तब्लीग़ी जमात के जिन लोगों पर कोरोना फैलाने का आरोप लगा था, उनका क्या हुआ

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
लगभग एक साल पहले दिल्ली के निज़ामुद्दीन में मौजूद तब्लीग़ी जमात का मरकज़ उस वक़्त सुर्ख़ियों में आया, जब दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कोरोना के फैलते संक्रमण के दौरान एक धार्मिक सभा करने के आरोप में उसके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की.
मरकज़ उस वक़्त कोरोना वायरस हॉटस्पॉट के रूप में उभरा, जब धर्मिक सभा में शामिल हुए 24 लोग कोविड-19 पॉज़िटिव पाए गए.
क्राइम ब्रांच ने 955 विदेशी जमातियों के ख़िलाफ़ विदेशी अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम, महामारी रोग अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों के तहत मुक़दमा दर्ज किया.
दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया कि इन्होंने टूरिस्ट वीज़ा के ज़रिए भारत में प्रवेश किया और मरकज़ में हुए कार्यक्रम में हिस्सा लिया. पुलिस ने यह भी कहा कि इन विदेशी नागरिकों ने वीज़ा प्रावधानों का उल्लंघन करने के अलावा एक ऐसी स्थिति बनने दी, जिससे संक्रामक बीमारी फैली और मरकज़ में मौजूद लोगों के साथ-साथ आम जनता के जीवन के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया.
जब कार्यक्रम में शामिल कुछ लोग कोरोना वायरस संक्रमित पाए गए, तो सरकार ने तब्लीग़ी जमात के लोगों पर भारत में कोरोना वायरस फैलाने का आरोप लगाया, जिसके चलते देश में एक घबराहट का माहौल बन गया. केंद्र के निर्देश पर राज्य सरकारों ने उन्हें खोजने और क्वारंटीन करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान भी चलाया.
तो यह जानना दिलचस्प होगा कि एक साल बाद आख़िरकार उन लोगों का क्या हुआ, जो दिल्ली में हुए तब्लीग़ी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे?
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पहले इन तथ्यों पर नज़र डालते हैं
दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ में मौजूद जिन 955 विदेशी जमातियों पर मुक़दमा किया गया था, उनमें से 911 ने 'प्ली बारगेन' किया था और अपने-अपने देश लौट गए थे. 'प्ली बारगेन' अभियोजक और प्रतिवादी के बीच एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें प्रतिवादी किसी छोटे आरोप के लिए ख़ुद को दोषी मान लेता है और इसके बदले बड़े आरोप या तो छोड़ दिए जाते हैं या उनमें उन्हें कठोर सज़ा नहीं दी जाती.
बाकी बचे 44 विदेशी जमातियों ने मुक़दमे का सामना करने का फ़ैसला किया. इनमें से 8 जमातियों को प्रथम दृष्टया सबूत के अभाव में मुक़दमा शुरू होने से पहले ही छुट्टी दे दी गई और बाक़ी 36 को अदालत ने बरी कर दिया.
दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के केस के अलावा दिल्ली के अलग-अलग पुलिस थानों में जमातियों के ख़िलाफ़ 29 और केस दर्ज किए गए थे, जिन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश पर एक साथ साकेत अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया. चूँकि इनमे से कुछ मुक़दमों को खारिज करने की अर्ज़ी दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित है, इसलिए उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को इन ख़ारिज करने की अर्ज़ियों के निपटारा होने तक कोई भी आदेश देने को मना किया है.
आज की तारीख़ में इन 29 मुक़दमों में से केवल 13 ही ट्रायल के लिए लंबित हैं और इन मुक़दमों में 51 भारतीय नागरिक शामिल हैं.

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तब्लीग़ी जमात की वकील अशिमा मांडला कहती हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों में दिल्ली पुलिस ने जो 29 मामले दर्ज किए, उनमें 193 विदेशी वही थे, जो क्राइम ब्रांच के मुक़दमे के अनुसार निज़ामुद्दीन मरकज़ में पाए गए थे.
मांडला कहती हैं, "हमने कोर्ट को यही कहा कि यह कैसे संभव है कि जिन लोगों को मरकज़ से पकड़ा गया, उन्हीं लोगों को शहर की अन्य मस्जिदों में उसी दिन दिखा कर उन पर अलग मुक़दमे दायर किए गए."
अशिमा मांडला कहती हैं कि 'प्ली बारगेन' के तहत दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के लोगों ने क़रीब 55 लाख रुपए जुर्माने के तौर पर दिल्ली उच्च न्यायालय में जमा कराए हैं, जिनमें से क़रीब 20 लाख रुपए पीएम केयर फंड में जमा कराए गए.
मांडला के अनुसार तब्लीग़ी जमात के लोगों को बरी करने का आदेश 15 दिसंबर 2020 को आया था और दिल्ली सरकार ने अब तक उस पर कोई अपील नहीं की है.
वो कहती हैं, "बरी हुए 36 लोगों में से एक ट्यूनीशियन नागरिक थे, जिनकी मौत हो गई है. बाक़ी 35 लोग अपने-अपने देश लौट चुके हैं. लेकिन वे इस शर्त पर गये हैं कि अगर इस मामले में अगले 6 महीनों में कोई अपील होती है, तो उन्हें सहयोग करना होगा. अगर बरी होने के 6 महीने बाद तक कोई अपील नहीं होती, तो वे केस से बरी मान लिए जाएँगे."

