शुभेंदु अधिकारी: पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले कौन हैं नंदीग्राम के ‘दादा’

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- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
"ममता बनर्जी ने जंगलमहल में क्रांति ला दी है. दिल्ली से यहां आने वाले लोग बाहरी हैं. बंगाल में अगले पचास वर्षों तक कोई तृणमूल कांग्रेस को नहीं हरा सकता. अब एक बार फिर केंद्र में ग़ैर-बीजेपी सरकार का नेतृत्व करने का मौक़ा एक बंगाली महिला (ममता बनर्जी) के सामने है."
"ममता बनर्जी ने नंदीग्राम और जंगलमहल इलाक़े के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया है. मैंने नंदीग्राम में अगर उनको कम से कम पचास हज़ार वोटों के अंतर से नहीं हराया तो राजनीति से संन्यास ले लूंगा."
अगर कहा जाए कि ऊपर लिखे ये दो परस्पर विरोधी बयान एक ही व्यक्ति के हैं तो आपको हैरत हो सकती है. लेकिन यह पश्चिम बंगाल की राजनीति की मौजूदा हकीकत है.
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इन दोनों बयानों के बीच अंतर महज़ कुछ महीनों का ही है.
पहला बयान टीएमसी सरकार में तत्कालीन मंत्री और ममता बनर्जी के क़रीबी शुभेंदु अधिकारी ने जंगलमहल में एक खेल प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण समारोह में दिया था.
लेकिन बाद में तेज़ी से बदले हालात में बीते दिसंबर में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया और उसके बाद इसी साल जनवरी में उन्होंने दूसरा बयान दिया था.
कभी टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के सबसे क़रीबी रहे शुभेंदु के अब उनके सबसे कट्टर विरोधी बनने तक का 360 डिग्री का सफ़र, राजनीति में कोई हैरत की बात नहीं है.
पुरानी कहावत है कि राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी. शुभेंदु की ऊपर लिखी दोनों टिप्पणियां इसी कहावत को चरितार्थ करती दिखती हैं.
फिलहाल पूर्व मेदिनीपुर ज़िले की नंदीग्राम सीट पर वे ममता के प्रतिद्वंद्वी हैं.

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ममता बनर्जी को अपने गढ़ में चुनौती
पहले विधायक, फिर दो बार सांसद और फिर नंदीग्राम सीट से पिछला विधानसभा चुनाव जीत कर ममता बनर्जी सरकार के दूसरे कार्यकाल में परिवहन मंत्री बने शुभेंदु अधिकारी का नाम हाल तक पश्चिम बंगाल से बाहर शायद ही कोई जानता हो.
लेकिन तेज़ी से बदलते घटनाक्रम में बीते दिसंबर में बीजेपी में शामिल होने और अब उसके बाद मौजूदा विधानसभा चुनावों में अपने गढ़ नंदीग्राम में मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को चुनौती देने वाले शुभेंदु का नाम अब देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैल चुका है.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों और आम लोगों की निगाहों में शुभेंदु फिलहाल पश्चिम बंगाल में बीजेपी का सबसे मज़बूत चेहरा बन कर उभरे हैं.
लेकिन शुभेंदु अचानक इतनी सुर्खियां क्यों बटोर रहे हैं?
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुभेंदु के उदय की कहानी और मौजूदा चुनाव में उनकी अहमियत को समझने के लिए लगभग 15 साल पीछे लौटना होगा. शुभेंदु ने साल 2006 के विधानसभा में पहली बार कांथी दक्षिण सीट से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता था.
उसके बाद साल 2009 में उन्होंने तमलुक सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. 2014 के चुनावों में भी उन्होंने अपनी सीट पर कब्ज़ा बनाए रखा.
उसके बाद 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने नंदीग्राम सीट से चुनाव जीता और ममता मंत्रिमंडल में परिवहन मंत्री बनाए गए. धीरे-धीरे उनको सरकार में नंबर दो माना जाने लगा था.
हालांकि उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से उस समय हुई थी जब वे कांथी स्थित पीके कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. साल 1989 में वे कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद के प्रतिनिधि चुने गए थे.
शुभेंदु 36 साल की उम्र में पहली बार 2006 में कांथी दक्षिण सीट से विधायक चुने गए. इसके बाद उसी साल उनको कांथी नगरपालिका का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. तमलुक लोकसभा सीट से चुनाव जीतने के बाद 2016 में ममता ने उनको नंदीग्राम सीट से मैदान में उतारा, जहां से वे आसानी से जीत गए.
