मोदी ने कहा लॉकडाउन से कोरोना पर लगी लगाम, क्या सहमत हैं जानकार?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, अपूर्व कृष्ण
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कोरोना संकट पर सोमवार को दिए गए भाषण को सुनकर अगर किसी तीसरे देश का व्यक्ति भारत के बारे में राय बनाना चाहेगा तो उसे मोटे तौर पर ये बात समझ में आएगी - कि भारत ने संकट के दौरान बड़ा शानदार काम किया है, और आगे जाकर ना केवल अपने लोगों का बल्कि दुनिया का भी भला करने वाला है क्योंकि दुनिया की आधी आबादी से ज़्यादा के लोगों के लिए वैक्सीन भारत में ही बन रही है.

अब ये बात तो स्वाभाविक है कि किसी देश का मुखिया अगर किसी मंच से अपनी बात रख रहा है तो वो क्यों अपनी कमियों की बात करेगा? और यहाँ तो प्रधानमंत्री ऐसे मंच से बोल रहे थे जो अंतरराष्ट्रीय था, तो यहाँ सरकार ही नहीं देश की भी प्रतिष्ठा प्रधानमंत्री के कंधों पर थी.

प्रधानमंत्री बिल और मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन की अगुआई में आयोजित एक सम्मेलन में अपनी बात रख रहे थे जिसमें भारत सरकार के कई मंत्रालय व विभाग के अलावा कनाडा, अमरीका और ब्रिटेन के प्रतिनिधि भी हिस्सा ले रहे थे.

प्रधानमंत्री ने तीन दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन भाषण दिया और वहाँ दावा किया कि भारत में बीमारी को सरकार के प्रयासों की वजह से कम किया जा सका.

प्रधानमंत्री ने इसकी वजह गिनाते हुए कहा, "भारत उन देशों में था जिन्होंने सबसे पहले लॉकडाउन लगाया. भारत उन देशों में था जिन्होंने मास्क के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया. भारत ने मरीज़ जिनसे-जिनसे मिला उनका पता लगाने में प्रभावी काम किया. भारत उन पहले देशों में था जिन्होंने रैपिड एंटीजन टेस्ट की व्यवस्था की."

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उन्होंने साथ ही बताया कि महामारी से पहले उनकी सरकार ने देश में स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर करने के लिए कई क़दम उठाए थे जिनका लाभ हुआ.

प्रधानमंत्री ने कहा,"सैनिटेशन का उदाहरण लीजिए. सफ़ाई में सुधार हुआ, शौचालय की संख्या बढ़ी. इनसे किसको सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ? ग़रीबों और वंचितों को. और इससे बीमारी में कमी आई."

तो प्रधानमंत्री की कोरोना संकट को लेकर पेश की गई भारत की ये तस्वीर कितनी विश्वसनीय है?

लॉकडाउन से लगाम लगा?

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25 मार्च, 2020 को जब सारे भारत में पहली बार एक साथ लॉकडाउन लागू हुआ, उस दिन देश में कोरोना संक्रमित लोगों की कुल संख्या थी - 618. उस दिन 87 नए मामलों की पुष्टि हुई थी.

20 अक्तूबर, 2020 को भारत में कोरोना संक्रमित रोगियों की संख्या है - 75,97,063 यानी लगभग 76 लाख. इस दिन लगभग 47 हज़ार नए मामले दर्ज हुए.

स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इस बात में कोई शक नहीं कि लॉकडाउन से महामारी को रोकने में मदद मिली, मगर उस समय का वैसा इस्तेमाल नहीं हुआ जो हो सकता था. यानी वो समय जब सारा देश बंद था, तब सरकार जितनी तैयारियाँ कर सकती थीं वो नहीं हो पाई और उसी का परिणाम है कि आज की तारीख़ में भी हज़ारों की संख्या में लोगों को संक्रमण हो रहा है.

