पश्चिम बंगाल में अपने सभी विधायकों को सुरक्षा क्यों दे रही है बीजेपी?

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है. राज्य में कई चीजें पहली बार हो रही हैं.
मिसाल के तौर पर अबकी बार दो सौ पार के नारे के साथ मैदान में उतरी बीजेपी को महज 77 सीटों से ही संतोष करना पड़ा.
चुनावी नतीजों के बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में हुई हिंसा में भी तमाम राजनीतिक दलों के करीब डेढ़ दर्जन समर्थकों की मौत हो गई.
उसके बाद बीजेपी ने अपने तमाम विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा मुहैया कराने का फ़ैसला किया है.
यही नहीं, विधानसभा चुनाव में हारे हुए कई उम्मीदवारों की सुरक्षा भी 31 मई तक बढ़ाने का फ़ैसला किया गया है.

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'ज़मीनी कार्यकर्ताओं को सुरक्षा'
लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के इस फैसले से पार्टी समर्थकों में भारी नाराजगी है.
पूर्व बर्दवान में हिंसा के शिकार रहे एक कार्यकर्ता देबेन मंडल की दलील है कि तमाम विधायक और नेता हिंसा के दौर में जमीनी कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने या उनके साथ खड़े होने में नाकाम रहे हैं. ऐसे में उनको सुरक्षा देने का क्या तुक है? पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को सुरक्षा कौन देगा?
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने केंद्र सरकार के इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि उसे यह याद रखना चाहिए कि क़ानून और व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है.
इसके बहाने विधायकों को सुरक्षा मुहैया कराने का मतलब सरकार पर सवाल खड़ा करना है.
बंगाल की राजनीति में यह पहला मौका है जब विपक्ष के तमाम विधायकों को ऐसी सुरक्षा दी जा रही हो.

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दो सांसदों का विधायकी से इस्तीफा
बीजेपी के दो नेताओं ने विधानसभा की बजाय संसद की सदस्यता को ही तरजीह दी है. नतीजतन अब उसके सदस्यों की संख्या घट कर 75 रह गई है.
इनमें से विपक्ष के नेता बने शुभेंदु अधिकारी और मुकुल राय समेत 16 नेताओं को पहले से ज़ेड कैटेगरी की सुरक्षा मिली हुई है. अब बाकी विधायकों को एक्स या वाई कैटेगरी की सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी.
सीआईएसएफ के एक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "केंद्रीय गृह मंत्रालय से हमें आदेश मिल चुका है. अगले कुछ दिनों में सबको सुरक्षा मुहैया करा दी जाएगी. लेकिन इन विधायको को सिर्फ बंगाल में ही सुरक्षा मिलेगी, पूरे देश में नहीं."
राज्य में ख़ुफ़िया विभाग के एक शीर्ष अधिकारी बताते हैं, "किसी पार्टी के तमाम विधायकों को सुरक्षा मुहैया कराने का यह देश में पहला मामला है. वर्ष 1996 में जम्मू और कश्मीर चुनावों के दौरान तमाम उम्मीदवारों को सुरक्षा मुहैया कराई गई थी. लेकिन वैसा चुनाव से पहले ही किया गया था. सुरक्षा मुहैया नहीं कराने की स्थिति में कोई चुनाव लड़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता."
वह बताते हैं कि पंजाब में चरमपंथ शीर्ष पर रहने के दौरान भी ऐसा देखने में नहीं आया था.

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बीजेपी की दलील
बीजेपी के एक नेता बताते हैं, "ख़ुफ़िया एजेंसियों ने पार्टी विधायकों पर हमले और उनकी जान को ख़तरा होने का अंदेशा जताया था. चुनाव के बाद हुई हिंसा का जायज़ा लेने राज्य के दौरे पर आई केंद्रीय गृह मंत्रालय की चार-सदस्यीय टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में इसकी सिफारिश की थी. उसी आधार पर सुरक्षा मुहैया कराने का फ़ैसला किया गया है. "
प्रदेश बीजेपी नेताओं के एक गुट का मानना है कि इस फैसले से लोगों में ग़लत संदेश जाने का अंदेशा है.
लेकिन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "राज्य की मौजूदा परिस्थिति में पार्टी के विधायकों के कहीं आने-जाने में खतरा है. इसी वजह से पार्टी ने उनकी सुरक्षा का इंतजाम किया है. चुनाव के बाद हुई हिंसा के दौरान केंद्रीय नेतृत्व ने मुझे इस बारे में राय मांगी थी. उसी आधार पर सुरक्षा मुहैया कराने का फ़ैसला किया गया है."
बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने इस मुद्दे पर अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स से कहा था, "हमने गृह मंत्री से अपने सभी 77 विधायकों को सुरक्षा मुहैया कराने को कहा था क्योंकि वे काम के सिलसिले में अपने चुनाव क्षेत्र समेत कहीं भी जाने में समर्थ नहीं थे. अगर हिंसा थमती है तो वे इस पर पुनर्विचार कर सकते हैं लेकिन फिलहाल हमें इसकी जरूरत है."

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टीएमसी का आरोप
लेकिन टीएमसी ने इस फ़ैसले को एकतरफा और राज्य की क़ानून और व्यवस्था की स्थिति में अनाधिकार हस्तक्षेप करार दिया है.
टीएमसी के प्रवक्ता सुखेंदु शेखर रॉय कहते हैं, "बीजेपी ने निर्वाचित विधायकों के अलावा कुछ हारे हुए उम्मीदवारों को भी केंद्रीय सुरक्षा देने का फ़ैसला किया है. खतरे के आधार पर राज्य सरकार पहले ही विधायकों को सुरक्षा मुहैया कराती रही है."
टीएमसी का आरोप है कि केंद्र सरकार इसके जरिए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही है.
पार्टी के वरिष्ठ नेता सौगत राय कहते हैं, "चुनावी नतीजों के बाद बीजेपी के तमाम नेता लगातार फर्जी वीडियो और तस्वीरों के जरिए राज्य की भयावह तस्वीर पेश करने में जुटे रहे. अब ताजा फैसला भी उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है. "
उनका कहना था कि दरअसल, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को डर है कि कहीं आधे से ज्यादा विधायक पार्टी से नाता न तोड़ लें.

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वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "यह फ़ैसला राजनीतिक है और इससे बीजेपी की छवि को नुकसान होने का अंदेशा है. सुरक्षा कवर की वजह से इन विधायकों के आम लोगों से कट जाने का खतरा है. शायद बीजेपी नेतृत्व को इन विधायकों के दलबदल का खतरा महसूस हो रहा है. ऐसे में सुरक्षा के बहाने उन पर निगाह रखना आसान होगा. "
उनका कहना है कि विधायकों को तो सुरक्षा मिलेगी, लेकिन पार्टी के आम कार्यकर्ताओं को नहीं. इससे ज़मीनी स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में असंतोष पैदा हो सकता है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा मुहैया कराना इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "पश्चिम बंगाल में नक्सल आंदोलन के दौरान भी कभी ऐसा देखने को नहीं मिला था. शायद बीजेपी ममता बनर्जी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति के तहत ही अपने तमाम विधायकों को सुरक्षा मुहैया करा रही है. लेकिन इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं का नेतृत्व से मोहभंग हो सकता है."
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