बिहार चुनावः नीतीश कुमार 15 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद फिर अगली पारी के लिए तैयार

    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नीतीश कुमार ने पूर्णिया में एक चुनावी रैली में कहा था, "आज चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन है, परसों चुनाव है और ये मेरा आखिरी चुनाव है, अंत भला तो सब भला..."

5 नवंबर को जब उन्होंने मंच से ये बात कही तो कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें अब अपना राजनीतिक अंत दिखने लगा है, वहीं कुछ लोगों का कहना था कि नीतीश ने यह इमोशनल कार्ड खेला है ताकि लोग उन्हें एक और बार, अंतिम बार मानकर वोट दे दें.

यह इससे भी समझ में आता है कि जनता दल यूनाइटेड ने ये साफ़ किया है कि ये नीतीश कुमार का आख़िरी चुनाव नहीं होगा लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार ये बखूबी जानते हैं कि उन्हें कब, कितना और क्या बोलना है.

नीतीश कुमार की राजनीति को बेहद क़रीब से समझने वाले पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के प्रोफ़सर डीएम दिवाकर कहते हैं, "नीतीश कुमार कोई हल्की समझ वाले नेता नहीं हैं. वो जो शब्द बोलते हैं बेहद सोच-समझकर बोलते हैं लेकिन इस चुनाव में उन्होंने ऐसा बहुत कुछ बोला है जिस पर यक़ीन नहीं किया जा सकता कि ये सब नीतीश कुमार ने कहा है."

उनके आख़िरी चुनाव के बयान पर वह कहते हैं, "देखिए पार्टी का जो इंटरनल सर्वे होता है उसमें पहले ही उन्हें ये ख़बर दे दी गई है कि हवा उनके पक्ष में नहीं है और वो जो कुछ लोगों से मिलकर देख रहे हैं उससे भी उन्हें समझ आ रहा है कि एंटी-इंकंबेंसी है. उन्होंने इस बयान के ज़रिए एक स्पेस बना दिया ताकि अगर उन्हें कोई क़दम उठाना पड़े तो वो लोगों को एक हिंट पहले ही दे दें."

लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं कि उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड का प्रदर्शन भले अच्छा ना रहा हो लेकिन वो सातवीं बार मुख्यमंत्री बनने की राह पर हैं, हालांकि उनको ये मौका जेडीयू नहीं बल्कि बीजेपी की सीटों की वजह से मिल रहा है. हालांकि नीतीश कुमार अब बिग ब्रदर की भूमिका में नहीं हैं , जेडीयू को इस चुनाव में 43 सीटें मिली हैं और उसकी सहयोगी बीजेपी को 74 सीटें मिली हैं. बिहार में अब बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और आरजेडी से महज़ एक सीट ही पीछे है.

साल 2015 के चुनावी नतीज़ों में भी नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर नहीं उभरी थी. इसके बावजूद उन्हें महागठबंधन ने मुख्यमंत्री बनाया था.

ठीक इसी तरह इस चुनाव में भी एनडीए ने नीतीश कुमार को अपना सीएम का चेहरा बनाया है और बीजेपी साफ़ कर चुकी है कि इस फ़ैसले पर सीटों के शेयर से कई असर नहीं पड़ेगा.

बीजेपी साफ़ तौर पर कह चुकी है अगर नीतीश कुमार की सीटें उससे कम भी हुईं और एनडीए गठबंधन को बहुमत मिला तो उस हालत में नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे, एनडीए ने यह चुनाव नीतीश कुमार को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करके लड़ा है.

टिके रहने की कला

साल 2010 के चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी का चुनावी नारा हुआ करता था- "बात बनाने वाले को 15 साल और काम करने वाले को 5 साल?"

लेकिन इस विधानसभा चुनाव में दोनों ही लालू यादव के 15 साल बनाम नीतीश के 15 साल जनता के सामने रहे. समर्थकों और विरोधियों की शब्दावली में 'जंगल राज' और 'सुशासन' के बीच टक्कर थी.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में (2005-2010) खूब काम किया, लड़कियों के लिए पोशाक योजनाएं, लड़कियां स्कूल गईं. उनका नज़रिया लोगों के हित में था, नीतीश कुमार के राज में रंगदारी लगभग बंद हो गई जो लालू यादव के समय में अपने चरम पर थी लेकिन बीते साढ़े सात सालों में अब नीतीश कुमार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार खूब फैला है. हर योजनाओं को ये कीड़ा लग गया."