भारत सरकार के पूर्व स्वास्थ्य सचिव केशव देसिराजू बताते हैं कि शुरुआत में जब संख्या कम थी, उस समय सही तरीक़े से ट्रैकिंग और ट्रेसिंग किया जाना चाहिए था यानी जिन्हें भी संक्रमण हुआ उनके संपर्कों का पता लगाना चाहिए था, लेकिन ये नहीं हुआ.

ऐसे में जब तक लॉकडाउन सख़्ती से लागू था तब तक तो स्थिति नियंत्रित रही, मगर छह हफ़्ते बाद जैसे ही उसमें ढील दी जानी शुरू की गई, बीमारी फैल गई.

केशव देसिराजू कहते हैं,"इसलिए आज की तारीख़ में भी इतने मामले आ रहे हैं, और ऐसी स्थिति में ये कहना कि दुनिया में सभी देशों में से भारत ने बड़ा अच्छा संभाला, ये बिल्कुल बेवकूफ़ी है, अगर प्रधानमंत्री इस पर विश्वास करते हैं तो करें, मगर मुझे तो ऐसा नहीं लगता, बड़े शहरों में संख्या लगातार बढ़ रही है."

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गुजरात के गांधीनगर में स्थित इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के निदेशक प्रोफ़ेसर दिलीप मावलंकर भी मानते हैं कि लॉकडाउन का लाभ ज़रूर हुआ मगर और भी कुछ किया जाना चाहिए था.

प्रोफ़ेसर मावलंकर बताते हैं कि शुरुआत में लॉकडाउन से वायरस को फैलने से रोका जा सका और सरकारों को कोविड अस्पतालों को बनाने के लिए समय मिल गया और इसी वजह से लोग बीमार ज़रूर हुए, पर मौतें उतनी नहीं हुईं.

प्रोफ़ेसर मावलंकर ने कहा," भारत में रोज़ाना लगभग 24 हज़ार लोगों की मौत होती है, उसमें से बीमारी के चरम पर पहुँचने के दौरान भी 1000-1100 लोगों की मौत कोविड से हुई, यानी चार प्रतिशत लोगों की मौत कोविड से हुई. यानी ऐसी स्थिति नहीं आई कि 10 प्रतिशत या 25 प्रतिशत मौतें कोविड की वजह से हुई."

मगर वो साथ ही ये भी मानते हैं कि कुछ चीज़ों को और बेहतर संभाला जा सकता था, जैसे संक्रमण की टेस्टिंग और संक्रमित रोगी के इलाज की सुविधाओं को नियंत्रित करने से लोग परेशान हुए.

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उन्होंने कहा," टेस्टिंग को कंट्रोल करना सही नहीं था, लाइसेंस राज की तरह हो गया था कि हर शहर में कुछ ही पैथोलॉजिस्टों को लाइसेंस मिलेगा, और वो भी महीने भर की देरी से मिलता था, सभी पैथोलॉजी केंद्रों को इसकी अनुमति दे देनी चाहिए थी, ऐसे में जिनके पास पैसे थे वो कहीं भी जाकर टेस्ट करवा लेते. वैसे ही इलाज में भी सभी प्राइवेट अस्पतालों को इलाज करने दिया जाना चाहिए था, लोगों को सरकारी अस्पतालों में भेजा जाने लगा, जिससे लोग घबरा गए."

स्वास्थ्य पर सरकार का कितना ध्यान?

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में ये भी दावा किया कि भारत में बहुत अच्छे वैज्ञानिक और वैज्ञानिक संस्थान हैं और उनकी वजह से बीमारी को क़ाबू में रखने में मदद मिली.

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लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि देश का पब्लिक हेल्थ सिस्टम यानी सरकारी स्वास्थ्य तंत्र बहुत बुरी दशा में है और कोरोना संकट ने उसे और कमज़ोर कर दिया है.

दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ़ सोशल मेडिसीन एंड कम्युनिटी हेल्थ विभाग में प्रोफ़ेसर रमिला बिष्ट बताती हैं कि महामारी के दौरान सरकारी अस्पतालों में जो नियमित डॉक्टर या स्वास्थ्य कर्मचारी थे उन्हें ही कोरोना की रोकथाम में लगा दिया गया जिससे दूसरी दिक़्क़तें आने लगीं.

प्रोफ़ेसर रमिला बिष्ट कहती हैं,"वहाँ जो नियमित स्वास्थ्य कर्मी थे उनको ही कोविड केयर में लगा दिया गया, जिससे देखने में लगता है कि कोरोना की रोकथाम में बहुत सारे लोग लगे हुए हैं. मगर आवश्यक सेवाओं में लोगों को हटा देने से उनपर बहुत गंभीर असर पड़ता है.

"इस देश में टीबी से बहुत लोगों की जान जाती है, उसके इलाज पर बहुत गंभीर असर पड़ा है, इसी तरह से सरकार का गर्भवती महिलाओं, नई माताओं और बच्चों को लेकर जो महत्वपूर्ण कार्यक्रम था, उस पर गंभीर असर पड़ा है."

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जानकार बताते हैं कि महामारी के दौरान भी सरकार का ध्यान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर नहीं है और उनमें कोई निवेश नहीं हो रहा जिसका परिणाम है कि कोरोना के टेस्ट या इलाज के लिए सब शहरों के अस्पतालों पर निर्भर हैं.

पूर्व स्वास्थ्य सचिव केशव देसिराजू बताते हैं," तमिलनाडु में भी जहाँ हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक डॉक्टर है, वहाँ भी उतनी सुविधाएँ नहीं हैं जितनी होनी चाहिए, यूपी, राजस्थान, बिहार, झारखंड में तो बहुत ही बुरा हाल है."

प्रोफ़ेसर दिलीप मावलंकर भी बताते हैं कि सरकार का ध्यान अभी भी स्वास्थ्य क्षेत्र पर उतना नहीं है जितना होना चाहिए.

वो बताते हैं कि अभी भी सरकारी अस्पतालों में कई पद ख़ाली पड़े हुए हैं और उनकी जगह पर अस्थायी नियुक्तियाँ कर काम चलाया जा रहा है जिसकी वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर तो दबाव पड़ ही रहा है, आम जनता भी परेशान हो रही है.

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प्रोफ़ेसर मावलंकर ने कहा,"डॉक्टर-नर्स ही नहीं, हमारे पास पर्याप्त संख्या में महामारी रोग विशेषज्ञ या गणना करने वाले सांख्यिकीविद् भी नहीं हैं जिससे आँकड़े स्पष्ट रूप से नहीं आ पाते हैं."

वो कहते हैं कि यही वजह है कि कोरोना संक्रमण के बारे में जो रोज़ की संख्या आती है, उसमें ये संख्या नहीं दी जाती कि अगर एक लाख लोग संक्रमित हो रहे हैं तो उनमें कितने वेंटिलेटर पर गए, कितने अस्पताल में गए, और कितने लोग घरों में इलाज करवा रहे हैं, और अगर इतने लोगों की मौत हुई तो कितनों की मौत अस्पताल में हुई और कितनों की घर में.

उन्होंने कहा,"ज़्यादातर लोग घरों में ही ठीक हो जाते हैं, अगर इसकी संख्या भी बताई जाती तो शायद लोगों में इससे भी डर कम होता."

जानकार बताते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का दुरुस्त होना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कल को यदि वैक्सीन आ भी जाती है तो उसे पूरी आबादी तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती होगी.

केशव देसिराजू कहते हैं,"सरकार से कुछ भी पूछें तो उनका जवाब होता है, आयुष्मान भारत. पर वो हमारी समस्याओं का जवाब नहीं है, हमें एक ऐसा हेल्थ केयर सिस्टम चाहिए जो ढंग से काम कर रहा हो."

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