कोरोना: ऑक्सीजन की कमी, प्रबंधन हुआ है फेल या फिर सियासत का खेल?

- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण देश के कई हिस्सों में अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर एक विकट स्थिति उभरकर सामने आई है, ऐसी स्थिति जो देश में पहले कभी नहीं देखी गई.
पिछले कुछ हफ़्तों में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हर दिन कई अस्पताल ऑक्सीजन की कमी की गुहार लगाते देखे गए और सोशल मीडिया ऐसे संदेशों से भरा रहा, जिनमें अस्पताल कह रहे थे कि उनके पास अब चंद घंटों की ऑक्सीजन सप्लाई ही बची है और उनके मरीज़ों की जान ख़तरे में है.
दूसरी ओर, मरीज़ों के परिजन और देखभाल करने वाले लोग ख़ाली ऑक्सीजन सिलिंडरों को भरवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर दिखे.
एक मई को महरौली स्थित बत्रा अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किए गए 12 कोविड मरीज़ों की मौत हो गई और अस्पताल ने इन मौतों का ज़िम्मेदार ऑक्सीजन की कमी को बताया.
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उससे कुछ ही दिन पहले ही दिल्ली के रोहिणी में मौजूद जयपुर गोल्डन अस्पताल के आईसीयू में भर्ती 20 लोगों की मौत कथित तौर पर ऑक्सीजन का स्तर गिरने से हुई.
जहाँ हाई कोर्ट के सामने अस्पताल ने दिल्ली सरकार को ऑक्सीजन पहुंचाने में देरी के लिए दोषी ठहराया, वहीं दिल्ली सरकार ने कोर्ट में यह दावा किया कि ये मौतें ऑक्सीजन की कमी की वजह से नहीं हुईं बल्कि इस वजह से हुई कि वे अस्पताल में रहने के दौरान पहले से ही बहुत बीमार थे.
दिल्ली के प्रमुख अस्पतालों में से एक सर गंगाराम अस्पताल में भी ऑक्सीजन की कथित कमी के कारण 25 गंभीर रूप से बीमार रोगियों की 22-23 अप्रैल की दरम्यानी रात में मौत हो गई.
अस्पताल ने ये माना कि यह सभी मरीज़ हाइ-फ़्लो ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे, पर आधिकारिक तौर पर मौतों की वजह को ऑक्सीजन की कमी नहीं माना गया.

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चार मई को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अस्पतालों को ऑक्सीजन की आपूर्ति न किए जाने की वजह से हो रही कोविड-19 के मरीज़ों की मौतें एक आपराध है.
अदालत ने कहा कि यह 'नरसंहार से कम नहीं' है और इसके लिए वे लोग ज़िम्मेदार हैं जिन्हें लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की निरंतर ख़रीद और आपूर्ति सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया है.
उसी दिन दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिल्ली में कोरोना के रोगियों के इलाज के लिए मेडिकल ऑक्सीजन देने के अपने आदेश की नाफ़रमानी पर कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा "आप शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सिर छिपा सकते हैं, हम नहीं."
ऑक्सीजन पर राजनीति?
मेडिकल ऑक्सीजन की कमी से बने भयावह हालात का सबसे विकराल रूप दिल्ली में देखा गया लेकिन इस गंभीर समस्या का हल ढूंढते वक़्त भी दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच रस्साकशी का खेल जारी रहा है.

