कोरोनाः वैक्सीन लगवाने में महिलाएं क्यों हैं पीछे

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली के सुंदरनगर की रहने वाली निशा पार्लर में काम करती हैं. लॉकडाउन की वजह से पति की नौकरी जाती रही और वो जैसे-तैसे पार्लर में काम करके घर का गुज़ारा चला रही हैं.

निशा ने कोरोना की वैक्सीन लगवाने के लिए एक पहचान वाली महिला की मदद ली. वो एक एनजीओ में काम करती हैं. वैक्सीन के लिए अस्पताल में स्लॉट भी मिल गया लेकिन उन दिनों घर में शादी थी.

निशा कहती हैं, "पार्लर का काम भी जरूरी था क्योंकि घर चलाना है और लॉकडाउन के कारण पार्लर में कभी-कभी ही महिलाएं आती हैं, ऐसे में काम न करो तो पार्लर की मालकिन भी नाराज़ हो जाती. और फिर घर में शादी थी. मुझे डर लग रहा था क्योंकि मैंने सुना था कि वैक्सीन लगवाने से कमज़ोरी होती है, दर्द भी होता है और बुखार भी आता है."

"वैक्सीन लगवाना भी ज़रूरी था लेकिन अगर मैं बीमार पड़ जाती तो न पार्लर का काम नहीं कर पाती और न ही घर में शादी का कामकाज. घर वाले भी ताना देते कि जब घर में शादी थी तो वैक्सीन लगवाना क्या जरूरी था. इसलिए मैंने वैक्सीन का ख़्याल छोड़ दिया. हालांकि मेरे पति वैक्सीन लगवा चुके हैं."

लेकिन कमलेश वैक्सीन न लगवाने का दूसरा कारण बताती हैं.

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उत्तरप्रदेश के प्रयागराज से आने वाली कमलेश घरों में खाना बनाने का काम करती हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि वैक्सीन लगवा लिया? तो उनका जवाब था- नहीं लगवाना. मैंने पूछा क्यों - तो बोलीं वैक्सीन लगाने से मौत हो जाती है.

वैक्सीन को लेकर उनके ज़हन में अलग ही तरह की भ्रांति दिखी. हालांकि ये सुनना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी. लेकिन मैं हैरान थी कि जो महिला पढ़े-लिखे परिवारों के घर में जाकर खाना बनाने का काम करती है, उनकी सोच ऐसी क्यों है.

कमलेश के अनुसार उनके गांव में एक पति-पत्नी का जोड़ा वैक्सीन लगवाने गया और रास्ते में आते-आते ही दोनों की मौत हो गई. अब उसके गांव के लोग डरे हुए हैं. कोई वैक्सीन का जिक्र तक नहीं करना चाहता.

जब मैंने उनसे कहा कि ऐसा नहीं है, ये सब अफ़वाहें तो उनका कहना था कि जब घरवाले मना कर रहे हैं तो कैसे लगवा लूं.

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महिला और पुरुष में अंतर

वैक्सीन को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं और भ्रांतियां फैली नज़र आती हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं कि लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे हैं.

सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट पर जारी किए गए ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 23,27,86,482 लोग वैक्सीन लगवा चुके हैं. लेकिन अगर आंकड़ों को तोड़कर देखा जाए तो पुरुषों के मुकाबले इस अभियान में महिला पीछे दिखाई देती हैं.

सरकारी वेबसाइट www.cowin.gov.in पर 6 जून तक के जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार ये वैक्सीन जहां 9,92,92,063 पुरुष ले चुके हैं, वहीं महिलाओं की संख्या 8,51,85,763 है. यानी महिलाओं और पुरुषों के बीच का फासला लगभग एक करोड़ का है.

टीकाकरण में महिलाओं की स्थिति

लेकिन ऐसा क्यों है?

राजस्थान के उदयपुर ज़िले में जन स्वास्थ्य केंद्र बड़गांव में सीनियर मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर अशोक शर्मा इसकी कई वजह बताते हैं. वे कहते हैं महिलाओं की पुरुषों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है. महिला को वैक्सीन केंद्र तक लाएगा कौन? उसे यहां तक लाने वाला उसका घरवाला ही हो सकता है. ऐसे में वो अकेले वैक्सीन लगवाने आएगी, ये असंभव है.

डॉक्टर अशोक शर्मा कहते हैं, "वहीं जब डॉक्टर कहते हैं कि दो-तीन दिन तक बुखार आ सकता हैं तो ऐसे में महिलाओं को लगता है कि अगर उसे बुखार आ गया तो घर में खाना कौन बनाएगा, पशुओं को चारा कौन देखेगा. बकरियों को कौन चराने जाएगा?"

