मध्य प्रदेश का मालवा क्यों जूझ रहा है सांप्रदायिक हिंसा से?- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश के मालवा इलाक़े में इन दिनों भगवा ध्वज लहराते नजर आते हैं. रास्तों पर जगह-जगह लगे पोस्टर राम मंदिर के लिए चंदे का आह्वान कर रहे हैं.
वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ हो गया था. अब इन दिनों मध्य प्रदेश के कई इलाक़ों में राम मंदिर निर्माण निधि संग्रह के लिए हिंदूवादी संगठन रैलियाँ निकाल रहे हैं.
आरोप है कि इन रैलियों के दौरान हिंदूवादी संगठन जान-बूझकर मुस्लिम इलाक़ों में जा रहे हैं, वहाँ नारेबाज़ी कर रहे हैं और डीजे बजा रहे हैं. आरोप ये भी है कि मुस्लिम इलाक़ों में रैलियों पर पथराव किए जा रहे हैं.
इन सब वजहों से कई क्षेत्रों में तनाव बढ़ा है और हिंसा भी हुई है. इन सबके बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्थरबाज़ों के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून लाने की बात कही है.
प्रशासन पर हिंदूवादी संगठनों के लोगों का बचाव करने के भी आरोप लगे हैं. हालाँकि मध्य प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि आरोप निराधार हैं और अपराधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है.

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हरे रंग के झंडे
इंदौर से क़रीब 55 किलोमीटर दूर धर्मांठ गाँव से एक पतली सड़क चांदन खेड़ी गाँव की तरफ मुड़ती है और घरों पर लगे झंडों के रंग बदलने लगते हैं. अब भगवा के साथ हरे रंग के झंडे भी नज़र आने लगते हैं और फिर चांदन खेड़ी आते-आते सिर्फ़ हरे झंडे ही लहराते नज़र आते हैं.
चांदन खेड़ी गाँव पूरी तरह खेती और दूध के कारोबार पर निर्भर है. यहाँ अधिकतर मुसलमान ही रहते हैं. आमतौर पर राजनीतिक और सामाजिक नक्शे से दूर रहे इस गाँव में अब पुलिस बलों का पहरा है. जैसे ही सड़क गांव में घुसती है, वे घर नज़र आते हैं जिन्हें प्रशासन ने अवैध बताकर तोड़ा है. इन टूटे घरों में अब भी परिवार रह रहे हैं.
चांदन खेड़ी गाँव में अब ख़ौफ़ का साया है. यहाँ कोई भी खुलकर बात करने को तैयार नहीं होता. कैमरा देखते ही लोग घरों में चले जाते हैं.
29 दिसंबर को यहां राम मंदिर के लिए चंदे का आह्वान करने निकली हिंदूवादी संगठनों की रैली के दौरान हिंसा हुई थी, जिसके बाद प्रशासन ने गाँव के 24 लोगों को गिरफ़्तार किया और 12 घरों को अवैध बताते हुए तोड़ दिया. गिरफ़्तार किए गए सभी लोग मुसलमान थे, तोड़े हुए घर भी मुसलमानों के ही हैं.
गाँव के आख़िर में क़ादर पटेल का घर है. यहाँ मातम सा पसरा है. क़ादर के घर दंगाइयों ने आग लगा दी थी. उनके पाँच घायल बेटों में से चार अब अस्पताल से घर लौट आए हैं जबकि एक अभी भी इंदौर के एमवाई अस्पताल में भर्ती है. उनके पैर में दो गोलियाँ लगी हैं.
सद्दाम पटेल के हाथ में पट्टी बँधी है. वो कहते हैं, "हम अपने घर का दरवाज़ा बंद करके अंदर थे. उन्होंने हमारे दूसरे घर में आग लगा दी. उस कमरे में बच्ची सो रही थी, उसे बचाने के लिए हम जैसे ही बाहर निकले उन्होंने हम पर हमला कर दिया. उनके हाथों में तलवारें और बंदूकें थी."

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रैली में क्या हुआ था?
