बिहार चुनाव: मॉर्टन टॉफ़ी, चीनी मिल समेत चार फ़ैक्ट्रियां बंद, मढ़ौरा की मिठास लौटने के आसार कम

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- Author, सीटू तिवारी,
- पदनाम, सारण बिहार से, बीबीसी हिंदी के लिए
सारण ज़िले के मढ़ौरा बाज़ार से तक़रीबन आधा किलोमीटर दूर सीधी सड़क पर आप जैसे ही बढ़ते हैं, एक पुरानी इमारत में मॉर्टन लिखा दिखता है. 90 के दशक तक पैदा हुए बच्चे इस नाम से बखूबी वाक़िफ़ है. ये नाम मुंह में दूध, चीनी और नारियल के महीन बुरादे वाली टॉफ़ी की याद दिला देता है.
मॉर्टन टॉफ़ी के बंद पड़े कैंपस में गार्ड का काम कर रहे कामाख्या सिंह याद करते हैं, "नारियल के बुरादे वाली कुकीज़ के अलावा लैक्टो और बॉन-बॉन की भी बहुत डिमांड थी. टॉफ़ी की परत ऐसी थी कि दूसरी तरफ़ भी झलकती थी. थोड़ी-सी पारदर्शी थी."
इस टॉफ़ी फ़ैक्ट्री में दस-ग्यारह साल की उम्र में दूध पहुंचाने वाले दीनानाथ राय कहते हैं, "दूध ले के जाते थे तो मुट्ठी भर कर टॉफ़ी मिलती थी. पूरे छपरा ज़िले में सीना तान कर चलते थे कि हम मढ़ौरा के है. अब तो फ़ैक्टरी के साथ-साथ सारा गुमान भी ख़त्म हो गया है. भैंस पालना भी बंद कर दिये हैं."

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रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण बिहार से लाखों लोग पलायन कर देश के अलग-अलग हिस्सों में रोज़ी कमाने जाते हैं. मढ़ौरा इसी कमी को पूरा करता था. लेकिन अब ये व्यवस्था की नाकामी और अदूरदर्शिता की मिसाल है.
चुनावों के बीच एक बार फिर नेता यहां बंद पड़ी चीनी मिल में जान फूंकने की हामी भर रहे हैं. ऐसा नहीं कि ये मिल खुलवाने वाले वादों से भरा ये पहला चुनाव है.
लेकिन सुनहरे दिनों को याद करते किसान-मज़दूर, अब भी चीनी मिल खुलने की आस लगाए बैठे हैं.
सुनहरे कल की यादें
सारण ज़िले का मढ़ौरा औद्योगिक क्षेत्र, राज्य में 90 के दशक के शुरुआती सालों तक आत्मनिर्भरता का एक मॉडल था. यहां चार फ़ैक्ट्रियां थी. अब सभी बंद हैं- मढ़ौरा चीनी मिल (राज्य की पहली चीनी मिल) और मिल से जुड़ी डिस्टीलरी, सारण इंजीनियरिंग वर्क्स और मॉर्टन फ़ैक्टरी.

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बिहार के गन्ना विभाग की वेबसाइट के मुताबिक 1904 में राज्य की पहली चीनी मिल मढ़ौरा में स्थापित की गई. बिहार में फ़िलहाल 28 चीनी मिल है जिनमें से महज 11 चालू है.
साल 2018 -19 में राज्य में 182.85 लाख मिट्रिक टन गन्ने का उत्पादन हुआ था, जबकि 84.02 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन हुआ था.
दरअसल गन्ने की खेती और उसके लिए माकूल मिट्टी ही मढ़ौरा के औद्योगिक क्षेत्र का आधार बनी थी. अब ज़्यादातर किसान इससे किनारा कर चुके हैं.