ये दावा हमें बिहार में, ख़ास तौर ग्रामीण बिहार में ख़ूब नज़र आया. महिलाओं को नीतीश कुमार का वोटर माना जाता है उन्होंने ब्लॉक स्तर पर फैले भ्रष्टाचार का बार-बार ज़िक्र किया. अपना पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद से ही नीतीश कुमार पर 'सत्ता में बने रहने की राजनीति' करने का आरोप लगने लगा.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी से गठबंधन तोड़कर नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव अकेले लड़े लेकिन उन्हें क़रारी हार का सामना करना पड़ा.

डीएम दिवाकर कहते हैं, "जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार ने इसलिए सीएम बनाया क्योंकि उन्हें 2014 में अपर-कास्ट वोट नहीं मिले और उन्होंने दलितों को ये मैसेज देना चाहा था कि उनके समुदाय के एक व्यक्ति को वो सत्ता के शीर्ष पर बैठा रहे हैं."

लेकिन मई 2014 में सीएम पद छोड़ने वाले नीतीश कुमार ने फ़रवरी 2015 में जीतनराम मांझी को पार्टी से निकालकर खुद 130 विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे और सरकार बनाने का दावा पेश किया.

इसके ठीक बाद विधानसभा चुनाव में लालू के 15 साल के शासन के ख़िलाफ़ लड़कर सत्ता में आने वाले नीतीश कुमार ने ये समझ लिया कि बिना गठबंधन बिहार में सरकार बनना संभव नहीं है और यहीं से साथ आए जेपी और कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में राजनीति सीखने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ.

बिहार में दोनों नेताओं के 'सामाजिक न्याय के साथ विकास' के नारे ने राज्य में बीजेपी के 'विकास' के नारे को पटखनी दे दी.

लेकिन 27 जुलाई 2017 को पटना में राजनीतिक सरगर्मी तब बढ़ गई जब नीतीश कुमार राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से मिलने राजभवन पहुंचे और अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया. नीतीश ने ये इस्तीफ़ा राज्य के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद दिया था, और उन आरोपों को ही इस्तीफ़े की वजह बताया था.

इसके ठीक बाद नीतीश कुमार उस बीजेपी के साथ सत्ता में आए जिसके लिए भरे सदन उन्होंने कहा था- 'मिट्टी में मिल जाऊंगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा.'

कभी नीतीश के साथ उप-मुख्यमंत्री रहे तेजस्वी ने उनकी इस राजनीतिक चाल की वजह से पलटूराम कहना शुरू कर दिया. नीतीश को कभी चाचा कहने वाले तेजस्वी अब उनके सामने मैदान में डटे हुए हैं.

राजनीति समीकरणों और संभावनाओं का खेल है. और इसी तथ्य को साबित करते हुए वो नीतीश कुमार, जो नरेंद्र मोदी की "सांप्रदायिक छवि" से कतराते रहे, उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए मंच से वोट मांगे और साल 2020 के विधानसभा में पीएम नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के लिए वोट मांगे.

इंजीनियर बाबू से सुशासन बाबू तक

पटना शहर से सटे बख्तियारपुर में 1 मार्च 1951 को नीतीश कुमार का जन्म हुआ. नीतीश कुमार ने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और इस दौरान वो इंजीनियर बाबू के नाम से भी जाने जाते थे.

नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले वाले नेता हैं जो बिहार की सत्ता में डेढ़ दशक तक केंद्र में रहे.

इंजीनियरिंग कॉलेज में ही उनके दोस्त और क्लासमेट रहे अरुण सिन्हा ने अपनी किताब 'नीतीश कुमारः द राइज़ ऑफ़ बिहार' में लिखा है कि कॉलेज के दिनों में नीतीश कुमार राज कपूर की फ़िल्मों के दीवाने थे, वो इस क़दर ये फ़िल्में देखते थे कि वे इस बारे में दोस्तों की हँसी-ठिठोली भी बर्दाश्त नहीं करते थे.

