हाथरस मामला: कांग्रेस की सक्रियता के बीच कहां हैं सपा और बसपा

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाथरस में दलित युवती के साथ गैंगरपे के मामले को लेकर पूरे देश में हंगामा है. कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च निकाले जा रहे हैं.
इन विरोध प्रदर्शनों के बीच राजनेताओं में जो दो नाम सबसे ज़्यादा सामने आ रहे हैं, वो हैं कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी बहन और यूपी कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी.
अक्सर कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर अहम मुद्दों के समय देश में मौजूद ना होने या उन्हें मजबूती से ना उठाने के आरोप लगते रहे हैं.
लेकिन, इस मामले के सामने आते ही गुरुवार को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का काफ़िला मृतक युवती के परिवार से मिलने हाथरस की ओर निकल पड़ा, जहां ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर उन्हें यूपी पुलिस ने रोक लिया.
पुलिस का कहना था कि पीड़िता के गांव में धारा 144 लागू है. तब राहुल गांधी ने अकेले पैदल ही हाथरस जाने की कोशिश की. लेकिन, पुलिस के रोकने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पुलिस में झड़प हो गई.
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जंतर-मंतर पर विरोध
राहुल गांधी भी झड़प में गिर पड़े और 200 कांग्रेस कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कई धाराओं और महामारी क़ानून के तहत एफआईआर दर्ज की गई.
तब से लेकर अब तक कांग्रेस लगातार इस मुद्दे को उठा रही है. प्रियंका गांधी दिल्ली में मृतक के लिए प्रार्थना करने वाल्मीकि मंदिर गईं और जंतर-मंतर पर विरोध किया.
अब राहुल गांधी फिर से हाथरस जाने वाले हैं. अब राहुल और प्रियंका गांधी को पांच लोगों समेत पीड़िता से परिवार से मिलने की इजाजत भी मिल गई है.
पीड़िता के लिए न्याय और क़ानून व्यवस्था में सुधार की मांग करते राजनीतिक दलों के बीच कांग्रेस का नाम सबसे आगे दिख रहा है.
जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इस मामले में उतनी सक्रिय नहीं रही हैं.

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कहां हैं सपा और बसपा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव इस समय विदेश गए हुए हैं. वो लगातार ट्वीट्स कर रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी को इस मामले में सामने आते-आते थोड़ा समय लग गया है.
इस दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन किए. उन्होंने लखनऊ और कानपुर में धरना दिया और मार्च निकाला.
वहीं, बसपा इस पूरे मामले में नदारद नज़र आ रही है. बसपा प्रमुख दलितों की नेता मानी जाती हैं. उनका प्रमुख वोट बैंक भी दलित ही रहा है लेकिन फिर भी वो कांग्रेस और सपा दोनों से पीछे दिख रही हैं. उन्होंने भी कुछ ट्वीट्स किए हैं और बसपा कार्यकर्ताओं ने रानी तालाब इलाक़े में नारेबाजी की है.
लेकिन, मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी खुलकर सामने आए हैं, उस तरह सपा-बसपा नज़र नहीं आई हैं.
इससे पहले भी प्रवासी मज़दूरों के लिए बसें ले जाने से लेकर सोनभद्र में दलित परिवार के 11 लोगों की हत्या के मामले में प्रियंका गांधी बढ़ चढ़कर सामने आई थीं.
ऐसे में चर्चा होने लगी है कि उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियां कहां हैं और क्या कांग्रेस अपनी पुरानी भूलों को सुधारते हुए यूपी में आधार बढ़ा रही है.
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कांग्रेस ने समय पर लिया फैसला
कांग्रेस की इस सक्रियता को लेकर राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि इस मामले में कांग्रेस ने मुद्दे की गंभीरता और उसे लेकर जनभावना को समय पर समझ लिया. उसने पहले की तरह देर नहीं की. सरकार के गलत कदमों पर सवाल उठाने का काम विपक्ष का है और कांग्रेस ने इस मामले में ये भूमिका बखूबी निभाई है.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "कांग्रेस पर लोगों के बीच ना जाने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन, इस बार राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इस सोच को उलट दिया. अब सवाल ये है कि क्या हाथरस प्रियंका के लिए बेलची आंदोलन बन सकता है जब दलितों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा के बाद पूर्व प्रधानमंत्री जलभराव के बावजूद हाथी पर बैठकर बेलची गांव पहुंची थी. जिसे आज भी याद किया जाता है. कांग्रेस के लिए ये एक शुरुआत हुई है और अब प्रियंका गांधी की क्षमता पर है कि वो इसे कितना आगे ले जा पाती हैं."
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्रा इसमें प्रियंका गांधी की भूमिका को अहम मानते हैं. वह कहते हैं कि जब से प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की कमान दी गई है तब से वहां कांग्रेस की सक्रियता बहुत बढ़ गई है. प्रवासी मज़दूरों के मामले में भी कांग्रेस ने बसें भिजवाई थीं. वो पहले पदयात्रा भी कर चुकी हैं. ये तो नहीं कह सकते कि यूपी में कांग्रेस का आधार इससे तुरंत मजबूत हो जाएगा लेकिन कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन ज़रूर मिलेगा.
