पत्रकारों के ख़िलाफ़ इतनी एफ़आईआर यूपी में क्यों

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए लखनऊ से
हाथरस में केरल के एक पत्रकार के ख़िलाफ़ लगे राजद्रोह के मामले और फिर उनकी गिरफ़्तारी के बाद यूपी में यह चर्चा एक बार फिर चल रही है कि योगी सरकार पत्रकारों से इतनी नाराज़ क्यों रहती है?
पिछले एक साल में कम से कम 15 पत्रकारों के ख़िलाफ़ ख़बर लिखने के मामलों में मुक़दमे दर्ज कराए गए हैं, जिनमें से आठ की एफ़आईआर कॉपी बीबीसी हिंदी के पास मौजूद है.
ऐसे में इन मुक़दमों की चर्चा फिर शुरू होने लगी हैं जो शासन-प्रशासन की आलोचना करने के जुर्म में पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज की गई थीं. इन मुक़दमों के बाद कई पत्रकारों की गिरफ़्तारियाँ भी हुई थीं, जिन्हें कुछ समय हिरासत में रहने के बाद ज़मानत भी मिल गई थी लेकिन उनके ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे जारी हैं.
बीते 16 अक्टूबर को जनसंदेश टाइम्स के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह और धनंजय सिंह के ख़िलाफ़ ऑफ़िसियल्स सीक्रेट ऐक्ट के तहत एफ़आईआर दर्ज हुई है. इन दोनों पर आरोप हैं कि उन्होंने गोपनीय दस्तावेज़ अवैध तरीक़े से प्राप्त किए और फिर उसके आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की.
कभी पत्रकार रह चुके और अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी कहते हैं कि "पत्रकारों को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए."
योगी आदित्यनाथ सरकार के राज्य में बीते एक साल में पत्रकारों पर चले कुछ मामले-
1.16 सितंबर, 2020- सीतापुर में रवींद्र सक्सेना- क्वारंटीन सेंटर पर बदइंतज़ामी की ख़बर
सरकारी काम में बाधा डालने, आपदा प्रबन्धन के अलावा एससी/एसटी ऐक्ट की धाराओं के तहत मुक़दमा
2.19 जून, 2020- वाराणसी में सुप्रिया शर्मा- पीएम के गोद लिए गांव डोमरी में भूखे रहने को विवश लोगों की ख़बर
एससी/एसटी एक्ट- 1989, किसी की मानहानि करने से जुड़ी आईपीसी की धारा 501 और किसी महामारी को फैलाने में बरती गई लापरवाही से जुड़ी आईपीसी की धारा 269 के तहत मामला
3.31 अगस्त, 2019- मिर्ज़ापुर में पंकज जायसवाल- सरकारी स्कूल में व्याप्त अनियमितता और मिड डे मील में बच्चों को नमक रोटी खिलाए जाने से संबंधित ख़बर
हंगामा होने के बाद पंकज जायसवाल का नाम एफ़आईआर से हटाया गया
4.दस सितंबर, 2019- आज़मगढ़ के एक स्कूल में छात्रों से झाड़ू लगाने की घटना को रिपोर्ट करने वाले छह पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर, पत्रकार संतोष जायसवाल
संतोष जायसवाल के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने और रंगदारी मांगने संबंधी आरोप
5.सात सितंबर, 2020- बिजनौर में दबंगों के डर से वाल्मीकि परिवार के पलायन करने संबंधी ख़बर के मामले में पांच पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर
पांच पत्रकारों आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर ख़ान तथा मोइन अहमद के ख़िलाफ आईपीसी की धारा 153A, 268 तथा 505 के तहत एफ़आईआर. मामले में त्रुटिपूर्ण विवेचना की बात कहते हुए संज्ञान लेने से कोर्ट का इनकार
6.तीन सितंबर, 2019- लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार असद रिज़वी को एक नोटिस, एसीएम की कोर्ट में हाज़िरी के लिए कहा गया, उन पर मुहर्रम के दौरान शांति भंग करने का आरोप, अगली सुनवाई छह नवंबर को
इसी साल दो अक्तूबर को लखनऊ में एक प्रदर्शन कवर करने के दौरान पीटा गया, असद ने एफ़आईआर दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन वो दर्ज नहीं हुई.