हिंदूवादी संगठनों की रैली को धर्मांठ गाँव से शुरू होकर आगे कनवास गाँव तक जाना था. बीच में मुसलमानों का गाँव चांदन खेड़ी है. मुसलमानों का आरोप है कि हिंदूवादी संगठनों ने गाँव में उग्र नारेबाज़ी की और एक ईदगाह की मीनार पर हमला किया, जिसके बाद तनाव हुआ. जबकि हिंदूवादी संगठनों का कहना है कि पहले मुसलमानों की तरफ़ से रैली पर पथराव हुआ, जिसके बाद हिंसा शुरू हुई.
गाँव के प्रधान दिलावर पटेल कहते हैं, "गाँव के बुज़ुर्गों, पुलिसकर्मियों और हिंदू संगठन के ज़िम्मेदार लोगों ने माहौल को शांतिपूर्ण बनाए रखने की बहुत कोशिश की, लेकिन भीड़ बेकाबू हो गई."
गाँव के मुसलमानों और हिंदूवादी संगठनों ने अपने-अपने दावे के पक्ष में बीबीसी को कई वीडियो दिखाए.
कनवास गाँव के रहने वाले और बीजेपी से जुड़े भरत अंजना रैली के आयोजकों में शामिल थे. भरत कहते हैं, "हमने युवाओं से शांतिपूर्ण तरीक़े से रैली निकालने की अपील की थी और कहा था कि अगर चांदन खेड़ी में डीजे न बजाना पड़े, तो शांतिपूर्ण तरीक़े से निकल जाएँ. रैली शांतिपूर्वक निकल भी गई थी, लेकिन कुछ मुसलमान युवकों ने पत्थर फेंक दिया जिसके बाद हालात काबू में नहीं रह सके."
वो कहते हैं, "पत्थर लगने से घायल युवकों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था जिसके बाद और अधिक संख्या में लोग चांदन खेड़ी गाँव पहुँच गए. इनमें कुछ असामाजिक तत्व भी थे."

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इंदौर पश्चिम के पुलिस अधीक्षक महेश चंद जैन भी घटनाक्रम को कुछ इस तरह ही बताते हैं. वो कहते हैं, "घायल युवकों का वीडियो वायरल होने के बाद आसपास के गाँव से भारी भीड़ चांदन खेड़ी में इकट्ठा हो गई. इन लोगों के पास लाठी-डंडे थे."
वो कहते हैं, "स्थानीय पुलिस से घटना का आकलन करने में लापरवाही हुई. इंदौर से पुलिसकर्मियों को गाँव पहुँचने में एक घंटे का समय लग गया. अगर पुलिस सही समय पर नहीं पहुँचती, तो बहुत ज़्यादा नुक़सान हो जाता. हम एक बड़ी घटना को टालने में कामयाब रहे."
पुलिस पर भीड़ को ना रोकने का आरोप
क़ादर पटेल के परिवार का आरोप है कि उनके घर के बाहर लगातार हिंसक भीड़ बढ़ती जा रही थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. उनके एक बेटे बताते हैं, "मैं पुलिस को बुलाने गया था. पुलिस ने मुझे वहाँ से मार कर भगा दिया. कहा कि हम यहाँ स्थिति संभालें या तुम्हारे घर को देखें."
घर की एक बहू सलमा कहती हैं, "वो हमारे घर के बाहर से नारे लगाते हुए निकले हम कुछ नहीं बोले. उन्होंने 12 बजे से लेकर 5 बजे तक हमारे घर में हंगामा किया हम कुछ नहीं बोले. गंदी-गंदी गालियाँ दी, फिर भी हम कुछ नहीं बोले. हमारे घर पर तीन बार हमला किया, हम कुछ नहीं बोले. पुलिस ने हमसे घर के भीतर बंद होने को कहा, हम अपने ही घर में बंद हो गए. उन्होंने हम पर तीन बार हमला बोला, तलवारों से, लाठियों से. हमारी भैंसों को भी मारा. वो हमारे घर में लूटपाट कर रहे थे, हम खिड़की से देख रहे थे. अलमारी तोड़कर जेवर और नक़दी चुरा ले गए. अभी तो हम अपने नुक़सान का हिसाब भी नहीं लगा पाए हैं."

