बिहार चुनाव: पहले चरण में वोटिंग पर्सेंट क्या बदलाव का इशारा हैं?

इमेज स्रोत, TWITTER/CEOBihar
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार में पहले चरण की 71 सीटों पर मतदान का प्रतिशत कुछ अभूतपूर्व नहीं रहा. मगर इसे लोग अभूतपूर्व इसलिए भी मान रहे हैं क्योंकि इस बार के विधानसभा चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब कोरोना महामारी के फैलने का दूर-दूर तक कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है.
फिर भी जानकार कहते हैं कि अगर 54.26 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले, तो ये भी इस समय के हिसाब से बहुत बड़ी बात है.
पहले चरण में इन्हीं सीटों पर 54 प्रतिशत, या कुछ कम ज़्यादा, का मतदान हर बार होता रहा है. चाहे पिछले विधानसभा के चुनाव रहे हों या पिछले साल हुए लोकसभा के चुनाव हों.
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि पहले चरण में उन इलाकों में वोटिंग हुई है जहाँ पर राष्ट्रीय जनता दल का दबदबा माना जाता रहा है. इन इलाकों में तत्कालीन एनडीए को सिर्फ 14 सीटें मिली थीं.
मगर पूर्व सांसद अली अनवर कहते हैं कि अब हालात बदल चुके हैं क्योंकि इस बार भाजपा अकेली नहीं है और महागठबंधन में जनता दल (यूनाइटेड) भी नहीं है.
पहले चरण के आधार पर अटकलें लगाना जल्दबाज़ी
जब जदयू और राजद साथ थे तो इस इलाके से इन्हें 53 सीटों पर जीत मिली थी. इस बार राजनीतिक समीकरणों में काफ़ी उलटफेर देखने को मिला है. भोजपुर, बक्सर या मगध के इलाके में इस बार लाल झंडे का प्रभाव कई सीटों पर दिख रहा है. इस बार सभी वाम दल महागठबंधन का हिस्सा हैं.
वहीं, एनडीए में भी रोचक बदलाव देखने को मिले हैं जो इस बार के विधानसभा के चुनावों में उसके पक्ष में जाते दिख रहे हैं.
इस बार नीतीश कुमार, या यूं कहा जाए कि जदयू और भाजपा साथ हैं. ये बात ज़रूर है कि अभी नतीजों पर अटकलें लगाना जल्दबाज़ी ही होगी.
इन दोनों दलों के गठबंधन ने वर्ष 2010 के विधानसभा के चुनावों में चौंका देने वाले परिणाम दिए थे जिसमें पहले चरण की 71 में से 61 सीटें जदयू और भाजपा के गठबंधन को मिली थीं.
पटना स्थित एएन सिन्हा सोशल इंस्टिट्यूट के डीएम दिवाकर कहते हैं कि साल 2010 की तुलना आज के माहौल से नहीं की जा सकती है क्योंकि ज़मीनी स्तर पर काफ़ी चीज़ें बदली हैं.

इमेज स्रोत, TWITTER/CEOBihar
उनके अनुसार पहले चरण में भी जिस प्रकार लोग कोरोना वायरस के ख़तरे के बावजूद वोट डालने निकले उससे समझ में आता है कि लोग बदलाव चाहते हैं.
लेकिन दूसरे विश्लेषक मानते हैं कि इस पैमाने पर लोगों के वोट डालने का श्रेय चुनाव आयोग को भी जाता है जिस पर लोगों ने भरोसा किया.
दूसरे कारण के बारे में वो कहते हैं कि जब लोगों ने देखा कि नेता बढ़-चढ़ कर प्रचार कर रहे हैं तो वो भी आश्वस्त होकर वोट डालने निकले.
लेकिन पूर्व संसद अली अनवर कहते हैं कि सिर्फ़ सरकार के ख़िलाफ़ बदलाव के लिए वोट नहीं डाले जाते हैं.
स्थानीय विधायक के ख़िलाफ़ भी लोग बदलाव के लिए मतदान करते हैं.
राजनीति में रणनीति बहुत महत्वपूर्ण
लंबे अरसे तक बिहार में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर कहते हैं, "ये देखना आवश्यक होगा कि वोट डालने वाले लोग किस तबक़े के हैं, क्योंकि दिल्ली और महानगरों की तरह ही जो आर्थिक रूप से संपन्न लोग हैं, वो वोट डालने नहीं निकलते. बिहार में भी ऐसा ही है. अगर वोट डालने के लिए निकलने वाले ग़रीब और सामान्य वर्ग के लोग हैं तो वैसे लोगों का विचार स्पष्ट होता है. इसमें पार्टी के कैडरों को भे जोड़ लीजिए."
उनका कहना है कि सिर्फ़ पहले चरण के मतदान से पूरे चुनाव का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है.
मगर बावजूद इसके, वो कहते हैं, "इस चरण में कई ऐसे इलाके हैं, जहां ग़रीब तबक़े के लोगों के लिए राजनीति करने वाले दल पहले से ही काफ़ी मज़बूत हैं."

इमेज स्रोत, TWITTER/CEOBihar
पहले चरण में एनडीए का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे लोक जनशक्ति पार्टी यानी लोजपा ने भी पहले चरण के 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं.
लोजपा खुद को भारतीय जनता पार्टी के साथ तो बताती है मगर नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ है.
एएन सिन्हा सोशल इंस्टिट्यूट के डीएम दिवाकर कहते हैं कि राजनीति में रणनीति बहुत महत्वपूर्ण होती है. इसलिए भाजपा भी सीधे तौर पर लोजपा या चिराग़ पासवान के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं दे रही है.
वो कहते हैं, "सत्ता विरोधी लहर से निपटने का एक ये भी तरीक़ा होता है कि अपने में से ही किसी को अपने ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया जाए तो सत्ता विरोधी वोट भी अपने ही पास आ जाएं. ऐसा राजनीतिक दल और नेता करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