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विभिन्न अदालतों ने इस मसले पर क्या कहा?
पिछले साल अगस्त में बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद खंडपीठ ने इसी मामले में 29 विदेशी नागरिकों और छह भारतीयों के ख़िलाफ़ दायर प्राथमिकी को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया था और उनके ख़िलाफ़ यह कार्रवाई नागरिकता (संशोधन) क़ानून के विरोध के बाद भारतीय मुसलमानों के लिए एक अप्रत्यक्ष चेतावनी जैसी है.
तब्लीग़ी जमात कार्यक्रम के मीडिया कवरेज पर एक याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि हाल के दिनों में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे अधिक दुरुपयोग किया गया है.
कोर्ट ने यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें कहा गया था कि मीडिया का एक वर्ग तब्लीग़ी जमात के मामले को लेकर सांप्रदायिक द्वेष फैला रहा था.
दिसंबर 2020 में दिल्ली की एक अदालत ने 36 विदेशी तब्लीग़ी जमात के सदस्यों को बरी करते हुए कहा कि उपस्थिति रजिस्टर भी यह साबित नहीं करता कि अभियुक्त बताई गई तारीखों पर मरकज़ में पहुँचे या मार्च 2020 के अंत तक मरकज़ में रहे.
अदालत ने स्पष्ट कहा कि "अभियोजन पक्ष 12 मार्च से 1 अप्रैल तक मरकज़ के अंदर किसी भी अभियुक्त की उपस्थिति को साबित करने में विफल रहा. ऐसा नहीं लगता कि कहीं कोई भी उल्लंघन हुआ."
तब्लीग़ी जमात के एक युवा सदस्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2020 में कहा कि नई दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के कार्यक्रम में भाग लेने पर किसी पर हत्या के प्रयास के आरोप लगाना क़ानून का दुरुपयोग करना है.
अक्तूबर 2020 में तब्लीग़ी जमात के 20 विदेशी सदस्यों को बरी करते हुए मुंबई की एक अदालत ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ रत्ती भर भी सबूत नहीं है.

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क्या दोबारा खुल पाया मरकज़?
कोविड-19 संक्रमण के दौरान धार्मिक सभा करने के आरोप में बंद किया गया निज़ामुद्दीन में तब्लीग़ी जमात का मरकज़ अब भी दोबारा खुलने की राह देख रहा है.
जहाँ दिल्ली सरकार ने मरकज़ को धार्मिक उद्देश्यों के लिए दोबारा से खोलने के प्रति अपनी सहमति जताई है, वहीं केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्य वक़्फ़ बोर्ड द्वारा चुने गए 50 लोगों को शब-ए-बारात के मौक़े पर निजामुद्दीन मरकज़ में मस्जिद में नमाज़ अदा करने की अनुमति दी जा सकती है.
इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय का फ़ैसला आना अभी बाक़ी है.
दिल्ली सरकार ने उच्च न्यायालय को बताया है कि पिछले साल सोशल डिस्टेन्सिंग के कथित उल्लंघन के मामले में पकड़े गए कई विदेशियों को बरी कर दिया गया है और चूँकि बाक़ी लोगों के मुक़दमे में समय लग सकता है और सभी धार्मिक स्थलों को पिछले जून में ही फिर से खोलने की अनुमति दे दी गई, इसलिए मरकज़ में धार्मिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए अदालत आदेश दे सकती है.
दिल्ली वक्फ़ बोर्ड ने अदालत में दायर एक याचिका के माध्यम से यह मांग की है कि मरकज़ में स्थित मस्जिद, मदरसा और छात्रावास सहित पूरे परिसर को खोलने की अनुमति दी जाए.
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तब्लीग़ी जमात क्या है?
तबलीग़ी जमात का जन्म भारत में 1926-27 के दौरान हुआ. एक इस्लामी स्कॉलर मौलाना मोहम्मद इलियास ने इसकी बुनियाद रखी थी. परंपराओं के मुताबिक़, मौलाना मुहम्मद इलियास ने अपने काम की शुरुआत दिल्ली से सटे मेवात में लोगों को मज़हबी शिक्षा देने के लिए की. बाद में यह सिलसिला आगे बढ़ता गया.
तबलीग़ी जमात की पहली मीटिंग भारत में 1941 में हुई थी. इसमें 25,000 लोग शामिल हुए थे. 1940 के दशक तक जमात का कामकाज अविभाजित भारत तक ही सीमित था, लेकिन बाद में इसकी शाखाएँ पाकिस्तान और बांग्लादेश तक फैल गईं. जमात का काम तेज़ी से फैला और यह आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया.
तबलीग़ी जमात का सबसे बड़ा जलसा हर साल बांग्लादेश में होता है. जबकि पाकिस्तान में भी एक सालाना कार्यक्रम रायविंड में होता है. इसमें दुनियाभर के लाखों मुसलमान शामिल होते हैं. इसके सेंटर 140 देशों में हैं.
भारत में सभी बड़े शहरों में इसका मरकज़ है यानी केंद्र है. इन मरकज़ों में साल भर इज़्तेमा (धार्मिक शिक्षा के लिए लोगों का इकट्ठा होना) चलते रहते हैं.
तबलीग़ी जमात का अगर शाब्दिक अर्थ निकालें तो इसका अर्थ होता है, आस्था और विश्वास को लोगों के बीच फैलाने वाला समूह. इन लोगों का मक़सद आम मुसलमानों तक पहुँचना और उनके विश्वास-आस्था को पुनर्जीवित करना है. ख़ासकर आयोजनों, पोशाक और व्यक्तिगत व्यवहार के मामले में.
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