कोरोना से हुई मौतों के बारे में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का दावा बेबुनियाद, सरकार ने दी सफ़ाई

कोरोना से मौत

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भारत में कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर अब धीरे-धीरे कम होने लगी है. जहां दैनिक मामलों में कमी आई है वहीं रिकवरी रेट भी बढ़ी है तो वैक्सीनेशन की रफ़्तार में भी इजाफ़ा हुआ है. लेकिन कोरोना महामारी से हुई मौतों के आंकड़े को लेकर अब भी उहापोह की स्थिति बनी हुई है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी केंद्र सरकार पर कोरोना वायरस से हुई मौतों के आंकड़े छुपाने का आरोप लगा रहे हैं तो एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ने अपने लेख में कहा है भारत में जो आधिकारिक आंकड़े बताए जा रहे हैं मौतों की संख्या उससे पाँच या सात गुना अधिक है.

मौत के आंकड़ों पर इस पत्रिका के लेख को केंद्रित करते हुए पीआईबी एक फैक्ट चेक लेकर आई है.

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इस फ़ैक्ट चेक में क्या है?

पीआईबी ने लिखा, "एक प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ने अपने एक लेख में भारत में कोविड-19 से हुई मौतों का अनुमान लगाया है कि शायद यह आधिकारिक संख्या से पाँच से सात गुना अधिक है."

"यह पूरी तरह अनुमानों पर आधारित है और बेबुनियाद है. ऐसा लगता है कि इसमें ग़लत सूचनाएं दी गई हैं. इस अनुचित कथित लेख का विश्लेषण बिना किसी महामारी विज्ञान के साक्ष्यों के एक ख़ास डेटा के ट्रेंड पर आधारित है."

"अधिक मृत्यु दर के अनुमानों के रूप में अपने शोध में पत्रिका ने जिस शोध का उपयोग किया है वो किसी भी देश में मृत्यु दर को निर्धारित करने के मान्य टूल नहीं हैं."

पीआई बी के अनुसार "पत्रिका ने जिस तथाकथित सबूत का उल्लेख किया है वो कथित रूप से वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के क्रिस्टोफर लाफ़लर का किया गया शोध है. पबमेड, रिसर्च गेट आदि जैसे वैज्ञानिक डेटाबेस में शोध अध्ययन के इंटरनेट सर्च ने यह शोध नहीं किया है और इसे कैसे किया गया है उसका विस्तृत तरीका पत्रिका ने प्रकाशित नहीं किया है."

"पत्रिका में एक और प्रमाण तेलंगाना में इंश्योरेंस क्लेम पर किए गए अध्ययन पर आधारित है. एक बार फिर, इस तरह के शोध पर कोई भी समीक्षा किया हुआ कोई भी समकक्ष वैज्ञानिक डेटा मौजूद नहीं है."

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पीआईबी ने लिखा है "दो अन्य शोध जो इस लेख के आधार हैं, वो चुनावों का विश्लेषण करने वाले समूहों प्रश्नम और सी-वोटर के हैं. इन दोनों का चुनाव के नतीजों का संचालन, भविष्यवाणी और विश्लेषण करने में अनुभव है. ये कभी किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य शोध से नहीं जुड़े रहे. यहां तक कि उनके अपने चुनाव विश्लेषण के क्षेत्र में भी चुनाव नतीजों पर उनकी भविष्यवाणियां कई बार वास्तविक नतीजों से बहुत अलग रही हैं."

पीआईबी ने लिखा कि केंद्र सरकार कोविड डेटा के प्रबंधन के अपने नज़रिए में पारदर्शी रही है

फैक्ट चेक में लिखा गया है "मई 2020 की शुरुआत में, रिपोर्ट की जा रही मौतों की संख्या में विसंगति से बचने के लिए भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च) डब्ल्यूएचओ की अनुशंसा के अनुसार आईसीडी-10 कोड्स के मुताबिक़ सभी मौतों की सही रिकॉर्डिंग के लिए "भारत में कोविड-19 से संबंधित मौतों की रिकॉर्डिंग" नाम से गाइडलाइन ले कर आई. औपचारिक संचार माध्यम से, कई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान और केंद्रीय टीम की नियुक्ति के ज़रिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से निर्धारित गाइडलाइन के मुताबिक मौतों की संख्या की सही रिकॉर्डिंग का आग्रह किया गया."

"केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी ज़िलेवार मामलों और मौतों की दैनिक गिनती पर नियमित निगरानी के लिए एक मजबूत रिपोर्टिंग तंत्र की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. जो राज्य लगातार अपनी रिपोर्ट में दैनिक मौतों की संख्या कम बताते उन्हें फिर से डेटा चेक करने को कहा जाता."

"इसी मामले में केंद्र ने बिहार को दैनिक ज़िलावार विस्तृत ब्यौरा स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजने को कहा गया."

"कोविड जैसी महामारी की स्थिति में मृत्यु दर का आकलन अच्छी तरह किए गए शोध के आधार पर आमतौर पर घटना के बाद किया जाता है, जब विश्वस्त सूत्रों से हुई मौतों का डेटा उपलब्ध होता है. तब जो डेटा निकल कर आता है वो प्रमाणिक माना जाता है."

राहुल गांधी, प्रियंका गांधी

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राहुल गांधी ने केंद्र पर क्या आरोप लगाए?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को यह आरोप लगाया कि केंद्र सरकार वास्तविक कोविड-19 की मौतों को छिपा रही है. उन्होंने एक मीडिया रिपोर्ट साझा करते हुए ट्वीट किया, "भारत सरकार वास्तविक कोविड मौतों को छिपा रही है."

इससे पहले राहुल ने देश के नागरिकों से कोविड-19 की वैक्सीन मुफ़्त देने की मांग करने को कहा था.

अपने ट्वीट में उन्होंने कहा था, "कोविड-19 महामारी के ख़िलाफ़ हमारी रक्षा में वैक्सीन मजबूत ढाल है. आप सभी नागरिकों को मुफ़्त में वैक्सीन पाने के लिए अपनी आवाज़ उठानी चाहिए और केंद्र सरकार को जगाना चाहिए."

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राहुल की बहन और कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी देश में चल रहे कोविड-19 वैक्सीनेशन अभियान को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं.

अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, "हम दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन निर्माताओं में से एक हैं. फिर भी हमारी आबादी के केवल 3.4 प्रतिशत ही पूरी तरह से वैक्सीन लगाया गया है. भारत के भ्रमित और अनिश्चित वैक्सीनेशन कार्यक्रम के लिए कौन ज़िम्मेदार है?"

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डॉ. रणदीप गुलेरिया

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'आंकड़े ग़लत दिखाना, महामारी की लड़ाई में बाधा'

दरअसल ऐसे आरोप हैं कि राज्यों में इस बात की होड़ लगी है कि कौन से राज्य कोरोना से मौतों के आंकड़े में नीचे के पायदान पर है, लिहाज़ा राज्य मौतों के आंकड़ों को कम करके दिखा रहे हैं.

दिल्ली स्थित एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि अस्पतालों और राज्यों को कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े की जांच करानी चाहिए. वे कहते हैं कि कोरोना से हुई मौत का ग़लत क्लासिफिकेशन किया जाना या आंकड़े ग़लत दिखाना इस महामारी की हमारी लड़ाई में बाधा बन सकती है.

डॉ. गुलेरिया ने कहा, "ये वक़्त है अस्पताल और राज्य मौत के आंकड़ों का ऑडिट करें. इसी से हमें पता चलेगा कि वास्तविक मृत्यु दर की क्या स्थिति है और इसे कम करने के लिए क्या कारगर उपाय किए जा सकते हैं. इससे हम वह रणनीति बना सकेंगे जिससे मृत्यु दर कम हो सके."

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