चंद्रशेखर को अँधेरे में रखकर जब बहुत चतुराई से बनाया गया था वीपी सिंह को प्रधानमंत्री- विवेचना

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल को 144 सीटें मिली थीं. उसने वामपंथियों और भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से सरकार बनाने का फ़ैसला किया था. हाँलाकि, जनता दल ने वोट विश्वनाथ प्रताप सिंह के नाम पर माँगे थे लेकिन पार्टी ने चुनाव से पहले औपचारिक ऐलान नहीं किया था कि जीत के बाद वो ही प्रधानमंत्री होंगे.
चुनाव परिणाम के बाद उड़ीसा भवन में हुई बैठक में वीपी सिंह के अलावा चंद्रशेखर, मुलायम सिंह यादव, अरुण नेहरू, बीजू पटनायक और देवीलाल मौजूद थे. वहीं पर चंद्रशेखर ने वीपी सिंह के मुँह पर उनसे कहा था, "विश्वनाथ अगर आप नेता का चुनाव लड़ रहे हैं, तो मैं भी लड़ूँगा."

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तब देवीलाल चंद्रशेखर को दूसरे कमरे में ले गए थे. इसके बाद ही वीपी सिंह को बिना किसी चुनाव के प्रधानमंत्री बनाए जाने की योजना बनी थी.

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हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गाँधी और मैं' के लेखक संतोष भारतीय बताते हैं, ''अरुण नेहरू ने एक योजना बनाई. उन्होंने पहले बीजू पटनायक को तैयार किया और उसके बाद देवीलाल को. उनकी योजना थी कि हम चंद्रशेखर से कहेंगे कि हम वीपी सिंह की जगह संसदीय दल के नेता के रूप में देवीलाल का नाम प्रस्तावित करेंगे. इस योजना का दूसरा हिस्सा वो वीपी सिंह और चंद्रशेखर दोनों से छिपा गए कि जब देवीलाल को विजयी घोषित किया जाएगा तो वो अपनी तरफ़ से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम प्रस्तावित कर देंगे.''
''2 दिसंबर, 1989 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में जनता दल के साँसदों की बैठक हुई जिसमें बिल्कुल यही हुआ. जैसे ही देवीलाल का नाम घोषित हुआ खामोशी छा गई. लेकिन जैसे ही देवीलाल ने वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित किया हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा.''

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चंद्रशेखर ने किया वॉकआउट
लेकिन चंद्रशेखर को वीपी सिंह का इस तरह नेता चुना जाना बहुत नागवार गुज़रा. वो अचानक उठ खड़े हुए और बाहर जाने से पहले बोले, ''मुझे ये फ़ैसला स्वीकार नहीं है. मुझसे कहा गया था कि देवीलाल नेता चुने जाएंगे. ये धोखा है. मैं सभा से उठकर जा रहा हूँ.''
उसी दिन से जनता दल सरकार और पार्टी के विघटन की नींव पड़ गई. बाद में चंद्रशेखर ने अपनी आत्मकथा 'ज़िंदगी का कारवाँ' में लिखा, ''मुझे यह महसूस हुआ जैसे सरकार का आरंभ ही कपटपूर्ण हुआ. यह बहुत निम्न स्तर की राजनीति थी जिसमें विश्वनाथ प्रताप सिंह एक नैतिक पुरुष के रूप में उभरे. उनका उदय राजनीति में फिसलन की शुरुआत थी. भ्रष्टाचार के मुद्दे को उन्होंने भावनात्मक बना दिया. जब जनता को किसी मुद्दे पर भावनात्मक बना दिया जाता है तो तर्क की गुंजाइश कम रह जाती है. भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए जो संस्थात्मक व्यवस्थाएं होनी चाहिए, सरकार में आने के बाद वीपी सिंह को उन्हें बनाने की चिंता नहीं थी.''