जहाँ दिल्ली सरकार केंद्र पर यह आरोप लगाती आ रही है कि दिल्ली को उसके हिस्से की पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल रही है.
वहीं केंद्र कह चुका है कि दिल्ली सरकार सप्लाई चेन का प्रबंधन करने में असमर्थ रही है और उसने ऑक्सीजन के टैंकरों की व्यवस्था तक नहीं की थी.
राजधानी दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन संकट को लेकर केंद्र सरकार की तरफ़ से ये कहा गया कि केजरीवाल सरकार ने ऑक्सीजन संयंत्र लगाने में देरी की.
केंद्र सरकार के सूत्रों ने यह दावा किया कि चार अस्पतालों में प्रस्तावित ऑक्सीजन प्लांट लगाने में इसलिए देरी हुई क्योंकि दिल्ली सरकार ने साइट रेडीनेस का सर्टिफ़िकेट पेश नहीं किया. इसी तरह रेल मंत्रालय के सूत्रों ने यह भी आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार ने 'ऑक्सीजन एक्सप्रेस' के लिए क्रायोजेनिक टैंकर उपलब्ध नहीं कराए.
इन आरोपों को 'झूठ' बताते हुए दिल्ली सरकार कह चुकी है कि केंद्र सरकार ऑक्सीजन संयंत्र लगाने में अपनी अपमानजनक विफलता को छिपाने के लिए ऐसी बातें कह रही है.
23 अप्रैल को प्रधानमंत्री की राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ चल रही कॉन्फ्रेंस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राजधानी में अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हाथ जोड़कर विनती करते हुए पड़ोसी राज्यों पर ऑक्सीजन ट्रकों को रोकने का आरोप लगाया.
साथ ही उन्होंने इस कॉन्फ्रेंस को लाइव-स्ट्रीम कर दिया. प्रधानमंत्री मोदी को केजरीवाल को ये कहना पड़ा कि उनका उस मीटिंग का सीधा प्रसारण दिखाना परंपरा और प्रोटोकॉल के ख़िलाफ़ है और अनुचित है. इसके जवाब में केजरीवाल ने कहा कि वे भविष्य में इसे ले कर सजग रहेंगे.
इसी बीच केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन को लिखे एक पत्र में दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि कुछ राज्यों में "जंगलराज" के कारण दिल्ली में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही है.
सिसोदिया ने हरियाणा और उत्तर प्रदेश का नाम लेकर कहा कि इन राज्यों में ऑक्सीजन प्लांटों में पुलिस अधिकारियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को तैनात किया गया है जिन्होंने अन्य राज्यों के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति को अपने राज्यों की तरफ़ मोड़ दिया है.

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ऑक्सीजन की कमी क्यों है?
इस बात में कोई शक नहीं कि कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या अचानक से कई गुना बढ़ जाने से अस्पतालों में मेडिकल ऑक्सीजन की ज़रूरत अचानक से बढ़ गई है.
लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में उत्तर या पश्चिम भारत के कई राज्यों में ऑक्सीजन की किल्लत की मुख्य वजह ये है कि ऑक्सीजन का सबसे अधिक उत्पादन ओडिशा या झारखंड जैसे पूर्वी राज्यों में होता है और इस ऑक्सीजन को दिल्ली तक आने में तकरीबन 1,500 किलोमीटर तक का सफ़र तय करना पड़ता है.
साकेत टिक्कू अखिल भारतीय औद्योगिक गैस निर्माता संघ (एआईआईजीएमए) के अध्यक्ष हैं. पिछले साल उन्हें भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की उस समिति का सदस्य नियुक्त किया गया जिसे कोविड-19 महामारी के मद्देनज़र मेडिकल ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है.
बीबीसी से बात करते हुए टिक्कू ने कहा कि कोविड महामारी की शुरुआत से पहले पिछले साल जनवरी, फ़रवरी और मार्च के महीनों में भारत में औसतन 850 टन ऑक्सीजन प्रतिदिन मेडिकल क्षेत्र में उपयोग हो रही थी.
वो कहते हैं, "अप्रैल 2020 से यह मांग बढ़ने लगी और 18 सितंबर तक हम तीन हज़ार टन प्रतिदिन इस्तेमाल करने लगे."
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सकेत टिक्कू कहते हैं, "अक्तूबर 2020 के बाद से जब कोविड के मामले कम होने लगे तो ऑक्सीजन की मांग घटने लगी. 11 फ़रवरी तक हम लगभग 1,200 टन मेडिकल ऑक्सीजन हर दिन इस्तेमाल कर रहे थे. उसके बाद मांग अचानक से बढ़ी और अब आज की तारीख़ में हम 8,000 टन से अधिक ऑक्सीजन इस्तेमाल कर रहे हैं. यह कहानी 850 टन प्रतिदिन से 8,000 टन तक के सफ़र की है."
दुनिया की तरह भारत में भी ऑक्सीजन का इस्तेमाल उद्योग क्षेत्र, खासकर स्टील उद्योग में होता है. दुनिया भर में 85 प्रतिशत ऑक्सीजन उद्योगों में और 15 प्रतिशत मेडिकल उपयोग में लाई जाती है. लिक्विड या तरल ऑक्सीजन को क्रायोजेनिक कंटेनर में ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है.
भारत में हुए ऑक्सीजन के संकट की एक बड़ी वजह क्रायोजेनिक कंटेनरों की सीमित उपलब्धता है. टिक्कू कहते हैं कि अगर आज नए क्रायोजेनिक कंटेनर बनाने के ऑर्डर दें तो उनकी डिलीवरी में 5 से 6 महीने का वक़्त लगेगा.
वे कहते हैं, "लॉजिस्टिक चुनौती यह है कि हमारे ऑक्सीजन के भंडार सही जगहों पर नहीं हैं. भंडार दुर्गापुर, भिलाई या राउरकेला में रखा है तो लगभग 1500 किलोमीटर की दूरी तय करके ही उसे उत्तर या पश्चिम भारत के राज्यों में लाया जा सकता है. ऑक्सीजन टैंकर्स की कमी के कारण तरल नाइट्रोजन और तरल आर्गन टैंकर्स को ऑक्सीजन ले जाने की अनुमति सरकार ने दे दी है."