शुभेंदु का राजनीतिक करियर भले ही 1990 के दशक में शुरू हुआ हो, लेकिन एक कद्दावर नेता के तौर पर उनकी पहचान साल 2007 में नंदीग्राम के अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के दौरान ही बनी. लो प्रोफाइल सांसद रहे शुभेंदु अपनी सांगठनिक दक्षता के कारण आगे चल कर बहुत कम समय में टीएमसी में सत्ता का वैकल्पिक केंद्र बन गए.
'पार्टी में उचित सम्मान नहीं मिला'
पूर्व मेदिनीपुर ज़िले के कोलाघाट में रूपनारायण नदी पार करते ही अहसास हो जाता है कि यहां अधिकारी परिवार का राज है.
पूरा इलाका शुभेंदु के पोस्टरों से पटा नज़र आता है. गली के नुक्कड़ों, चौराहों और चाय की दुकानों पर इस परिवार का ज़िक्र सुनने को मिल सकता है.
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बीते दो दशकों में इस परिवार ने इलाक़े में ऐसी राजनीतिक पकड़ बनाई है जिसकी राज्य में दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती.
पूर्व मेदिनीपुर में अधिकारी परिवार के क़रीबी रहे टीएमसी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "शुभेंदु ने इलाक़े में टीएमसी की स्थिति और मज़बूत करने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन उनको वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हक़दार थे."
हाल के दिनों में ममता बनर्जी शुभेंदु को लगातार नाम लिए बिना ग़द्दार और मीर जाफ़र जैसे विशेषणों से नवाज़ती रही हैं. इससे ख़ास कर इस इलाक़े में पार्टी के लिए जी-जान लड़ा देने वाले अधिकारी परिवार के मुखिया शिशिर अधिकारी काफ़ी आहत हैं.
वो कहते हैं, "हमने पार्टी के लिए क्या नहीं किया. लेकिन बदले में हमें अब बाप-दादा के नाम की गालियां सुननी पड़ रही हैं. यह तो वक्त ही बताएगा कि ग़द्दार और मीर जाफ़र कौन है."
शुभेंदु के पिता और अधिकारी परिवार के मुखिया शिशिर अधिकारी साल 1982 में कांथी दक्षिण विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक बने थे.
वो बाद में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे. फिलहाल वे तीसरी बार टीएमसी के टिकट पर कांथी लोकसभा सीट से सांसद है. वो पहले तीन बार विधानसभा चुनाव भी जीत चुके हैं. मनमोहन सिंह की सरकार में शिशिर मंत्री भी रहे हैं.
शुभेंदु के छोटे भाई दिब्येंदु अधिकारी ने साल 2009, 2011 और 2016 में विधानसभा चुनाव जीता था. बाद में शुभेंदु की खाली की गई सीट पर उपचुनाव जीत कर वो संसद पहुंचे थे.

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टीएमसी को मज़बूत करने में निभाई अहम भूमिका
राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफ़ेसर समीरन पाल कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में जिस नंदीग्राम आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी उसके मुख्य वास्तुकार शुभेंदु ही थे. साल 2007 में कांथी दक्षिण सीट से विधायक होने के नाते तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के ख़िलाफ़ भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमिटी के बैनर तले स्थानीय लोगों को एकजुट करने में उनकी भूमिका सबसे अहम रही थी."
"तब नंदीग्राम में प्रस्तावित केमिकल हब के लिए ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू ही हुई थी. उस दौर में इलाक़े में हल्दिया के सीपीएम नेता लक्ष्मण सेठ की तूती बोलती थी. लेकिन यह शुभेंदु ही थे जिनके कारण इलाक़े के सबसे ताकतवर नेता रहे लक्ष्मण सेठ को हार का सामना करना पड़ा था."
पाल बताते हैं कि जंगलमहल के नाम से कुख्यात रहे पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा ज़िलों में तृणमूल कांग्रेस का मज़बूत आधार बनाने में भी शुभेंदु का ही हाथ था.
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टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "2011 में विधानसभा में लेफ्ट के 34 साल के शासन का ख़ात्मा कर सत्ता में पहुंचने वाली ममता बनर्जी ने टीएमसी के प्रति निष्ठा के लिए अधिकारी परिवार को पुरस्कृत किया था. उनको जंगमहल के अलावा मालदा और मुर्शिदाबाद में टीएमसी का पर्यवेक्षक बना दिया गया."