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संतोष भारतीय का भी मानना है कि अगर नेता पद का चुनाव होता तो वीपी सिंह बेहतर हालत में होते.
भारतीय बताते हैं, ''चुनाव में सौ प्रतिशत संभावना थी कि जीत वीपी सिंह की ही होती. यहाँ गाँधीजी का सिद्धाँत फिर सही साबित हुआ कि ग़लत रास्ते से सही मंज़िल नहीं मिलती. लेकिन, षड्यंत्र कर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने वालों ने ये नहीं सोचा कि वीपी सिंह भी भविष्य में षड्यंत्र से हटाए जा सकते हैं. यही हुआ, उन्हें दूसरे तरह के षड्यंत्र से हटाया गया.''

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यशवंत सिन्हा को कैबिनेट मंत्री न बनाने पर बवाल
जब वीपी सिंह ने अपना मंत्रिमंडल बनाया तो उन्होंने यशवंत सिन्हा को राज्यमंत्री बनाना चाहा जिसे उन्होंने चंद्रशेखर के कहने पर अस्वीकार कर दिया. उन्होंने सुबोधकाँत सहाय को राज्यमंत्री बनाया, इस उम्मीद में कि वो चंद्रशेखर के साथ उनका रिश्ता सामान्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

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वह चंद्रशेखर और वीपी सिंह के बीच पुल नहीं बन पाए. बाद में यशवंत सिन्हा ने अपनी आत्मकथा 'रेलेंटलेस' में लिखा, ''राष्ट्रपति भवन पहुंच कर जब मैंने कैबिनेट सचिव टीएन सेशन का दिया लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमें लिखा था कि राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री की सलाह पर मुझे राज्यमंत्री नियुक्त किया है. मुझे महसूस हुआ कि वीपी सिंह ने मेरे साथ न्याय नहीं किया है. मैंने तय किया कि पार्टी में अपनी वरिष्ठता और उसके चुनाव प्रचार में भूमिका को देखते हुए मैं जूनियर मंत्री का पद नहीं स्वीकार कर सकता. दस सैकेंड में मैंने फ़ैसला लिया. मैंने अपनी पत्नी की बाँह पकड़ी और फुसफुसाते हुए लेकिन दृढ़ लहजे में कहा, चलो वापस चलें.''

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देवीलाल का उप प्रधानमंत्री बनना
2 दिसंबर, 1989 को राष्ट्रपति आर वैंकटरमण ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई. उनके साथ देवीलाल ने उप प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. भारत के संविधान में उप प्रधानमंत्री पद का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए उप प्रधानमंत्री द्वारा पढ़े गए शपथ पत्र में उनके लिए मंत्री लिखा जाता है.
सीमा मुस्तफ़ा ने वीपी सिंह की जीवनी 'द लोनली प्रॉफ़ेट वीपी सिंह अ पोलिटिकल बॉयोग्राफ़ी' में लिखा, ''देवीलाल ने पहले से तैयार शपथपत्र की अनदेखी करते हुए उप प्रधानमंत्री कहा. राष्ट्रपति वैंकटरमण ने उन्हें शपथ पत्र के मसौदे का पालन करने के लिए टोका लेकिन देवीलाल पर इसका कोई असर नहीं हुआ. दो बार के प्रयास के बाद वैंकटरमण ने उन्हें सही करने का प्रयास छोड़ दिया.''

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रुबइया सईद का अपहरण
वीपी सिंह ने एक मुस्लिम और वो भी कश्मीर के एक नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद को गृह मंत्री बना कर एक ख़ास संदेश देने की कोशिश की.

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इंदर कुमार गुजराल अपनी आत्मकथा 'मैटर ऑफ़ डिसक्रेशन' में लिखते हैं, ''इस क़दम से वीपी सिंह ने एक तीर से दो शिकार किए. एक तरफ़ तो उन्होंने अल्पसंख्यकों को संदेश दिया कि इस सरकार में उनकी पहुंच काफ़ी ऊपर तक है . दूसरी तरफ़ उन्होंने देवीलाल और अरुण नेहरू दोनों को भी दरकिनार किया जो भारत के गृह मंत्री बनने की महत्वाकाँक्षा पाले हुए थे.''

