कोरोना: बिहार के गाँवों में टेस्टिंग की चुनौती, सरकारी तैयारी पर सवाल

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की राजधानी पटना से तक़रीबन 50 किलोमीटर दूर सेहरा पंचायत के खपुरा गाँव में बीते 20 दिन में 14 मौत हो चुकी है. इन मौतों से 3500 वोटर वाला पूरा खपुरा गाँव ही नहीं बल्कि पूरा पालीगंज प्रखंड दहशत में है.
स्थानीय पत्रकार अशोक कुमार इसी गाँव के रहने वाले हैं.
उन्होने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, "लोग अपने घरों में बंद हैं और दहशत में है. एक दूसरे के श्राद्ध और दाह संस्कार में शामिल नहीं हो रहे हैं. ऐसा गाँव में पहली बार हो रहा है."
अशोक बताते हैं, "सबसे पहली मौत 28 वर्षीय मंजू मांझी की हुई थी, उसके बाद से मौतों का सिलसिला जारी है. पाँच मई को भी यहाँ भुवनेश्वर ठाकुर और सेना से रिटायर जगत यादव की मौत हुई है. ज़्यादातर लोगों को साँस लेने में दिक़्क़त थी लेकिन सरकार की तरफ़ से जाँच के लिए अब तक कोई नहीं आया है."

इतनी मौतों के बाद भी खपुरा गाँव के लोग कोरोना जाँच के लिए अनुमंडल अस्पताल, पालीगंज नहीं जा रहे हैं. वजह टटोलने पर सिविल सर्जन, विभा सिंह से ही इसका जवाब मिल जाता है जो छह मई को अनुमंडल अस्पताल के निरीक्षण पर आई थीं.
दरअसल अनुमंडल अस्पताल के अधीक्षक और प्रभारी ही बीते 15 दिनों से ग़ायब हैं.
विभा सिंह ने स्थानीय पत्रकारों से बातचीत में कहा, "उनसे स्पष्टीकरण माँगा जाएगा. इस कोविड के समय में उनका यहाँ नहीं रहना ग़लत है और इस पर एक्शन लिया जाएगा."



बिहार के ग्रामीण इलाक़े - चिकित्सकों के आंकड़े में
राज्य की राजधानी पटना से सटे इस इलाक़े की दहशत से बिहार के अन्य ग्रामीण अंचलों में प्रशासनिक तैयारी और मुस्तैदी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
बीते साल मई में पटना हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी, "ग्रामीण क्षेत्र में रिक्तियाँ बहुत अधिक और पूरी तरह से असंगत हैं."
स्वास्थ्य विभाग ने पटना उच्च न्यायालय में चिकित्सकों के कुल पदों के संदर्भ में जो शपथ पत्र प्रस्तुत किया था, उसके मुताबिक़ कुल सृजित पद शहरी क्षेत्रों में 11645 हैं, जिसमें शहरी क्षेत्रों में 4418, ग्रामीण क्षेत्रों में 6944 और दुर्गम इलाक़ों में 283 है.
वहीं इसमें से पोस्टिंग सिर्फ़ 2877 पदों पर ही हुई है यानी 8768 पद ख़ाली पड़े हैं.
शहरी क्षेत्रों में 2874 पद, ग्रामीण क्षेत्रों में 5674 पद और दुर्गम इलाक़ों में 220 पद ख़ाली पड़े हैं.
साफ़ है कि पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं से फिसड्डी राज्य बिहार में ग्रामीण - दुर्गम इलाक़े और भी ज़्यादा हाशिए पर हैं.
ग्रामीण इलाक़ों में टेस्ट ही सबसे बड़ी चुनौती

