बिहार के गांवों में क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मरीज़

    • Author, सर्वप्रिया सांगवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

आशा देवी चेहरे पर गहरी ख़ामोशी लिए शाम के खाने की तैयारी कर रही हैं. 26 दिन पहले ही उनके पति की मौत गले के कैंसर से हुई है.

आशा देवी कहती हैं, "डॉक्टर ने बोला इसे कैंसर हो गया है, इसे ले जाइए पटना. लेकिन हम नहीं जा पाए. कैसे जाते, न कोई साधन था न पैसा. आख़िरी दिनों में बहुत तकलीफ़ में थे वो."

बिहार में सहरसा ज़िले के सहरवा गांव के एक महादलित टोले में आशा एक कच्चे मकान में रहती हैं. उनके तीन छोटे बच्चे स्कूल जाने लायक हैं लेकिन सबने पढ़ाई छोड़ दी है.

कागज़ के नाम पर आशा अपने अनाज के खाली ड्रम से निकालती हैं अपना और मृत पति का आधार कार्ड, एक एसबीआई बैंक का कार्ड जो शायद किसी सरकारी मदद के लिए बनाया गया है और पति का मृत्यु प्रमाणपत्र. इसके अलावा उनके पास कोई कार्ड या दस्तावेज़ नहीं था.

उनके पास कमाई का क्या ज़रिया है? ये पूछने पर बताती हैं कि वे दूसरों के खेतों में धान काटती हैं और बदले में उन्हें कुछ अनाज मिल जाता है जो उनकी और बच्चों की रोज़ी-रोटी है.

ऐसे परिवार के लिए ये वाकई मुश्किल था कि वो नियमित पटना जाकर इलाज करवा सकें.

यहां से थोड़ी दूर ही सत्तर गांव में भारती अपने पति की तस्वीर लेकर बैठी हैं. जिनकी मौत छह महीने पहले ही हुई है. उनकी पांच साल की बेटी आंगन में खेल रही है.

जब उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो वह कुछ बोल नहीं पाईं. उनके पति के बड़े भाई ने बताया कि भाई को लिवर कैंसर था.

बड़े भाई ने बताया, "हम लोग उसे दिल्ली ले जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ज़्यादा गंभीर हुआ तो पहले सहरसा के अस्पताल लेकर गए, फिर पटना मेडिकल कॉलेज लेकर गए. वहीं उसकी मौत हो गई."

उनके भाई बताते हैं कि यहां इलाक़े में कोरोना से ज़्यादा, कैंसर एक महामारी के रूप में फैल रहा है.

ये परिवार पढ़ा-लिखा था और आर्थिक तौर पर मध्यम वर्ग कहा जा सकता है.

थोड़ी दूर मेनवा गांव के मनोज कुमार की मां को 2004 में मुंह का कैंसर हुआ था जिसका उन्होंने बाक़ायदा इलाज करवाया. लेकिन अब फिर से उनका कैंसर लौट आया है.

मनोज थोड़े गुस्से में बोले, "मीडिया में जाने से भी कुछ होता नहीं है. सरकार को ध्यान देना चाहिए कि इस क्षेत्र में कैंसर इतना क्यों बढ़ रहा है. लेकिन सरकार तो चुनाव में व्यस्त है."

मनोज का परिवार गांव का एक संभ्रात परिवार है. उनकी मां के कैंसर के इलाज में अब तक ढाई लाख रुपये ख़र्च हो चुके हैं. इस ख़र्चे के अलावा उन्हें मुख्यमंत्री चिकित्सा कोष से भी 80 हज़ार रुपये मिले थे. हालांकि, ये सहायता ग़रीबी रेखा से नीचे वाले लोगों के लिए होती है.

वह कहते हैं, "मेरी मां परेशान है और बस प्रार्थना कर रही हैं कि वो इस दुनिया से चली जाएं. इतने दर्द में इंसान और क्या कहेगा"

ये तीनों परिवार एक ही इलाक़े के अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्ग से हैं. लेकिन, तीनों में ही परिजन कैंसर के शिकार हुए हैं.

फ़र्क बस इतना है कि जागरूकता और इलाज तक सबकी पहुंच नहीं है.