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टिक्कू के अनुसार सात अप्रैल को भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया जिसके अनुसार औद्योगिक ऑक्सीजन का इस्तेमाल मेडिकल कार्यों के लिए करने की अनुमति दे दी गई.
वे कहते हैं, "औद्योगिक और मेडिकल ऑक्सीजन लगभग एक ही तरह की होती है. मेडिकल ऑक्सीजन के लिए बस कुछ बातों का ध्यान रखना होता है. भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल की सहमति से यह निर्णय लिया गया और इसी वजह से हज़ारों जानें आज बचाई जा रही हैं क्योंकि बड़े-बड़े स्टील उद्योग आज ऑक्सीजन की आपूर्ति कर पा रहे हैं."
ऑक्सीजन की बढ़ती मांग के कारण भारत की उत्पादन क्षमता कुछ समय पहले तक 7200 टन प्रतिदिन हो गई थी.
टिक्कू कहते हैं कि इस क्षमता को बढ़ाते-बढ़ाते 8500 से 9000 टन प्रतिदिन तक लाया जा चुका है पर चिंता की बात यह है कि ऑक्सीजन की मांग अब भी इससे अधिक है. वे कहते हैं, "यह कहा जा सकता है की केंद्र और राज्य सरकारें पिछले साल सितम्बर से इस साल मार्च तक सो गई थीं."