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लेकिन वीपी सिंह सरकार को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब सरकार बनने के कुछ दिनों के अंदर पृथकतावादियों ने मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबइया सईद का अपहरण कर लिया और वीपी सिंह सरकार को उनको रिहा करने के बदले पाँच पृथकतावादियों हमीद शेख़, शेर ख़ाँ, जावेद अहमद ज़रगर, मोहम्मद कलवल और मोहम्मद अल्ताफ़ बट्ट को रिहा करना पड़ा.
संतोष भारतीय बताते हैं, ''यह विशुद्ध मानवीय भावना में बहकर लिया गया निर्णय था, जिसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं निकले. इससे ये संदेश गया कि विश्वनाथ प्रताप सिंह पर दबाव डाल कर कुछ भी काम कराया जा सकता है. अगर वीपी सिंह वो समझौता नहीं करते तो इतिहास में एक अलग तरह के प्रधानमंत्री के तौर पर उनका नाम होता.''
सरकार पर अरुण नेहरू का शिकंजा
वीपी सिंह ने अरुण नेहरू के गृह मंत्री बनने के मंसूबों पर तो पानी फेर दिया लेकिन सरकार पर अरुण नेहरू की पकड़ मज़बूत होती चली गई. दिलचस्प बात ये थी कि यही अरुण नेहरू राजीव गाँधी की सरकार में वीपी सिंह के सबसे बड़े विरोधी हुआ करते थे.
लेकिन वीपी सिंह के शासनकाल में अरुण नेहरू न सिर्फ़ सभी मंत्रियों पर नज़र रखने लगे बल्कि प्रधानमंत्री का नाम लेकर इशारों में निर्देश भी देने लगे.

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ये किसी से छिपा नहीं रहा कि सरकार बनने के बाद वीपी सिंह अरुण नेहरू से सबसे ज़्यादा सलाह मशविरा करते थे. धीरे-धीरे ये संदेश पहुंचने लगा कि अरुण नेहरू ही सरकार चला रहे हैं. अरुण नेहरू की सलाह पर उन्होंने जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया.
सीमा मुस्तफ़ा विश्वनाथ प्रताप सिंह की जीवनी में लिखती हैं, "इमरजेंसी के दौरान दिल्ली के उपराज्यपाल के पद पर काम करते हुए जगमोहन ने मुस्लिम विरोधी रवैया अपनाया था. जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फ़ारूख़ अब्दुल्लाह ने इस फ़ैसले का घोर विरोध किया था. उन्होंने इसके विरोध में इस्तीफ़ा दे दिया. चंद्रशेखर खुलेआम उनके समर्थन में आए और इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी ही पार्टी पर ज़ोरदार हमला बोला.''
''वीपी सिंह गुजरात में थे कि जगमोहन ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा भंग कर दी. बाद में कश्मीरी नेता मौलवी मीरवाइज़ फ़ारूख़ की शवयात्रा के दौरान पुलिस फ़ायरिंग हुई जिसमें कई लोग मारे गए. वीपी सिंह को अंतत: जगमोहन को हटा कर गिरीश सक्सेना को वहाँ भेजना पड़ा.''