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गन्ना और भैंस पालना छोड़ दिया
मार्टन टॉफ़ी और चीनी मिल से कुछ ही दूरी पर डेवढ़ी गांव है. इस गांव में गन्ने की खेती होती थी और हर किसान के घर में भैंस पाली जाती थी.
सुरेश राय ऐसे ही एक किसान है. वे बताते हैं, "गन्ना जाता था शुगर फ़ैक्टरी को और दूध जाता था मॉर्टन को. हम लोगों ने पुश्तों से यहीं काम किया. लेकिन जब सब बंद हो गया तो भैंस पालना छोड़ दिया और गेंहू, धान लगाने लगे. चार लड़के हैं तो वो भी कोलकाता, ओडिशा जाकर मज़दूरी करते हैं. यहां कोई काम बचा ही नहीं है."
65 साल के जोगिन्दर राय कहते हैं, "बस इतना समझ लीजिए, एक सुंदर सपना टूट गया. गन्ने लगाते थे तो हरे चारे से माल-मवेशी पल जाते थे. शादी ब्याह, उत्सव इससे निपट जाता था. हमारे पिताजी बिन्दा राय चीनी मिल में मज़दूरी करते थे और हम खेती का काम संभालते थे."

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कामाख्या सिंह जो इस वक्त मॉर्टन फैक्ट्री में गार्ड हैं, वो बताते हैं, "हमारे यहां भैंस पली थी तो यहां दूध लाते थे और यहीं पर मैनेजमेंट के एक अधिकारी एस डी शुक्ला के पर्सनल गार्ड बन गए. 1996 में नौकरी करनी शुरू की तो 900 रुपये मिलते थे जो फ़ैक्टरी बंद होने यानी साल 2000 तक बढ़कर 1,500 रुपये हो गए थे. 300 आदमी यहां तीन शिफ़्ट में काम करते थे."
रसीद तक बिक जाती थी
मिल बंद होने से तक़रीबन बीस हज़ार गन्ना किसान सीधे सीधे प्रभावित हुए. इन किसानों ने सुनहरे दिन भी देखे हैं. चीनी मिल से मिली रसीद (मज़दूरों को गन्ना देने पर रसीद दी जाती थी, जिससे राशि का भुगतान बाद में होता था) का बाज़ार में बहुत महत्व था. नागेन्द्र राय बताते हैं, "तब तो सुनार तक हम लोगों के दरवाजे पर आ कर कहते थे कि हमसे सामान ख़रीद लो. आज यही लोग एक रुपया की उधार नहीं देते हैं."
रघुनाथ राय बताते हैं, "जिसको भी पैसे की ज़रूरत हुई, वो चीनी मिल से मिली रसीद को बेच देता था. मान लीजिए दस हज़ार की रसीद है, तो उसे नौ हज़ार में बेच दिया. इसलिए चीनी मिल के रहते, पैसे की कभी दिक्कत ही नहीं हुई."

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आज खंडहर में तब्दील हो चुके औद्योगिक क्षेत्र में चीनी मिल, डिस्टीलरी और इंजीनियरिंग वर्क्स के कर्मचारियों के लिए बने क्वार्टर में पुराने कर्मचारी रह रहे हैं. इनमें सात नेपाली परिवार भी हैं. 65 साल के भवानी बहादुर 1974 से सिक्युरिटी गार्ड थे. वो बहुत कम उम्र में नेपाल से बिहार आ गए और फिर छपरा की ही एक लड़की चन्द्रावती देवी से शादी कर ली.
वो बताते हैं, "1997 में जब चीनी मिल बंद हुई तो इसी आस में साल 2000 तक बिना वेतन के ड्यूटी करते रहे कि मिल दोबारा चालू हो जाएगी. प्रोविडेन्ट फंड का पैसा बैठकर खाते रहे, लेकिन जब मिल नहीं खुली तो बाहर चले गए मज़दूरी करने. अब शरीर साथ नहीं देता तो घर वापस लौट आए."
मिल/फ़ैक्टरी क्यों बंद हुई?
इस बात के जवाब टुकड़ों-टुकड़ों में ही हमारे पास आते हैं. मॉर्टन फ़ैक्टरी, के के बिड़ला समूह की थी, जिसे बाद में पांच स्थानीय लोगों को नीलाम कर दिया गया. मॉर्टन की फैक्ट्री का पूरा ढांचा कबाड़ी में बिक गया तो सिर्फ यादगार के तौर पर मॉर्टन का बोर्ड लगा दफ़्तर बचा है.

