बिहार चुनाव: अमित शाह इस जीत पर कितना ख़ुश होंगे?

अमित शाह

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बात 2015 की है, बिहार विधानसभा चुनाव क़रीब थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 'देश में आरक्षण की समीक्षा किए जाने की ज़रूरत' वाला बयान दिया था और बिहार में एक नई बहस शुरू हो गई.

बिहार के पेंचीदे जातीय राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इस बयान से ये कहते हुए पल्ला भी झाड़ लिया था कि "पार्टी आरक्षण को लेकर किसी पुनर्विचार के पक्ष में नहीं है."

लेकिन आगामी चुनाव में इस बयान से नुक़सान की आशंकाएँ भी बढ़ रही थीं.

बिहार चुनाव की बागडोर तब पार्टी अध्यक्ष रहे अमित शाह के हाथ में थी. पटना के एक पाँच सितारा होटल की तीसरी मंज़िल पर कमरा नम्बर 330 पिछले डेढ़ महीने से उनका घर बना हुआ था.

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मोहन भागवत के आरक्षण पर विवादित बयान देने के अगले दिन सुबह आठ बजे से अमित शाह ने अपने कमरे से फ़ोन पर प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं को दहाड़-दहाड़ कर बताया था, "हम आरक्षण का पूरा समर्थन करते हैं और सभी को यही बात दोहरानी है."

पार्टी पर अमित शाह की छाप गहराती जा रही थी और 2014 के लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत और ख़ासतौर से उतर प्रदेश में महीनों डेरा डालकर भारी संख्या में सीटों को जिताने का सेहरा उनके सिर बांधा जा चुका था.

2015 के बिहार चुनाव के दौरान भाजपा संगठन में बूथ मैनेजमेंट से लेकर बड़ी रैलियों और दर्जनों मंत्रियों के हेलिकॉप्टर से प्रचार तक का फ़ैसला अमित शाह ही लेते थे.

लेकिन विभिन्न मतदान चरणों के बीच में कुछ ऐसा हुआ जिसकी छाप 2020 बिहार चुनाव में भी दिखी.

शाह की टीम में काम कर चुके एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक़, "अमित जी को फ़ीडबैक मिला कि उनको लेकर स्थानीय लोगों के मन में थोड़ा ग़ुस्सा है. उन्होंने रातोंरात प्रचार के सभी होर्डिंग बदलवा दिए और सभी से अपनी तस्वीर हटवा दी थी. तब से लेकर इस साल (2020) चुनावों तक अमित शाह ने अपने को आगे न रखते हुए बिहार पर सभी फ़ैसले लिए हैं."

चुनाव के नतीजे आए और भले ही भाजपा ने प्रदेश में तब तक का अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया रहा हो, लेकिन सरकार नीतीश कुमार की जदयू और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी की ही बनी.

कई लोगों ने इस हार के पीछे अमित शाह को भी ज़िम्मेदार ठहराया था और कुछ ने उनके उस फ़ैसले पर सवाल उठाए थे कि "भाजपा को कम से कम अपने मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के नाम के साथ मैदान में उतरना चाहिए था."

2020 के लिए रणनीति

अमित शाह

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ये जगज़ाहिर है कि अमित शाह लंबे समय से बिहार और पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकारों के गठन के लिए जुटे रहे हैं.

पिछले लोक सभा चुनावों में भी बतौर पार्टी अध्यक्ष उन्होंने इन राज्यों पर अपना ख़ास ध्यान बनाए रखा था.

पिछले डेढ़ दशक से भाजपा को कवर करने वाले इकोनॉमिक टाइम्स अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार राकेश मोहन चतुर्वेदी के मुताबिक़, "नित्यानंद राय जैसे नेताओं को अपना उप-मंत्री बनाकर और उन्हें साथ में जोड़ना जैसी कई मिसालें हैं."

उन्होंने कहा, "2019 के लोक सभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार से दोनों दलों के प्रत्याशियों की 17-17 वाली संख्या पर समझौते में शाह की प्रमुख भूमिका थी. हालांकि 2014 में नीतीश की पार्टी का प्रदर्शन ख़राब था और उन्हें सिर्फ़ दो सीटें ही मिली थीं, फिर भी शाह ने ये समझौता 2020 विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ही किया था."

पिछले लोक सभा चुनावों के बाद से अमित शाह भारत के गृह मंत्री हैं जबकि पार्टी की बागडोर जेपी नड्डा के हाथ सौंपी गई है.

2015 के बिहार चुनावों में अमित शाह ने प्रदेश के लिए अपनी टीम में जेपी नड्डा के साथ-साथ भूपेन्द्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान को प्रमुख भूमिकाएँ सौंपी थीं.

अब इसे महज़ इत्तेफ़ाक़ तो नहीं कहा जा सकता कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में भी चुनाव कैम्पेन को धर्मेंद्र प्रधान और भूपेन्द्र यादव ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश चुनाव प्रमुख देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर चलाया.

