कोरोना: भारत में अचानक रेमडेसिविर और वैक्सीन की क़िल्लत कैसे हो गई?

वैक्सीन की कमी

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    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मेरा नाम माधुरी है. यहाँ मेडिकल की दुकान पर सुबह छह बजे से लाइन में लगी हुई हूँ. 10 बजे दुकान पर नोटिस लगा कर बोल दिया गया कि यहाँ रेमडेसिविर नहीं है. मेरे ससुर अस्पताल में हैं और डॉक्टर ने कहा है कि रेमडेसिविर लाओ, तभी लग पाएगा. अस्पताल वाले मरीज़ से ही मुझे फ़ोन करा कर पूछ रहे हैं कि दवा मिली या नहीं. मैं क्या करूँ?"

पुणे की रहने वाली माधुरी के ससुर कोविड सेंटर में भर्ती हैं, जिन्हें रेमडेसिविर की ज़रूरत थी.

माधुरी की तरह बहुत से लोग महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात जैसे राज्यों में कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटी-वायरल दवा रेमडेसिविर ख़रीदने के लिए लंबी क़तारों में खड़े होकर अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर लोगों को ख़ाली हाथ वापस लौटना पड़ रहा है.

दुनिया भर में कोविड-19 संक्रमण के मामले में सोमवार को भारत ने ब्राज़ील को भी पीछे छोड़ दिया है. बीते 24 घंटों में देश में एक लाख 68 हज़ार से ज़्यादा नए मामले सामने आए हैं और 900 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है.

ऐसे में रेमडेसिविर की बढ़ती क़िल्लत को देखते हुए रविवार को भारत ने इसके निर्यात पर रोक लगा दी है.

कोरोना दवा

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क्यों कम पड़ रही है दवा?

अब सवाल यह है कि आख़िर ऐसे वक़्त में जब भारत कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है और कोरोना के मामलों ने बीते साल सितंबर (कोरोना की पहली लहर) का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है, आख़िर रेमडेसिविर की कमी होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि बीते दिसंबर से लेकर फ़रवरी तक रेमडेसिविर की कम या लगभग न के बराबर माँग थी, इसलिए इसका प्रोडक्शन रोक दिया लगा था.

ज़ाहिर है, तीन महीने तक न के बराबर प्रोडक्शन होना इस दवा की आपूर्ति में कमी के पीछे बड़ा कारण है.

भारत में सात कंपनियाँ (मायलेन, हेट्रो हेल्थ केयर, जुबलियंट, सिप्ला, डॉक्टर रेड्डी लैब, सन फ़ार्मा और ज़ाइडस कैडिला) रेमडेसिविर का उत्पादन करती हैं. अब केंद्र सरकार ने इन सभी कंपनियों से उत्पादन बढ़ाने को कहा है.

हालात की गंभीरता देखते हुए लोग बड़ी मात्रा में रेमडेसिविर ख़रीद रहे हैं और इकट्ठा भी कर रहे हैं.

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बीते शुक्रवार को गुजरात के सूरत में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल ने कहा कि वो रेमडेसिविर की 5000 ख़ुराक ज़रूरतमंद लोगों को देंगे. बीजेपी के सूरत स्थित कार्यालय पर लोगों की लंबी क़तारें लग गई थीं. इसकी ख़ूब आलोचना भी हुई.

इंडियन मेडिकल असोसिएशन के महासचिव डॉक्टर रवि वानखेड़कर ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि बीते एक साल में हमने देखा है कि रेमडेसिविर का इस्तेमाल अगर किसी कोरोना संक्रमित मरीज़ के लिए शुरुआती दिनों में किया जाए, तो उसकी हालत गंभीर होने से रोका जा सकता है."

वो कहते हैं, "रेमडेसिविर की अचानक क़िल्लत होने की एक वजह डॉक्टरों का बिना सोचे समझे सबको रेमडिसिविर लेने की सलाह देना भी है, जबकि इसे सिर्फ़ मध्यम या गंभीर संक्रमण में ही देना चाहिए. लेकिन कई डॉक्टर सोचे समझे बिना यही दवा लिख रहे हैं."

डॉक्टर रवि के मुताबिक़, "दवा की कमी का एक अन्य कारण यह भी है कि दूसरी लहर में संक्रमण छोटे क़स्बों-गाँवों तक पहुँच गया है. यहाँ लोग जिन छोटे डॉक्टरों, या यूँ कहें कि नॉन-एमबीबीएस डॉक्टरों को दिखा रहे हैं और वो भी रेमडेसिविर की सलाह दे रहे हैं. यही कारण है कि माँग इतनी बढ़ गई कि लोगों ने हज़ारों-हज़ार रुपये में एक ख़ुराक ख़रीदी.''

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किल्लत को क़ाबू में करने के लिए क्या हो रहा है?

फ़ार्मास्यूटिकल्स विभाग ने रेमडेसिविर बनाने वाली कंपनियों से 38 लाख वाइल (दवा की शीशी) का उत्पादन करने को कहा है.

महाराष्ट्र सरकार ने रेमडेसिविर किसे दिया जाएगा, इसके लिए नया नियम जारी किया है. विभाग की ओर से एक फ़ॉर्म जारी किया गया है. इसमें मरीज़ का ऑक्सीजन लेवल, बुख़ार सहित ज़रूरी जानकारी भरनी होगी. इस पर अस्पताल के इंचार्ज का हस्ताक्षर होना चाहिए, इसी सूरत में रेमडेसिविर दी जाएगी.

दवा की कालाबाज़ारी न हो, इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने रेमडेसिविर के दाम तय कर दिए हैं. अस्पतालों में अब 100 एमजी की बोतल की क़ीमत 2,240 रुपए होगी. वहीं, केमिस्ट की दुकान पर यह क़ीमत 2,360 रुपए होगी.