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जहाँ राजधानी पटना में लोग ऑक्सीजन, अस्पताल में बेड और रेमडेसिवीर- टोसीलीजूम इंजेक्शन की कमी झेल रहे है, वहीं ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना टेस्ट कराना और टेस्टिंग के लिए पूरे सामाजिक ताने बाने में ख़ुद को तैयार करना ही सबसे बड़ी चुनौती है.
जैसा कि सामाजिक कार्यकर्ता प्रतिमा बताती हैं, "लोगों में ये डर व्याप्त है कि कोरोना जाँच पॉज़िटिव निकलने पर एक तरीक़े का सामाजिक बहिष्कार होगा, इसलिए लोग खाँसी बुख़ार में ऐसे ही दवा खाकर ठीक होना ही बेहतर समझ रहे है."
गाँव के ज़मीनी हालात की बात करें, तो सुपौल के लालपुर गाँव के विजयेन्द्र मिश्र बताते हैं, "गाँव के हर दूसरे घर में सर्दी बुख़ार से पीड़ित आदमी हैं. लोग पैरासिटामाल - एंटीबॉयोटिक खाकर अपनी तबीयत ठीक कर रहे है. हमको 10 दिन पहले बुख़ार आया, दवाई खाकर ठीक कर लिए."
सिमरी बख़्तियारपुर का हाल
वहीं सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर अनुमंडल के स्थानीय पत्रकार ब्रजेश भारती ने बताया कि वहाँ सिर्फ़ अनुमंडल अस्पताल में ही जाँच हो पा रही है और बाक़ी छह लाख से ऊपर की आबादी के लिए बने दो प्राइमरी हेल्थ सेंटर - सलखुआ और बनमा में जाँच की हालत ख़राब है.
ब्रजेश भारती ने बताया, "जहाँ तक पॉज़िटिव निकलने की बात है तो पाँच मई को 275 लोगों की जाँच हुई जिसमें 70 कोरोना से संक्रमित निकले. सोचिए ठीक से जाँच हो, तो क्या आँकड़े होंगे? जो बाहर से मज़दूर आ रहे हैं उनकी भी रेलवे स्टेशन पर कोई जाँच नहीं हो रही."

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सिमरी बख्तियारपुर में तक़रीबन एक साल पहले कोविड डेडिकेटेड सेंटर भी बनाया गया था, लेकिन आज तक उसमें ताला लटका है. भौगोलिक तौर पर इस दुर्गम इलाक़े का 60 फ़ीसदी क्षेत्र दियारा (नदी किनारे का इलाक़ा) के अंदर है. यहाँ के विधायक यूसुफ़ सलाहउद्दीन ने सहरसा, ज़िलाधिकारी को पत्र लिखकर कोविड सेंटर चालू करने की माँग की है.
यूसुफ़ सलाहउद्दीन ने बीबीसी से कहा, "हमने पत्र लिखा कि कोविड सेंटर क्यों बंद है, इसका कोई उत्तर नहीं मिला है. रोज़ पचासों कॉल आते हैं जिसमें कोई मदद नहीं कर पा रहे है."
ऐसा नहीं है कि टेस्टिंग की दिक़्क़त सिर्फ़ भौगोलिक रूप से दुर्गम इलाक़ों में है.
राजधानी पटना से 80 किलोमीटर दूर मुज़फ़्फ़रपुर की मुसहरी पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) में तैनात आशा वर्कर अनीता शर्मा बताती है कि वहां भी जाँच की स्थिति बहुत ख़राब है. उन्हें ख़ुद के संक्रमित होने का डर भी है.
अनीता कहता हैं, "वहीं हम लोगों को इस मुश्किल परिस्थिति में काम करने पर सरकार क्या देगी, ये भी स्पष्ट नहीं है. तीन महीने से वेतन नहीं मिला है और जहाँ तहाँ से आशा कार्यकर्ताओं की अचानक मौत की भी ख़बरें आ रही हैं. सरकार बस हमें धमकी दे रही है कि अभी काम नहीं करेंगे तो चयन मुक्त कर दिया जाएगा."
टेस्टिंग को लेकर चिंताएँ राज्य के अन्य गाँव-क़स्बों से भी जताई जा रही हैं.
भागलपुर के स्थानीय पत्रकार सज्जाद आलम बताते है, "मेरे अपने गाँव सन्हौला और उसके आस-पास के इलाक़े से हर दो-तीन दिन पर मौत की ख़बर आती है. जाँच हो ही नहीं रही है. यहाँ जो मेडिकल कॉलेज है वहाँ व्यवस्था है, लेकिन पूर्णिया, कटिहार, झारखंड के कुछ इलाक़ों और भागलपुर के सारे मरीज़ यहाँ आते है."
प्राइवेट अस्पतालों की चांदी - वेंटिलेटर धूल फाँक रहे
कोविड से लड़ाई में ऑक्सीजन और वेंटिलेटर, दो प्रमुख ज़रूरतें है. कई प्राइवेट अस्पतालों पर आरोप है कि वो इस मेडिकल इमरजेंसी में मुनाफ़ा कमा रहे हैं.
कैमूर ज़िले की ही बात करें तो ज़िले में प्रभात ख़बर अख़़बार के ब्यूरो चीफ विकास कुमार बताते है, "यहाँ जब बात बिगड़ती है तो या तो प्राइवेट अस्पताल या फिर बनारस - पटना लेकर मरीज़ को भागना पड़ता है. ऐसे में एंबुलेंस वालों और अस्पतालों की चांदी है."
विकास बताते हैं कि ज़िले में सदर अस्पताल में 75 और अनुमंडलीय अस्पताल में 38 ऑक्सीजन युक्त बेड की व्यवस्था की गई है. किसी पीएचसी में ऑक्सीजन युक्त बेड नहीं है. विकास कुमार का कहना है कि पीएम केयर्स फ़ंड से चार वेंटिलेटर ज़िले को मिले थे, लेकिन तकनीशियन नहीं होने के चलते वो धूल फांक रहे हैं.
विकास कहते हैं, "पिछली बार जब संक्रमण इतना घातक नहीं था तो टेस्टिंग 2500 से 3000 तक जाता था. लेकिन अबकी बार एंटीजन और आरटी-पीसीआर दोनों मिलाकर तक़रीबन 1500 टेस्टिंग रोज़ हो रही है जबकि आबादी 16 लाख है."
हालाँकि राज्य सरकार ने ज़िलों को तीन श्रेणी में वर्गीकृत करके निजी चिकित्सा संस्थानों की इलाज दर निर्धारित की है. इसके अलावा विभिन्न श्रेणियों की प्राइवेट एंबुलेंस का किराया निर्धारित किया गया है. ख़ुद स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय एंबुलेस चालकों से मानवता के नाते कोरोना मरीज़ों से निर्धारित शुल्क लेने की अपील कर चुके है.
लेकिन ज़मीन पर क्या हालात है?

