जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले परिसीमन ज़रूरी क्यों - क्या हैं मायने?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार शाम अपने आवास पर जम्मू - कश्मीर के नेताओं के साथ एक अहम बैठक में कहा है कि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन तेज़ गति से होना चाहिए ताकि चुनाव हो सकें.
इसके साथ ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी ट्वीट किया है कि “संसद में राज्य का दर्जा बहाल करने का जो वादा किया गया था उसकी दिशा में परिसीमन की प्रक्रिया और शांतिपूर्ण चुनाव महत्वपूर्ण चरण हैं.”
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इस बैठक में जम्मू-कश्मीर से 14 नेता शामिल हुए थे जिन्होंने बैठक के बाद टीवी चैनलों से बात करते हुए कहा कि उन्हें बताया गया है कि पहले परिसीमन होगा, फिर चुनाव होगा.
इस बैठक से पहले कश्मीर के मसले पर एक बड़ा सवाल था कि कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कैसे शुरू हो सकती है?
उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बैठक में शायद इस समस्या का हल निकल सकता है. लेकिन बैठक में ये तय हुआ है कि पहले परिसीमन होगा, फिर चुनाव होगा. परिसीमन जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू होने की दिशा में एक नयी बाधा के रूप में नज़र आता है.
ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव होने की दिशा में परिसीमन की अनिवार्यता के मायने क्या हैं.

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चुनाव से पहले परिसीमन का मतलब क्या?
परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसकी मदद से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को तय किया जाता है ताकि सभी नागरिकों को संसद और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व प्रदान किया जा सके. ये एक सामान्य प्रक्रिया है जिसे एक निश्चित अंतराल पर दोहराया जाता है ताकि जनसंख्या में हुए बदलावों को ध्यान में रखते हुए मतदाताओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.
जम्मू-कश्मीर में आख़िरी परिसीमन साल 1995 में हुआ था. फिलहाल जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 83 सीटें हैं जिनमें 37 सीटें जम्मू क्षेत्र में और 46 सीटें कश्मीर क्षेत्र में आती हैं. इसके साथ ही 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए भी आरक्षित हैं.
ऐसे में सरकार बनाने के लिए सिर्फ 44 सीटों की ज़रूरत पड़ती है. जम्मू के लोगों के बीच ये एक असंतोष का विषय है कि साल 1947 के बाद से अब तक जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री बनने वाला शख़्स कश्मीर से आता रहा है. हालांकि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद जम्मू को डोडा इलाक़े से आते हैं.
लेकिन परिसीमन होने के बाद विधानसभा सीटों की संख्या और क्षेत्र में परिवर्तन होने की आशंकाएं जताई जा रही है. ऐसे में राजनीतिक दल इसे बेहद संदेह के साथ देख रहे हैं.
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दशकों से कश्मीर से रिपोर्टिंग कर रहे बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, “चरमपंथ पनपने के बाद से जम्मू और कश्मीर के बीच एक तरह से ध्रुवीकरण हो गया है. पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस हुआ करती थी. जम्मू से लेकर कश्मीर तक हिंदू मुस्लिम सब वोट डालते थे. लेकिन 2008 से जब बीजेपी का उदय हुआ तो वहां पर एक ही तरह की विचारधारा पर वोट पड़ते हैं. कश्मीर घाटी में तरह - तरह की विचारधाराओं पर वोट पड़ते हैं. इससे जम्मू से एक बड़ी राजनीतिक शक्ति उभरती है. लेकिन कश्मीर में वोट बंटे हुए होते हैं. जैसे पीडीपी को कुछ सीटें मिलती हैं, एनसी को कुछ सीटें मिलती हैं.
अब इन्हें ये आशंका है कि अगर जम्मू वालों को ज़्यादा सीटें दी गयीं तो चूंकि विधानसभा में सरकार बनाने के लिए आपको सिर्फ 44 सीटों से भी कम चाहिए क्योंकि लद्दाख़ की सीटें घट गयी हैं. ऐसे में अगर नये परिसीमन में जम्मू की सीटें 37 से बढ़कर 47 हो जाएं और जम्मू से ही 44 सीटों पर चुनकर आ जाएं तो यहां के राजनीतिक गुटों को लगता है कि वे अलग-थलग पड़ जाएंगे और कश्मीर पर जम्मू का दबदबा बनेगा.
वहीं, जम्मू में एक नैरेटिव चलता है कि आज़ादी से लेकर आज तक राज्य का मुख्यमंत्री कश्मीरी ही क्यों हो. उनका मानना है कि पिछले सत्तर वर्षों में उन्हें उनका अधिकार नहीं मिला. इसमें हिंदू सीएम बनने की बात भी है. ऐसे में कश्मीर के राजनेताओं को शक्ति हाथ से जाने का डर सता रहा है.”