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वैक्सीन की कमी और 'टीका उत्सव'

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार, 11 अप्रैल से देश में 'टीका उत्सव' की शुरुआत की, जो 14 अप्रैल तक चलेगा. इसके तहत 45 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को टीका दिया जा रहा है.

दूसरी तरफ़, पिछले सप्ताह दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद और महाराष्ट्र, पंजाब और छत्तीसगढ़ के कई इलाक़ों में कोरोना वैक्सीन की कमी के कारण टीका केंद्र पर टीकाकरण रोकना पड़ा था.

ऐसे में राहुल गांधी, सोनिया गांधी सहित विपक्ष केस कई नेताओं ने प्रधानमंत्री से वैक्सीन के निर्यात पर रोक लगाने की माँग की है.

सवाल यह भी उठ रहा है कि आख़िर क्यों भारत ने अपने यहाँ में सभी आयु-वर्ग के लोगों को टीका मुहैया न कराके इसका निर्यात किया?

इसका जवाब समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. दरअसल, दिसंबर तक भारत में कोरोना के मामले बेहद कम हो गए थे. कहा जाने लगा था कि शायद देश हर्ड इम्युनिटी के क़रीब जा रहा है.

इसी बीच भारत वैक्सीन के सबसे बड़े सप्लायर के रूप में उभरा और 'वैक्सीन डिप्लोमेसी' के तहत लाखों की ख़ुराक कई देशों को भेजी गई.

भारत का यह क़दम इसलिए भी उल्लेखनीय था, क्योंकि अमेरिका जैसे देश ने वैक्सीन के एक्सपोर्ट पर तब तक रोक जारी रखी है, जब तक पूरे देश में टीकाकरण पूरा ना हो जाए, लेकिन भारत ने देश में आयु-सीमा तय करके टीकाकरण योजना शुरू की.

भारत ने घाना, फ़िजी और भूटान जैसे देशों को तो वैक्सीन भेजी, साथ ही सऊदी अरब, ब्रिटेन और कनाडा जैसे अमीर देशों को भी वैक्सीन निर्यात की गई.

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बाक़ी देशों की तुलना में भारत वैक्सीनेशन के मामले में कहाँ है?

स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ अब तक भारत में 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों का टीकाकरण हो चुका है.

यह नंबर देखने में बड़ा लग सकता है, लेकिन आबादी के अनुपात में भारत टीकाकरण के मामले में काफ़ी पीछे है.

आर वर्ल्ड इन डेटा के मुताबिक़ भारत में 5.7 फ़ीसद लोगों को कोरोना वैक्सीन की पहली ख़ुराक मिली है. वहीं, ब्रिटेन में 46.71 और अमेरिका में 32.89 फ़ीसद आबादी को टीका लगाया जा चुका है.

इस मामले में ब्राज़ील भी भारत से आगे है, जहाँ 8.87% लोगों को टीका लग चुका है. भूटान, जिसने भारत से वैक्सीन निर्यात की है, वहाँ 61.04% लोगों का टीकाकरण हो चुका है.

वीडियो कैप्शन, कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले लोगों का क्या कहना है?

हालत ऐसी क्यों?

तेज़ी से बढ़ते कोरोना मामलों को देखते हुए सरकार क्यों वैक्सीन का आयात नहीं कर रही है? परिस्थिति आख़िर इतनी क्यों बिगड़ गई?

इन सवालों के जवाब में डॉक्टर वानखेडकर कहते हैं, "सरकार में फ़ैसले ब्यूरोक्रेट्स ले रहे हैं, न कि एक्सपर्ट्स. लेकिन ब्यूरोक्रेट्स की प्लानिंग ग़लत हो गई है."

डॉक्टर रवि का मानना है कि भारत सरकार के जिन देशों से रिश्ते बेहतर हैं, वहाँ के सभी संसाधनों का इस्तेमाल कर वैक्सीन आयात करना चाहिए.

उन्होंने कहा, "हम बाक़ी प्राइवेट प्लेयर्स को क्यों वैक्सीन बनाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं? हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में कोवैक्सीन के उत्पादन की अनुमति माँगी थी, लेकिन नहीं मिली."

डॉक्टर रवि का मानना है कि सरकार ने टीकाकरण की योजना का इतना केंद्रीयकरण कर दिया है कि राज्य और स्थानीय अधिकारी अपने मुताबिक़ क़दम उठा ही नहीं पा रहे हैं.

वो कहते हैं, "स्वास्थ्य महकमा राज्य के अंतर्गत आता है, लेकिन यहाँ सारी नीतियाँ केंद्र सरकार ही बना रही है. राज्य और स्थानीय प्रशासन को बेहतर तरीक़े से पता होता है कि कैसे वैक्सीन कैम्पेन चलाएँ, तो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक वैक्सीन पहुँचे."

डॉक्टर रवि के मुताबिक़, "प्रधानमंत्री ने टीकारण को लेकर वो आँकड़े बताए हैं, जो सुनने में अच्छे लगते हैं. जैसे भारत में हर दिन अमेरिका या किसी अन्य से ज़्यादा लोगों को टीका लगाया गया है लेकिन जब आप आबादी की फ़ीसद के हिसाब से देखेंगे, तो तस्वीर थोड़ी अलग लगेगी और सच वही है.''

डॉक्टर रवि कहते हैं कि यह वक़्त 'क्या और कैसे ग़लत हुआ' इस पर चर्चा करने का नहीं है, बल्कि ग़लतियाँ सुधारने और टीकाकरण में तेज़ी लाने का है.

वीडियो कैप्शन, कोरोना से बचाव में क्या विटामिन डी मदद कर सकता है?

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