भारत में औद्योगिक और मेडिकल गैसों के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक आईनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड है. बीबीसी ने आईनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स के निदेशक सिद्धार्थ जैन से मौजूदा ऑक्सीजन संकट पर बात की.
जैन कहते हैं, "हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती मेडिकल ऑक्सीजन को उत्पादन के स्थान से अस्पतालों तक ले जाने की है. एक जगह से दूसरी जगह ऑक्सीजन पहुंचाने में एक लंबा सफर तय करना पड़ रहा है इसीलिए इतनी दूरी पर ऑक्सीजन को जल्दी से स्थानांतरित करने के लिए ढेर सारे बड़े क्रायोजेनिक टैंकरों की आवश्यकता है."
ऑक्सीजन के परिवहन के लिए रेल मंत्रालय ने ऑक्सीजन एक्सप्रेस की शुरुआत की है. वायु सेना भी खाली कंटेनरों को हवाई मार्ग से ला रही है. लेकिन सारी मुश्किलें सिर्फ परिवहन की ही नहीं हैं.
जैन कहते हैं, "जब कंटेनर शहर में आते हैं, तो उन्हें छोटे ट्रकों में ट्रांसफर करने की आवश्यकता होती है जो अंततः अस्पतालों में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं. ये अस्पताल कभी-कभी बहुत भीड़भाड़ वाले इलाकों में स्थित होते हैं और बड़े ट्रकों के लिए इन अस्पतालों में प्रवेश करना संभव नहीं हो पाता."
जैन का यह भी कहना है कि "इस तरह के अतिरिक्त भार को लेने के लिए अस्पतालों के अंदर के बुनियादी ढांचे को कभी बनाया या डिज़ाइन नहीं किया गया".
वे कहते हैं, "तो जहाँ मांग दस गुना बढ़ गई है, ऑक्सीजन पाने के लिए बुनियादी ढांचा बिल्कुल पहले जैसा ही है. आप ऑक्सीजन के लिए एक अस्पताल की प्रणाली पर बढ़े हुए दबाव की कल्पना कर सकते हैं. यह मामला केवल ऑक्सीजन भेजने के बारे में नहीं है, उसे रिसीव करने के बारे में भी है."

जैन के अनुसार आईनॉक्स कोविड महामारी शुरू होने के पहले प्रतिदिन लगभग 400 टन मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति कर रहा था और अब एक दिन में लगभग 2,700 टन की आपूर्ति कर रहा है.
वे कहते हैं, "हमने अपने संयंत्रों में उत्पादन में लगभग 30 से 35 प्रतिशत की वृद्धि की है. यह एक बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग संघर्ष रहा है और हमें ऐसा करने के लिए काफी मात्रा में धन का निवेश करना पड़ा है."
जैन कहते हैं कि कोविड महामारी शुरू होने से पहले देश में मेडिकल ऑक्सीजन की कुल मांग एक दिन में 700 टन थी. वे कहते हैं, "आज यह मांग 7,000 से 7,500 टन प्रतिदिन है यानी इसमें 10 गुना की बढ़ोतरी हो गई है. मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य देश ने खपत या मांग में इस तरह की वृद्धि का सामना किया है."

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वहीं टिक्कू कहते हैं कि दिल्ली में ऑक्सीजन संकट की एक मुख्य वजह यह भी है कि दिल्ली में कभी ऑक्सीजन बनाने का संयंत्र नहीं लगा और दिल्ली ऑक्सीजन के लिए हमेशा अपने पड़ोसी राज्यों पर निर्भर रही.
वे कहते हैं, "महामारी से पहले दिल्ली लगभग 100-120 टन प्रतिदिन ऑक्सीजन इस्तेमाल करती थी. दिल्ली की ऑक्सीजन सप्लाई राजस्थान में भिवाड़ी से, उत्तर प्रदेश में नोएडा, उत्तराखंड में देहरादून और हरियाणा से आती रही है. लेकिन कुछ जिला अधिकारी इन प्रणालियों को काम करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं. वे उन वाहनों को रोक रहे हैं जो उनके ज़िलों से पड़ोसी राज्यों में जा रहे हैं. जब ज़िला अधिकारी केंद्रीय गृह सचिव के आदेश का सम्मान नहीं करेंगे तो सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा."
उनके अनुसार चूँकि दिल्ली के पड़ोसी राज्यों की ऑक्सीजन की ज़रूरतें भी बढ़ गई हैं इसीलिए अब दिल्ली को ऑक्सीजन लेने दूर जाना पड़ रहा है.
वे कहते हैं, "महाराष्ट्र और पंजाब को राउरकेला से ट्रक भेजकर ऑक्सीजन मांगनी पड़ रही है. उत्तर प्रदेश बोकारो से ले रहा है. जब बाकी राज्यों को दूर जाना पड़ रहा है, तो दिल्ली को भी जाना पड़ेगा."