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एक न्यूज़ वेबसाइट की कार्यकारी संपादक के साथ क्या हुआ
इसी वर्ष जून के महीने में लॉकडाउन के दौरान एक न्यूज़ वेबसाइट की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा और वेबसाइट की मुख्य संपादक के ख़िलाफ़ वाराणसी पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर एफ़आईआर दर्ज की थी.
सुप्रिया शर्मा ने पीएम मोदी के गोद लिए गांव डोमरी में लॉकडाउन के दौरान लोगों की स्थिति का जायज़ा लेती हुई एक रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित की थी. इस दौरान उन्होंने कई लोगों का इंटरव्यू किया था जिनमें माला देवी नाम की एक महिला भी शामिल थीं.
वेबसाइट के मुताबिक, इंटरव्यू के दौरान माला देवी ने रिपोर्टर को बताया था कि वह लोगों के घरों में काम करती हैं और लॉकडाउन के दौरान उनकी आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब हो गई कि उन्हें खाने तक के लाले पड़ गए. रिपोर्ट के अनुसार महिला ने रिपोर्टर को यह भी बताया था कि उनके पास राशन कार्ड नहीं था, जिसकी वजह से उन्हें राशन भी नहीं मिल पा रहा था.
रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद में माला देवी ने कहा कि उन्होंने ये बातें रिपोर्टर को नहीं बताई थीं और रिपोर्टर ने उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाया है.
माला देवी की शिकायत पर वाराणसी में रामनगर थाने की पुलिस ने 13 जून को दिल्ली की पत्रकार सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई.
इस मामले में पुलिस ने सुप्रिया शर्मा के ख़िलाफ़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम- 1989, किसी की मानहानि करने से जुड़ी आईपीसी की धारा 501 और किसी महामारी को फैलाने में बरती गई लापरवाही से जुड़ी आईपीसी की धारा 269 के तहत मामला दर्ज़ किया है.
हालांकि एफ़आईआर के बावजूद सुप्रिया शर्मा अपनी रिपोर्ट पर कायम रहीं और उनका दावा है कि उन्होंने कोई भी बात तथ्यों से परे जाकर नहीं लिखी है. एफ़आईआर में वेबसाइट की संपादक को भी नामज़द किया गया था.
सुप्रिया शर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एफ़आईआर रद्द करने की अपील की लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी यह अपील ख़ारिज कर दी. यह ज़रूर है कि कोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी पर भी तब तक के लिए रोक लगा दी जब तक कि मामले की मुक़म्मल जांच न हो जाए.

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द वायर के संपादक के साथ क्या हुआ?
इससे कुछ समय पहले ही वरिष्ठ पत्रकार और अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ भी उत्तर प्रदेश के अयोध्या में दो एफ़आईआर दर्ज की गई थीं.
उन पर आरोप थे कि उन्होंने लॉकडाउन के बावजूद अयोध्या में होने वाले एक कार्यक्रम में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शामिल होने संबंधी बात छापकर अफ़वाह फ़ैलाई.
हालांकि 'द वायर' ने जवाब में कहा है कि इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री का जाना सार्वजनिक रिकॉर्ड और जानकारी का विषय है, इसलिए अफ़वाह फ़ैलाने जैसी बात यहां लागू ही नहीं होती.
राज्य सरकार की इस कार्रवाई का देश भर के बुद्धिजीवियों ने विरोध किया और इस बारे में एक बयान जारी किया जिसमें कई जाने-माने क़ानूनविद, शिक्षाविद, अभिनेता, कलाकार और लेखक शामिल थे. इन लोगों ने अपने बयान में कहा था कि यह प्रेस की आजादी पर सीधा हमला है. इस मामले में सिद्धार्थ वरदराजन को भी हाईकोर्ट से अग्रिम ज़मानत मिल गई थी.

