बंगाल चुनाव: ममता का 'तुष्टीकरण' बंगाल के मुसलमानों को कितनी संतुष्टि देता है

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- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पश्चिम बंगाल से लौटकर
पश्चिम बंगाल में पाँच चरणों के विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. चुनाव प्रचार, नारे, आरोप-प्रत्यारोप और दावों के आधार पर तो लगता है कि मुक़ाबला सिर्फ़ टीएमसी और बीजेपी के बीच है. राज्य में 34 साल तक राज करने वाली लेफ़्ट मुक़ाबले में कहीं दिख नहीं रही.
ममता बनर्जी बीजेपी को 'बाहरी' पार्टी बताती हैं और धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाती हैं. वहीं बीजेपी ममता सरकार पर 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का आरोप लगाती रही है.
पीएम मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ से लेकर स्थानीय नेताओं ने भी बार-बार सार्वजनिक मंचों से कहा है कि ममता को सिर्फ़ मुसलमानों की परवाह है, वो उनके लिए ही काम करती हैं क्योंकि वही उनके वोटर हैं.
लेकिन बीजेपी के आरोपों का आधार क्या है?
हाल ही में ममता की पार्टी के बड़े नेता और तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए शुवेंदु अधिकारी ने एक इंटरव्यू में कहा कि "ममता चंडी पाठ ग़लत करती हैं लेकिन कलमा एकदम सटीक बोलती हैं. विष्णु को माता बोलती हैं. ये हिंदू धर्म का अपमान नहीं तो और क्या है?"

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शुवेंदु ने कहा कि, "ममता बनर्जी मुसलमानों के लिए जो कुछ भी करती हैं वो वोट के लिए करती हैं. वो मुस्लिम तुष्टीकरण करके अपना 27 फ़ीसद वोट सुरक्षित करना चाहती हैं."
ममता बनर्जी पर हालांकि तुष्टीकरण के आरोप उस समय से ही लग रहे हैं जब साल 2011 में वो सत्ता में आईं और साल भर बाद ही उन्होंने इमामों के लिए ढाई हज़ार रुपये भत्ते का ऐलान कर दिया था.
बयानों से इतर ममता बनर्जी ने मुसलमानों के लिए जो घोषणाएं की हैं, उन्हें तुष्टीकरण के आरोप का आधार बताया जाता है.
राज्य में मुसलमानों की आबादी के कुल 97 फ़ीसद हिस्से को अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) की श्रेणी में रखा गया है. इस आधार पर उन्हें राज्य की सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिलता है.
ममता पर लगने वाले आरोपों का कारण सिर्फ़ ये योजनाएं या घोषणाएं ही नहीं हैं. "जय श्रीराम" के नारे पर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया, दुर्गा प्रतिमा विसर्जन को लेकर ममता के फ़ैसले भी इन आरोपों की वजह रहे हैं.
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मुसलमान भी लगा रहे हैं इल्ज़ाम
हुगली के मशहूर सूफ़ी दरगाह फुरफुरा शरीफ़ के अब्बास सिद्दीक़ी ने बीबीसी से बातचीत में कहा था, "मुहर्रम के लिए ममता को दुर्गा पूजा बाधित करने की ज़रूरत नहीं है. एक सेक्युलर नेता, वो होगा जो मुहर्रम और दुर्गा पूजा दोनों साथ कराए, न कि किसी एक के लिए किसी दूसरे को बंद करे. किसी मुसलमान ने दुर्गा विसर्जन बाधित करने की माँग नहीं की थी लेकिन ममता ने ऐसा मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए किया. मैं मानता हूँ कि ममता ने मुस्लिम तुष्टीकरण किया है. किसी और की सरकार में दुर्गा पूजा और मुहर्रम को लेकर दिक़्क़त नहीं हुई, लेकिन ममता राज में क्यों समस्या हुई?"
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अब्बास सिद्दीक़ी ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ़) नाम की एक पार्टी बनाई है और वामपंथी दलों के साथ उनका गठबंधन है.
वरिष्ठ पत्रकार निर्मल्या मुखर्जी कहते हैं, "ममता बनर्जी मुस्लिमों के लिए ही करती हैं. पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी वामपंथियों को हराकर आईं तो उन्होंने देखा कि उन्हें अपनी ज़मीन बनाए रखनी है और मुस्लिम कम्युनिटी का सपोर्ट बनाए रखना है. उन्होंने देखा कि चुनावों में मुस्लिम कम्युनिटी ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया है."

