनर्विचार करने की सलाह दी लेकिन उस सलाह को दरकिनार करते हुए सिद्धू वाघा बॉर्डर पार कर उस समारोह का हिस्सा बनने के लिए गए.
मामला पेचीदा तब हो गया जब अमरिंदर ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा के साथ सिद्धू के गले मिलने की खुली आलोचना की.

इमेज स्रोत, ANI
मंत्री बने तो मुश्किलें और बढ़ीं
सिद्धू पंजाब में कैबिनेट मंत्री तो बन गए लेकिन ये सिर्फ़ उनकी मुश्किलों की शुरुआत थी.
बादल परिवार के केबल टीवी व्यवसाय को निशाना बनाते हुए एक नया क़ानून लाने की सिद्धू की कोशिश को उन्हीं की सरकार से कोई ख़ास समर्थन नहीं मिला.
2018 में सिद्धू को एक बड़ा झटका तब मिला जब पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस फ़ैसले का समर्थन किया जिसमें 1998 के रोड रेज़ मामले में सिद्धू को दोषी ठहराया गया था और तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी.
2019 के लोकसभा चुनावों में आठ संसदीय सीटें जीतने के बाद अमरिंदर सिंह का राजनीतिक क़द और बढ़ा और उन्होंने सिद्धू पर सीधा निशाना साधना शुरू किया.
यहाँ तक कि अमरिंदर ने सिद्धू को एक नॉन-परफ़ॉर्मर तक कह डाला और उनसे स्थानीय निकाय विभाग वापस ले लिया गया.
सिद्धू ने कांग्रेस आलाक़मान से अपनी नज़दीकी का इस्तेमाल करते हुए अमरिंदर के साथ चल रहे उनके झगड़े को गाँधी परिवार के सामने के रखा पर आख़िरकार उन्हें 2019 में अमरिंदर कैबिनेट से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

इमेज स्रोत, Getty Images
अमरिंदर का राजनीतिक कद
2014 में जब ऐसी धारणा बन रही थी कि कांग्रेस के बड़े नेता लोकसभा चुनाव लड़ने से कतरा रहे हैं, उस समय भी सोनिया गाँधी के कहने पर अमरिंदर ने अरुण जेटली के ख़िलाफ़ अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए हामी भरी और अंततः जेटली को हराया.
ये चुनाव लड़ने के समय अमरिंदर पंजाब विधानसभा में विधायक थे.
2017 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने पंजाब में कुल 117 सीटों में से 77 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता में 10 साल बाद वापसी की थी.
अमरिंदर सिंह की यह जीत इस मायने में बेहद अहम थी कि 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद बीजेपी लगातार कई राज्यों में अपनी सरकार बनाती जा रही थी. इनमें हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, असम, गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य शामिल थे.
लेकिन पंजाब की सत्ता में कांग्रेस की वापसी कर अमरिंदर सिंह बीजेपी की विजय रथ को रोकने वाले गिनती के नेताओं में शुमार हो गए.
2019 के लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी लहर की ही चर्चा थी. यह नतीजों ने भी साफ़ दिखा और जनादेश स्पष्ट रूप से बीजेपी को मिला. लेकिन मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने पंजाब की 13 लोक सभा सीटों में से 8 सीटें जीतीं और इससे अमरिंदर का कद और ऊंचा हो गया.

