बिहार चुनाव: महबूब आलम जैसे नेताओं की जीत में छिपा है कम्युनिस्टों की सफलता का राज़?

महबूब आलम

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    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, पटना (बिहार) से, बीबीसी हिन्दी के लिए

बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने शानदार सफलता हासिल की है. उनके 19 में से 12 प्रत्याशियों ने इस चुनाव में जीत दर्ज की है.

भाकपा (मा-ले) की इस सफलता की काफ़ी चर्चा है, और इन चर्चाओं में सबसे अधिक सुर्ख़ियाँ बटोर रहे हैं, कटिहार के बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र से जीत हासिल कर चौथी बार विधायक बने महबूब आलम.

महबूब आलम को 'जनता का नेता' बताया जा रहा है. ट्विटर और फ़ेसबुक पर उनकी सादगी से जुड़ी बातें लिखी जा रही हैं.

उनकी एक फ़ोटो भी वायरल हो रही है जिसमें महबूब धीमी रोशनी वाले एक कच्चे मकान के अंदर साधारण वेशभूषा में अपनी नन्हीं बेटी के साथ दिखते हैं.

चुनाव आयोग को दिये हलफ़नामे में महबूब ने अपनी कुल संपत्ति, हाथ में नगदी और बैंक की जमाराशि मिलाकर एक लाख रुपये के क़रीब बताई है.

महबूब बलरामपुर विधानसभा के आबादपुर थाना क्षेत्र में पड़ने वाले शिवानंदपुर गाँव में आठ सौ वर्ग फ़ुट के मकान में रहते हैं.

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महबूब आलम की चर्चा इसलिए तो हो ही रही है कि वो ना सिर्फ़ सीमांचल में, बल्कि पूरे बिहार में सबसे अधिक वोटों के मार्जिन से जीते हैं. पर ज़्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि चार बार विधायक बनने के बावजूद वो आज तक अपने परिवार के साथ एक कमरे वाले कच्चे मकान में रहते हैं. उनके पास अपना पक्का घर नहीं है.

आलम का नाम इससे पहले भी चर्चा में रहा, जब मुहर्रम के मौक़े पर लाठी भांजते हुए उनके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे.

इसके अलावा बैंक मैनेजर को थप्पड़ मारने के एक मामले में भी उनका नाम सुर्ख़ियों में आया था और ऐसी ख़बरें भी छपी थीं कि सीसीटीवी फ़ुटेज में महबूब आलम थप्पड़ मारते देखे गए थे.

चुनाव आयोग को दिये हलफ़नामे से यह जानकारी भी मिलती है कि महबूब आलम के ख़िलाफ़ पाँच आपराधिक मामले चल रहे हैं. इनमें हत्या के आरोप से लेकर हत्या की साज़िश रचने तक के आरोप शामिल हैं.

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फिर भी 'जनता के नेता' कैसे?

बीबीसी से बातचीत में महबूब आलम ने अपने ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमों को फ़र्जी और निराधार बताया.

उन्होंने कहा, "इन मुक़दमों का कोई आधार नहीं है. अगर आधार होता तो अब तक मुझे सज़ा हो गई होती. जनता जानती है कि मुझे फंसाया गया है, इसीलिए मैं जीत रहा हूँ."

अपनी छवि के बारे में बात करते हुए महबूब आलम ने कहा, "मैं एक मार्क्सवादी हूँ और मैंने अपना पूरा जीवन वर्ग संघर्ष में लगाया है. मैं विधायक हूँ और फिर भी मेरे पास पक्का मकान नहीं है. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. इस देश में हज़ारों-लाखों लोगों के पास पक्का मकान नहीं है. हमारा संघर्ष उन लोगों के लिए है, ना कि अपने लिए."

मौजूदा समय में 'चुनाव लड़ने के ट्रेंड' को देखकर यह यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है कि महज़ एक लाख रुपये की जमा-पूंजी वाले महबूब चार बार चुनाव जीत चुके हैं.

चुनाव लड़ने के लिए पैसे की ज़रूरत को लेकर महबूब का मानना है, "मैं चुनाव नहीं लड़ता. अपने वर्ग का सिर्फ़ प्रतीक बनता हूँ. मेरा चुनाव हमारे यहाँ की जनता लड़ती है. इसके लिए मुझे पैसों की ज़रूरत नहीं. रही बात चुनाव प्रचार की तो मुझे नोमिनेशन के बाद और वोटिंग से पहले मिलने वाले समय में किये गए प्रचार की ज़रूरत नहीं पड़ती. मैं 24 घंटे अपने क्षेत्र की जनता के बीच ही रहता हूँ, इसलिए मुझे आख़िरी समय में लोगों तक जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी."

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जब भी चुनाव लड़े, या तो जीते, या दूसरे नंबर पर रहे

बौद्धिक विरासत से ताल्लुक रखने वाले महबूब आलम की राजनीति की शुरुआत बहुत कम उम्र में हुई थी.

मगर जवानी के दिनों में टमटम चलाने के दौरान टमटम यूनियन से जुड़कर उन्होंने संगठनात्मक राजनीति का पाठ पढ़ा.

महबूब की चुनावी राजनीति में शुरुआत 1985 में सीपीआई (एम) के प्रत्याशी के तौर पर तत्कालीन बारसोई विधानसभा से हुई, तब वे दूसरे नंबर पर रहे थे.

बाद में सीपीआईएम के साथ वर्ग संघर्ष को लेकर उत्पन्न विरोधाभासों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

फिर 1990 में वे सीपीआईएमएल के टिकट पर चुनाव लड़े और दूसरे नंबर पर रहे, लेकिन उनके वोट प्रतिशत में सुधार हुआ.