''सरकार की तरफ से कोविड टेस्ट की सुविधा दी जा रही है. वहीं, महिलाएं आगे नहीं आ रही हैं क्योंकि उन्हें लगता अगर वो पॉज़िटिव आ गई तो सब दूर हो जाएंगे."

"ऐसे में वैक्सीन लगवाना तो उनके लिए दूर की बात है. आदमी भी सोचता है कि अगर उसकी पत्नी को बुखार चढ़ गया तो घर का काम-काज कौन देखेगा? हालांकि घर के पुरुषों के समझाया जाता है कि कोविड-19 हो गया तो इतने दिनों तक कौन घर संभालेगा और स्थिति 14 दिनों में ज्यादा भी बिगड़ सकती है."

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"और वैक्सीन के बाद बुखार भी आएगा तो दवा लेकर काम कर सकती है. साथ ही महिला स्वास्थ्यकर्मियों जैसे आशा वर्कर, एएनएम (सहायक नर्स मिडवाइफ़) का भी उदाहरण देते हैं कि देखिए ये सभी लगवा चुकी हैं और कितने आराम से काम कर रही हैं.''

वे सवाल उठाते हैं कि क्या सरकार ने गांववालों को वैक्सीन के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए कोई कदम उठाया है?

"हालांकि हम कह रहे हैं कि घर की महिला को वैक्सीनेशन के लिए लाएं, वहीं एएनएम भी इस क्षेत्र में काम कर रही हैं लेकिन पुरुषों के मुकाबले एक चौथाई महिलाएं ही इस इलाके में वैक्सीनेशन के लिए सामने आई हैं."

लेकिन शहरों में इससे स्थिति अलग है. वे बताते हैं, "मेरे केंद्र पर शहरों से महिलाएं वैक्सीन लगवाने आई हैं लेकिन गांव में अभी महिलाएं बाहर नहीं आ रही हैं."

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महिलाओं की पुरुषों पर निर्भरता

बिहार में जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े और महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए काम करने वाली संस्था चार्म के निदेशक डॉक्टर शकील महिलाओं के वैक्सीन न लगवाने को लेकर कई कारण गिनाते हैं, जिसमें प्रमुख वजह वैक्सीन को लेकर उनकी हिचकिचाहट है.

उनका कहना है कि जैसे पोलियो को लेकर हम अफ़वाह फैली देखते थे कि उससे पुरुष पिता नहीं बन पाएंगे, वैसा ही इस वैक्सीन के साथ भी लोगों के बीच शंका घर कर रही है.

डॉक्टर शकील बताते हैं, ''महिलाओं में डर है कि वैक्सीन लगवाने से कहीं वे बांझ न हो जाएं. जो महिलाएं गर्भवती होना चाहती हैं, वे असमंजस में हैं कि वैक्सीन लगवाएं या नहीं. जो पहली डोज़ लगवा कर गर्भवती हो गई हैं, वो परेशान हैं कि दूसरी डोज़ लगवानी चाहिए कि नहीं."

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"वहीं जब परिवार में फैसले लेने के अधिकार की बात आती है तो वो महिलाओं के पास है ही नहीं और अगर स्वास्थ्य की बात हो तो वो अधिकार नदारद नज़र आता है. ऐसे में वो खुद ही वैक्सीन लेने चली जाएं वो तो दूर की बात हो जाती है. वो अगर जाना भी चाहें तो वैक्सीन केंद्र तक पहुंचने के लिए भी वे पुरुषों पर निर्भर रहती हैं.''

वे कहते हैं, "कहीं न कहीं ये भी डर है कि मौत न हो जाए. सरकार को चाहिए कि वो महिलाओं के बीच उठने वाले सवालों के बारे में आशा वर्कर और एएनएम को जागरूक करे ताकि वो महिलाओं के सवालों के जवाब दे सकें और उनके बीच फैल रहीं भ्रांतियों को दूर कर सकें."

बिहार में सरकार ने कोरोना वैक्सीन के रजिस्ट्रेशन और तुरंत वैक्सीनेशन के लिए मोबाइल वैन की सेवाएं भी चलाई है लेकिन ऐसी भी ख़बरें आईं कि गांव में इन वैन को भगा दिया गया.

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हालांकि डॉक्टर शकील उम्मीद जताते हैं कि पिछले डेढ़-दो महीने में शहरों से ग्रामीण इलाकों में मज़दूर लौट कर आए हैं, उससे शायद लोगों में वैक्सीन को लेकर समझ बढ़े.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया में एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर सुरेश के राठी कहते हैं कि ये जेंडर गैप वैक्सीनेशन में ही नहीं समाज के हर क्षेत्र में बल्कि हर कार्यक्रम में नज़र आता है."