इमेज स्रोत, Getty Images
कांग्रेस हाई कमान की विफलता?
पंजाब की राजनीति पर पैनी नज़र रखने वाले पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के विभागाघ्यक्ष प्रोफ़ेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, "पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी कलह पार्टी हाई कमान की बेवक़ूफ़ी का नतीजा है."
वे कहते हैं, "ये तय है कि सिद्धू या तो आम आदमी पार्टी में जाएंगे या अमरिंदर कांग्रेस को तोड़ देंगे. अगर अमरिंदर अभी सिद्धू के पार्टी अध्यक्ष बनने को मान भी लें तो वे सिद्धू की अहमियत को कम करने की पूरी कोशिश करेंगे."
प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, "इस समय पंजाब में उठापटक सिद्धू के नाम पर नहीं बल्कि इस बात पर चल रही है कि कैप्टन ने कुछ काम नहीं किया और कई वादे नहीं निभाए जिनमें से एक वादा अकालियों को सबक़ सिखाने का था. जब अकाली सत्ता में थे तो कांग्रेसियों की हालत बहुत बुरी थी. उन पर कई मुक़दमे दर्ज किए गए थे, जो कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी वापस नहीं लिए गए.''
''कांग्रेसियों के दिल का दर्द अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ है कि वे काफ़ी कुछ कर सकते थे लेकिन उन्होंने नहीं किया और बादल परिवार को खुली छूट दी जिसके वजह से बसों और केबल टीवी का उनका व्यवसाय फल-फूल रहा है."
वे कहते हैं कि अब चुनाव सिर पर है तो कांग्रेस विधायकों को लग रहा है कि वो सब मुद्दे उठेंगे जिन पर अमरिंदर ने बड़े बड़े वादे किए थे और उन्हें डर है कि आम आदमी पार्टी इसका फ़ायदा उठा सकती है.
डॉ प्रमोद कुमार चंडीगढ़ स्थित इंस्टिट्यूट फॉर डिवेलपमेंट एंड कम्युनिकेशन के निदेशक हैं. वह मार्च 2012 से 2017 तक पंजाब गवर्नेंस रिफॉर्म्स कमिशन के अध्यक्ष रह चुके हैं.
कांग्रेस हाईकमान के रवैये पर वे कहते हैं, "आप अपने मुख्यमंत्री को दिल्ली बुलाते हैं और कहते हैं कि आपका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. अब यह 18 पॉइंट ले जाकर काम करके दिखाइए और 15 दिन में रिपोर्ट दीजिए. तो आप साढ़े चार साल बाद ये मान रहे हैं कि आपके मुख्यमंत्री ने काम नहीं किया."

इमेज स्रोत, Getty Images
डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार कांग्रेस हाईकमान असमंजस में हैं और पंजाब के ज़रिए अपनी ऑल इंडिया मृत्युलेख लिख रही है. "यहां केंद्र में एक नेतृत्व है जो यह तय नहीं कर सकता कि राज्य में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा."
प्रोफ़ेसर आशुतोष के अनुसार कैप्टन की कार्यशैली को लेकर एक-डेढ़ साल से सवाल उठ रहे थे लेकिन पार्टी हाई कमान ने इस बारे में कुछ नहीं किया.
वे कहते हैं, "अब ऐसा लग रहा है कि चूँकि सिद्धू की पहुँच प्रियंका गाँधी तक है तो उनकी वजह से हाईकमान ने पंजाब के मामले में रुचि दिखाना शुरू किया है. लेकिन यहां भी सिद्धू को शांत कराने में हाईकमान की दिलचस्पी है, मुद्दों पर बात करने में नहीं."
वे कहते हैं, "सिद्धू को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बना भी दिया जाए तो उनके लिए मुश्किल स्थिति होगी. पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद वे कुछ अच्छा प्रदर्शन कर के दिखाने की कोशिश में होंगे. लेकिन अमरिंदर ऐसा नहीं चाहेंगे. उन्हें ज़रूर ये लगेगा कि जो कुछ वे करेंगे उसका श्रेय सिद्धू ले जाएंगे. यानी खींचतान चलती ही रहेगी."
प्रोफ़ेसर आशुतोष का मानना है कि कांग्रेस हाई कमान को पहले ही हस्तक्षेप करना चाहिए था.
वे कहते हैं, "पार्टी केरल, असम हार गई. बंगाल में शून्य पर पहुँच गई. लेकिन ये साफ़ है कि कांग्रेस हाई कमान ने कोई सबक नहीं सीखे."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
विवाद का चुनाव पर असर
प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, "2017 के पंजाब चुनाव के समय अमरिंदर ने धमकी दी थी कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो वे पार्टी तोड़ देंगे. वे फिर वही कर सकते हैं."
वे कहते हैं कि 2016 के अंत में एक समय ऐसा लग रहा था कि 'आप' पंजाब का चुनाव जीत भी सकती है लेकिन 2017 में अमरिंदर का जीतना इसलिए भी संभव हुआ क्यूंकि 'आप' ने कई गड़बड़ियां कीं.
वे कहते हैं, "आप नेताओं पर खालिस्तानियों से पैसे लेने के आरोप लगे. इससे हिन्दू वोट कांग्रेस की तरफ़ चले गए. आप ने टिकट देने में भी गड़बड़ी की. सबसे बड़ी बात ये हुई कि अरविन्द केजरीवाल ख़ुद ही चुनाव अभियान का चेहरा बन गए."
मौजूदा विवाद के चलते उनका मानना है कि अमरिंदर और सिद्धू की जोड़ी नहीं चल सकती क्योंकि दोनों ही मिलजुल कर काम करने वालों में से नहीं हैं.
साथ ही वे कहते हैं कि ऐसा लग रहा है कि 'आप' सिद्धू को स्वीकार करने के लिए तैयार है और कांग्रेस हाई कमान को लग रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस का नुकसान होगा.

