दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसा क्या कह दिया जिससे युवा बनाम बुज़ुर्ग ज़िंदगियों पर बहस छिड़ गई?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"अगर दवा की कमी की वजह से एक बीमारी से पीड़ित सभी लोगों का इलाज नहीं किया जा सकता, तो ये केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि एक पॉलिसी बनाई जाए, जिसमें बताया जाए कि दवा किन्हें देनी है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा ज़िंदगियाँ बचाई जा सके. ऐसी पॉलिसी बनाते समय क़ानून और चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों की राय ली जानी चाहिए.
जिन लोगों के बचने की संभावना ज़्यादा है, दवा देने में उन्हें प्राथमिकता दी जा सकती है.
उसी तरह से अगर, दो ज़िंदगियों के बीच चुनना हो, जिनमें दोनों के जीने की संभावना बराबर हो तो युवा मरीज़, जो देश का भविष्य हैं उनको बुजुर्गों के मुक़ाबले, जो अपनी ज़िंदगी जी चुके हैं, प्राथमिकता दी जा सकती है."
दिल्ली हाईकोर्ट में म्यूकरमायकोसिस (ब्लैक फंगस) के बढ़ते मामलों और इलाज के लिए दवा एम्फ़ोटेरिसिन बी की कमी से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की बेंच ने ये आदेश दिया है.
क्या है पूरा मामला?
कोर्ट के इस आदेश की चर्चा खूब हो रही है.
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वकील राकेश मल्होत्रा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी कि म्यूकरमायकोसिस (ब्लैक फंगस) के मामले दिल्ली में तेज़ी से बढ़ रहे हैं और इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा एम्फ़ोटेरिसिन बी की क़िल्लत है.
इस पर कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों से इस बारे में स्टेटस रिपोर्ट माँगी थी. सरकार ने जवाब में कहा कि दवा की क़िल्लत कुछ दिन तक और बने रहने की संभावना है. इसी संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि सरकार को इस पर पॉलिसी बनानी चाहिए कि दवा में प्राथमिकता किसे और किस आधार पर मिले.
हालाँकि ये कोर्ट का बस एक सुझाव है, नीति इस पर केंद्र सरकार को बनानी है. विश्व के दूसरे देशों ने दवा की क़िल्लत की सूरत में क्या किया है, कोर्ट ने इस बारे में भी केंद्र सरकार को अध्ययन करने के लिए कहा है.
मामले में याचिका दायर करने वाले वकील राकेश मल्होत्रा ने बीबीसी से कहा, "वास्तविकता के आधार पर देखा जाए तो, फ़ैसला सही है. लेकिन भावनात्मक रूप से देखें, तो कइयों को ये फ़ैसला तनाव दे सकता है. एक ही परिवार में अगर युवा बेटा और बूढ़े पिता के बीच चुनना हो, तो एक बार के लिए परिवार बेटे को चुन सकता है. लेकिन बात जब दो परिवार की हो, तो मामला पेचीदा हो सकता है. मामला जब एक परिवार के बेटे और दूसरे परिवार के बूढ़े पिता के बीच चुनाव का होगा, तो कोई भी परिवार अपने पिता को छोड़ दूसरे के बेटे को दवा दिए जाने की बात स्वीकार नहीं करेगा."

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क्या कहते हैं क़ानून के जानकार?
वरिष्ठ क़ानूनविद उपेंद्र बक्शी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "संविधान की धारा 31, 32 और 142 के तहत न्यायपालिका को अधिकार है कि वो केंद्र या राज्य सरकारों को किसी मसले पर क़ानून या पॉलिसी बनाने के लिए कह सकती है. क़ानून बनाने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं है. वो केवल इस बारे में सरकार को कह सकती है."
ब्लैक फंगस मामले में कोर्ट के फ़ैसले के बारे में वो कहते हैं, "फ़ैसले में अंग्रेजी के MAY शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो केंद्र सरकार को फ़ैसले के मुताबिक़ ही काम करने के लिए बाध्य नहीं करता. इसके अलावा फ़ैसले में केवल सुझाव है कि दवा की क़िल्लत से निपटने के लिए 'लाइफ़ एक्सपेक्टेंसी' को एक आधार बनाया जा सकता है.
कोर्ट ने केवल एक सुझाव दिया है. उस आधार को क़ानून बनाने वाले स्वीकार करते हैं या नहीं, किस आधार पर स्वीकार करते और किस आधार पर अस्वीकार- ये विशेषज्ञों का काम है. सरकार क़ानून बनाते वक़्त प्राथमिकता का जो भी आधार चुनती है, उसे कोर्ट में आगे भी चुनौती दी जा सकती है."