अचानक कैंसर के इतने ज़्यादा मामले क्यों

बिहार में सहरसा का सत्तर कटैया प्रखंड मानो कैंसर का केंद्र बन गया है. जब अचानक यहां कैंसर के कई मरीज़ निकलने लगे तो यहीं रहने वाले एक पत्रकार लाल बहादुर ने छानबीन शुरू की.

उन्होंने बताया, "मेरे पिता की मौत भी कैंसर से हुई. सत्तर गांव में 10 हज़ार लोग रहते हैं और मैंने खोजना शुरू किया तो देखा कि 50 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी थी. 35 के क़रीब कैंसर मरीज़ मुझे और मिले. ख़बर छपने लगी तो सिविल सर्जन ने अपनी टीम यहां भेजी. वो भी देखकर हैरान रह गए कि इतने छोटे से गांव में इतने कैंसर के मरीज़ कैसे. इसके बाद यहां इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस (आईजीआईएमएस) की टीम ने भी आकर देखा."

आईजीआईएमएस से कैंसर सर्जन डॉक्टर शशि के नेतृत्व में एक टीम फ़रवरी में सत्तर गांव आई थी.

उन्होंने यहां कैंप लगाकर कुछ लोगों के लक्षणों की जांच की थी.

डॉक्टर शशि ने बताया, "हम ये तो पता नहीं कर सके कि वहां इतना कैंसर किस वजह से फैल रहा है लेकिन हमें वहां बड़ी संख्या में मरीज़ मिले. मान लीजिए हमारे पास अगर 70-80 लोग आए तो उनमें से 15 कैंसर मरीज़ मिले और ये काफ़ी चिंताजनक बात है."

डॉक्टर शशि बताते हैं कि उन्होंने ये रिपोर्ट सरकार के प्रतिनिधि को सौंप दी थी. हालांकि, इसके बाद सरकार की ओर से आगे की कोई कार्रवाई नहीं हो सकी और मार्च में कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन लग गया.

पत्रकार लाल बहादुर बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान ही यहां 15 कैंसर मरीज़ों की मौत हो चुकी है.

चिकित्सा संसाधनों का अभाव

बिहार में पटना का महावीर कैंसर संस्थान ही एकमात्र सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान है. संस्थान का कहना है कि बिहार में हर साल कैंसर के 80 हज़ार से ज़्यादा नए मरीज़ जुड़ रहे हैं.

कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर मनीषा सिंह महावीर कैंसर संस्थान में एसोसिएट डायरेक्टर हैं.

वे बताती हैं कि कैंसर का ग्राफ तो बढ़ता ही जा रहा है और ये आगे भी बढ़ेगा.

वह कहती हैं, "भारत में जांच करवाने का कल्चर नहीं है. जब तक मरीज़ हमारे पास आता है तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है. मरीज़ अपने स्थानीय डॉक्टरों के पास साल भर घूम कर हमारे पास आता है. दूसरी बात ये कि कैंसर स्पेशलिस्ट ही पता लगा सकते हैं कि 10 दिन से ज़्यादा का बुख़ार शायद ब्लड कैंसर भी हो सकता है. हमने ये प्रस्ताव भी सरकार को दिया कि वे गांव-देहात में काम करने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों को हमारे साथ कुछ वक़्त ट्रेनिंग करवाए."

बिहार में कैंसर के लिए मरीज़ के पास सरकारी विकल्प पटना मेडिकल, नालंदा मेडिकल, एम्स और सरकारी मान्यता प्राप्त स्वायत्त अस्पताल आईजीआईएमएस ही है.

इसके अलावा वह महावीर संस्थान में जा सकते हैं जो कि एक ट्रस्ट से चलता है या फिर पारस जैसे किसी प्राइवेट अस्पताल में. ये सभी सरकारी या ग़ैर-सरकारी अस्पताल पटना ज़ोन में हैं.

सहरसा के पूर्व पार्षद प्रवीण आनंद लंबे वक़्त से इस मुद्दे को उठा रहे हैं.

