प्रिया रमानी के फ़ैसले से महिलाओं के लिए ऑफ़िस में क्या बदलेगा?

प्रिया रमानी

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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"यौन उत्पीड़न के मामले में पीड़ित होने के बावजूद मैं कोर्ट रूम में एक अभियुक्त के तौर पर खड़ी थी. लेकिन आज मुझे ख़ुशी है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न मामले को जो तवज्जो मिलनी चाहिए, वो मिल रही है."

मानहानी मामले में बरी होने के बाद पत्रकार प्रिया रमानी ने ये बात कही.

पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर ने महिला पत्रकार प्रिया रमानी के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज किया था. लेकिन दिल्ली की एक अदातल ने 17 फरवरी को प्रिया रमानी को बरी कर दिया.

कई इस फ़ैसले को ऐतिहासिक करार दे रहे हैं, जबकि कई इसे भारत में मी-टू मूवमेंट की पहली सफ़लता बता रहे हैं.

मानहानि के मामले में आए इस फ़ैसले को कई जानकार 'कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न क़ानून' से जोड़ कर भी देख रहे हैं.

प्रिया रमानी, एमजे अकबर

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एमजे अकबर केस की कुछ बुनियादी बातें

दरअसल किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले कुछ तथ्यों को समझाना ज़रूरी है.

ये फ़ैसला आपराधिक मानहानि से जुड़ा है, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर ने महिला पत्रकार प्रिया रमानी के ख़िलाफ़ दायर किया था.

प्रिया रमानी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए 2018 के #MeToo मूवमेंट के दौरान एक आर्टिकल ट्वीट किया था. आर्टिकल 2017 में एक अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए लिखा था. जिसे ट्वीट 2018 में किया गया था. उस आर्टिकल में लिखा वाकया 1993 दिसंबर का था.

प्रिया रमानी इस मामले में अभियुक्त थीं और उन्हें दिल्ली की एक कोर्ट ने अब बरी कर दिया है.

पूर्व विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर इस फ़ैसले को ऊपर की अदालत में चुनौती दे सकते हैं. ये मामला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का केस नहीं था.

प्रिया रमानी

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कोर्ट ऑर्डर का सबसे अहम हिस्सा

91 पन्ने के अपने फ़ैसले में एडिशनल चीफ़ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट रवींद्र कुमार पांडे ने लिखा है -

"समाज को समझना ही होगा कि यौन शोषण और उत्पीड़न का पीड़ित पर क्या असर होता है. यौन उत्पीड़न, पीड़ित के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को ख़त्म कर देता है.

उत्पीड़न करने वाला हममें से कोई भी व्यक्ति हो सकता है. सामाजिक प्रतिष्ठा वाला व्यक्ति भी यौन उत्पीड़न कर सकता है.

यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाली महिला को अवमानना के आपराधिक मुक़दमें में इसलिए नहीं सज़ा हो सकती कि मामला किसी की प्रतिष्ठा से जुड़ा है. किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अधिकार की रक्षा किसी दूसरे के जीने के अधिकार और महिला के सम्मान की क़ीमत पर नहीं की जा सकती है.

महिलाओं के पास दशकों बाद भी अपनी शिकायत को स्वेच्छा से किसी भी प्लेटफ़ॉर्म पर रखने का का अधिकार है."

फ़ैसले के इस हिस्से को पढ़ कर कहा जा रहा है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले में ये फ़ैसला मील का पत्थर साबित होगा.

सांकेतिक तस्वीर

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यौन उत्पीड़न की शिकायत में समयसीमा की शर्त ख़त्म हो गई है?

माना ये जा रहा है कि अब महिलाएँ दशकों पुराने यौन उत्पीड़न के मामले में भी आवाज़ उठा पाएँगी. लेकिन क्या वाकई में ऐसा है?

दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ फैकल्टी में प्रोफ़ेसर वेद कुमारी कहती हैं, "कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न क़ानून 2013 में बना है. उसके पहले के यौन उत्पीड़न के मामलों पर ये क़ानून लागू नहीं हो सकता. इसलिए उसके पहले के जितने भी यौन उत्पीड़न के मामले हैं, उसे 2013 के क़ानून के तहत नहीं ट्रायल किया जा सकता है."