जम्मू-कश्मीर के इतिहास को समझने वाले प्रोफेसर हरि ओम बताते हैं कि ”ये राज्य उस दौर से गुज़रा है जब बंद कमरों में बैठकर जनगणना हो जाया करती थी. जम्मू का दर्द ये है कि कभी भी ठीक तरह से प्रतिनिधित्व नहीं मिला.”

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परिसीमन पर क्या सोचते हैं जम्मू-कश्मीर के नेता?
उप चुनाव आयुक्त चंद्र भूषण कुमार ने बीते बुधवार जम्मू और कश्मीर के ज़िला चुनाव अधिकारियों के साथ बैठक की है. माना जा रहा है कि गुरुवार को हुई बैठक के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस परिसीमन की प्रक्रिया में भाग लेगी क्योंकि संबंधित क्षेत्र के सांसद भी आयोग के सहयोगी सदस्य होते हैं.
अब तक एनसी इसका विरोध करती आ रही थी लेकिन बैठक के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्लाह ने कहा है कि अगर आयोग की तरह से दावत आती है तो उनकी पार्टी इस पर विचार करेगी.
जम्मू से लेकर कश्मीर तक हर पार्टी परिसीमन को अपनी–अपनी चिंताओं के साथ देख रही है.
जम्मू से आने वाले अरविंद गुप्ता कहते हैं कि “हमारी हमेशा से ये माँग रही है कि परिसीमन को ठीक किया जाए. और इसे जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से किया जाए. मिसाल के रूप में अभी भी कश्मीर में ऐसी विधानसभाएं हैं जिनका क्षेत्रफल 100 से 150 वर्ग किलोमीटर है. लेकिन जम्मू में ऐसी विधानसभाएं हैं जहां का क्षेत्रफल 800-900 वर्ग किलोमीटर है. ऐसे में हमारी माँग है कि इसे ठीक किया जाए.”
वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी कहते हैं कि “हमारी माँग यही है कि ये एक स्वायत्त संस्था है, इसे एक स्वायत्त संस्था की तरह काम करते दिखना भी चाहिए और जब पूरे मुल्क में 2026 में परिसीमन होना है तो यहां पर अलग से क्यों किया जा रहा है.”
कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रविंद्र शर्मा भी इसी तरह की माँग करते हुए बताते हैं, “यहां पर एक तरह का भ्रम फैला हुआ है कि बीजेपी सब खाका बना रही है. सब जगह चर्चा है कि फलां क्षेत्र उस विधानसभा में लगेगा और फलां इलाका वहां लगेगा. ऐसे में ये सब कौन कर रहा है. कमिशन ने तो अब तक कुछ नहीं कहा है. फिर ये सब कहां से फैल रहा है. ऐसे में लोगों को ये भ्रम है कि जैसे पहले एकतरफा कार्यवाहियां हुई हैं, वैसे ही इस बार भी न हो. कमिशन पर भी ये एक प्रश्न चिह्न है. ऐसे में हम चाहते हैं कि ये प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से संपन्न हो.”
जम्मू-कश्मीर के अलग–अलग दलों की ओर से जताई जा रही आशंकाओं के केंद्र में बस एक बात है कि कहीं इस परिसीमन में कुछ ऐसा न हो जाए कि उनके लिए ज़मीनी हक़ीकत ही बदल जाए.

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सरकार क्या कर सकती है?
प्रधानमंत्री मोदी के साथ गुरुवार को हुई मीटिंग के बाद जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं ने बेहद सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी हैं. बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए कई नेताओं ने कहा कि उनकी बातों को बेहद धैर्य के साथ सुना गया और वे भविष्य के लिए काफ़ी आश्वस्त हैं.
लेकिन उमर अब्दुल्लाह ने विशेष तौर पर इसका विरोध किया है.
उन्होंने कहा, “जब बाकी मुल्क में 2026 को परिसीमन होना है तो जम्मू-कश्मीर में अभी क्यों किया गया है. अजीब बात ये है कि जब जम्मू-कश्मीर के लिए परिसीमन का ऐलान हुआ था तब असम के लिए भी हुआ था. लेकिन असम के परिसीमन का सिलसिला रोक दिया गया. और उनके फिर चुनाव किए. लेकिन जम्मू-कश्मीर के परिसीमन की प्रक्रिया अभी भी चालू रखी हुई है. हमने वज़ीर-ए-आज़म साहब से कहा है कि इसकी ज़रूरत नहीं है. अगर वाकई पाँच अगस्त को संसद में हुए फैसले का मकसद जम्मू-कश्मीर को हिंदुस्तान के साथ मिलाना था तो ये जो हमें अलग करके परिसीमन हो रहा है, ये पाँच अगस्त के फैसले को विफल करता है.”