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ऑक्सीजन की बर्बादी
टिक्कू और जैन दोनों इस बात से सहमत हैं कि देश को ऑक्सीजन का विवेकपूर्ण उपयोग करना सीखना होगा.
जैन कहते हैं, "हमें ज़रूरत है ऑक्सीजन डॉक्टरों की जो निगरानी करें कि ऑक्सीजन की कोई बर्बादी न हो. ऑक्सीजन एक रंगहीन, गंधहीन गैस है जो आपको नुक़सान नहीं पहुंचाती है. यदि आप सिर्फ अपने चेहरे से मास्क हटाते हैं और बाथरूम में जाते हैं, तो मास्क से ऑक्सीजन हवा में रिसता रहता है. आपको यह देखने के लिए ऑक्सीजन मॉनिटर की आवश्यकता होगी कि जब किसी मरीज़ ने मास्क उतार दिया है तो ऑक्सीजन की सप्लाई बंद है."
जैन यह भी कहते हैं कि ऑक्सीजन की बर्बादी उन क्षेत्रों में अधिक हो रही है जहां पहले अस्पतालों में ऑक्सीजन का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं हुआ है. वे कहते हैं, "हर किसी को ऑक्सीजन सिलेंडर के उपयोग का अनुभव नहीं है और यह पता होना मुश्किल है कि वॉल्व को कब बंद करना है और कब खोलना है."
टिक्कू कहते हैं, "ऑक्सीजन के समझदारी से उपयोग की ज़रूरत है. मरीज़ों को किस दर पर ऑक्सीजन प्रवाह दिया जाए यह एक सवाल है. किसी-किसी राज्य में 60 लीटर प्रति मिनट के प्रवाह से ऑक्सीजन दिया जाता है और इससे बहुत अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की खपत होती है. स्वास्थ्य मंत्रालय को यह बताना चाहिए की राज्यों को मरीज़ों को किस प्रवाह पर ऑक्सीजन देनी है."
टिक्कू के अनुसार कई राज्यों में कोविड के सक्रिय मामलों और ऑक्सीजन की खपत बहुत बेमेल है.
वे कहते हैं, "महाराष्ट्र में सात लाख लोग बीमार हैं और यह राज्य 1,500 टन ऑक्सीजन प्रतिदिन इस्तेमाल कर रहा है. वहीं गुजरात में एक लाख लोग बीमार हैं और वहां भी लगभग 1,500 टन ऑक्सीजन का हर दिन इस्तेमाल हो रहा है. और एक तरफ केरल है जहाँ 3.5 लाख लोग बीमार हैं और वहां 300 टन ऑक्सीजन का इस्तेमाल भी नहीं हो रहा. यदि केरल सबसे अच्छा ऑक्सीजन-प्रबंधित राज्य है, तो अन्य राज्यों को इससे सीखना चाहिए."

