भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर जारी बातचीत के बीच नाकुला में झड़प: प्रेस रिव्यू

सिक्किम

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चीन और भारत के सैनिकों के बीच सिक्किम के नाकुला क्षेत्र में पिछले हफ़्ते झड़प होने की घटना सामने आई है.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक़, इस मामले पर नज़र रख रहे अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया है कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प उस वक़्त हुई जब कुछ चीनी सैनिक भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे.

वहीं, भारतीय सेना ने इस मामले पर संक्षिप्त बयान जारी करके कहा है, "ये स्पष्ट है कि 20 जनवरी को उत्तरी सिक्किम के नाकुला एरिया में एक मामूली झड़प हुई थी जिसे स्थानीय कमांडर्स ने स्थापित प्रोटोकॉल के ज़रिए शांत करा दिया था."

हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए अधिकारियों ने बताया है कि इस क्षेत्र में सामान्य तौर पर झड़पें नहीं हुआ करती हैं, ऐसे में ये घटनाएं ईस्टर्न सेक्टर में चीन के आक्रामक रवैये को दिखा रही हैं.

कई विशेषज्ञ इस घटना को चीन द्वारा एक नया मोर्चा खोलने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं क्योंकि मई 2020 के बाद से लद्दाख सेक्टर में स्थिति जस की तस बनी हुई है. इस दौरान दोनों ही पक्ष तनाव कम करने के लिए राजनयिक और सैन्य स्तर पर संवाद कर रहे हैं.

पूर्व राजदूत विष्णु प्रकाश कहते हैं, "मुझे लगता है कि 'मामूली' शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहिए था. झड़प आख़िर में झड़प होती है. जब हम नौवें दौर की वार्ता के नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं तब नाकुला में घुसपैठ की ख़बरें एक एटीट्यूड के बारे में बताती हैं, जो कुछ भी हो सकता है लेकिन मामूली नहीं है."

विशेषज्ञ मानते हैं कि ये घटना चीन की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकती है जिसके तहत चीन भारतीय रक्षा व्यवस्था का आकलन कर रही है और लद्दाख में गतिरोध पैदा होने की वजह से नया मोर्चा खोलने पर विचार कर रही है.

अख़बार ने इंटरनेशनल सिक्योरिटी एट गेटवे हाउस फेलो समीर पाटिल के हवाले से कहा है कि, "लद्दाख में चीन इस समय ऐसा कुछ नहीं कर सकता है जिसे चीन अपने लाभ के रूप में दिखा सके. पिछले गतिरोधों में चीन ने घुसपैठ करके कदम पीछे खींचे हैं. लेकिन इस बार चीन के व्यवहार में मूलभूत अंतर दिख रहा है. इस बार विरोध का सामना करने के बावजूद वे कदम पीछे नहीं ले रहे हैं."

सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा, 'हाई कोर्ट को हल्के में न लें'

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा है कि यूपी सरकार इलाहाबाद हाई कोर्ट को हल्के में न ले.

इलाहाबाद हाई कोर्ट उत्तर प्रदेश के विवादास्पद क़ानून एंटी कन्वर्ज़न लॉ की जांच कर रहा है. यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को ऐसा करने से रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी.

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक़, मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की खंडपीठ ने ये स्पष्ट किया है कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर नहीं करेगा और चाहेगा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय इस क़ानून की वैधता पर अपना फ़ैसला सुनाए.

पीठ ने कहा, "अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई करके जल्दी फ़ैसला देने जा रही है तो हमें क्यों दखल देना चाहिए. हमें इस केस को यहां क्यों लाना चाहिए. हम उच्च न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए."

इस मामले में आगामी छह फरवरी को सुनवाई होनी है. उत्तर प्रदेश सरकार पिछली दो तारीख़ों पर इसी तरह की याचिकाओं के सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने की बात कहते हुए सुनवाई को टलवा चुकी है.

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दफनाए जाने से ठीक पहले महिला के शरीर में हुई हरकत

बेंगलुरु में एक ऐसा केस सामने आया है जिसमें एक महिला ने कब्रिस्तान में दफ़नाए जाने से कुछ लम्हे पहले ही साँस लेना शुरू कर दिया.

बीती 17 जनवरी को चालीस वर्षीय यास्मीन बानो अपने घर में बेहोश होकर गिर गई. इसके बाद उन्हें एक बड़े सरकारी अस्पताल में ले जाया गया जहां डॉक्टर ने तत्काल उनका ऑपरेशन कराने की सलाह दी. लेकिन बेड न होने की वजह से उनका ऑपरेशन नहीं हो सका.

इसके बाद पीड़ित महिला के घरवाले उसे एक निजी अस्पताल में लेकर गए जहां डॉक्टर ने उसे ब्रेन डेड बताकर ऑपरेशन करने से मना कर दिया.

यास्मीन के घरवाले उन्हें मृत मानकर कब्रिस्तान लेकर आ गए जहां अंतिम क्रिया से ठीक पहले यास्मीन बानो के शरीर में हरकत हुई जिसके बाद वहां खड़े लोगों ने यास्मीन को पानी पिलाया और एक बार फिर अस्पताल लेकर गए.

महिला की जाँच करने वाले डॉक्टर पाशा का कहना है कि ये ग़लतफहमी की वजह से हुई चूक है क्योंकि महिला के डिस्चार्ज फॉर्म पर मृत घोषित नहीं किया गया था.

मौलाना वहीउद्दीन ख़ान

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कौन हैं पद्मविभूषण पाने वाले वहीदुद्दीन ख़ान

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय राष्ट्रपति की ओर से मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान को भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण देने की घोषणा हुई है.

वहीदुद्दीन ख़ान को उन शख़्सियतों के रूप में जाना जाता है जो कि अपने गांधीवादी विचारों के साथ हिंदू और मुस्लिम दोनों समाजों में एक ख़ास स्थान रखते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के क़रीबी माने जाने वाले वहीदुद्दीन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र में लेख लिखते रहे हैं.

अंग्रेजी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स ने वहीदुद्दीन के बारे में लिखा है कि उन्होंने साल 2004 के चुनाव में वाजपेयी हिमायत कमेटी का गठन किया था जिसने तत्कालीन लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के लिए समर्थन जुटाने का काम किया था.

लेकिन अगर वहीदुद्दीन ख़ान को किसी बात के लिए सबसे ज़्यादा ख्याति हासिल है तो वह उनका बाबरी मस्जिद को लेकर दिया गया बयान है.

ख़ान मुस्लिम समाज के पहले धार्मिक नेताओं में से एक थे जिन्होंने मुस्लिमों से बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने के लिए कहा था.

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