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क़ादर पटेल के चार घायल बेटे अब घर के एक कमरे में लेटे हैं. उनके सिर और हाथों पर पट्टियाँ बँधी हैं. सद्दाम के अलावा और कोई भी बोलने की स्थिति में नहीं है. शाकिर इतनी दहशत में हैं कि उनके मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही है.
पुलिस ने क़ादर पटेल के घर पर हमले को लेकर अज्ञात हमलावरों के ख़िलाफ़ हत्या की कोशिश के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया है. लेकिन पुलिस ने लूटपाट के आरोपों से इनकार किया है.
एसपी महेश चंद जैन कहते हैं, "मेरी टीम ने ही पाँचों घायलों को तुरंत एमवाई अस्पताल पहुँचाया था. घायलों को हर संभव चिकित्सीय मदद दी गई है. पुलिस जब घर में पहुँची थी, तब लूटपाट के कोई संकेत नहीं मिले थे."
जब उन्हें टूटी हुई अलमारी की तस्वीरें दिखाईं गईं तो उनका कहना था, "जब पुलिस पहुँची थी, तब सब ठीक था, बाद में तो कोई भी कुछ भी कह सकता है."
क्या कहना है हिंदूवादी कार्यकर्ताओं का?
धर्मांठ गाँव के रहने वाले बलबीर भी रैली में शामिल थे. भीड़ के हमले के बाद उनका एक हाथ टूट गया है. बलबीर कहते हैं, "हमें उम्मीद थी की चांदन खेड़ी के हमारे मुसलमान भाई हमारा स्वागत करेंगे. हम पर फूल बरसाएँगे, लेकिन वहाँ तो उल्टे हम पर हमला हो गया. हम चांदन खेड़ी के मुसलमानों को जानते हैं. अधिकतर से हमारे पारिवारिक संबंध हैं. हमारी पूरी रैली निकल गई थी, कुछ चुनिंदा लोगों ने हमला किया और फिर हालात बिगड़ते गए."
वो बताते हैं, "जब मैंने देखा कि हमारे साथियों का ख़ून बह रहा है, तो मैं उन्हें बचाने पहुँचा. वो लाठियों से वार कर रहे थे. मैंने हाथ से लाठी रोकनी चाही तो मेरा हाथ ही टूट गया. युवाओं के सर से ख़ून बहता देख हिंदुओं का भी आक्रोश भड़क गया."

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बलवीर कहते हैं, "यहाँ मोहर्रम का जुलूस निकलता है. हमारे गाँव की मज़ार तक मुसलमान आते हैं. हम उनके जुलूस का स्वागत करते हैं बल्कि उसमें शामिल होते हैं. हमने कभी नहीं सोचा था कि वो हमारी रैली पर हमला करेंगे."
धर्मांठ के ही रहने वाले संजय पटेल के घर पर भगवा झंडा लहरा रहा है. वो राम मंदिर के लिए चंदा भी भेज रहे हैं. संजय बताते हैं, "हमारे गाँव में पहले कभी ऐसी घटना नहीं हुई थी. जो हुआ है उसका हमें बहुत दुख है. हमारे भगवान राम के नाम पर ऐसा हुआ उसका और भी ज़्यादा दुख है."
संजय पटेल से मैं बात कर ही रहा था कि आसपास के मुसलमान भी उनके घर में आ जाते हैं. यहाँ के मुसलमानों को नाइता पटेल कहा जाता है. संजय कहते हैं, "आप धर्मांठ या चांदन खेड़ी के किसी भी नाइता पटेल से बात कर लीजिए, पहले यहाँ कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई है और इस घटना के बाद भी हम अपना भाईचारा बरक़रार रखेंगे."
धर्मांठ गाँव में एक मुसलमान सूफी संत की मज़ार है, जिसके लिए ज़मीन गाँव के ही हिंदू परिवार ने दी थी. संजय कहते हैं, "यहाँ हिंदू मुसलमान हमेशा से मिल-जुलकर रहते आए हैं. कुछ राजनीतिक लोग भले ही तनाव पैदा करने की कोशिश करें, लेकिन वो बहुत कामयाब नहीं हो पाएँगे. उस दिन भी चांदन खेड़ी में बहुत कुछ नहीं होने दिया गया."