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कई अन्य पत्रकारों पर भी एफ़आईआर
इससे पहले भी यूपी में कई स्थानीय पत्रकारों के ख़िलाफ़ सरकार विरोधी ख़बरें छापने के जुर्म में एफ़आईआर दर्ज हो चुकी हैं.
लॉकडाउन के दौरान ही यूपी के फ़तेहपुर ज़िले के पत्रकार अजय भदौरिया पर स्थानीय प्रशासन ने एफ़आईआर दर्ज कराई थी. अजय भदौरिया ने रिपोर्ट लिखी थी कि एक नेत्रहीन दंपत्ति को लॉकडाउन के दौरान कम्युनिटी किचन से खाना लेने में कितनी दिक्कतें हो रही हैं.
प्रशासन के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ ज़िले के पत्रकारों ने सत्याग्रह शुरू कर दिया था.
पिछले साल मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित धांधली की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार पर दर्ज हुई एफ़आईआर के बाद सरकार की काफ़ी किरकिरी हुई थी. इस घटना का दिलचस्प पहलू ज़िले के कलेक्टर का वह बयान था जिसमें उन्होंने कहा था कि 'प्रिंट मीडिया का पत्रकार वीडियो कैसे बना सकता है?' इस मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को हस्तक्षेप करना पड़ा था.

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क्या ख़बर लिखने के लिए पत्रकारों पर कार्रवाई होनी चाहिए?
31 अगस्त 2019 को मिर्ज़ापुर में पंकज जायसवाल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई. पंकज जायसवाल ने सरकारी स्कूल में व्याप्त अनियमितता और मिड डे मील में बच्चों को नमक रोटी खिलाए जाने से संबंधित ख़बर छापी थी. काफ़ी हंगामा होने के बाद पंकज जायसवाल का नाम एफ़आईआर से हटा दिया गया और उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई.
मिर्ज़ापुर में मिड डे मील में कथित धांधली की ख़बर दिखाने वाले पत्रकार के ख़िलाफ़ दर्ज मुक़दमे का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि उसी समय बिजनौर में कथित तौर पर फ़र्ज़ी ख़बर दिखाने का आरोप लगाकर पांच पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी गई. वहीं आज़मगढ़ में एक पत्रकार पर प्रशासन ने धन उगाही का आरोप लगाकर एफ़आईआर दर्ज कराई और फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
बिजनौर में जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था उन लोगों ने एक रिपोर्ट छापी थी कि एक गांव में वाल्मीकि परिवार के लोगों को सार्वजनिक नल से पानी भरने से रोका गया था. इस वजह से वाल्मीकि परिवारों ने पलायन का मन बना लिया है. प्रशासन का आरोप था कि पलायन की बात इन पत्रकारों ने कथित तौर पर गढ़ी थी.
बिजनौर के थाना मंडावर में पिछले साल सात सितंबर 2019 को उप निरीक्षक प्रमोद कुमार के प्रार्थना पत्र के आधार पर पांच पत्रकारों आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर ख़ान तथा मोइन अहमद के ख़िलाफ आईपीसी की धारा 153A, 268 तथा 505 के तहत रिपोर्ट दर्ज की गई थी. बाद में कोर्ट ने इस मामले में त्रुटिपूर्ण विवेचना की बात कहते हुए संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था.