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वो कहते हैं, "बीजेपी ममता बनर्जी पर तुष्टीकरण का जो आरोप लगा रही है वो बिल्कुल सही बात है लेकिन इसमें दोष ममता बनर्जी का ही है. ममता बनर्जी ने ही उन्हें वो मुद्दे दिए हैं, जिन्हें बीजेपी अब उछाल रही है."
निर्मल्या मुखर्जी मानते हैं कि तुष्टीकरण के पीछे वोट-बैंक की राजनीति है. हालांकि ममता बनर्जी तुष्टीकरण के ऐसे किसी भी आरोप से इनकार करती आई हैं.
हैदराबाद से सांसद और ऑल इंडिया इत्तिहाद उल मुसलिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी भी ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगा चुके हैं.
उन्होंने कहा था, "हम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पूरी मानवता के साथ अपील करते हैं कि आप ये सब छोड़ दीजिए, दुआ के लिए हाथ उठाना, इफ़्तार के लिए दावत करना, मुसलमान इसका मोहताज नहीं है. आप ज़मीनी विकास की बात कीजिए."

कितनी बदली मुसलमानों की स्थिति?
2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 27 फ़ीसद है लेकिन राज्य के सभी इलाक़ों में मुस्लिमों की स्थिति एक-सी नहीं है.
अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अमर्त्य सेन की संस्था प्रतिची इंस्टीट्यूट से जुड़े शब्बीर अहमद ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की स्थिति पर सरकारी आंकड़ों और आरटीआई से प्राप्त जानकारी के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है.
उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में औसत साक्षरता दर जहां 76.3 फ़ीसद है, वहीं मुसलमान समुदाय में यह दर 69.7 प्रतिशत है. ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले दस मुसलमान परिवारों में से क़रीब आठ परिवारों की मासिक आय पाँच हज़ार रुपए या उससे कम है.
शहरों में रहने वाले तक़रीबन एक-चौथाई मुसलमान परिवार ऐसे हैं जिनकी मासिक आमदनी ढाई हज़ार के क़रीब है, गाँव में रहने वाले ज़्यादातर मुसलमान खेतिहर मज़दूर हैं और जबकि शहरों में रहने वाले मुसलमानों की बड़ी आबादी छोटे-मोटे काम धंधे करती है.
ममता बैनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल पुलिस में मुसलमानों की भागीदारी बढ़ी है, 2008 की तुलना में यह वृद्धि दो प्रतिशत है, इस समय
पुलिस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 11.14 प्रतिशत है जो उनकी औसत आबादी के आधे से भी कम है. इनमें से ज़्यादातर लोग पुलिस सिपाही या कॉन्सटेबल हैं.

शिक्षा के क्षेत्र में क्या हुआ?
आसिफ़ अहमद आलिया यूनिवर्सिटी के छात्र हैं. जब हमने उनसे ममता राज में मुसलमानों के तुष्टीकरण के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि "हमारे लिए तो कुछ भी नहीं किया है. यह यूनिवर्सिटी पहले से ही थी बस इसे नीला-नीला रंग दिया था. ना तो टीचर हैं, ना ही इंफ्रास्ट्रक्चर है."
वो कहते हैं, "ममता बनर्जी जब सिर ढकती हैं और इफ़्तारी करती हैं तो हिंदुओं को शायद बुरा लगता है. यही सबसे बड़ी समस्या है. बीजेपी इन्हीं सब बातों को उछाल रही है लेकिन सच्चाई यह है कि ममता बनर्जी सरकार ने मुस्लिमों के लिए कुछ नहीं किया है. ना हमारे पास शिक्षा की अच्छी व्यवस्था है, और ना ही नौकरी की."
आसिफ़ अहमद की सबसे बड़ी चिंता यह है कि पढ़ाई ख़त्म होने के बाद वो क्या करेंगे. नौकरी मिलेगी या नहीं, इसे लेकर संदेह है.
इमरान गणित में मास्टर्स कर चुके हैं और ये सोचकर बीएड भी कर लिया था कि कम से कम टीचर की नौकरी तो मिल ही जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
वो कहते हैं, "इमाम को भत्ता देने की बात पर इतना हल्ला मचा हुआ है लेकिन कितने लोगों को पता है कि इमाम का भत्ता वक़्फ़ बोर्ड देता है. और मान लीजिए इमाम को भत्ता मिल भी रहा हो लेकिन क्या उस ढाई हज़ार से जीवन चल जाएगा जबकि उसके बच्चों के पास नौकरी नहीं हो."