अमित शाह ने किस पर जताया भरोसा

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भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, "बिहार चुनाव नड्डा जी के नेतृत्व में ही लड़ा गया. सभी बड़े फ़ैसले/बैठकें उनके निवास पर ही हुईं, लेकिन टिकट बंटवारे से लेकर लोक जनशक्ति पार्टी या दूसरे दलों से गठबंधन बनाने या बनाने वाली अहम बैठकों में अमित शाह फ़ोन या वीडियो कॉल के ज़रिए शामिल रहे."

आउटलुक पत्रिका की राजनीतिक सम्पादक भावना विज-अरोड़ा के अनुसार, "अपने ख़राब स्वास्थ्य (अमित शाह कोरोना वायरस संक्रमण के चलते दो हफ़्ते अस्पताल में रहे थे) के चलते वो फ़ील्ड में कम ही देखे गए और गृह मंत्री होने के नाते वे पार्टी और अध्यक्ष जेपी नड्डा के बीच नहीं दिखना चाहते थे."

भावना विज-अरोड़ा ने आगे बताया, "ये एक रणनीति भी थी क्योंकि बिहार में जनता का मूड नीतीश के ख़िलाफ़ दिख रहा था और शाह को भी एनडीए की साफ़ जीत का पूरा भरोसा नहीं था. जबकि पर्दे के पीछे नड्डा सिर्फ़ अमित शाह की ही राय ले रहे थे."

नड्डा और अमित शाह

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यानी नड्डा, भूपेन्द्र यादव और धर्मेंद्र प्रधान पर अमित शाह का भरोसा आज भी उतना ही है जितना एक दशक पहले था.

अक्तूबर 2010 से लेकर सितंबर 2012 तक जब गुजरात के सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अमित शाह को गुजरात से बाहर रहने के लिए कहा था तब उन्होंने एक वरिष्ठ पत्रकार से कहा था, "वैसे तो अपने प्रदेश से दूर रहना कष्टदायी होता है लेकिन पार्टी में जेपी नड्डा, धर्मेन्द्र प्रधान और भूपेंद्र यादव जैसे मित्र मेरा बहुत ध्यान रखते हैं."

हालांकि इकोनॉमिक टाइम्स अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार राकेश मोहन चतुर्वेदी मानते हैं कि, "शाह अब पार्टी में ख़ुद को मेंटॉर के तौर पर देखते हैं. लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल उनके लिए आज भी उतने अहम हैं."

भाजपा के जानकारों को लगता है कि "2020 के बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई ऐसे मौक़े आए जहाँ विपक्षी महागठबंधन भारी पड़ता दिखाई दिया. तेजस्वी यादव का दस लाख नौकरियों का वादा इनमें से एक था. इसके तुरंत बाद भाजपा ने स्ट्रैटजी बदलते हुए 'जंगल राज' पर ज़ोर देना शुरू कर दिया और इसमें पूर्व अध्यक्ष शाह की चुनी गई टीम का ही रोल था."

जीत से संतुष्ट हैं अमित शाह?

नीतीश कुमार और अमित शाह

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इसमें कोई शक नहीं कि बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन अप्रत्याशित रहा है. 74 सीटें (आरजेडी को सबसे ज़्यादा 75 सीटें मिली हैं) के साथ भाजपा ने सहयोगी जदयू (43 सीटें) को भी पछाड़ दिया है.

एनडीए गठबंधन के सरकार बनाने के आँकड़े पार करने के बाद वरिष्ठ भाजपा नेता ये भी दोहरा रहे हैं कि "नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहेंगे और पीएम मोदी और अमित शाह प्रचार के दौरान ये लगातार कहते रहे हैं."

लेकिन हक़ीक़त ये भी है कि नीतीश अगर मुख्यमंत्री रहेंगे तो ये फ़ैसला भी अब भाजपा ले रही है जो पहली बार होगा.

पार्टी जानकारों के मुताबिक़, "हमारी जीत हुई है, ये बड़ी बात है. लेकिन ख़ुद अमित शाह जी ने पिछले लोक सभा चुनावों में जीत कर आए सांसदों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि बिहार और पश्चिम बंगाल में भाजपा को ख़ुद ही सरकार बनानी है."

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इस लिहाज़ से देखा जाए तो मिशन पूरा तो नहीं हो सका और शायद अमित शाह को इसका मलाल भी हो.

क्योंकि इसे पूरा करने की कड़ी में बिहार चुनाव के अंतिम चरणों में भी उन्होंने बिहार में रैली न कर, पड़ोसी पश्चिम बंगाल को चुना. इसे एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश भी कही जा सकती है.

आउटलुक पत्रिका की राजनीतिक सम्पादक भावना विज-अरोड़ा को लगता है कि, "नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की महत्वाकांक्षा का लाभ अमित शाह ने उन्हें अपने खेमे में लाकर उठाया था और अब अपने सहयोगी को ख़ुद पर निर्भर कर दिया."

उन्होंने कहा, "नीतीश कुमार को साइडलाइन करने के लिए चिराग पासवान भी अमित शाह की सोच थी. मुझे इस बात पर शक है कि अब नीतीश को पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर रहने दिया जाएगा."

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