प्रशासन ने क्या किया?
पुलिस ने रैली पर हमला करने के आरोप में चांदन खेड़ी से 22 मुसलमानों को गिरफ़्तार किया था, जिनमें से 18 की ज़मानत हो चुकी है. जिन चार लोगों की ज़मानत नहीं हुई है, उन पर हत्या के प्रयास करने के आरोप हैं. ईदगाह पर झंडा फहराने के आरोप में दो हिंदू युवकों को भी गिरफ़्तार किया गया था, जिनकी अगले ही दिन ज़मानत हो गई थी.
क़ादर पटेल के परिवार पर हमले के आरोप में अभी किसी को गिरफ़्तार नहीं किया गया है. एसपी महेश चंद जैन कहते हैं, "हम गोली चलाने वाले युवक की पहचान कर रहे हैं, उसे जल्द ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. लाठी डंडा लिए लोगों की पहचान करने की भी कोशिश की जा रही है, इस मामले में जल्द ही गिरफ़्तारियाँ होंगी."
प्रशासन ने चांदन खेड़ी गांव में 12 घरों को भी ध्वस्त किया है. आरोप है कि इन घरों से पत्थरबाज़ी हुई थी. हालाँकि प्रशासन का कहना है कि ये घर सरकारी ज़मीन पर बनाए गए थे और इनसे सड़क अवरुद्ध हो रही थी जिसकी वजह से इन्हें तोड़ा गया है.

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तबेले में सोने को मजबूर लोग
रूबीना ऐसे ही टूटे हुए घर में रह रही हैं. वो कहती हैं, "हमें नहीं पता कि हमारा घर क्यों तोड़ा गया है. हमें तो बस ये पता है कि हमारे सर पर अब छत नहीं है और आगे घर बनाने के पैसे भी हमारे पास नहीं है. सरकार को घर तोड़ने से पहले सोचना चाहिए था कि जो लोग रह रहे हैं उनका क्या होगा."
पास ही रईस पटेल का टूटा हुआ घर है, जिसके बाहरी हिस्से को पूरी तरह तोड़ दिया गया है. घर में रखी मोटरसाइकिल अभी भी मलबे में ही दबी है.
रईस कहते हैं, "ना हमें कोई नोटिस दिया, ना ही कुछ बताया, ना ही हमारी कोई बात सुनी, बस बुलडोज़र लाए और घर तोड़ दिया. चार कमरे नीचे के और चार ऊपर के तोड़ दिए."
वो कहते हैं, "मेरा घर गाँव की ज़मीन पर बना है, जैसे बाक़ी लोगों के बने हैं. जब रैली निकली थी, मैं अपने घर के बाहर खड़ा था. आगे जाकर झगड़ा हुआ उसका हमें क्या पता. हमारा घर तो बेवजह तोड़ दिया गया है."
रईस के बेटे फ़ारूक़ पटेल कहते हैं, "हम कुछ बोलने लायक नहीं है, प्रशासन हमारा नहीं है, सब हमारे ख़िलाफ़ हैं, अगर मैं कुछ बोलूँगा, तो पुलिस मुझे उठा ले जाएगी. हमें निशाना बनाया गया है. हमारे परिवार में 15 लोग हैं. हमारे पास अब सोने की जगह भी नहीं है. हम भैंसों के तबेले में सो रहे हैं. ये कैसी सरकार है जो अपने ही नागरिकों को बेघर कर रही है?"

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उज्जैन में भी हिंसा
चांदन खेड़ी से उज्जैन की दूरी क़रीब 30 किलोमीटर है. महाकाल मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध उज्जैन में भी 25 दिसंबर को हिंदूवादी संगठनों की रैली के दौरान हिंसा हुई थी. यहाँ भी प्रशासन ने हिंसा में शामिल लोगों के मकान तोड़े हैं.
बेग़मबाग़ इलाक़ा महाकाल मंदिर के ठीक पीछे हैं. यहाँ नाले के क़रीब पट्टे की ज़मीन पर बसी कच्ची बस्ती में अधिकतर मुसलमान रहते हैं, जो पेशे से मज़दूर हैं.