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दस सितंबर 2019 को आज़मगढ़ के एक स्कूल में छात्रों से झाड़ू लगाने की घटना को रिपोर्ट करने वाले छह पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई जिसमें से एक पत्रकार संतोष जायसवाल को गिरफ़्तार कर लिया गया. संतोष जायसवाल के ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने और रंगदारी मांगने संबंधी आरोप लगाए गए थे.
स्थानीय स्तर पर ख़नन और अपराध जैसे गंभीर मामलों में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को कथित तौर पर माफ़िया के हमलों का शिकार तो अक्सर बनना ही पड़ता है लेकिन जब छोटी-मोटी बातों में प्रशासन की भी नज़रें टेढ़ी होने लगें तो ये मामला बेहद गंभीर हो जाता है और पत्रकारों के सामने सुरक्षा का सवाल भी खड़ा हो जाता है.
अहम सवाल यह भी है कि क्या ख़बर लिखने के आरोप में पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर और गिरफ़्तारी जैसी कार्रवाई होनी चाहिए, वो भी इसलिए कि इससे सरकार की छवि ख़राब हो रही है?
मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी कहते हैं, "प्रशासन या सरकार यदि एफ़आईआर करा रही है तो ज़रूर कोई गंभीर बात होगी और यदि पत्रकार अपनी जगह सही होगा तो अदालत में यह बात साबित हो जाएगी."

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"लोकतांत्रिक मूल्यों को नुक़सान"
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव कहते हैं, "पत्रकार का काम ऐसा है कि किसी न किसी पक्ष को पीड़ा पहुंचेगी ही लेकिन सरकार अपनी आलोचना न सुन सके, ये स्थिति बेहद गंभीर है. हो सकता है कि इसके पीछे सरकार का प्रचंड बहुमत का अहंकार हो लेकिन यह लोकतांत्रिक मूल्यों को कितना नुक़सान पहुंचा रहा है, इसका अंदाज़ा शायद सरकार में बैठे लोगों को नहीं है. प्रशासनिक स्तर पर ऐसी कार्रवाइयों का सिर्फ़ एक मक़सद है- पत्रकारों को डराना."
दिल्ली स्थित 'राइट एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप' ने हाल के दिनों में ऐसे 55 पत्रकारों को परेशान किए जाने के उदाहरण इकट्ठे किए हैं जिन्हें सरकारी नीतियों की आलोचना या फिर ज़मीनी हक़ीक़त दिखाने की वजह से मुक़दमों का सामना करना पड़ा है और गंभीर धाराओं में उन पर केस दर्ज हुए हैं. इनमें सबसे ज़्यादा 11 मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैं जबकि जम्मू-कश्मीर में 6 और हिमाचल में 5 ऐसे मामले हैं.
ख़बर पर आपत्ति है तो शिकायत कहां करें?
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "पत्रकार ने ख़बर लिखी और किसी को आपत्ति है तो उसके लिए कई फ़ोरम बने हैं. आप संपादक से शिकायत कर सकते हैं, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया में जा सकते हैं, यहां तक कि कोर्ट में भी जा सकते हैं लेकिन आप उसके साथ अपराधी की तरह पेश आएंगे, एफ़आईआर कर देंगे और फिर गिरफ़्तार कर लेंगे, ऐसा नहीं होना चाहिए. इससे साफ़ पता चलता है कि आलोचना सुनने की सहनशक्ति आप में नहीं है और आप प्रतिशोध की भावना से काम कर रहे हैं."
मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार इन आरोपों को ग़लत बताते हैं, वे कहते हैं, "जानबूझकर और बिना किसी कारण के तो किसी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर नहीं की जाती है."
क्वारंटीन सेंटर पर स्टोरी की तो दर्ज की गई एफ़आईआर

