शबनम: आज़ाद भारत में फांसी के फंदे पर जा रही पहली महिला का गुनाह - ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, शहबाज़ अनवर
- पदनाम, अमरोहा से, बीबीसी के लिए
प्रेम संबंध में अड़चन बने अपनों से नफ़रत में सात ज़िंदगियां एक ही रात में खत्म कर दी गईं. राज़ खुला तो हक़ीक़त रौंगटें खड़े कर देने वाली थी.
शबनम ने अपने ही मां-बाप, भतीजे, दो भाई, एक भाभी और रिश्ते की बहन को दूध में नशीला पदार्थ देकर, रात को बेहोशी की हालत में, एक-एक करके कुल्हाड़ी से मार दिया था.
14 अप्रैल 2008 - ये वो तारीख़ है जिसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा के हसनपुर तहसील के गांव बावनखेड़ी के लोग चाह कर भी नहीं भुला पाते.
शबनम के घर में अगल-बगल में सात क़ब्रें हैं और दीवारों पर आज भी ख़ून के धब्बे उस खौफ़नाक हत्याकांड की याद दिलाते हैं.

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गांव के ज़्यादातर लोगों को लगता है कि शबनम को उसके गुनाह की सज़ा बहुत पहले ही मिल जानी चाहिए थी.
पुलिस ने जाँच के बाद बताया था कि घर की सदस्य शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर अपने पिता, मां, दो भाइयों, एक भाभी, भतीजे और रिश्ते की बहन की हत्या कर दी थी.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शबनम और सलीम, दोनों को फाँसी की सज़ा सुनाई है, और राष्ट्रपति ने दया याचिका खारिज कर, उनकी फांसी की सज़ा को बरकरार रखा है.

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'माफ़ी के काबिल नहीं गुनाह'
शबनम के चाचा सत्तार इस घटना को याद कर विचलित हो जाते हैं. वे कहते हैं, "शबनम को फांसी की सज़ा मिलने में देरी हो गई है. उसने जो अपराध किया वो माफी के क़ाबिल नहीं है."
वे कहते हैं, "मेरे और शबनम के पिता शौक़त के परिवार का काम-काज साथ-साथ था. शौक़त साल 2000 से पहले ताहरपुर रहता था. वह इंटर कॉलेज में शिक्षक था. बाद में उसने बावनखेड़ी में अपना घर बना लिया था."
शबनम के प्रेस प्रसंग के बारे में सत्तार बताते हैं, "शबनम और सलीम के बीच ये रिश्ता पता नहीं कब से चल रहा था. घटना वाली रात तो मेरे पास कुछ गांववाले ताहरपुर पहुंचे और उन्होंने मुझसे इस हत्याकांड के बारे में बताया. मैं और मेरी पत्नी वहां पहुंचे तो मेरा दिल बैठ गया. सामने मंज़र डरावना था. वहां लाशें पड़ी थीं, उनके सिर और शरीर कटे हुए थे. भैया-भाभी, कुंवारा भतीजा, बड़ा भतीजा और उसकी बीवी-बच्चा की लाशें थीं, कटे हुए पड़े थे."
सत्तार की पत्नी फ़ातिमा भी वहीं उनके पास बैठी थीं. वो बीच में बोलती हैं, "हमने तो शौकत को उनकी बेटी को लेकर पहले ही आगाह किया था, लेकिन उन्होंने विश्वास नहीं किया.''