युवा मुस्लिम नेता क़मरउज्ज़मां का कहना है कि "लेफ़्ट पार्टी के दौरान मुसलमानों की जैसी स्थिति थी, वैसी ही स्थिति अब भी है. एक्स्ट्रा कुछ नहीं मिला है."
हालांकि साल 2016 में आई प्रतिची ट्रस्ट की रिपोर्ट 'लिविंग रिएलिटी ऑफ़ मुस्लिम्स इन वेस्ट बंगाल' में कहा गया था कि ग्रामीण इलाक़ों की तुलना में टीएमसी के प्रभाव वाले इलाक़ों में, मसलन, हावड़ा और हुगली में मुसलमानों की स्थिति कुछ बेहतर ज़रूर हुई है.
हावड़ा स्थित पंचपारा हाई मदरसा के बड़े इमाम कहते हैं, "ये बिल्कुल सही है कि ममता बनर्जी के आने के बाद से स्थिति बेहतर हुई है. अब बच्चों को राशन, कपड़ा, किताबें सब कुछ मिलता है. पुरानी सरकार की तुलना में इस सरकार ने बेहतर काम किया है
हुबली के एक शख़्स मोहम्मद फ़ैसल का कहना है कि "दीदी ने जो काम किया है, उसके बाद दीदी के ख़िलाफ़ कोई नहीं जा सकता है. दीदी ने जो हम लोगों के लिए किया है, हमारे बच्चों के लिए किया है, वैसा कभी नहीं हुआ. हम लोग बहुत ख़ुश हैं दीदी के राज में. दीदी ने हम लोगों का बहुत ध्यान रखा है."

तुष्टीकरण बनाम कमज़ोर की मदद
सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़, कोलकाता में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर मैद-उल-इस्लाम कहते हैं कि "मुझे नहीं लगता है कि बीजेपी, ममता सरकार पर जो आरोप लगा रही है वो सही हैं."
वो कहते हैं, "यह शब्द सही नहीं है. आप इसे सकारात्मक कार्रवाई के तौर पर देख सकते हैं. रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट की सलाह थी कि जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं उन्हें आरक्षण दिया जा सकता है. ख़ास तौर पर जो अल्पसंख्यक हैं उन्हें आप आरक्षण दे सकते हैं. इसी लिहाज़ से पूरी मुस्लिम कम्युनिटी को रिज़र्वेशन नहीं है. उनमें जो ओबीसी हैं उन्हीं को आरक्षण दिया गया है."
इस्लाम कहते हैं कि ममता ने कुछ नया नहीं किया है, "लेफ़्ट के समय में भी दिया गया था 2010 में. तृणमूल की सरकार में हुआ बस ये है कि उन्होंने ओबीसी की लिस्ट बढ़ा दी है लेकिन ओबीसी तो हिंदू भी हैं और मुस्लिम भी. उससे फ़र्क़ ये पड़ा कि 2011 से बहुत से मुस्लिम ओबीसी उच्च शिक्षा में आए और सरकारी नौकरियों में भी उन्हें आरक्षण मिला."

मैद-उल-इस्लाम कहते हैं, "ममता बनर्जी अपने पहले टर्म में कभी चादर पहनकर दिखाई दीं, तो कभी इफ़्तार पार्टी में. लेकिन इसे ऐसे समझिए कि उससे पहले ममता बीजेपी के साथ गठबंधन में थीं, तो उनके अंदर कहीं ये बात थी कि मुसलमानों को क़रीब लाने के लिए ऐसा करना होगा, लेकिन 2016 के बाद से उन्होंने बहुत कम ऐसे मौक़े दिए हैं जिसको लेकर तुष्टीकरण का आरोप लगाया जाए."
मैद-उल-इस्लाम बीजेपी के आरोप पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "लेफ़्ट के दौर में एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को भूमि सुधार के तहत ज़मीन मिली थी. ग़रीब लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक बल मिला था. अगर कोई इसे तुष्टीकरण कहता है तो फिर तो एससी, एसटी या ओबीसी को लेकर जो आरक्षण है वो भी तुष्टीकरण ही है. यह संविधान का एक प्रावधान है."

बंगाल बनाम दूसरे राज्य
2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी कुल आबादी की 27 फ़ीसद है यानी तक़रीबन ढाई करोड़. हालांकि पश्चिम बंगाल में मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे कुछ ज़िले हैं जहाँ मुसलमान आबादी हिंदुओं से काफ़ी अधिक है, यानी इन ज़िलों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं.
पड़ोसी राज्य बिहार में मुस्लिम आबादी 16.87 फ़ीसद है यानी तक़रीबन पौने दो करोड़. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19.26 फ़ीसद है यानी पौने चार करोड़ से अधिक मुसलमान हैं.
हालात को समझने के लिए बिहार के एक मुसलमान बहुल ज़िले किशनगंज से बंगाल के मुर्शिदाबाद की तुलना की जा सकती है. मिसाल के तौर पर, मुर्शिदाबाद में खाना पकाने के लिए 30 प्रतिशत घरों में स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल होता है, वहीं किशनगंज में यह आंकड़ा केवल 15 प्रतिशत है.
इसी तरह, मुर्शिदाबाद में जहाँ क़रीब 97 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं के पास स्वास्थ्य कार्ड है, वहीं किशनगंज में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत है.
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (2018-2019) के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर उच्च शिक्षा में मुस्लिम समुदाय के छात्रों का प्रतिशत 5.23 फ़ीसद है.
इस सर्वे के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर जनरल कैटेगरी से शिक्षकों का प्रतिशत सबसे अधिक 56.7 फ़ीसद है जबकि ओबीसी 32.1 फ़ीसद हैं. उच्च शिक्षण संस्थानों में 5.4 फ़ीसद शिक्षक मुस्लिम समुदाय से हैं.