"क्रिमिनल लॉ के तहत गंभीर अपराधों में शिक़ायत करने या मामला दर्ज़ कराने के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं होती है, मामूली शिक़ायतों को छोड़ कर. सिविल लॉ में समय सीमा निर्धारित की जा सकती है. इसलिए पुराने यौन उत्पीड़न के मामले कभी भी खोले जा सकते हैं. "

यहाँ एक बात जो समझने वाली है वो ये कि जब यौन उत्पीड़न की शिक़ायत आप अपने दफ़्तर की बनी इंटर्नल कंप्लेन कमेटी (ICC) के सामने करते हैं, तो वो सिविल मामला होता है. लेकिन अगर उस मामले को लेकर आप पुलिस के पास जाते हैं, तो वो क्रिमिनल यानी आपराधिक मामला हो जाता है.

आईसीसी में यौन उत्पीड़न की शिकायत करने के लिए 3 महीने की समय सीमा निर्धारित है. लेकिन आईपीसी में 2013 के बाद धारा 354 (यौन उत्पीड़न की धारा) में कुछ बदलाव कर नए सेक्शन जोड़े गए और 'लिमिटेशन पीरियड' को ख़त्म कर दिया गया. 2013 के पहले आईपीसी की धारा 354 में ये 'लिमिटेशन पीरियड' तीन साल का था.

मीटू

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तो क्या आज हुए यौन उत्पीड़न की मामले में अब दस साल बाद शिक़ायत हो सकती है?

इस सवाल के जवाब में सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट शाहरुख़ आलम कहती हैं, "अगर महिला दफ़्तर की आईसीसी में शिक़ायत करना चाहती है, तो उसे तीन महीने के अंदर शिक़ायत करनी होगी. अगर पुलिस के पास जा कर शिक़ायत करनी है, तो उसके लिए 'लिमिटेशन पीरियड' नहीं है. लेकिन हर देरी के लिए ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता होती है."

प्रिया रमानी ने यौन उत्पीड़न की कोई शिक़ायत पुलिस में या अपने दफ़्तर में नहीं की थी. बल्कि उनके आर्टिकल को ट्वीट करने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर ने उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि का मुक़दमा दायर किया था.

वरिष्ठ वकील इंदिरा जय सिंह ने इस फ़ैसले को एतिहासिक करार देते हुए एक लेख लिखा है. लेख में उन्होंने कहा है कि इस फ़ैसले का सबसे अहम हिस्सा यही है कि कोर्ट ने एमजे अकबर के 'देर से की गई यौन उत्पीड़न की शिकायत' की दलील को नहीं माना.

प्रिया रमानी के मुताबिक़ उनके साथ जो वाकया हुआ, वो एक नौकरी के इंटरव्यू के दौरान मुंबई के एक होटल में हुआ. 1993 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का क़ानून नहीं था. इसलिए ऐसी शिकायतें करने का कोई प्रावधान ही नहीं था.

पूर्व केंद्रीय मंत्री की तरफ से मानहानि मामले में प्रिया रमानी की यौन उत्पीड़न की शिकायत की 'टाइमिंग' को लेकर सवाल खड़े किए थे.

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कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न क़ानून में क्या बदलेगा?

लेकिन क्या इस फ़ैसले से मौजूदा क़ानून को बदलने की ज़रूरत है?

इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट शाहरुख़ आलम कहती हैं, "ये बात फ़ैसले में लिखी गई है कि यौन उत्पीड़न की शिक़ायत के मामले में समय सीमा तब मायने नहीं रखती, जब क़ानूनी प्रावधान नहीं हो या संस्था में उन क़ानूनी प्रावधानों का पालन ठीक से नहीं हो रहा हो. इस फ़ैसले में ये बात कही गई है कि जब संस्थानों में यौन उत्पीड़न रोकने के प्रावधान ठीक से काम नहीं कर रहे हों, तो किसी दूसरे प्लेटफ़ॉर्म का सहारा ले कर अपनी बात कहना ग़लत नहीं है.

मानहानि का मुक़दमा करके एमजे अकबर ये कहना चाह रहे थे कि यौन उत्पीड़न के मामले में किसी पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म पर पीड़िता बोल भी नहीं सकती."