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सरकार का दूरदर्शन ही वीपी सिंह के ख़िलाफ़
विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने सारे मंत्रियों को पूरी तरह आज़ादी दे दी और प्रधानमंत्री कार्यालय को एक तरह से शून्य कर दिया. आज़ादी यहाँ तक बढ़ी कि मंत्रियों का तालमेल ही ख़त्म हो गया और ऐसा लगने लगा कि मंत्रिमंडल में जैसे कई प्रधानमंत्री है. हर शुक्रवार को होने वाली संसदीय दल की बैठक में मंत्रियों ने आना बंद कर दिया.
संतोष भारतीय कहते हैं, ''वीपी सिंह का सबसे बड़ा दुश्मन उनके अपने घर में था, उनका दूरदर्शन. चूँकि सूचना और प्रसारण मंत्री पी उपेंद्र मंडल आयोग के ख़िलाफ़ थे, मंडल आयोग के विरोध का आँदोलन 75 फ़ीसदी दूरदर्शन ने बढ़ाया. दूरदर्शन ने मंडल आयोग क्या है, या इसका रिश्ता रोज़गारों से न हो कर सामाजिक न्याय से है, ये कभी लोगों को बताने की ज़रूरत ही नहीं समझी. इसकी पराकाष्ठा तब हुई जब राष्ट्र के नाम मंडल आँदोलन पर दिया गया प्रधानमंत्री का संदेश तक दूरदर्शन पर सेंसर हुआ.''

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देवीलाल की बर्खास्तगी
वीपी सिंह की सरकार दो बैसाखियों पर टिकी थी- भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी. जब लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार किया गया तो भाजपा ने 23 अक्तूबर, 1990 को सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. आखिरकार 7 नवंबर को विश्वास मत हारने के बाद वीपी सिंह की सरकार चली गई.
चंद्रशेखर ने अपनी आत्मकथा 'ज़िंदगी का कारवाँ' में लिखा, ''इससे पहले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने देवीलाल को उप प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था. जो कारण बताए गए उनका औचित्य मुझे समझ में नहीं आया. उनके बारे में कहा गया कि वो हर क़दम पर सरकार का विरोध कर रहे थे. इसे भीतरघात माना गया. पता नहीं प्रधानमंत्री ने इस बारे में किसी से राय ली या नहीं. अगर उनका देवीलाल से किसी बात पर मतभेद था तो उन जैसे वरिष्ठ व्यक्ति से त्यागपत्र लिया जाना चाहिए था.''
''दरअसल देवीलाल को नीचा दिखाने के लिए मंडल का नारा लगाया गया. तभी भाजपा ने सोचा कि अब इसके विकल्प के तौर पर धर्म की बात की जाए. इसलिए रथयात्रा की योजना बनी. इन घटनाओं से किसको नफ़ा-नुक्सान हुआ, यह अलग बात है, लेकिन भारतीय राजनीति में विघटनकारी ताकतों को बल मिला.''

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मंडल के कारण भाजपा ने समर्थन वापस लिया
सवाल उठता है कि वीपी सिंह ये क्यों मान कर चल रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी उनका आख़िर तक समर्थन करेगी जबकि उन दोनों की विचारधारा में ज़मीन-आसमान का अंतर था.
इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख राम बहादुर राय अपनी किताब 'मंज़िल से ज़्यादा सफ़र' में लिखते हैं, ''जब मैंने वीपी सिंह से पूछा कि क्या आप शुरू से मानते थे कि अंतत: भाजपा और आपका रास्ता अलग-अलग होगा तो उनका जवाब था, मैंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही हिसाब लगाया कि भाजपा से हमारी कितने साल निभेगी. ये साफ़ था कि भाजपा उसी गद्दी पर बैठना चाहती थी जिस पर मैं बैठा था. उसे मेरा विरोध करके ही चुनाव में जाना पड़ता.''
''मेरा उस समय मानना था कि भाजपा हमारी सरकार का कम से कम दो साल समर्थन करेगी. मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के कारण उसने एक साल पहले बटन दबा दिया. अगर मंडल आयोग लागू नहीं करते तो भाजपा समर्थन देती रहती.''