25 दिसंबर को भारतीय जनता युवा मोर्चा की रैली पर हुए पथराव के बाद यहाँ से अब तक 18 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है, जिनमें से पाँच पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत कार्रवाई की गई है. ये सभी मुसलमान हैं. इनमें से कई के परिवारों का कहना है कि उन्हें बेवजह फँसाया गया है.
यहाँ रहने वाले मुसलमानों का आरोप है कि भारत माता मंदिर की तरफ़ जा रही रैली के दौरान हिंदूवादी युवाओं ने बेग़मबाग़ के सामने रुककर हंगामा किया, यहाँ खड़े वाहनों में तोड़फोड़ की, जिसके बाद मुसलमान बस्ती की तरफ़ से रैली पर पथराव हुआ.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़ इस पथराव में 18 युवा घायल हुए, जो सब रैली में शामिल थे. घटना के वीडियो सामने आने के बाद उज्जैन प्रशासन ने उन घरों को तोड़ दिया, जिनसे महिलाएँ पत्थर फेंकती हुई दिख रही हैं.
ऐसा ही एक घर अब्दुल हमीद का है. हालाँकि अब्दुल हमीद का कहना है कि उनके घर से कोई पत्थर नहीं फेंका गया था. अब्दुल हमीद कहते हैं, "मेरे बगल वाले मकान से पत्थर फेंके गए थे. प्रशासन इस मकान को तोड़ने आया था, लेकिन बाद में जब पता चला कि ये मकान टीकाराम यादव का है और मकान में मंदिर भी है, तो बुलडोज़र का रुख़ मेरे घर की तरफ़ कर दिया गया.''

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हमीद कहते हैं, "हमें न घर तोड़ने की वजह बताई गई, ना सामान निकालने की मोहलत दी गई. हमारा सारा सामान नाले में बह गया. एक ही झटके में 19 लोगों का मेरा संयुक्त परिवार सड़क पर आ गया."
हमीद के परिवार में छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो अब पड़ोसियों के घर में रह रहे हैं. यहीं रहने वाली मीराबाई ने हमीद के परिवार को अपने घर में बने उस कमरे में रहने की जगह दी है, जिसमें कथित तौर पर पत्थरबाज़ी में शामिल महिला रह रही थी, जो अब फ़रार हैं.
मीराबाई कहती हैं, "ठंड के मौसम में छोटे-छोटे बच्चे सड़क पर पड़े थे, मैंने हमीद से कहा कि अपने पोता-पोती को मेरे उस कमरे में रख लो, जिसमें हिना रह रही थी."
हिना को पुलिस ने पत्थरबाज़ी का अभियुक्त बनाया है. वो अभी फ़रार हैं.
अब्दुल हमीद के घर में ही यास्मीन बी का परिवार किराए पर रहता था. यास्मीन बी को पुलिस ने पत्थरबाज़ी के आरोप में गिरफ़्तार किया है. स्थानीय अदालत ने उनकी ज़मानत भी ख़ारिज कर दी है.
यास्मीन की गिरफ़्तारी के बाद उनके परिवार के सामने रोज़ी-रोटी का संकट है. उनकी बेटी रेशमा कहती हैं, "घर टूटने के बाद हमें दूसरी जगह जाना पड़ा, वो यहाँ से दूर है. हमारी मम्मी को बेवजह गिरफ़्तार कर लिया गया. उनकी कमाई से ही घर चल रहा था, मैं काम खोज रही हूँ, काम नहीं मिल रहा है. भाई मज़दूरी करता है, लेकिन रोज़ाना सिर्फ़ सौ रुपए ही दे रहा है.''

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वो कहती हैं, ''हम ग़रीब हैं, इसलिए हमें निशाना बनाया गया. हमारी तरफ़ से कोई बोलने वाला नहीं है. कोई हमारी सुनने वाला नहीं है."
एडवोकेट इशराक़ सिद्दीक़ी पेशे से वकील हैं और समाजसेवा से भी जुड़े हैं. इशराक़ बताते हैं कि श्रीराम मंदिर के लिए चंदा जुटाने के लिए निकाले गए जुलूस में आपत्तिजनक नारेबाज़ी की गई थी.