वो आगे कहती हैं, "इस फ़ैसले से कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मौजूदा क़ानून को बदलने की ज़रूरत नहीं है. बल्कि ज़रूरत है उस क़ानून की सही व्याख्या करने की है. इस फ़ैसले में मौजूदा क़ानून की जो व्याख्या की है, वो अपने आप में ऐतिहासिक है. अगर सही तरह से इसका पालन हो, तो फ़िलहाल क़ानून में बदलाव की ज़रूरत नहीं है. इस फ़ैसले ने मौजूदा क़ानून के दायरे को ही बड़ा कर दिया है."

वो अपनी बात को क़ानून की परिभाषा के साथ समझाती हैं.

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भारत में यौन उत्पीड़न के मौजूदा क़ानून

भारतीय क़ानून में 'किसी के मना करने के बावजूद उसे छूना, छूने की कोशिश करना, यौन संबंध बनाने की मांग करना, सेक्शुअल भाषा वाली टिप्पणी करना, पोर्नोग्राफ़ी दिखाना या कहे-अनकहे तरीक़े से बिना सहमति के सेक्शुअल बर्ताव करना'- को यौन उत्पीड़न माना गया है.

साल 2013 में 'सेक्शुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)' लाया गया, जो ख़ास तौर पर काम की जगह पर लागू होता है. इसमें यौन उत्पीड़न की परिभाषा तो वही है, लेकिन उसे जगह और काम से जोड़ दिया गया है.

यहाँ काम की जगह का मतलब सिर्फ़ दफ़्तर ही नहीं, बल्कि दफ़्तर के काम से कहीं जाना, रास्ते का सफ़र, मीटिंग की जगह या घर पर साथ काम करना, ये सब शामिल है.

क़ानून सरकारी, निजी और असंगठित सभी क्षेत्रों पर लागू है. ये औरतों को अपने काम की जगह पर बने रहते हुए कुछ सज़ा दिलाने का उपाय देता है. यानी ये जेल और पुलिस के कड़े रास्ते से अलग न्याय के लिए एक बीच का रास्ता खोलता है, जैसे संस्था के स्तर पर अभियुक्त के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई, चेतावनी, जुर्माना, सस्पेंशन, बर्ख़ास्त किया जाना वगैरह.

एडवोकेट शाहरुख आलम कहती हैं, "दरअसल प्रिया रमानी ने 2018 में भारत में चले #MeToo मूवमेंट के वक़्त एक पत्रिका में एक साल पहले लिखे आर्टिकल को ट्वीट किया था. पूरा मामला 1993 दिसंबर का था.

आर्टिकल में पत्रकार के तौर पर इंटरव्यू के वक़्त मुंबई के एक होटल में एमजे अकबर उनके साथ कैसे पेश आए और उस दौरान वो कितना असहज महसूस कर रही थी, उसका उन्होंने सिलसिलेवार तरीक़े से विवरण लिखा था. उस वक़्त कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न का क़ानून नहीं था.

अपने ट्वीट में प्रिया रमानी ने ये भी स्पष्ट लिखा था कि उन्होंने पहले कभी एमजे अकबर का नाम नहीं लिया था, क्योंकि उन्होंने 'कुछ नहीं किया' था.

लेकिन प्रिया ने उस पूरे वाक़्ये को एक अनकहे तरीक़े का उत्पीड़न बताया था.

अदालत के ताज़ा फ़ैसले ने सेक्शुअल हैरेसमेंट की उसी परिभाषा को दोहराया है. अदालत ने अपने फ़ैसले में उसी 'अनकहे उत्पीड़न' की बात को स्वीकार किया है."

जज ने अपने फ़ैसले में लिखा है कि कई बार महिला यौन उत्पीड़न शब्द के साथ जुड़े 'शर्म' की वजह से भी सामने नहीं आती है.

यौन उत्पीड़न

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तो क्या इस फ़ैसले से दशकों पुराने मामले की बाढ़ आ जाएगी?

इस पर प्रोफ़ेसर वेद कुमारी कहती है, "हम इस फ़ैसले से उम्मीद कर सकते हैं कि ज़्यादा महिलाएँ यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँगी. लेकिन ये भी सवाल है कि कितनी महिलाएँ हैं, जो इतनी सार्थक लड़ाई लड़ सकतीं हैं. प्रिया रमानी एक अपवाद हैं, जिनमें इतना साहस था कि वो इतने वक़्त तक लड़ी. वरना तो ऐसे मामले में आप सामने आईं नहीं कि आपको अवमानना के आरोप में कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा."