नीतीश कुमार को 150 रुपये की स्कॉलरशिप मिला करती थी जिससे वो हर महीने किताबें-मैगज़ीन खरीद लाते, ये वो चीज़ें होतीं जो उस वक़्त के अन्य बिहारी छात्रों के लिए सपने जैसी थीं लेकिन स्वतंत्रता सेनानी के बेटे नीतीश का झुकाव हमेशा राजनीति की ओर रहा.

लालू प्रसाद यादव और जार्ज फ़र्नांडिस की छाया में राजनीति की शुरुआत करने वाले नीतीश कुमार ने राजनीति में 46 साल का लंबा रास्ता तय कर लिया है. जब 1995 में समता पार्टी को महज सात सीटें मिली तो नीतीश कुमार ने ये समझ लिया कि राज्य में तीन पार्टियां अलग-अलग लड़ाई नहीं लड़ सकतीं. इस तरह 1996 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन किया.

इस वक़्त लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में नेतृत्व हुआ करता था. इस गठबंधन का नीतीश कुमार को फ़ायदा हुआ और साल 2000 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने, हालांकि ये पद उन्हें महज़ सात दिन के लिए ही मिला, लेकिन वे अपने-आपको लालू यादव के ख़िलाफ़ एक ठोस विकल्प बनाने में कामयाब रहे.

महादलितों की पॉलिटिक्स

2007 में नीतीश कुमार ने दलितों में भी सबसे ज़्यादा पिछड़ी जातियों के लिए 'महादलित' कैटेगरी बनाई. इनके लिए सरकारी योजनाएं लाई गईं. 2010 में घर, पढ़ाई के लिए लोन, स्कूली पोशाक देने की योजनाएं लाई गईं.

आज बिहार में सभी दलित जातियों को महादलित की कैटेगरी में डाला जा चुका है. साल 2018 में पासवानों को भी महादलित का दर्जा दे दिया गया.

यूं तो बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता रामविलास पासवान हुए लेकिन जानकार कहते हैं कि दलितों के लिए ठोस काम नीतीश कुमार ने किया है.

नीतीश ख़ुद 4 प्रतिशत आबादी वाली कुर्मी जाति से आते हैं, लेकिन सत्ता में रहते हुए उन्होंने हमेशा उस पार्टी के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़ा जिनके पास ठोस जाति-वर्ग का वोटर रहा हो.

चाहे वह बीजेपी के साथ लड़ा गया चुनाव हो, जहां बीजेपी समर्थक माने जाने वाले सवर्ण वोटरों का साथ उन्हें मिला या फिर 2015 में यादव-मुस्लिम आधार वाली आरजेडी के साथ चुनाव हो.

नीतीश कुमार ने जैसे ही मंच से अपने आखिरी चुनाव की बात की तो ये बहस छिड़ गई कि नीतीश माइनस जेडीयू क्या संभव है? अगर नीतीश नहीं तो जेडीयू का नया चेहरा कौन हो सकता है? इस सवाल के जवाब में एक भी नाम ख्याल में नहीं आता.

मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "नीतीश कुमार के बिना जेडीयू कुछ भी नहीं है. और अगर आज जेडीयू जिस भी हाल में हो, इसके ज़िम्मेदार नीतीश ही हैं. नीतीश ने कभी नहीं चाहा कि उनके रहते कोई और नेता पनपे. यहां तक कि नीतीश कुमार की कैबिनेट में एक भी मंत्री नहीं है जो बड़े फ़ैसले अपने मंत्रालय के लिए खुद ले सके."

विनम्र और सौम्य छवि वाले नीतीश कुमार राजनीति के मामले में उतने ही निर्मम हो सकते हैं जितने बाकी राजनेता. मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "उन्होंने शरद यादव और जॉर्ज फ़र्नांडीज़ के साथ क्या किया ये सबको पता है, ज़ॉर्ज के आखिरी दिन कैसे बीते ये किसी से छिपा नहीं है."

नीतीश कुमार की पार्टी के पास कोई भी संस्थागत ढांचा नहीं है, बिहार के सुदूर ज़िलों में जेडीयू के पास बूथ लेवल के कार्यकर्ता तक नहीं है, लेकिन ये नीतीश कुमार की राजनीतिक कुशलता ही रही कि वह राज्य में वोट बेस और कार्यकर्ताओं वाली पार्टियों को किनारे लगाकर 15 साल तक सत्ता का केंद्र बने रहे.

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