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सपा और बसपा की भूमिका
बसपा प्रमुख मायावती ने हाथरस मामले में लगातार कई ट्वीट करके सीबीआई जांच की मांग की है. उन्होंने यूपी सरकार और पुलिस के रवैये की निंदा की है.
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लेकिन, समाजवादी पार्टी इस मामले में बसपा से ज़्यादा सक्रीय दिख रही है. सपा कार्यकर्ताओं ने लखनऊ और कानपुर में विरोध प्रदर्शन किया. लखनऊ में पुलिस ने लाठी चार्ज भी किया. इससे पहले सपा की महिला कार्यकर्ताओं ने कैंडल मार्च भी निकाला था.
अखिलेश यादव ने इस मामले में कई ट्वीट्स किए. उन्होंने लिखा, “हाथरस कांड में जिस तरह भाजपा सरकार ने अपने कुछ लोगों को बचाने के लिए मेडिकल करवाने में देरी की व एफ़आईआर भी टाली, उससे देशभर के बहन-बेटी वाले परिवार आक्रोशित हैं. सरकार अपने प्रवक्ताओं व व्हाट्सऐप मेसेजों से अपना बचाव करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज से इसकी जाँच करवाएं.”
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विपक्षी दलों की इस भूमिका को लेकर सुभाष मिश्रा का कहना है, "जहां तक मायावती की बात है तो आप उनका पुरान रिकॉर्ड देखें, खासतौर से 2019 के बाद से वो बड़े मुद्दों पर एनडीए और बीजेपी की तरफ दिखाई देती हैं. चाहे धारा 370 हो, एनआरसी हो या सीएए, किसी भी मसले पर मायावती या तो चुप रही हैं या बीजेपी का समर्थन किया है. मायावती की प्रतिक्रिया के पीछे दूरगामी उद्देश्य हो सकते हैं. वह विरोध करते हुए भी सिर्फ़ सुझाव देती हैं, एक विपक्ष की तरह हमला नहीं बोलतीं."
"वहीं समाजवादी पार्टी की बात करें तो उसने भी धरना दिया है लेकिन वो सिर्फ़ यूपी में है तो बहुत ज्यादा हाइलाइट नहीं हुआ है. गांधी परिवार के सामने मीडिया शायद ही किसी और को दिखाना चाहेगा. हालांकि, ये भी सही है कि सपा ने इस मामले में सामने आने में कांग्रेस से थोड़ी देर कर दी है. अखिलेश यादव का यहां ना होना भी एक बड़ी वजह हो सकता है."
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जातिगत समीकरणों का प्रभाव
हाथरस मामले में जहां क़ानून व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठा है वहीं ये दलित बनाम स्वर्ण का मसला भी बना गया है. ऐसे में जानकारों का मानना है कि राजनीतिक पार्टियां का अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर चलना स्वाभाविक है.
सुभाष मिश्रा कहते हैं कि इसका सबसे ज्यादा नुक़सान बसपा और बीजेपी को हो सकता है. मायावती का दलित का मुद्दा ना उठाना उनकी छवि को नुक़सान पहुंचाता है. वहीं, वाल्मिकी बीजेपी का वोट बैंक रहा है तो इस मामले से बीजेपी के लिए भी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए यूपी सरकार की परेशानियां बढ़ गई हैं. सपा को पूरी तरह से दलितों का वोट नहीं मिलता है. इसलिए इसका बहुत ज्यादा नुक़सान या फायदा नहीं होगा लेकिन अगर वो इन मामलों में कांग्रेस से पीछे रह गई तो वो कांग्रेस को ज़मीन तैयार करने का मौका ज़रूर दे देगी.
कांग्रेस भी इस मामले में दलित उत्पीड़न से ज़्यादा महिलाओं की सुरक्षा और यूपी की क़ानून व्यवस्था पर ज्यादा जोर दे रही है. जिस तरह मायावती के ट्वीट्स में खुलकर दलितों का ज़िक्र है उस तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के ट्वीट्स दलितों की बात नहीं करते. सुभाष मिश्र कहते हैं कि एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस को सभी का वोट चाहिए. चाहे दलित हो, ठाकुर या ब्राह्मण, अगर वो एक ही वर्ग पर फोकस करेंगे तो उनका बड़ा नुक़सान हो सकता है.
लेकिन, इस सबसे परे कांग्रेस के बढ़ते कद को क्षेत्रीय पार्टियां नज़रअंदाज नहीं कर सकतीं. ये तीसरा मौका है जब कांग्रेस यूपी में क्षेत्रीय दलों से आगे बढ़कर मुद्दों को उठा रही है जिसे लेकर अन्य दलों की चिंताएं बढ़ना लाज़मी है.
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