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भोजपुर की स्थानीय पत्रकार नेहा गुप्ता ने बीबीसी को बताया, "एंबुलेंस वाले कुछ किलोमीटर जाने के लिए 15 से 20 हज़ार रुपए भाड़ा ले रहे हैं. बाक़ी यहाँ सदर अस्पताल में वेंटिलेटर हैं लेकिन टेक्नीशियन के अभाव से बंद पड़े हैं. 24 अप्रैल को सांसद आरके सिंह सदर अस्पताल के दौरे पर आए थे और वेंटिलेटर के जल्द चालू होने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ है."
राज्य सरकार ने हाल ही में पटना हाईकोर्ट को बताया है कि राज्य के सरकारी अस्पतालों में विभिन्न स्तर पर कुल 91,921 पदों में से 46,256 पद ख़ाली पड़े हैं. इनमें सामान्य चिकित्सकों के 3206 और विशेषज्ञ चिकित्सकों के 4149 पद ख़ाली हैं.
इन हालातों से जूझने के लिए स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने छह मई को तीन महीने के लिए अस्थायी तौर पर डॉक्टरों और अन्य स्टाफ़ की नियुक्ति की घोषणा की है. वेंटिलेटर्स को ऑपरेट करने वाले टेक्नीशियन का तो आलम ये है कि ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्तर पर ये कहा जा चुका है कि वेंटिलेटर्स को क्रियाशील करने में निजी क्षेत्र की भागीदारी हो सकती है.
आईएमए बिहार के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट डॉ अजय कुमार बताते है, "चिकित्सीय स्टाफ़ की कमी राज्य में पहली बार सामने नहीं आ रही है और सरकार के पास कोरोना की दोनों लहरों के बीच में तैयारी के लिए अच्छा ख़ासा वक़्त था. लेकिन सरकार ने उस स्तर की तैयारी नहीं की जिसकी दरकार थी."
कोरोना पॉज़िटिव मरीज़ों की बात करें तो छह मई तक राज्य में 1,15,151 एक्टिव केस थे, जबकि रिकवरी दर 78.65 फ़ीसदी है. पटना में सबसे ज़्यादा एक्टिव केस 21,704 हैं जबकि दूसरे नंबर पर गया है जिसमें एक्टिव केस 6545 हैं. राज्य में अब तक कोविड के चलते 3077 मौत हो चुकी है.

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इस बीच पंचायती राज विभाग ने कोरोना से लड़ने के लिए अपने स्तर पर घोषणाएँ की है.
पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ने बीबीसी से कहा, "कोरोना का गाँव में विस्तार देखते हुए पंचायती राज संस्थाओं को 15वें वित्त आयोग के अनुदानों के माध्यम से ये अधिकार दिया गया है कि वो ब्लॉक, अनुमंडल और ज़िला स्तरीय अस्पताल में ऑक्सीजन सिलेंडर और कॉन्सेंट्रेटर्स की व्यवस्था करें."
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार के गाँवों में लाउडस्पीकर के ज़रिए कोरोना के प्रति जागरूकता फैलाने का निर्देश दे चुके हैं.
लेकिन यहाँ सबसे अहम सवाल है ये है कि बीते वर्षों में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर भव्य इमारतें खड़ी की गईं लेकिन चिकित्सीय व्यवस्था से जुड़े मानव संसाधनों पर कोई ठोस काम नहीं किया गया.
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