उन्होंने बताया, "हम लोगों ने सहरसा में एम्स बनवाने के लिए प्रदर्शन किए, लाख कोशिशें की, ज़मीन तक तय करके दी लेकिन सरकार ने एम्स दरभंगा के लिए दे दिया. आज यहां की कैंसर की वजह से जो हालत है, तो सरकार यहां कम से कम एक कैंसर स्पेशियलटी अस्पताल ही बनवा दे."

डॉक्टर मनीषा कहती हैं कि बिहार में कैंसर स्पेशलिस्ट भी कम हैं. यहां के मेडिकल कॉलेज में ऑनकोलॉजी (कैंसर के बारे में पढ़ाई) विषय रख भी दें तो विषय को पढ़ाने के लिए भी फैकल्टी चाहिए. उसका भी अभाव है.

दूसरे इलाकों में भी बढ़ रहा है कैंसर

डॉक्टर मनीषा बताती हैं कि उनके संस्थान में भी एक रिसर्च हो रही है. इस रिसर्च में पाया गया है कि बिहार के गंगा बेल्ट के आस-पास के इलाक़े में पित्त की थैली का कैंसर बहुत ज़्यादा है. वहां मिट्टी और पानी की स्टडी की गई और देखा गया कि वहां आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज़्यादा थी जो कि कैंसर का एक कारक है.

2016 में इंडियन मेडिकल काउंसिल की एक रिसर्च से सामने आया था कि बिहार कैंसर से सबसे ज़्यादा पीड़ित राज्यों में से एक है जहां साढ़े तीन लाख से भी ज़्यादा कैंसर के मरीज़ मिले थे.

आयुष्मान भारत योजना का असर

आईजीआईएमएस के डॉक्टर शशि भी कहते हैं कि कैंसर के मरीज़ हर साल बढ़ ही रहे हैं.

वह बताते हैं, "मैं शाम के 5 बजे भी अपनी ओपीडी में बैठा हूं और अब भी 10 मरीज़ हैं. लॉकडाउन में सरकार ने मरीज़ों को देखने पर कैप लगा दिया था कि 40 से ज़्यादा मरीज़ न देखें. लेकिन, इतने मरीज़ आ रहे थे कि हमें वो कैप हटानी पड़ी. मैं अब भी 80 से ज़्यादा कैंसर के मरीज़ देखता हूं. कैंसर तो पहले भी था लेकिन अब उसका पता ज़्यादा लगने लगा है और आयुष्मान भारत योजना की वजह से भी लोग आ पा रहे हैं."

आयुष्मान भारत योजना में ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए पांच लाख रुपये तक का बीमा होता है. अगर मरीज़ किसी ऐसे संस्थान में जाएगा जिसका सरकार के साथ इस योजना के तहत टाइ-अप है तो वहां उसका पांच लाख रुपये तक इलाज हो सकता है. ये पैसा बाद में सरकार संस्थान को देती है.

डॉक्टर मनीषा भी बताती हैं कि उनके यहां भी कई मरीज़ आयुष्मान भारत योजना के तहत आ रहे हैं. लेकिन, कैंसर से निपटने के लिए सरकार को जांच की ओर ध्यान देना चाहिए.

वह कहती हैं, "जिन मरीज़ों के पास खाने के लिए पैसा नहीं है, उनसे कैसे कह दें कि आप वक़्त से जांच क्यों नहीं करवाते. अगर सरकार मेमोग्राफी फ़्री कर दे जिससे की स्तन कैंसर का पता लगाया जा सकता है तो शुरुआती स्टेज में कई महिलाओं का इलाज शुरू हो जाएगा. जब जांच फ़्री होगी या सस्ती होगी तो लोग अस्पतालों में आएंगे."

कैंसर सिर्फ़ बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या बन कर उभर रहा है. 2019 की नेशनल हेल्थ प्रोफ़ाइल रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में प्रति लाख व्यक्तियों पर 258 कैंसर मरीज़ हैं जबकि 2016 में एक लाख पर 106 कैंसर मरीज़ होते थे.

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2018 में भारत में 10 लाख से ज़्यादा नए कैंसर मरीज़ आए थे. विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर 10 में से एक भारतीय को अपनी ज़िंदगी में कैंसर होगा और हर 15 में से एक व्यक्ति की कैंसर से मौत होगी.

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