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इसकी देखभाल कर रहे गार्ड कामाख्या सिंह बताते हैं, "मुख्य समस्या मज़दूरी की थी. साल 2000 में जब मिल बंद हुई तो सबसे बड़े बाबू को पांच हज़ार मिलते थे और मज़दूर को महज पच्चीस सौ रुपये. इसी के चलते मैनेजमेंट और मज़दूरों में तनातनी थी. इस तनातनी मे फ़ैक्टरी बिकी और कर्मचारियों को वीआरएस दे दिया गया."
वहीं चीनी मिल के बंद होने की तीन मुख्य वजह राम बाबू सिंह बताते हैं, "पहला तो ये कि ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) की सारी मिलों को टेक्सटाइल मिनिस्ट्री ने ले लिया. टेक्सटाइल का चीनी से दूर दूर तक कोई नाता नहीं. जिसके चलते राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा. दूसरा ये कि प्रदूषण विभाग ने तकनीकी वजहों से डिस्टीलरी फ़ैक्ट्री बंद कर दी जिससे चीनी मिल को आमदनी देने वाली फ़ैक्ट्री बंद हो गई. तीसरा ये कि प्रतिस्पर्धा के दौर में मिल की गन्ना पेरने की कैपासिटी को समयानुसार बढ़ नहीं पाई."
2005 में मिल खोलने का हुआ था वादा
मढ़ौरा विधानसभा से मौजूदा विधायक राष्ट्रीय जनता दल के जितेन्द्र राय है. जीत की हैट्रिक लगाने की कोशिश कर रहे जितेन्द्र राय का मुक़ाबला जेडीयू के अल्ताफ़ राजू से है.
साल 2005 में नीतीश सरकार बनने के बाद चीनी मिल को खोलने की कोशिश सारण के वर्तमान सांसद राजीव प्रताप रूडी की तरफ़ से हुई थी.
रूडी एक कंपनी को लेकर आए थे जिसने 2007 तक मिल खोलने का भरोसा दिलाया था. इसी भरोसे की वजह से इलाक़े के किसानों ने गन्ने की खेती भी की. बाद में उन्हें गन्ने की फसल खेत में ही जलानी पड़ी या मामूली दाम में बेचनी पड़ी.
जितेन्द्र राय ने बीबीसी से कहा, "तेजस्वी जी ने जब 10 लाख रोज़गार का वादा किया है, तो हमारी सरकार आने पर चीनी मिल दोबारा खुलेगी. बाकी लालू जी ने मढ़ौरा में रेल इंजन कारखाना खुलवाया था लेकिन उसे सरकार ने असेंबलिंग यूनिट बनाकर रख दिया है और उसमें बाहर के लड़के ही नौकरी करते हैं. स्थानीय नौजवानों के लिए कुछ नहीं है."
साल 1951 के सारण गैज़ेटियर के मुताबिक यहां 2500 मज़दूर काम करते थे लेकिन मिल बंद होते होते इनकी संख्या तक़रीबन 1200 रह गई थी.
पूरे औद्योगिक क्षेत्र के लिए रेल पटरियां बिछाई गई थीं जिनके अवशेष आज भी मिलते हैं. हालांकि मिल की मशीनों को काट काट कर स्थानीय लोग कबाड़ में बेच रहे हैं. मिल की ऐतिहासिक इमारत जिसमें 52 कमरों का गेस्ट हाउस शामिल है, उसे तोड़कर स्थानीय लोग लगातार ईंटे चुरा रहे हैं.
औद्योगिक क्षेत्र में ही रहने वाले नौजवान राजकुमार सिंह कहते हैं, "ये मिल जिंदा रहती तो हम लोग बाहर क्यों जाते. मेरे पापा बताते हैं कि कभी मढ़ौरा के 80 फ़ीसदी लोगों को इससे रोज़गार मिलता था, अब तो बस खंडहर है."
मढ़ौरा चीनी मिल मजदूर यूनियन के अध्यक्ष राम बाबू सिंह बताते हैं, "अभी भी चीनी मिल के पास 650 एकड़ ज़मीन है, सरकार चाहे तो मिल फिर खुल जाएगी."
लेकिन पलायन से जूझते राज्य के सामने अहम सवाल यहीं है कि आखिर सरकार 'चाहती' क्यों नहीं?
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