कोरोना: यूपी के जौनपुर में ऑक्सीजन देने वाले पर ही दर्ज हुआ मुक़दमा, क्या है पूरा मामला?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के जौनपुर में सरकारी अस्पताल के बाहर ऑक्सीजन के बिना तड़प रहे मरीज़ों को अपनी एंबुलेंस से ऑक्सीजन देने वाले युवक के ख़िलाफ़ प्रशासन ने मुक़दमा दर्ज करा दिया है.
इस मुक़दमे को कई लोग मददगारों को ख़ामोश करने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं, तो वहीं प्रशासन का तर्क है कि युवक अस्पताल के बाहर अव्यवस्था पैदा कर रहा था जिसकी वजह से मेडिकल स्टाफ़ को दिक्कत हो रही थी.
जौनपुर के डीएम मनीष वर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "अभी युवक के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है, एडीएम की टीम पूरे मामले की जांच कर रही है. प्रशासन का इरादा किसी को बेवजह दंडित करने का नहीं है."
जौनपुर कोतवाली में विक्की अग्रहरि नाम के युवक के ख़िलाफ़ महामारी एक्ट की धारा 3 और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 और 269 के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है. ये मुक़दमा जौनपुर के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक की शिकायत पर दर्ज कराया गया है.
विक्की अग्रहरि ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "मैं मरीज़ों को बिना ऑक्सीजन के तड़पते हुए देख नहीं सका तो मैंने अपनी एंबुलेंस से ही ऑक्सीजन सिलेंडर निकाल कर ऑक्सीजन दे दी."

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अपनी शिकायत में सीएमओ ने कहा है, "विक्की और अन्य लोग पर्चा काउंटर के पास सांस फूलने वाले मरीज़ों को प्राइवेट सिलेंडर से ऑक्सीजन दे रहे थे और वीडियो बना रहे थे, वे वहां मौजूद लोगों को बता रहे थे कि हम मरीज़ों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि शासन-प्रशासन की ओर से व्यवस्था नहीं की जा रही है."
मददगार युवक पर मुक़दमे से प्रशासन की छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. ऐसे में इस मुक़दमे के दर्ज करने का तर्क क्या है?
इस प्रश्न पर डीएम मनीष वर्मा ने कहा, "जहां तक मेरी जानकारी है, संबंधित युवक अस्पताल के बाहर मरीज़ों को ऑक्सीजन देकर वीडियो बना रहा था जबकि उस समय अस्पताल में बेड उपलब्ध थे. जिन लोगों को बाहर ऑक्सीजन दी गई उन सभी को भर्ती करा दिया गया था."
मनीष वर्मा कहते हैं, "हमारे अधिकारी और मेडिकल स्टाफ़ भी अपनी जान ख़तरे में डाल रहे हैं. उनके प्रयासों को तो मीडिया में जगह नहीं मिलती है लेकिन जब कोई नकारात्मक ख़बर आती है तो उसे उछाल दिया जाता है. इससे अधिकारियों का मनोबल भी गिरता है."
डीएम का दावा है कि कोविड की दूसरी विनाशकारी लहर के बावजूद जौनपुर में स्थिति बहुत हद तक नियंत्रण में है और फ़िलहाल ऑक्सीजन या बेड का कोई संकट नहीं है.

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कौन हैं विक्की अग्रहरि
34 वर्षीय विक्की अग्रहरि पेशे से एंबुलेंस चालक हैं. बीबीसी से बात करते हुए विक्की ने कहा, "मेरे पास एंबुलेंस में दो ऑक्सीजन सिलेंडर थे. दो सप्ताह पहले मैंने अपनी बीवी का सोना बेचकर चार ऑक्सीजन सिलेंडर और ख़रीदे हैं. दो सिलेंडर मुझे दान में मिले हैं. मैं अब तक सौ से ज़्यादा लोगों की ऑक्सीजन देकर मदद कर चुका हूँ."
उनके मुताबिक, ऑक्सीजन संकट को देखते हुए उन्होंने बीस हज़ार रुपए प्रति सिलेंडर की दर से ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदे हैं.
गुरुवार के घटनाक्रम को याद करते हुए वो कहते हैं, "मैं एंबुलेंस से एक गंभीर मरीज़ को लेकर ज़िला अस्पताल गया था. एंबुलेंस में ऑक्सीजन सिलेंडर था. वहां मैंने देखा कि कई मरीज़ ऑक्सीजन के लिए परेशान हो रहे हैं और उन्हें भर्ती कराने की प्रक्रिया में समय लग रहा है. मैंने उन्हें अपनी एंबुलेंस से ऑक्सीजन दे दी. जब मैंने एक मरीज़ को ऑक्सीजन दी तो और भी मरीज़ मेरे पास आ गए और भीड़-सी लग गई."
विक्की कहते हैं, "मैं 16 साल से एंबुलेंस चला रहा हूँ. ये अभूतपूर्व संकट है. मैंने सोचा कि ये लोगों की मदद करने का मौका है और इसलिए ही मैंने घर के गहने तक बेच दिए. जिन लोगों को ऑक्सीजन दी है वो पैसे देना चाह रहे थे लेकिन मैंने किसी से कोई पैसा नहीं लिया. मैं पूरे सेवाभाव से काम कर रहा था."
विक्की का दावा है कि पहले वो 500 रुपए सिलेंडर की दर से ऑक्सीजन भरवाते थे लेकिन अभी उन्हें एक सिलेंडर भरवाने पर 2500 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं. विक्की से जब हमने फ़ोन पर बात की तो वे जौनपुर से करीब 80 किलोमीटर दूर रामनगर से सिलेंडर भरवा रहे थे.