वो कहते हैं, "उज्जैन में हिंदुओं और मुसलमानों की मिलीजुली आबादी है. यहाँ पहले इस तरह का तनाव नहीं हुआ है. रैली के दौरान हुई मामूली पत्थरबाज़ी को अब इतना बड़ा रूप दे दिया गया है."
हमीद के टूटे हुए मकान की तरफ़ इशारा करते हुए इशराक़ कहते हैं, 'ये सरकार की तरफ़ से संदेश है कि वो जब चाहेगी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का आशियाना तोड़ देगी, उन्हें बेघर और बेरोज़गार कर देगी."
वहीं विश्व हिंदू परिषद से जुड़े मनीश रावल हिंदूवादी संगठनों की तरफ़ से किसी भी हमले के आरोप से इनकार करते हुए कहते हैं, "युवा रैली निकाल रहे थे कि अचानक मुस्लिम बस्ती से पथराव हो गया, जिसमें 17 लड़के घायल हैं. ये लड़के सिर्फ़ यात्रा के उद्देश्य से गए थे, इनके हाथ में भगवा ध्वज के अलावा कुछ भी नहीं था."
रावल कहते हैं, "रैली प्रभारी को सख़्त निर्देश थे कि रैली के दौरान कोई हंगामा ना हो. राम मंदिर निधि समर्पण अभियान में हम कोशिश कर रहे हैं कि रैलियाँ मुसलमान बस्तियों से ना निकलें. ये रैली भारत माता मंदिर पहुँचनी थी, जिसके लिए रास्ता बेग़म बाग़ से ही होकर जाता है, ऐसे में रैली को वहाँ से निकालना पड़ा."
रावल रैली में उत्तेजक नारेबाज़ी किए जाने या वाहनों में तोड़फोड़ किए जाने से इनकार करते हैं. वो कहते हैं, "वहाँ खड़े वाहन भी बस्ती की तरफ़ से ही की गई पत्थरबाज़ी में टूटे हैं."
प्रशासन की तरफ़ से घर तोड़ने के सवाल पर रावल कहते हैं, "प्रशासन की कार्रवाई सही है, हमारे पास इन घरों से पत्थर फेंके जाने के प्रमाण हैं."

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मंदसौर में मुसलमानों के घरों पर हमला
राम मंदिर के लिए चंदा जुटाने के लिए मंदसौर में निकाली गई रैली के दौरान भी मुसलमानों के धार्मिक स्थल और घरों में तोड़फोड़ की गई. ये घटना 29 दिसंबर की है. पुलिस ने इस संबंध में 9 लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिन्हें उसी दिन ज़मानत दे दी गई थी.
मंदसौर के डोराना गांव के प्रमुख शाहिद मंसूरी के मुताबिक़, "25 दिसंबर को डोराना में मस्जिद के बाहर उग्र नारेबाज़ी की गई थी और डीजे बजाया गया था. मुसलमान युवकों के आग्रह करने पर रैली में शामिल युवा आगे बढ़ गए और बात वहीं ख़त्म हो गई."
लेकिन इसके बाद मंदसौर में सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हुआ, जिसमें हिंदूवादी संगठनों ने 29 दिसंबर को फिर से डोराना में रैली निकालने का आह्वान किया. इस संदेश के बाद डोराना गाँव के मुसलमानों ने एक आवेदन देकर पुलिस अधीक्षक से सुरक्षा की गुहार की.
शाहिद मंसूरी के मुताबिक़ पुलिस ने लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया था. एहतियात के तौर पर सड़क के पास बने घरों में रहने वाले मुसलमान अपने घर छोड़कर चले गए थे.
प्रशासन ने संवेदनशीलता को देखते हुए शीर्ष अधिकारियों समेत पुलिस बल डोराना गाँव में तैनात किया था. लेकिन इसके बावजूद आरोप ये है कि रैली में शामिल युवाओं ने मस्जिद पर चढ़कर नारेबाज़ी की, झंडे उतारकर भगवा झंडे फहरा दिए. घरों में तोड़फोड़ की.
डोराना के मुसलमानों की तरफ़ से इस संबंध में तीन मुक़दमे दर्ज कराए गए हैं. उनका आरोप है कि पुलिस ने धाराएँ हल्की करके लगाई, जिसकी वजह से गिरफ़्तार युवकों को उसी दिन ज़मानत मिल गई.