वो कहती हैं कि आम महिला के लिए ये सब बहुत आसान आज भी नहीं होगा. आम महिला तो एक मामूली शिकायत करने में डरती है. उस पर ये सोचना कि उसके साथ दूसरी महिलाएँ भी खड़ी हो जाएँगी, ये अब भी मुश्किल है.

वो कहती हैं, "एक और बात ये है कि फ़िलहाल ये फ़ैसला सेशन कोर्ट का है. इसके बाद हाई कोर्ट है, फिर सुप्रीम कोर्ट है. अभी इस फ़ैसले को चुनौती दी जा सकती है. अगर अकबर इसके ख़िलाफ़ ऊपर की अदालत में अपील नहीं करते, तो कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर वो आगे अपील करते हैं, तो इस फ़ैसले पर रोक भी लग सकती है. अभी इस केस में बहुत से किंतु-परंतु हैं."

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दूसरे पक्ष के वकील ऊपरी अदालत में इस फ़ैसले को चुनौती देने का मन बना रहे हैं.

एमजे अकबर

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फ़ैसले से क्या हासिल हुआ?

फ़ैसले की अहमियत पर एडवोकेट शाहरुख़ आलम कहती हैं, "ये केवल ऑर्डर नहीं है, बल्कि 91 पन्ने का दलीलों के आधार पर तर्कसंगत तरीक़े से लिखा गया फ़ैसला है. इस फ़ैसले ने मौजूदा क़ानून की व्याख्या विस्तार से की है. ऊपर की अदालतों में इस फ़ैसले को चुनौती देने के पहले, इसमें दी गई दलीलों को ख़ारिज़ करने का आधार ढूँढना होगा. यही इस फ़ैसले की सबसे बड़ी खूबी है."

प्रोफ़ेसर वेद कुमारी कहती हैं, "#MeToo मूवमेंट की ताक़त यही थी कि ताक़तवर महिलाओं के साथ भी यौन उत्पीड़न हुआ. आम महिलाओं के साथ तो ऐसा होता ही रहता है. उनमें से कितनी महिलाएँ आवाज़ उठाती हैं? और क्या इस एक फ़ैसले के बाद वो आवाज़ उठाने लगेंगी?

इस फ़ैसले से बस इतना ही हुआ है कि इस कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न के मुद्दे पर चर्चा का एक माहौल बना है. लोग इस पर बात करने लगे हैं. लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि अब ऐसे मामलों की बाढ़ सी आ जाएगी और हर औरत अपने साथ इस तरह के उत्पीड़न की शिकायत करने लगेगी."

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह इस फ़ैसले को अलग तरीक़े से देखती है. उन्होंने लिखा है, "यह फ़ैसला भारत के #MeToo मूवमेंट में कितना बड़ा मील का पत्थर साबित होगा, ये वक़्त बताएगा. लेकिन इस फ़ैसले ने बताया है कि यौन उत्पीड़न की शिकार महिला किस मानसिक स्थिति से गुज़रती है. मामले को रिपोर्ट करना या नहीं करना या देरी से करना कई कारणों पर निर्भर करता है."

एमजे अकबर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

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क्या प्रिया, ग़जाला यौन उत्पीड़न का मामला लेकर कोर्ट जाएँगी?

बीबीसी ने पूरे मामले में प्रिया रमानी से संपर्क करने की कोशिश की. उनका जवाब हमें नहीं मिला है.

प्रिया रमानी के मामले में कोर्ट में गवाह के तौर पर पेश हुई पत्रकार गज़ाला वहाब ने पूरे मामले पर बीबीसी से बात की.

उन्होंने कहा, "एमजे अकबर बनाम प्रिया रमानी केस मानहानि का केस था. जिसका यौन उत्पीड़न हुआ था, उसी को इसमें अभियुक्त बनाया गया था. लेकिन कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न क़ानून, या फिर विशाखा गाइडलाइन से इस पूरे मामले से कोई लेना देना नहीं था."

"मैं बुधवार को कोर्ट में मौजूद थी. जज चाहते तो दो लाइन का फ़ैसला सुना सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने फ़ैसले के ज़रिए ये समझाया कि किसी लड़की ने यौन उत्पीड़न सहा है, तो उस बात की शिकायत वो कभी भी कर सकती है. शिकायत की टाइमिंग पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते. दूसरी अहम बात ये कि कोई भी यौन उत्पीड़न की पीड़िता द्वारा सुनाई आपबीती पर कोई शक नहीं कर सकता है कि सबूत लाए कि क्या-कुछ तुम्हारे साथ हुआ है. जज ने फ़ैसले में कहा कि यौन उत्पीड़न बंद दरवाज़ों के पीछे होता है, तो सबूत और साक्ष्य लाना मुश्किल काम है."