इमेज स्रोत, Getty Images
सिद्धू अगर पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए
प्रोफ़ेसर आशुतोष कहते हैं, "अगर सिद्धू पंजाब कांग्रेस की अध्यक्षता स्वीकार कर लेते हैं और पार्टी कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएँगी. अमरिंदर उन्हें काम करने नहीं देंगे. टिकट वितरण में भी अमरिंदर सिद्धू को खुली छूट नहीं देंगे. और अगर हाई कमान ने अमरिंदर पर ज़्यादा दबाव डाला तो वे पार्टी तोड़ सकते हैं. वे एक समय अकाली दल में रहे हैं. उनका अपना जनाधार और प्रभाव क्षेत्र है. अगर उन्हें लगा कि वह मुख्यमंत्री नहीं बनने जा रहे तो ऐसी स्थिति में वे पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे."
प्रोफेसर आशुतोष पूछते हैं कि हरीश रावत जो दो सीटों पर लड़ने के बावजूद एक पर भी चुनाव नहीं जीत पाए उनका राजनीतिक क़द क्या है? क्या अमरिंदर सिंह उन्हें कुछ समझेंगे?
वे कहते हैं, "अमरिंदर कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं और उन्होनें कई चुनाव जीते हैं और पार्टी को जिताया है. उन्हें दो बार दिल्ली बुला के अपने से छोटे क़द के नेताओं के सामने पेश होने को कहना बहुत ही बचकाना था. ऐसा करके उन्हें अपमानित किया गया है."
वे कहते हैं कि अगर ये विवाद न हुआ होता तो कांग्रेस बहुत अच्छी स्थिति में थी.
वे कहते हैं, "कैप्टन ने किसानों के मुद्दे को बड़ी चतुराई से संभाला जिसकी वजह से इस मुद्दे की वजह से कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं हुआ. कांग्रेस अभी भी बहुमत हासिल कर सकती है अगर वह इस मुद्दे को संभाल लेती है."
डॉ प्रमोद कुमार कहते हैं कि इस संकट की जड़ कहीं और है. सिद्धू और अमरिंदर के बीच जो संघर्ष है उसकी एक पृष्ठभूमि है और वो पृष्ठभूमि सरकार के शासन से जुड़ी हुई है.
वे कहते हैं, "कांग्रेस हाई कमान ने लोगों को यह सन्देश दे दिया है कि हमारी सरकार कुछ ख़ास काम नहीं कर सकी है. मुख्यमंत्री ने हाई कमान को बताया कि उनके कुछ मंत्री भ्रष्ट हैं. तो इससे लोगों को यह सन्देश जा रहा है कि कांग्रेस की सरकार भ्रष्ट थी. मुख्यमंत्री नॉन-परफार्मिंग थे. फिर भी हमें वोट दें."
डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार इस विवाद को इस तरह से देखा जाना चाहिए कि कांग्रेस की हार इन दोनों नेताओं के संघर्ष की वजह से नहीं होगी बल्कि यह कि 'ये संघर्ष ही इसलिए हुआ क्योंकि सरकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं था.'
वे कहते हैं, "यह एक ऐसी सरकार थी जिसने काम करके नहीं दिखाया. कांग्रेस जनता से पूरी तरह कट गई और भ्रष्टाचार पनपा."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