रोज़गार का सवाल
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक़, ग्रामीण भारत में रहने वाले मुस्लिम समुदाय की क़रीब 49.2 फ़ीसदी आबादी स्वरोज़गार में है. वहीं शहरों में यह 50 फ़ीसदी है.
पश्चिम बंगाल में प्रति हज़ार मुसलमानों में अनियमित मज़दूरी करने वालों की संख्या 483 है. वहीं बिहार में यह संख्या 401 है और असम में 141 है जबकि उत्तर प्रदेश में 322 है. यानी रोज़गार के मामले में पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की हालत बिहार, असम और उत्तर प्रदेश, तीनों से बुरी है.
अनियमित मज़दूरी के बाद, अब नियमित मज़दूरी यानी वेतन पाने वालों की तादाद पर नज़र डालें. पश्चिम बंगाल में जहां प्रति हज़ार मुसलमानों में 209 वेतन पाते हैं वही बिहार में 150 और उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 203 प्रति हज़ार है.

राजनीतिक आरोप?
ममता बनर्जी ने हाल ही में राज्य के आठ हज़ार से ज़्यादा ग़रीब ब्राह्मण पुजारियों को एक हज़ार रुपए मासिक भत्ता और मुफ़्त आवास देने की घोषणा की है.
पूजा समितियों को बिजली के बिल में 50 फ़ीसद छूट देने का एलान किया ही है. इसके अलावा आयोजन समितियों को भी रियायत दी है.
लेकिन हिंदू समुदाय को ध्यान में रखकर की गईं ये घोषणाएं ऐसे समय में की गईं जब चुनाव सिर पर थे.
ऐसे में सवाल ये है कि क्या ममता ने अपने ऊपर लगे तुष्टीकरण के आरोप को ग़लत साबित करने के लिए ये घोषणाएं कीं और क्या ममता पर बीजेपी के आरोप सही हैं?
पहली बात तो यह है कि राज्य में 27 फ़ीसद मुस्लिम आबादी है जो कि एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है. इसे साधे बिना सत्ता में आ पाना मुश्किल है और ममता इस बात को जानती हैं.
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बीबीसी से एक बातचीत में टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इस बात का ज़िक्र किया था.
उन्होंने कहा था, "पश्चिम बंगाल में एक भी स्कीम ऐसी नहीं है, जो सिर्फ़ मुसलमानों के लिए हो. हमारे यहाँ 27 फ़ीसद मुसलमान रहते हैं. हम किसी का तुष्टीकरण नहीं करते. किसी स्कीम में ग़रीब को घर देंगें और मुसलमानों को मिलेगा, तो आप ये नहीं कह सकते कि हमने मुसलमानों को घर दिया है. ये तुष्टिकरण नहीं है. ये सबकी देखभाल करने की एक प्रक्रिया का हिस्सा है."
लेकिन अल्पसंख्यकों की हालत पर तैयार की गई सच्चर कमेटी रिपोर्ट की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की हक़ीक़त जानने के लिए प्रोफ़ेसर अमिताभ कुंडू की अध्यक्षता में बनी समिति ने कहा था कि "यह कहना तो ग़लत होगा कि सरकार ने सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों को लागू करने की कोशिश नहीं की है. उन्होंने योजनाएं बनाई हैं, उन्हें लागू किया है लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि जो परिणाम हासिल होने चाहिए थे, वे नहीं हुए."
अंफन तूफ़ान में अपना सब कुछ खो देने वाले कोलकाता के पंकज सरदार और बांग्लादेश की सीमा से लगने वाले राज्य के सुदूर हिस्से मोशालदांगा एन्क्लेव के जैनल दोनों से जब हमने पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि ममता के राज में मुसलमानों की हालत बेहतर हुई है तो दोनों के शब्द थोड़े अलग थे लेकिन जवाब एक ही था- "जीवन में तुष्टि नहीं, चुनौती है."

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