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मेडिकल एथिक्स/चिकित्सा आचारसंहिता क्या कहती है?
भारत में डॉक्टरों के अधिकार, सम्मान और पेशेवर दिक़्क़तों, सहूलियतों पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) काम करती है. आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर राजन शर्मा ने इस आदेश पर बीबीसी से बात की.
जब दवा की क़िल्लत हो और युवा और बुज़ुर्ग दोनों को उसकी ज़रूरत हो, ऐसी स्थिति में मेडिकल एथिक्स क्या कहता है?
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर राजन कहते हैं, "ये तो डॉक्टर का धर्म ही नहीं है कि दवाई नहीं है तो डॉक्टर मरीज़ का इलाज ही ना करे. डॉक्टरी पढ़ने वाले हर छात्र को यही सिखाया जाता है कि अंत तक आपको मरीज़ की साँसों के लिए लड़ना है. कई बार ऐसा होता है कि मरीज़ के क्लीनिकल पैरामीटर नीचे जा रहे हैं, बचने की संभावना ना के बराबर होती है, उस सूरत में दवा देने का कोई असर नहीं होता, तो हम मरीज़ के परिजनों को बुला कर विस्तार से समझा कर घर ले जाने को सुझाव देते हैं. लेकिन तब भी ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लेते."
भारत में पूर्व में डायरेक्टर जनरल हेल्थ सर्विस के पद पर रहे जगदीश प्रसाद कहते हैं, "मेडिकल एथिक्स में ये तो पढ़ाया जाता है कि जो ज़्यादा बीमार है और उसके बचने की उम्मीद कम है, तो इलाज में प्राथमिकता उसको दी जाए, जिसके बचने की संभावना ज़्यादा हो. लेकिन मेडिकल एथिक्स में ये नहीं पढ़ाया जाता कि दोनों के बचने की संभावना बराबर हो, तो युवा को बचाओ.
मान लीजिए एक 45 साल का मरीज़ है और अविवाहित है, उसके पास अपने अलावा कोई और ज़िम्मेदारी नहीं है. दूसरी तरफ़ एक 60 साल के बुज़ुर्ग मरीज़ हैं, जो सात लोगों के परिवार में अकेले कमाने वाले हैं, जिन्हें तीन बेटियों को पढ़ाना है, बूढ़े माता-पिता और पत्नी की देख रेख भी करनी है. ऐसे में आप कोर्ट के तर्क के आधार पर किसे चुनेंगे?"

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इटली का उदाहरण
कोरोना संक्रमण के दौर में इटली में एक वक़्त ऐसा आया, जब कुछ डॉक्टरों ने मरीज़ के उम्र के आधार पर फ़ैसला किया. इस बात की पुष्टि कई मीडिया रिपोर्ट्स से होती है.
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान इटली का उदाहरण भी दिया गया,जहाँ पहली लहर के दौरान हालात बहुत ही चिंताजनक थे. उस वक़्त इटली में मरीज़ों के अनुपात में अस्पताल में ज़रूरी सुविधाओं की क़िल्लत थी. उस वक़्त इटली में डॉक्टरों ने युवाओं के इलाज को प्राथमिकता दी थी.
लेकिन ऐसा फ़ैसलों पर पिछले साल भी बहुत बहस हुई थी. बीएमजे जर्नल में प्रकाशित एक ब्लॉग में इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए तीन तर्क दिए गए थे.
पहला - एक मरीज़ 18 साल का है और दूसरा 19 साल का. ऐसी सूरत में 18 साल वाले को केवल इस आधार पर नहीं बचाया जा सकता कि वो एक साल छोटा है.
दूसरा - आम धारणा है कि बुज़ुर्ग अपनी ज़िंदगी जी चुके होते हैं, लेकिन इसे तय करने का आधार क्या है?
तीसरा - ऐसा करने पर एक संदेश ये भी जाता है कि हम बुजुर्गों को कम महत्व देते हैं.
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