भारत-चीन सीमा विवाद: साल भर बाद कहां तक पहुंचे दोनों मुल्कों के बीच रिश्ते

मोदी और शी जिनपिंग

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    • Author, वसीम मुश्ताक़
    • पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता

बीते साल मई के महीने में भारत और चीन के बीच शुरु हुए सीमा विवाद को अब एक साल हो गया है. इस बीच दोनों मुल्कों के कूटनीतिज्ञों और सैन्य अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई है, लेकिन इस मामले का अब तक कोई हल नहीं निकला.

इसी साल नौ अप्रैल को दोनों देशों के आला सैन्य कमांडरों के बीच सीमा विवाद को लेकर 11वें दौर की बातचीत हुई लेकिन ये भी बेनतीजा रही.

माना जा रहा था कि इस बैठक के बाद इस साल फरवरी के मध्य में शुरु हुई डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए रास्ता बनाया जा सकेगा.

भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर विवाद होना कोई नई बात नहीं है. 1 मई 2020 को दोनों देशों के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के पैगोन्ग त्सो झील के नॉर्थ बैंक में झड़प हुई थी.

इस झड़प में दोनों ही पक्षों के दर्जनों सैनिक घायल हो गए थे. इसके बाद 15 जून को विवादित गलवान घाटी में एक बार फिर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई. इसमें दोनों तरफ के कई सैनिकों की मौत हुई.

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क्या आंशिक डिसइंगेजमेंट से मदद मिली?

गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई जिसके बाद फरवरी में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू की गई. पैगोन्ग त्सो झील के उत्तरी तट से दोनों तरफ के सैनिक अपने हथियारों के साथ पीछे हटने लगे. लेकिन दोनों देशों के बीच मौजूद फ्रिक्शन प्वाइंट्स पर सैनिकों का पीछे जाना अभी शुरु नहीं हो सका है.

देखा जाए तो मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार दोनों देश सीमा के पास यानी लाइन ऑफ़ एक्चुएल कंट्रोल (एलएसी) पर अपनी सेना की तैनाती बढ़ा रहे हैं. ये इस बात का इशारा हो सकता है कि आने वाले दिनों में डी-एस्केलेशन नहीं होगा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी सेना सीमा के नज़दीक अपने सैन्य ठिकानों में सैनिकों की तैनाती बढ़ा रही है और एलएसी के आसपास "भीतरी इलाक़ों" के सैनिकों को एक जगह से दूसरी जगह भेज रही है.

इधर भारतीय आर्मी भी सीमा के नज़दीक अपनी सेना की तैनाती बढ़ा रही है और अपने बुनियादी ढांचे को बेहतर बना रही है.

भारतीय मीडिया में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया को लेकर "सतर्क रहने और उम्मीद रखने" की बात की गई है और कहा गया है कि चीन को अपनी प्रतिबद्धताओं पर खरा न उतरने के लिए जाना जाता है इसलिए भारत को सावधानी से आगे कदम बढ़ाना चाहिए.

द हिंदू अख़बार में छपे एक लेख के अनुसार डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जो योजना बनाई गई है उसका "ज़मीनी स्तर पर कितना पालन किया जाता है."

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट में दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी है, ऐसे में भारत को "सतर्क न रहने का जोखिम नहीं लेना चाहिए."

भारत-चीन सीमा विवाद

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क्या सेना को पीछे हटाना भारत की ग़लती थी?

पैगोन्ग त्सो झील के इलाक़े में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया की शुरुआत में महत्वपूर्ण प्रगति की कमी का हवाला देते हुए कुछ जानकारों ने कहा है कि शायद ख़ुद को मिला "सामरिक लाभ" छोड़ कर भारत ने ग़लती की.

फरवरी में दोनों झील के पास के इलाक़े से सेना और हथियार पीछे हटाने को लेकर देशों के बीच हुए समझौते के बाद भारत ने सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण कैलाश रेंज से अपनी सेना पीछे कर ली है.

हॉन्ग कॉन्ग से छपने वाले साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी में चाइनीज़ और चाइना स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक के हवाले से लिखा, "ऐसा लगता है कि (पैगोन्ग त्सो झील के) फिंगर एरिया ने 'पीछे हटने' के लिए चीन को मना कर भारत अपनी 'जीत' की घोषणा करने की जल्दी में था."