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जनता दल के अधिक्तर साँसद चाहते थे मंडल आयोग
मैंने संतोष भारतीय से पूछा क्या मंडल आयोग वीपी सिंह का मास्टरस्ट्रोक था या मजबूरी में लिया गया फ़ैसला?
उनका जवाब था, ''वीपी सिंह सैद्धांतिक रूप से इसे लागू करना चाहते थे और अपनी पार्टी का घोषणापत्र अपने हाथ में रखते थे. जनता संसदीय दल की 6 अगस्त को हुई बैठक में ज़बरदस्त माँग उठी कि मंडल कमीशन लागू किया जाए. यह माँग जिन सदस्यों ने उठाई उन्होंने बाद में दल बदल लिया पर वीपी सिंह ने इस माँग को दल के घोषणापत्र पर अमल की एक सीढ़ी समझा.''
''संसदीय दल की बैठक में किसी साँसद ने नहीं कहा कि इसे लागू नहीं किया जाना चाहिए या रुक-रुक कर लागू करना चाहिए. सामाजिक न्याय की दिशा में उठे इस क़दम ने उन ताक़तों को चौंका दिया जो सामाजिक न्याय के ख़िलाफ़ थीं. ग़लतफ़हमी का आलम ये था कि जिन्हें मंडल कमीशन से फ़ायदा हो रहा था, वही लोग मंडल कमीशन के ख़िलाफ़ आँदोलन कर रहे थे.''

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उधर राम बहादुर राय अपनी किताब 'मंज़िल से ज़्यादा सफ़र' में लिखते हैं, ''वीपी सिंह ने मुझे बताया था कि अरुण नेहरू, आईके गुजराल और राम कृष्ण हेगड़े मंडल आयोग के खिलाफ़ थे. रामकृष्ण हेगड़े ने पार्टी में इस मामले को उठाया था. चूँकि जाट मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों में नहीं थे, इसलिए अजीत सिंह भी नाराज़ थे. लेकिन जनता दल में उत्तर प्रदेश और बिहार के जो साँसद थे, उनमें से 95 फ़ीसदी मंडल आयोग के समर्थन में थे.''

वीपी सिंह आए मध्यम वर्ग के निशाने पर
मंडल आयोग को लागू करने की वजह से जहाँ विश्वनाथ प्रताप सिंह को पिछड़े वर्ग की वाहवाही मिली वहीं, उन्हें मध्यम वर्ग के एक बहुत बड़े हिस्से का कोपभाजन भी बनना पड़ा.
7 नवंबर, 1990 की रात ग्यारह घंटे की बहस के बाद सवा दस बजे हुए विश्वास मत में वीपी सिंह सरकार के पक्ष में 142 और विपक्ष में 346 वोट पड़े.
अगले ही दिन जनता दल में विभाजन हो गया. दो मुख्यमंत्रियों मुलायम सिंह यादव और चिमनभाई पटेल ने चंद्रशेखर का साथ पकड़ा तो लालू प्रसाद यादव वीपी सिंह के पक्ष में खड़े देखे गए.

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कुछ साँसदों ने चंद्रशेखर का दामन पकड़ा जिन्होंने समाजवादी जनता दल के नाम से नई पार्टी बनाई. लेकिन कांग्रेस के बाहरी सहयोग से बनी उनकी सरकार भी ज़्यादा दिन नहीं चली और उसे भी इस्तीफ़ा देना पड़ा.
वीपी सिंह के 11 महीने के शासनकाल पर उन्हीं के मंत्रिमंडल के अहम सदस्य इंदर कुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा 'मैटर ऑफ़ डिसक्रेशन' में टिप्पणी की थी, ''वीपी सिंह की टीम में बौद्धिक गहराई का अभाव था. उनकी सरकार की नीतियाँ प्रो-एक्टिव न हो कर रि-एक्टिव थीं. उन्होंने अपने घोषणापत्र की मशीनी अंदाज़ में व्याख्या की थी. इसके सामाजिक परिणामों का अंदाज़ा वो नहीं लगा पाए. एक व्यक्ति के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उच्चतम मापदंडों को छुआ लेकिन एक राजनीतिक नेता के रूप में उनके पास दिशाबोध की कमी थी. वो देश का भला चाहते थे लेकिन वो एक अच्छे समन्वयक और टीम लीडर नहीं थे.''
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