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लॉकडाउन के दौरान क्वारंटीन सेंटरों में हो रही अनियमितताओं की वजह से भी कई पत्रकारों को सरकारी अफ़सरों के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा. सीतापुर में ऐसे ही एक मामले में रवींद्र सक्सेना नाम के एक पत्रकार के ख़िलाफ़ स्थानीय प्रशासन ने एफ़आईआर दर्ज कराई.
16 मई 2020 को सीतापुर में पत्रकार रवींद्र सक्सेना पर एफ़आईआर दर्ज कराई गई. रवींद्र सक्सेना ने क्वैरेंटीन सेंटर की बदइंतज़ामी की ख़बर प्रकाशित की थी. उनके ख़िलाफ़ सरकारी काम में बाधा डालने, आपदा प्रबन्धन के अलावा हरिजन ऐक्ट की धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज कराया गया था.
पिछले साल राजधानी लखनऊ में असद रिज़वी के ख़िलाफ़ भी प्रशासन ने न सिर्फ़ एफ़आईआर दर्ज कराई थी बल्कि स्थानीय पुलिस ने कथित तौर पर उन्हें ऐसी ख़बरें न लिखने के लिए धमकाया भी था. असद रिज़वी के ख़िलाफ़ पिछले साल तीन सितंबर को एक नोटिस भेजा गया और उन्हें एसीएम की कोर्ट में हाज़िर होने को कहा गया.
बीबीसी से बातचीत में असद रिज़वी कहते हैं कि स्थानीय थाने के लोग ख़ुद घर पर आए थे कुछ बातचीत करने और दो दिन बाद मेरे घर पर नोटिस आ गया. असद बताते हैं, "नोटिस धारा 107 और 116 को तामील कराने के संबंध में थी. मुझसे 18 अक्तूबर को कोर्ट में आकर पचास हज़ार का मुचलका भरने और पचास-पचास हज़ार के दो गारंटर लाने को कहा गया था. मैंने उस नोटिस का जवाब अपने वकील की सलाह पर कोर्ट के माध्यम से भिजवाया."
असद रिज़वी को इसी साल दो अक्तूबर को लखनऊ में एक प्रदर्शन को कवर करते समय कुछ हज़रतगंज चौराहे पर बुरी तरह पीटा था. असद अली ने इसके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए आवेदन पत्र भी दिया है लेकिन अभी तक एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है.
लखनऊ में कई पत्रकार संगठनों ने इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से भी की थी और पत्रकारों को धमकाने जैसे मामलों को बेहद गंभीर बताते हुए इसे रोकने की मांग की थी.

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प्रशांत कनौजिया के मामले में क्या हुआ था?
एक साल पहले यूपी के मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर कथित तौर पर अशोभनीय टिप्पणी के मामले में पत्रकार प्रशांत कनौजिया के ख़िलाफ़ लखनऊ के हज़रतगंज कोतवाली में एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी और बाद में उनको गिरफ़्तार किया गया था.
पुलिस का आरोप था कि प्रशांत ने मुख्यमंत्री पर आपत्तिज़नक टिप्पणी करते हुए उनकी छवि ख़राब करने की कोशिश की थी.
बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशांत कनौजिया को रिहा किया गया. सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ़ प्रशांत कनौजिया की गिरफ़्तारी पर सवाल उठाते हुए काफ़ी सख़्त टिप्पणी की थी बल्कि 11 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने संबंधी मजिस्ट्रेट के फ़ैसले की भी आलोचना की थी.प्रशांत कनौजिया पर पिछले 18 अगस्त को एक ट्वीट की वजह से लखनऊ के ही हज़रतगंज कोतवाली में फिर से एफ़आईआर दर्ज हुई और उन्हें दोबारा गिरफ़्तार कर लिया गया. प्रशांत कनौजिया के परिजनों ने उनकी रिहाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है लेकिन अभी तक उन्हें ज़मानत नहीं मिल पाई है.
प्रशांत ने इस ट्वीट में हिंदू आर्मी के किन्हीं सुशील तिवारी का ज़िक्र करते हुए अपने ट्वीट में लिखा था कि 'यह तिवारी का निर्देश है कि अयोध्या के राम मंदिर में शूद्र, ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति का प्रवेश निषेध होना चाहिए और सभी लोग इसके लिए आवाज उठाएं.'
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