प्रोफ़ेसर बीआर दीपक कहते हैं कि चीन का उद्देश्य "भारत को कैलाश रेंज से हटाना था ताकि भारत को सामरिक तौर पर जो महत्वपूर्ण बढ़त हासिल है वो ख़त्म हो जाए."

इंडियन एक्सप्रेस ने दोनों देशों के बीच हुई बातचीत में शामिल एक सूत्र के हवाले से लिखा कि चार स्ट्रैटेजिक फ्रिक्शन प्वाइंट में से दो (हॉट स्प्रिंग के पट्रोलिंग प्वाइंट 15 और 17 और गोगरा पोस्ट) से चीन ने अपने सैनिक पीछे हटाने से मना कर दिया है. बातचीत में चीन ने भारत से कहा कि "अब तक भारत को जो मिला है उसे उसी में खुश होना चाहिए."

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दोनों तरफ से जो बयान जारी किए गए हैं उनसे यही इशारा मिलता है कि दोनों देशों के बीच अभी तनाव जारी रहेगा.

20 अप्रैल को चीन के लिए भारत के दूत विक्रम मिस्री ने एक बयान जारी किया जिसमें ये सुझाव दिया गया था कि भारत सीमा पर गतिरोध नजरअंदाज करने के लिए तैयार नहीं है.

उन्होंने कहा कि, "कुछ हलकों में ये प्रवृत्ति है कि वो स्थिति को नज़रअंदाज़ कर दें और इसे केवल एक छोटा सा मुद्दा या नज़रिए का मामला कह कर टाल दें."

इसके उत्तर में चीन ने कहा कि भारत को सीमा को लेकर जारी विवाद पर "अपना उचित पक्ष" रखना चाहिए.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेन्बिन ने 21 अप्रैल को कहा कि दोनों देशों को "अपना ध्यान लंबे वक्त में द्विपक्षीय संबंधों के विकास की बड़ी तस्वीर पर लगाना चाहिए."

भारत और चीन का झंडा

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क्या कोविड-19 डिप्लोमेसी से पिघलेगी बर्फ?

कोरोना महामारी की दूसरी लहर का सामना कर रहे भारत में संक्रमण के लगातार बढ़ते मामलों के बीच चीन ने बार-बार भारत को मदद की पेशकश की है.

इसके बाद अटकलें लगाई जा रही हैं कि शायद इससे दोनों देशों के बीच जमी बर्फ पिघल सकती है. लेकिन मीडिया टिप्पणीकार और विशेषज्ञ इस मामले में सतर्क हैं.

भारतीय मीडिया का कहना है कि चीन से आपातकालीन मेडिकल सप्लाई खरीदने के बाद दोनों की नीति में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं.

29 अप्रैल के अपने एक लेख में द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि, "सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव जारी है और बातचीत भी सीमित है. ऐसे में चीन से आपातकालीन मेडिकल सप्लाई, ख़ास कर ऑक्सीजन इक्विमेंट खरीदने के भारत के फ़ैसला बाहद अहम माना जा रहा है."

द हिंदू ने सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट में लिखा कि चीन से ज़रूरी मेडिकल इक्विमेंट खरीदने को लेकर भारत में कोई "वैचारिक समस्या" नहीं है. इसी तर्ज पर एक रिपोर्ट द इकोनॉमिक टाइम्स में भी छपी थी. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत ने विदेश से जो मेडिकल इक्विमेंट खरीदे उनमें चीन से खरीदे गए ऑक्सीमीटर बहुतायत में थे.

हालांकि चीन के कोविड-19 संकट का प्रोपोगैंडा के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका को लेकर भारत में चिंता भी जताई जा रही है.

सिक्किम

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एक उदाहरण के अनुसार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के केंद्रीय राजनीतिक और क़ानूनी मामलों के आयोग ने एक मई को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया जिसमें चीन के स्पेस रॉकेट और भारत के एक श्मशान की तस्वीरें छापी गईं और साथ में ये बताया गया था कि भारत और चीन ने कैसे कोरोना महामारी का सामना किया. सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना होने के बाद इस पोस्ट को हटा दिया गया.

कुछ चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 से निपटने के लिए मदद की पेशकश करना चीन के लिए कूटनीतिक अवसर है.

शंघाई इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ शोधकर्ता डॉ ली होंगमेई ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को बताया, "चीनी पक्ष के बयान को देखें तो ऐसा नहीं लगता कि वो भारत के साथ अपने रिश्तों को सीमा विवाद से जोड़ कर देखता है. चीन को उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर हो सकते हैं."

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