इस फ़ैसले की इन बारीकियों को अगर कॉरपोरेट दफ़्तर के सेक्शुअल हैरेसमेंट कमेटी में भी शामिल कर लिया जाए, तो महिलाओं के लिए कार्यस्थल को सुरक्षित बनाना आसान हो जाएगा. दफ़्तरों में मौजूद इंटर्नल कमेटी में भी सबूत दिखाने की ज़िम्मेदारी शिकायतकर्ता पर नहीं होनी चाहिए.

तो क्या आगे यौन उत्पीड़न का कोई केस एमजे अकबर के ख़िलाफ़ करेंगी?

इस सवाल के जवाब में गज़ाला कहती हैं, "मैं कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं करूँगी. ये बात मेरे लिए ख़त्म हो गई है. मैंने एक आर्टिकल लिखा था और प्रिया के केस में गवाह बन कर मेरी जंग पूरी हो गई है. मैं इससे आगे नहीं जाऊंगी."

"जब कोर्ट रूम में फ़ैसला पढ़ा जा रहा था, मैंने महसूस किया कि शिकायतकर्ता (एमजे अकबर) के लिए इससे बड़ी बेइज्ज़्ती क्या हो सकती है कि जज ने भी फ़ैसले में वही बातें दोहराई, जो मैंने लिखा था, कहा था. पब्लिक फ़ोरम, भरे कोर्ट रूम में आपके सामने कोई वही इल्ज़ाम दोहराए, किसी भी इज़्ज़तदार आदमी के लिए इससे बड़े अपमान की बात नहीं हो सकती. मेरे लिए इतना काफ़ी था."

एमजे अकबर

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फ़ैसले की दूसरी अहम बातें

लेकिन इस फ़ैसले में कई और बातें हैं, जिनकी चर्चा भी दबी ज़बान से हो रही है.

इस फ़ैसले में प्राचीन भारत के पौराणिक महाकाव्यों से बहुत सारे संदर्भों का हवाला दिया गया है.

"ये शर्मनाक है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध उस देश में हो रहे हैं, जहाँ 'महाभारत' और 'रामायण' जैसे महाकव्य लिखे गए. वाल्मीकि रामायण में एक जगह संदर्भ मिलता है कि जब लक्ष्मण को सीता का वर्णन करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने जवाब दिया उन्होंने तो सीता के केवल चरण ही देखे हैं."

इसके आगे जटायू का भी उदाहरण दिया गया है.

एडवोकेट शाहरुख़ आलम कहती हैं कि फ़ैसले में इन उदाहरणों का ज़िक्र क्यों है, इसकी ज़रूरत समझ नहीं आती.

सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट सिद्धार्थ दवे फ़ैसले के दूसरे पक्ष पर ग़ौर करने की बात कहते हैं.

एडवोकेट सिद्धार्थ दवे का कहना है, "फ़ैसला इस तरह से लिखा गया है जैसे प्रिया रमानी यौन उत्पीड़न का मामला लेकर कोर्ट पहुँची थी. जबकि मानहानि का केस एमजे अकबर ने कोर्ट में फ़ाइल किया था. फ़ैसला इस बारे में होना था कि ये मामला मानहानि का मामला है या नहीं है."

"प्रिया रमानी ने अपनी दलील में मानहानि के मामले में 'अपवाद' का सहारा लिया था. उन्होंने कोर्ट में कहा है कि 'जनता की भलाई में किसी बात को सार्वजनिक रूप से कहना' मानहानि नहीं है. इसका मतलब हुआ कि मानहानि के मामले में कोर्ट ने उस अपवाद को स्वीकार किया है. कत्ल की सूरत में भी कई बार अपवाद की बात कोर्ट में स्वीकार की जाती है."

"प्रिया रमानी ने आज बोला या उस वक़्त क्यों नहीं बोला, ये तय ही नहीं होना था. तय तो कोर्ट को ये करना था कि जो बोला वो मानहानि है या नहीं."

यानी भाविष्य में इस फ़ैसले की कई तरह से समीक्षा और व्याख्या होगी.

BBC ISWOTY

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