"वैक्सीन को लेकर लोगों में बांझपन होने की अफ़वाह फैली, जनसंख्या के अनुपात में भी महिलाएं कम हैं, लोगों में एक डर वैक्सीन के साइड इफेक्ट को लेकर भी हैं."

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"फिर कोविड की दूसरी लहर के दौरान घरों से बाहर निकलना मुश्किल है क्योंकि वैक्सीनेशन केंद्रों में भीड़ की वजह से वहां जाने का डर. वहीं, पुरुष काम के सिलसिले में बाहर जाता है तो उसने वैक्सीन ले लिया. लेकिन वैसे महिला उतनी संख्या में बाहर नहीं निकल पाई."

"लेकिन रजिस्ट्रेशन कितने हुए हैं और उसमें महिला और पुरुषों की संख्या कितनी है, ये देखना भी जरूरी है क्योंकि सरकार ने सभी को कहा है कि वो वैक्सीन लगवाएं. फिर आंकलन किया जाना चाहिए इसके अलावा और क्या कारण रहे हैं."

"ये एक दूसरे नज़रिए से भी देखा जाना चाहिए क्योंकि हम एक राज्य की किसी दूसरे राज्य से तुलना नहीं कर सकते हैं. क्योंकि सबकी अपनी स्थितियां हैं. अब जहां माइग्रेशन वर्कर काम करने जा रहे हैं, वहां उन लोगों ने वैक्सीन लगवा लिया जबकि उनके परिवार गांव में हैं, इसलिए इन आंकड़े को इस एंगल से भी देखना चाहिए."

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कश्मीर में डॉक्टरों ने लिया सोशल मीडिया का सहारा

जम्मू और कश्मीर में डॉक्टर्स एसोसिएशन (कश्मीर) के अध्यक्ष डॉक्टर निसार उल हसन कहते हैं कि शुरुआत में वैक्सीनेशन को लेकर लोगों में काफ़ी हिचकिचाहट और शंकाएं थीं. यहां 12,07,888 महिलाओं को वैक्सीन लग चुकी है. महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर 4,93845 का है.

डॉक्टर निसार उल हसन का कहना था, "यहां पुरुष और महिलाओं में ग़लत जानकारियां थी कि वैक्सीन से बांझ हो सकते हैं. ये वैक्सीन जल्दी तैयार हुआ है तो पता नहीं कितना असरदार होगा. इसके दुष्प्रभाव हो सकते हैं. जो माएं स्तनपान कराती हैं, वे भी डरी हुई थीं लेकिन धीरे-धीरे हमने लोगों की सारी शंकाओं को दूर किया. अब गांव और शहरों में भी महिलाएं वैक्सीन लगवा रही हैं."

"हम सभी हेल्थ वर्कर्स से कहा कि वे वैक्सीन लगवाकर सोशल मीडिया पर फ़ोटो पोस्ट करें. इनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल थे. उन्होंने लोगों से कहा कि देखिए हम बिल्कुल ठीक हैं और अफ़वाहों में न आएं."

"वहीं सरकार ने भी डोर टू डोर कैंपन चलाया और लोगों को वैक्सीनेशन दी. इसलिए शुरुआत में जो वैक्सीन को लेकर उदासीनता थी वो अब बहुत कम हुई है."

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वहीं, छत्तीसगढ़ और केरल दो ऐसे राज्य हैं जहां वैक्सीन लगवाने को लेकर महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में महिलाओं और पुरुषों में करीब 24 लाख का फासला है.

राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 75 पिंक बूथ बनाए जाने के निर्देश दिए हैं जो सोमवार से काम कर रहे हैं. यहां, केवल महिलाओं का टीकाकरण होगा और केवल महिला कर्मचारियों की तैनाती होगी.

शहरों में वैक्सीन को लेकर लोग रजिस्ट्रेशन करा रहे है और महिलाएं भी सामने आ रही हैं. कई राज्यों में महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर कम भी दिखाई देता है लेकिन अभी भी कई गांवों में वैक्सीन को लेकर उदासीनता दिखाई देती है साथ ही डर और अफ़वाह से लोग प्रभावित दिखते हैं.

और इन्हीं में कमलेश जैसे परिवार के लोग भी शामिल है जिनके ज़हन से इस भय को निकालना भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि सरकार वैक्सीनेशन के 100 फ़ीसदी टारगेट पर पहुंच सके.

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