वहीं पुलिस ने दो हिंदू युवकों की तरफ़ से दी गई शिकायत पर लूट की धाराओं में 50 से अधिक अज्ञात मुसलमानों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है.
शाहिद मंसूरी कहते हैं, "पुलिस ने ये फ़र्ज़ी मुक़दमा इसलिए दर्ज किया है ताकि मुसलमानों के पक्ष को कमज़ोर किया जा सके."
वो कहते हैं, "जैसी कार्रवाई प्रशासन ने इंदौर और उज्जैन में की है, वैसी ही इन लोगों पर की जाए, इनके घर तोड़े जाएँ. लेकिन प्रशासन ने हमारी कोई बात नहीं सुनी है."
मंदसौर की घटना के बाद एक बयान में ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहाद-उल-मुसलेमीन (एआईएएमआईएम) के नेता असदउद्दीन ओवैसी ने एक बयान में कहा था, "इन लोगों में जो चरमपंथ बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है?"

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क्रिया की प्रतिक्रिया?
हिंदू जागरण मंच के मालवा प्रांत के प्रमुख राजेश भार्गव इन घटनाओं को क्रिया की प्रतिक्रिया बताते हैं. वो कहते हैं, "राम मंदिर के लिए चल रहा निधि संग्रह अभियान समाज को जोड़ने का अभियान है. हर व्यक्ति का मंदिर निर्माण में योगदान हो, इस उद्देश्य से यात्राएँ निकाली जा रही हैं. इन यात्राओं पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया तो होगी ही."
वो कहते हैं, "जहाँ से फूल आने चाहिए, वहाँ से पत्थर आएँगे, तो जिसे पत्थर लगेगा, वो मस्जिद पर झंडा भी फहरा सकता है. इसे भी समाज को उन्माद के तौर पर ही लेना चाहिए. इसे क्रिया की प्रतिक्रिया माना जा सकता है, ये किसी योजना के तहत नहीं हुआ है."
मुसलमानों के घर तोड़ने जाने की कार्रवाई को सही ठहराते हुए भार्गव कहते हैं, "समुदाय विशेष जो कर रहा है, उसे कठोर अनुशासन से नहीं दबाया गया, तो आगे और भी घटनाएँ हो सकती हैं. जो तत्व मस्जिद के गुंबद पर भगवा झंडा लहरा रहे हैं, उन पर भी सख्त कार्रवाई का हम समर्थन करते हैं."
मध्य प्रदेश की सरकार पत्थरबाज़ी के ख़िलाफ़ नया सख़्त क़ानून ला रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई बार कह चुके हैं कि पत्थरबाज़ों को बख़्शा नहीं जाएगा.
लेकिन दंगा करने, धर्मस्थल पर हमला करने, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, पशुओं पर हमला करने, फसल बर्बाद करने, इस सबके ख़िलाफ़ तो पहले से ही भारतीय दंड संहिता के तहत प्रावधान मौजूद हैं. लेकिन मध्य प्रदेश की पुलिस ने अभी तक मुसलमानों पर हमला करने, उनकी संपत्तियों को नुक़सान पहुँचाने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं की है.
मध्य प्रदेश मदरसा बोर्ड के चेयरमैन रहे प्रोफ़ेसर हलीम ख़ान कहते हैं, "दबी हुई ज़बान में पुलिस अधिकारी ये कहते हैं कि हम क्या करें, ऊपर का दबाव है, इससे साफ़ है कि पुलिस दबाव में काम कर रही है. कई अधिकारी ये जानते हैं कि वे जो कर रहे हैं वो ग़लत हैं. लेकिन फिर भी वे ऐसा करते हैं."

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प्रोफ़ेसर हलीम ख़ान कहते हैं, "ऐतिहासिक तौर पर मालवा में सांप्रदायिक सौहार्द्र रहा है. होल्कर स्टेट के दौरान भी सांप्रदायिक सौहार्द्र बना रहा. अगर बीते दो-तीन दशकों को छोड़ दें, तो यहाँ कभी भी सांप्रदायिक तनाव नहीं रहा है. लेकिन राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद से ये इलाक़ा सांप्रदायिक तनाव का केंद्र बन गया है."