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घटना का ज़िक्र करते हुए फ़ातिमा कहती हैं, "जब हम बावनखेड़ी पहुंचे तो यहां पैर रखने की भी जगह नहीं थी. जब शवों को एक-एक कर घर से बाहर लाया गया तो हमारा दिल दहल उठा. शबनम ने सभी को कुल्हाड़ी से काट दिया था. हालांकि, उस वक़्त तक किसी को पता नहीं था कि जो शबनम रो रही है, दरअसल वही क़ातिल है."
उस वक्त शबनम ने कहा था कि घर पर हमला हुआ था लेकिन बाद में पुलिस की जांच में असलियत सामने आई.
सत्तार कहते हैं, "शबनम ने इस हत्याकांड में अपने रिश्ते के भाई को फंसाना चाहा था. वो चाहती थी कि वह अपने पिता की संपत्ति के हक़दार बनकर सलीम के साथ रहे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और वो पकड़े गए."
शबनम के चाचा बताया कि उनके घर रोज़ एक किलो दूध जाया करता था, लेकिन वारदात वाले दिन उसने दो किलो दूध ख़रीदा था, उसने दूध में कुछ नशीला पदार्थ मिलाकर सबको पिला दिया था.
पुलिस जाँच में पता चला कि शबनम सलीम के साथ जब घर में गई तब सब लोग नशे में बेसुध थे. घटना के वक्त सलीम उसके साथ था लेकिन सातों लोगों पर कुल्हाड़ी शबनम ने चलाई थी. हत्या में शबनम का साथ देने और साज़िश में शामिल होने के जुर्म में अदालत ने सलीम को भी मौत की सज़ा सुनाई.

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बावनखेड़ी के इस हत्याकांड के बाद बारह साल बाद भी गांव में इसकी चर्चा होती है.
डरावना था दृश्य
बावनखेड़ी के शहज़ाद खां घटना के बाद रात में ही मौके़ पर पहुंचे थे.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "रात को बारिश शुरु हो गई थी. आंगन में सोए लोग घर के भीतर जाने लगे थे. जब लोग अपने बिस्तर बटोरकर भीतर ले जा रहे थे तो वहां शोर मचा."
शहज़ाद और उनके परिवार वाले वहां पहुंचे तो मंज़र देखर दहल गए. सात लाशें पड़ी थीं और शबनम रो रही थी. गांव के युवा अफज़ाल खान ने भी बताया कि वह भी घटना के बाद मौके पर पहुंचे थे, और ये सब नज़ारा देखा था.
वहां गांव के एक बुज़ुर्ग रियासत कहते हैं, "घटना की रात क़रीब दो बजे हम वहां पहुंचे थे. सामने नज़ारा देखकर हमारी टांगें डगमगा गईं थी. हमसे रुका नहीं गया और हम वापस आ गए."

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शबनम और सलीम के रिश्ते
गांववालों ने बताया कि शबनम, सलीम से प्यार करती थी और उसके परिवारवालों को यह पसंद नहीं था. यही बात परिवार और शबनम के बीच तकरार की वजह थी.
परिवार के ऐतराज़ की वजह ये थी कि शबनम का परिवार पढ़ा-लिखा और समृद्ध था. ख़ुद शबनम ने एमए तक पढ़ाई की थी, जबकि सलीम की सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं थी. वो पढ़ा-लिखा नहीं था और रोज़ी के तौर पर लकड़ी चीरने की आरा मशीन चलाता था.
वारदात के वक़्त सलीम की उम्र 25 साल और शबनम की उम्र 27 साल थी. इस समय शबनम की उम्र 39 साल है.

सलीम के एक दोस्त बताते हैं कि हालांकि उन्होंने सलीम के साथ मिलकर व्यापार भी किया लेकिन उसने कभी भी बातचीत में शबनम का ज़िक्र तक नहीं किया.
गांववालों ने बताया कि शबनम के परिवारवालों को इन दोनों के संबंधों से सख़्त एतराज़ था. अपने आख़िरी दिनों शबनम के दादा ने उसके हाथ का पका खाना लेना भी बंद कर दिया था.
शबनम के सलीम से प्रेम प्रसंग की जानकारी उसके छोटे भाई राशिद को भी हो गई थी. गांववाले कहते हैं कि राशिद ने नाराज़ होकर एक बार शबनम को थप्पड़ भी मार दिया था.
सलीम के पड़ोस में रहने वाली महमूना उनके बारे में कहती हैं, "लड़का ठीक था. किसी को नज़र उठाकर नहीं देखता था. अब क्या कहें? अब सरकार ही इंसाफ कर सकती है."

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