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क्या करें कि ऐसा संकट दोबारा न आये?
साकेत टिक्कू कहते हैं कि मेडिकल ऑक्सीजन के इस्तेमाल को तर्कसंगत बनाने के साथ-साथ सरकार को उन लघु एयर सेपरेशन यूनिट्स को पुनर्जीवित करना चाहिए जो एक वक़्त पर हर ज़िले में थे पर बिजली की बढ़ती दरों के कारण बड़ी कंपनियों से कंपीटिशन नहीं कर पाए और बंद हो गए.
वे कहते हैं, "इस ऑक्सीजन के संकट के दौरान इन एयर सेपरेशन यूनिट्स की बहुत ज़रूरत महसूस हुई क्योंकि देश में अब भी 35 से 40 प्रतिशत ऑक्सीजन सिलेंडरों में ही उपलब्ध करवाई जाती है. इन प्लांट्स को पुनर्जीवित करने की ज़रूरत है. नई स्कीमों के ज़रिए या बिजली की दरों में छूट देकर इनकी सहायता की जानी चाहिए. बहुत से राज्यों में ऑक्सीजन बनाने के संयंत्र नहीं हैं. ऐसे राज्यों में ये एयर सेपरेशन यूनिट बहुत काम आ सकते हैं."
इस संकट से निपटने के लिए भारतीय वायु सेना खाली क्रायोजेनिक कंटेनर एयरलिफ्ट करके स्टील प्लांट तक पहुंचा रही है और इन कंटेनरों को ऑक्सीजन से भर के भारतीय रेल की "ऑक्सीजन एक्सप्रेस" ट्रेनों के ज़रिए जगह-जगह भेजा जा रहा है.
ताज़ा जानकारी के अनुसार 6 मई तक 40 "ऑक्सीजन एक्सप्रेस" ट्रेनें लगभग 2,511 टन ऑक्सीजन 161 टैंकरों के जरिए अलग अलग राज्यों तक पहुँचा चुकी थीं.
ये विशेष ट्रेनें 1,053 टन ऑक्सीजन दिल्ली तक, 689 टन उत्तर प्रदेश तक, 259 टन हरियाणा तक, 190 टन मध्य प्रदेश तक और 123 टन ऑक्सीजन तेलंगाना तक पहुँचा चुकी हैं. ताज़ा जानकारी के अनुसार 400 टन ऑक्सीजन लिए 22 टैंकर जल्द ही मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली पहुंचेंगे.
जब से भारत में अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत महसूस की जाने लगी, तभी से देश-विदेश से ऑक्सीजन सम्बंधित साज़ोसामान जुटाने का काम भी शुरू हो गया.

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विदेश से आती मदद
भारतीय वायु सेना अब तक 54 खाली क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनर और 900 खाली ऑक्सीजन सिलिंडर विदेशों से ला चुकी है.
अब तक सिंगापुर से 21, दुबई से 18, बैंकॉक से 11 और फ़्रैंकफ़र्ट से 4 क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनर लाए जा चुके हैं. इसी तरह भारतीय वायु सेना अब तक 900 खाली ऑक्सीजन सिलिंडर ब्रिटेन से ला चुकी है.
भारत में, भारतीय वायु सेना 180 खाली क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनरों, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन प्लांट उपकरण, आवश्यक दवाएं और अस्पताल उपकरणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचा चुकी है.
पाँच मई तक भारतीय वायु सेना के परिवहन विमान भारत के बाहर चार अलग-अलग जगहों से ऑक्सीजन ला रहे थे. एक विमान सिंगापुर से हिंडन एयर बेस के लिए 350 ऑक्सीजन सिलेंडरों को एयरलिफ्ट कर रहा है, वहीं एक और विमान बैंकॉक से पानागढ़ एयर बेस में तीन क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनर ला रहा था.
इसके अलावा एक विमान को बैंकॉक से पानागढ़ के लिए 4 खाली क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनरों को एयरलिफ्ट करने के लिए तैनात किया गया था और दूसरे विमान को ओस्टेंड, बेल्जियम से पानागढ़ एयर बेस में 4 और क्रायोजेनिक ऑक्सीजन कंटेनर लाने का कार्य सौंपा गया था.
दूसरी तरफ़, उद्योग जगत भी ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशें कर रहा है. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ काम करने के लिए ऑक्सीजन आपूर्ति चेन पर एक टास्क फोर्स का गठन किया है. ये टास्क फोर्स ऑक्सीजन के परिवहन, गैस सिलिंडरों की अनुपलब्धता और नीतिगत स्तर के हस्तक्षेप पर काम कर रही है.
टाटा समूह, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, जेएसडब्ल्यू ग्रुप, अडाणी, आईटीसी, और जिंदल स्टील एंड पावर जैसी औद्योगिक कंपनियों सहित कई निजी कंपनियां मेडिकल ऑक्सीजन, क्रायोजेनिक कंटेनर, पोर्टेबल कॉन्सेंट्रेटर और जनरेटर की आपूर्ति करने में अस्पतालों की मदद के लिए आगे आई हैं.
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