ख़ान कहते हैं, "जब मुग़लों से सत्ता मराठों के हाथ में आई, तब भी यहाँ बिना किसी बड़ी उथल-पुथल के सत्ता परिवर्तन हो गया. होल्कर राजा मुसलमानों के त्यौहारों में भी ज़ोर-शोर से शामिल होते थे. इसकी वजह से जनता में भी भाईचारा था. यहाँ ज़मीन बहुत उपजाऊ है, इसकी वजह से भी ये इलाक़ा हमेशा से शांत बना रहा."
प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान शुरू हुई सांप्रदायिकता अब पूरे मालवा में फैल गई है. वो कहते हैं, "मुसलमानों ने राम जन्मभूमि के फ़ैसले को ख़ामोशी से स्वीकार किया है. इसमें अब चंदे के लिए मुस्लिम इलाक़ों से जुलूस निकालने से तनाव हो रहा है. आज़ादी के बाद से ये मुसलमानों के लिए सबसे ख़तरनाक माहौल है. इसका असर मुसलमानों के कारोबार से लेकर शिक्षा तक पर पड़ रहा है."
मालवा के क्षेत्र में बीजेपी के वरिष्ठ नेता गोविंद मालू ने इन घटनाओं को लेकर शिवराज सरकार का बचाव करते हुए बीबीसी से कहा, "पिछले दिनों जिस तरह की घटनाएँ देखने को मिली हैं, वो दुखद हैं. शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में राज्य सरकार ने सख़्त क़दम उठाते हुए इन घटनाओं को हिंसक होने से रोकने का काम किया है. समाज में कट्टरपंथी सोच रखने वाल शरारती तत्व इन घटनाओं के पीछे हैं. ऐसे लोगों से निपटने के लिए हमारी सरकार प्रतिबद्ध है."
इन घटनाओं के पृष्ठभूमि पर गोविंद मालू ने कहा, "भारत में क़ानून के तहत, संविधान के तहत जय श्री राम के नारे लगाना या उसके उदघोष वाले यात्रा निकालना अपराध नहीं है. लेकिन ऐसी यात्राओं से उत्तेजित होकर पत्थरबाज़ी करना अपराध के दायरे में आता है. हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान और आयोजन में बाधा पहुँचाने की कोशिश से हमारी सरकार सख़्ती से निपटेगी."
मालवा के सांप्रदायिक सद्भाव को नुक़सान पहुँचाने वाली इन घटनाओं में एक तबके ने सरकार पर हिंदूवादी संगठनों और समूहों का साथ देने का आरोप लगाया है.
इन आरोपों को खारिज करते हुए गोविंद मालू ने कहा, "दूसरे पक्ष को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है. उन्हें भी प्रशासन के पास शिकायत करने का अधिकार है. शिकायतें मिली भी हैं और प्रशासन अपना काम कर रहा है. लेकिन हमारा ये भी कहना है कि शिकायतें आधारहीन नहीं होनी चाहिए. केवल हिंसा की मानसिकता को प्रदर्शित करने वाली शिकायतें नहीं होनी चाहिए. अगर शिकायतों की पुख़्ता वजहें होंगी तो शिवराज सिंह चौहान की सरकार न्यायसंगत कार्रवाई करेगी, चाहे वे किसी भी पक्ष के लोग क्यों ना हों."
लेकिन इस सबके बीच इस इलाक़े के मुसलमानों में डर का एक माहौल बन रहा है.
अपने टूटे हुए घर के बरामदे में खड़े होकर फ़ारूक़ कहते हैं, "अगर हम मुसलमान न होते, तो शायद हमारा घर सही सलामत होता. जिन पर पत्थर फेंकने के आरोप हैं, उनका तो घर तोड़ दिया गया और जिन्होंने घर में घुसकर लोगों की जान लेने की कोशिश की, उन्हें गिरफ़्तार तक नहीं किया गया. इसके पीछे का संदेश साफ़ है- ख़ामोश रहो नहीं तो निबटा दिए जाओगे."
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