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विक्की अग्रहरि का दावा है कि उनके छोटे भाई को पुलिस ने थाने बुलाकर बिठाया था लेकिन कोतवाली जौनपुर की एसएचओ तारावती ने बीबीसी से कहा कि वो सिर्फ अपने भाई के मुक़दमे के बारे में जानकारी लेने के लिए आए थे, इस मामले में हमने किसी को गिरफ्तार नहीं किया है.
इस एफ़आईआर के बाद विक्की का परिवार डरा हुआ है. उनके छोटे भाई ने बीबीसी से यहाँ तक कहा कि अब वो भाई के ऑक्सीजन सिलेंडर बिकवा देंगे. लेकिन विक्की का कहना है कि तमाम मुश्किलों और एफ़आईआर के बावजूद वो लोगों की मदद करना जारी रखेंगे.
विक्की कहते हैं, "मैं इस संकट को सेवा के मौके के तौर पर देख रहा हूं. मैंने ज़िंदगी भर कमाया है, आगे भी कमा लूंगा. मुझसे जहां तक होगा मैं लोगों की मदद करूंगा. मैं अपने सिलेंडर नहीं बेचूंगा."

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जौनपुर की हालत
ज़िलाधिकारी मनीष वर्मा के मुताबिक जौनपुर में प्रशासन ने कोविड रिस्पांस वार रूम स्थापित किया है जिसके ज़रिए कोविड संकट से निबटा जा रहा है. अभी लेवल-वन और लेवल-टू के 500 बेड जौनपुर में कोविड संक्रमित मरीज़ों के लिए उपलब्ध हैं.
मनीष वर्मा कहते हैं, "हमारे कंट्रोल रूम में रोज़ाना एक हज़ार के क़रीब कॉल आ रहे हैं. जिन मरीज़ों को भर्ती किए जाने की ज़रूरत है उन्हें भर्ती किया जा रहा है. हम हर कॉल पर रिस्पांस कर रहे हैं. ये अभूतपूर्व परिस्थिति है. हमारे पास तैयारी का पर्याप्त समय नहीं था लेकिन विकट परिस्थितियों के बावजूद हमारे अधिकारी और मेडिकल स्टाफ चौबीस घंटे काम कर रहे हैं."

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ज़िलाधिकारी का दावा है कि जौनपुर में रेमडेसिविर का संकट भी नहीं हैं. मनीष वर्मा कहते हैं, "हमारे पास संस्थागत तरीके से रेमडेसिविर की जो भी मांग आ रही है उसे हम पूरा कर रहे हैं. कुछ निजी अस्पतालों को हमने लोन पर भी ये दवा दी है. लेकिन जो लोग निजी तौर पर इसे हासिल करना चाहते हैं उन्हें हम ये दवा नहीं दे रहे हैं."
जौनपुर में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. शुक्रवार तक जौनपुर में पाँच हज़ार से ज़्यादा कोरोना के एक्टिव मरीज़ थे. शुक्रवार तक एल-टू कोविड हॉस्पिटल में 62 में से 61 बेड भरे हुए थे. वहीं ज़िला अस्पताल में 71 बेड में से एक भी नहीं खाली था.
स्थानीय पत्रकार आदित्य प्रकाश के मुताबिक प्रशासन के सामने स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण हैं और अब तक किए गए इंतज़ाम नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं.
आदित्य कहते हैं, "ऑक्सीजन की किल्लत के कारण लगातार प्रशासन पर दबाव बना हुआ है. ज़िला प्रशासन कोविड कंट्रोल रूम के माध्यम से स्थिति पर काबू पाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन अचानक बढ़ी मरीज़ों की संख्या के कारण सभी अस्पतालों की हालत खस्ता हो चली है. बड़ी संख्या में कोविड और नॉन- कोविड मरीज़ों को ऑक्सीजन की ज़रूरत है जिसे उपलब्ध कराना प्रशासन की लिए मुश्किल होता जा रहा है. हालांकि ज़िला प्रशासन ने चौबीसों घंटे डॉक्टरों की टीम को टेलीमेडिसिन उपचार के लिए लगा रखा है."
ज़िलाधिकारी के मुताबिक जौनपुर में ऑक्सीजन का कोई प्लांट नहीं हैं और इसकी सप्लाई के लिए ज़िले के पड़ोसी शहरों पर निर्भर हैं. उनका कहना है कि अभी तक तो सप्लाई में कोई दिक्कत नहीं आई है, आगे के लिए इंतज़ाम किए जा रहे हैं.
मददगारों की आवाज़ दबाने की कोशिश?
उत्तर प्रदेश सरकार की कोविड नीतियों के मुखर आलोचक पूर्व नौकरशाह सूर्य प्रताप शाही का कहना है कि सरकार मददगारों पर मुक़दमे दर्ज करके उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश कर रही है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यूपी सरकार परिस्थितियों को स्वीकार नहीं करना चाहती है. वो नागरिकों को इस भ्रम में रखना चाहती है कि सब ठीक है. लेकिन अस्पतालों के बाहर लोगों की मौतें हो रही हैं, सरकार इस सच को छुपा नहीं पा रही है. इसी छटपटाहट में मुक़दमे दर्ज किए जा रहे हैं. मुझ पर भी तीन मुक़दमे दर्ज कर लिए गए हैं लेकिन ऐसे मुक़दमों से कोई फर्क पड़ेगा नहीं. जिन्हें मदद करनी है वो बाहर निकलेंगे और मदद करेंगे."
शाही कहते हैं, "ज़रूरत अस्पताल बनाने की थी, बिस्तरों की संख्या बढ़ाने की थी, ऑक्सीजन उपलब्ध करवाने की थी. सरकार इस दिशा में कोशिशें तो कर रही है लेकिन संकट इतना बड़ा है कि बहुत कुछ हो नहीं पा रहा है."
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