महबूब के मुताबिक़, "1995 के चुनाव से छह महीने पहले एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी. सामंती आपराधिक तत्वों ने एक दलित बस्ती पर हमला करके एक तालाब पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश की, इसे लेकर टकराव हुआ जिसमें दो लोगों की मौत हो गई."

महबूब बताते हैं, "पुलिस ने हत्या के मामले में मुझे अभियुक्त बना दिया क्योंकि मैं दलितों के ख़िलाफ़ पुलिस गठजोड़ को ध्वस्त करने की बात कर रहा था. यही उस वक़्त का मेरा नारा था."

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जब नहीं लड़ पाए चुनाव

1995 का चुनाव महबूब आलम ने जेल से ही लड़ना चाहा, मगर कथित साज़िशों के चलते उनका नॉमिनेशन रद्द कर दिया गया.

पार्टी के साथ राय मशविरा करके उन्होंने अपने छोटे भाई मुनाफ़ आलम को चुनावी मैदान में उतारा. मुनाफ़ जीत तो नहीं सके, मगर 27 हज़ार वोटों के साथ दूसरे स्थान पर ज़रूर रहे.

हत्या के मामले में दो साल बाद महबूब को ज़मानत मिली. वो कहते हैं कि जेल से वापस आने तक उनके ख़िलाफ़ और भी कई मुक़दमे दर्ज किये जा चुके थे. वो फिर से अंडरग्राउंड हो गये और अंडरग्राउंड होकर ही उन्होंने 2000 का चुनाव लड़ा और अंतत: महबूब की जीत हुई.

2005 में दो बार विधानसभा चुनाव हुआ था. पहली बार में महबूब आलम जीत गये थे. लेकिन दूसरी बार में उन्हें लगा कि नॉमिनेशन फ़ाइल करने जाने के दौरान उन्हें गिरफ़्तार किया जा सकता है, इसलिए अपने भाई मुनाफ़ आलम को दोबारा सीपीआईएमएल के टिकट पर खड़ा करवा दिया.

महबूब आलम के अंडरग्राउंड रहते हुए मुनाफ़ ने वो चुनाव जीत भी लिया.

महबूब के मुताबिक़, उनके भाई विधायक के तौर पर अपनी भूमिका नहीं निभा पाये, लोगों में नाराज़गी हुई, शायद इसीलिए जब 2010 का चुनाव हुआ तो महबूब को करारी हार मिली.

हालांकि, 2015 के चुनाव में वो एक बार फिर भारी मतों के अंतर से जीतकर विधानसभा पहुँचे.

विरोधी महबूब आलम पर नक्सली होने का आरोप लगाते हैं. उन्हें लेकर यह भी कहा जाता है कि वो दबंग विधायक हैं.

इन आरोपों पर महबूब आलम कहते हैं, "पुलिस सामंती अपराधी गठजोड़ पर जब आप हमला करते हैं तो वो आप पर हमला करेगा ही. बिहार की 21 लाख एकड़ ज़मीन अगर यहाँ के वंचितों में बांट दिये जाने की बात हम कर रहे हैं तो क्या हम नक्सली हैं. इन बातों पर केवल वो सामंत राज़ी नहीं होते. हम तो जनता की सुरक्षा में और जनता की रोटी पर चलते हैं."

महबूब आलम

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महबूब के अलावा भी हैं और नाम

सीपीआईएमएल की तरफ़ से इस बार के विधानसभा चुनाव में महबूब आलम के अलावा और भी कई नव-निर्वाचित विधायक हैं जिनकी चर्चा उनकी छवि और राजनीतिक जीवन को लेकर हो रही है.

इन नामों में जेएनयू के पूर्व छात्र नेता संदीप सौरव और बिहार के पूर्व छात्र नेता अजीत कुशवाहा का नाम शामिल है.

छात्र राजनीति से निकलकर मुख्यधारा की राजनीति में आने का इनका सफ़र ही चुनाव में चर्चा के केंद्र में रहा.

संदीप सौरव ने पटना के पालीगंज विधानसभा से चुनाव जीता है. पालीगंज में वोटिंग हो जाने के अगले दिन शाम में वो पटना के मौर्या लोक कॉम्पेल्क्स में कुछ युवाओं के साथ ठेले की चाय पीते मिल गए.

बातचीत में कहा, "हम यहीं से होकर जाते हैं, इसलिए लौटकर यहां ज़रूर आते हैं. हमारे कहने का मतलब है कि हम उसी क्लास के लोगों में से हैं जो यहां इस ठेले की चाय पीते हैं."

इसी तरह डुमरांव विधानसभा क्षेत्र से सीपीआईएमल की तरफ़ से जीत दर्ज करने वाले अजीत कुशवाहा इस पूरे चुनाव के इकलौता नाम हैं जिनका ताल्लुक हालिया दौर की बिहार की छात्र राजनीति से है.

जेपी आंदोलन से निकले नेताओं की पीढ़ी के बाद हाल के दिनों में बिहार से ऐसा कोई छात्र नेता नहीं निकला जिसने मुख्यधारा की राजनीति में जाकर सफलता पाई हो. अजीत कुशवाहा इस परिपाटी को तोड़ते हैं.

वो बीबीसी से कहते हैं, "जो लोग पूर्व की छात्र राजनीति से निकलकर सत्ता के शिखर तक पहुँचे उन्होंने कभी मन से चाहा ही नहीं कि कोई अगली पीढ़ी तैयार हो. इसलिए यहाँ छात्र राजनीति के लिए माहौल ही ख़राब कर दिया गया. छात्र संघ के चुनाव बंद हो गए. इसके लिए हमने लंबी लड़ाई लड़ी. अब जबकि एक बार फिर से यहाँ की छात्र राजनीति करवट लेने लगी है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में नए चेहरे देखने को मिलेंगे."

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