"इसके साथ ही शुभेंदु ने हल्दिया बंदरगाह इलाक़े और ख़ासकर वहां की ट्रेड यूनियनों पर अपनी मज़बूत पकड़ बना ली. इससे राज्य की राजनीति और टीएमसी में शुभेंदु एक बेहद मज़बूत नेता के तौर पर उभरे."
हाल में टीएमसी से नाता तोड़ कर बीजेपी में शामिल होने वाले एक पूर्व मंत्री नाम नहीं छापने की शर्त पर पूरा मामला कुछ इस तरह बताते हैं.
वो कहते हैं कि टीएमसी में नंबर दो रहते मुकुल राय ने पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले में पार्टी संगठन में अपने समर्थकों को शामिल कर शुभेंदु के पर कतरने का प्रयास किया था.
लेकिन 2017 में मुकुल के बीजेपी में शामिल होने के बाद पार्टी में नंबर दो नेता के तौर पर उभरे अभिषेक बनर्जी से शुभेंदु का अहम और उनकी महात्वाकांक्षाएँ टकराने लगीं. दरअसल, पार्टी के इस मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाने वाले शुभेंदु चाहते थे कि उनको टीएमसी में ममता बनर्जी के बाद नंबर दो नेता माना जाए.
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लेकिन बीते लोकसभा चुनावों के बाद अभिषेक बनर्जी जब प्रशांत किशोर की सहायता से पार्टी को चलाने लगे तो शुभेंदु को महसूस होने लगा कि अब इसमें रहकर उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं होंगी.
शुभेंदु ने मंत्रिमंडल और पार्टी से इस्तीफ़ा देने के चार महीने पहले से ही ख़ुद को पार्टी से अलग-थलग कर लिया था. वो न तो पार्टी की बैठकों में शामिल हो रहे थे और न ही सरकार की.
लेकिन दूसरी ओर, उन्होंने इलाक़े में बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान छेड़ रखा था. शुभेंदु और अधिकारी परिवार की अहमियत समझते हुए ममता, उनके मंत्रियों और ख़ुद 'पीके' ने उनको मनाने का हरसंभव प्रयास किया. लेकिन शुभेंदु शायद पहले ही टीएमसी से नाता तोड़ने का मन बना चुके थे. इसलिए उन्होंने नवंबर के आख़िर में जब अपना इस्तीफ़ा भेजा तो राजनीतिक हलके में किसी को कोई हैरत नहीं हुई.
टीएमसी के प्रवक्ता सौगत राय कहते हैं, "शुभेंदु की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं काफी बढ़ गई थीं. इसलिए उन्होंने दीदी की बातों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया. पार्टी उनकी शिकायतें सुन कर उनको दूर करने के लिए तैयार थी. लेकिन वे अपनी ज़िद पर अड़े रहे."
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टीमसी के एक अन्य वरिष्ठ नेता का आरोप है कि शुभेंदु विधानसभा चुनावों में अपने 50 से ज़्यादा उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए दबाव बना रहे थे. लेकिन यह संभव नहीं था.
लेकिन शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी इसे ग़लत बताते हैं. वो कहते हैं, "जहां आत्मसम्मान नहीं हो, वहां रहना ठीक नहीं है. पार्टी और सरकार में लगातार शुभेंदु की उपेक्षा हो रही थी. उनके मंत्रालय से संबंधित फ़ैसले भी दूसरे लोग ले रहे थे. अब टीएमसी के नेता अपनी ग़लती छिपाने के लिए ब्लैकमेल जैसे निराधार आरोप लगा रहे हैं."
प्रोफ़ेसर पाल का कहना है कि अधिकारी परिवार के रसूख वाले ज़िलों में वोटरों के एक तबके का समर्थन 'दीदी' के बदले 'दादा' यानी शुभेंदु के पक्ष में जा सकता है.
प्रोफ़ेसर पाल कहते हैं, "चुनावी नतीजा चाहे जो हो, शुभेंदु ने नंदीग्राम को ठीक 14 साल बाद एक बार फिर सुर्खियों में तो ला ही दिया है. यह राज्य की सबसे हाई प्रोफ़ाइल सीट बन गई है. इसके नतीजे का बंगाल की भावी राजनीति पर दूरगामी असर होना तय है."
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