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सरकार कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरु करना चाहती थी तो इसमें परिसीमन एक रोड़ा क्यों बना.

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जम्मू-कश्मीर की राजनीति को समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन यही सवाल उठाते हुए कहती हैं, “परिसीमन का तर्क समझ नहीं आता है. जब तक कि बीजेपी ये नहीं चाहती है कि वे जम्मू – कश्मीर में पहला हिंदू मुख्य मंत्री लेकर आएं. इसके अलावा कोई तुक नहीं बनती है. क्योंकि इससे पहले भी चुनाव हुए हैं. जम्मू के लोगों का कहना है कि ये परिसीमन 2011 की जनगणना के हिसाब से हो रहा है, ऐसे में ये पुरानी जनगणना के आधार पर हो रहा है. ऐसे में कोई भी इससे ख़ुश नहीं है. ऐसे में समझ नहीं आता है कि परिसीमन को एक शर्त क्यों बनाया गया है
सरकार कहती है कि अनुच्छेद 370 पर कोई बात नहीं कर सकते हैं क्योंकि वह मसला कोर्ट में लंबित है. ये एक संविधान से जुड़ा मसला था इस पर बात क्यों नहीं हो सकती. और अगर वह सब-ज़्युडिश है तो उससे जुड़े बाकी सभी मसले भी सब-ज्युडिस हैं. लेकिन आप इससे जुड़े दूसरे मसलों पर बात करने के लिए तैयार हैं. ऐसे में ये एक तरह का पाखंड है.”
साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के साथ कश्मीर एक लंबे लॉकडाउन में चला गया था. इसके बाद धीरे-धीरे गतिविधियां शुरू हुईं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, भारतीय सेना ने कहा है कि जम्मू - कश्मीर में हिंसा के मानकों में पचास फीसदी की गिरावट आई है और स्थिति काफ़ी संतुलित है.
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कश्मीर पर किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राहुल पंडिता मानते हैं कि कश्मीरियों के दिलों और ज़हन में एक स्कित्ज़ोफ्रेनिया भर दिया गया है, उन्हें समझ नहीं आता है कि वे अलगाववादियों के साथ जाएं या सरकार के साथ जाएं.
वे कहते हैं, “स्पष्ट रूप से ऐसा लगता है कि सरकार के पास कश्मीर को लेकर किसी तरह का रोड मैप नहीं है. कल तक जिन नेताओं को आप गुपकार गैंग बुला रहे थे. आज आप उनके साथ बातचीत कर रहे हैं. ऐसे में ये स्पष्ट नहीं कि क्या बदल गया है. और मैं अंतरराष्ट्रीय दबाव की बात से सहमत नहीं हूं.
परिसीमन की शर्त पर चुनाव की बात करें तो उसे लेकर भी कोई योजना नहीं है. जम्मू में हिंदू बाहुल्य आबादी है. बीजेपी उस आबादी को संतुष्ट रखना चाहती है. कोशिश है कि किसी तरह कोई संयोग बने और जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री एक हिंदू समुदाय से आने वाला व्यक्ति हो.
एंटी-इंसर्जेंसी डॉक्टरीन है सरकार की. लेकिन आप उस इकोसिस्टम पर चोट नहीं कर रहे हैं जो कि कश्मीर में आतंक के बीज बोता है. मैंने अपनी हालिया किताब में एक युवक का ज़िक्र किया है जो कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा है. पाकिस्तानी जैश के कमांडर उस लड़के तक अपनी पहुंच बना लेते हैं. उसे इतना रैडकलाइज़ कर देते हैं कि वह उनका एक कोरियर बन जाता है. मेरा सवाल है कि क्या एक राष्ट्र के रूप में भारत की इतनी सामर्थ्य नहीं है कि उस लड़के वैज-उल-इस्लाम तक जैश या लश्कर से पहले नहीं पहुंच सकता.”
उमर अब्दुल्लाह से लेकर महबूबा मुफ़्ती ने कल की बैठक के बाद शांतिपूर्ण ढंग से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की बात की है.
और भरोसा कायम करने की ज़िम्मेदारी सरकार पर डाली है.
अब देखने की बात ये होगी कि सरकार किन रास्तों पर चलकर कश्मीर में राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत सुनिश्चित करती है या परिसीमन जम्मू से लेकर कश्मीर में एक नये विवाद की जड़ बनता है.
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