भोजपुरी म्यूज़िक और फ़िल्म इंडस्ट्री के अश्लील फूहड़ रूप को चुनौती

रिया चक्रवर्ती

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    • Author, चिंकी सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बोकारो स्टील सिटी की एक फ़ैक्ट्री के गेट पर वर्कर हड़ताल कर रहे थे, तभी वहां खड़ी एक छोटी बच्ची ने अपनी मां के शब्दों को याद किया. उसने अपनी आंखें बंद कीं और तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों के सामने गाना शुरू कर दिया.

वहां मौजूद हज़ारों लोग जिस कंपनी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे, वहां उस बच्ची के पिता भी काम करते थे.

ये भोजपुरी गायिका चंदन तिवारी की पहली स्टेज परफॉर्मेंस थी और उन्होंने बिहार के बिरहा गीतों के जाने-माने लोक गायक महेंद्र मिश्रा (या मिसिर) का भोजपुरी गाना गया था.

चंदन तिवारी ने अक्सर अपनी मां को ये गाना गाते सुना था. वो कहती हैं, "गाने के बोल हैं कि श्रमिकों के आंसू व्यर्थ नहीं जाएंगे. न्याय होगा."

वो मुश्किल से दस साल की थीं और एक फ़ैक्ट्री वर्कर की बेटी थीं जो नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी इतने सारे लोगों के सामने गाए. लेकिन जब लोगों ने छोटी चंदन की तारीफ़ की तो उनके पिता ने भी उनके गायन जारी रखने पर आपत्ति नहीं जताई.

चंदन तिवारी अब एक लोकप्रिय भोजपुरी गायिका हैं, जो पिछले दो दशकों से फूहड़ और अश्लील वीडियो के लिए पहचाने जाने वाले भोजपुरी संगीत की गरिमा को वापस लाने की कोशिश कर रही हैं.

हाल में सोशल मीडिया पर एक गाना वायरल हुआ जिसमें रिया चक्रवर्ती को वेश्या कहा गया. इस गाने ने एक बार फिर भोजपुरी संगीत और सिनेमा उद्योग में मौजूद स्त्री - द्वेष और सेक्सिज़्म की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया.

गाने का पोस्टर

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लेकिन चंदन तिवारी ने जो सोचा है वो आसान नहीं है, क्योंकि ज़्यादातर लोग अब भोजपुरी संगीत को फूहड़पन और अश्लीलता से जोड़कर देखते हैं, जिसे इंडस्ट्री के ही कई लोगों ने प्रमोट किया है. इनमें डायमंड स्टार उर्फ़ गुड्डू रंगीला भी शामिल हैं जिन्होंने दो हज़ार से ज़्यादा गाने गाए हैं जिनमें महिलाओं से लेकर एनआरसी और यहां तक कि कोरोना वायरस तक को सेक्शुलाइज़ किया गया है.

'ख़ुद ऐसे गीत गाने से मना किया'

वो ख़ुद फूहड़ गाना गाने से लगातार मना करती रही हैं. ऐसे गाने इंडस्ट्री की पहचान बन गए हैं.

ऑटो-ट्यून टेक्नोलॉजी के ज़रिए कई लोग ऐसे गाने रिकॉर्ड कर पा रहे हैं जिन्हें यू-ट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर "हिट्स" मिलते हैं.

भोजपुरी बोले जाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार में संगीत उद्योग के तथाकथित लोकतांत्रिकरण की आड़ में ऐसे गाने परोसे जा रहे हैं जो बहुत ज़्यादा सेक्शुअल और अति राष्ट्रवादी हैं. इनमें महिलाओं के तन को किसी चीज़ की उपमा देने या किसी चीज़ की ओर इशारा करने और हिंदुत्व विचारधारा की बात करने के लिए पिरोया जाता है.

2019 में भोजपुरी गायक वरुण उपाध्याय उर्फ ​​वरुण बहार को एक गाना गाने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया था. उस गाने के बोल थे - "जो ना बोले जय श्री राम, उसको भेजो कब्रिस्तान."

गाने का पोस्टर

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इस गाने की ये कहते हुए आलोचना की गई थी कि ये अल्पसंख्यक समुदाय की मॉब लिंचिंग को प्रोत्साहित करता है. बहार को गाने के प्रोड्यूसर्स के साथ गिरफ्तार किया गया था और बहार ने बजरंग दल और हिंदू युवा वाहिनी जैसे दक्षिण-पंथी समूहों से मदद की अपील की थी.

इस तरह के आपत्तिजनक गानों के लिए किसी तरह की सेंसरशिप भी नहीं है और हेट स्पीच से निपटने के लिए मौजूद आईपीसी की धारा 153A जैसे क़ानूनों के बावजूद गायक धार्मिक हिंसा भड़काने वाले गाने गाना जारी रखे हुए हैं.

भोजपुरी इंडस्ट्री के सल्लू खेसारी-2 ने एक गाना बनाया जिसमें उन्होंने कश्मीरी लड़कियों से शादी करने और अनुच्छेद 370 ख़त्म होने के बाद कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने की बात की.

अन्य भोजपुरी गायकों ने भी कश्मीरी लड़कियों से शादी वाले और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने का जश्न मनाने वाले गाने रिलीज़ किए.

टीम रंजन के संस्थापक रंजन सिन्हा कहते हैं कि पूरे राज्य में 500 से ज़्यादा रिकॉर्डिंग स्टूडियो हैं. टीम रंजन एक के बाद एक हिट देने वाले सुपरस्टार खेसारी लाल यादव और पवन सिंह जैसे कलाकारों का प्रतिनिधित्व करती है.

खेसारी लाल, सपना चौधरी और मनोज तिवारी

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इन कलाकारों ने गुड्डू रंगीला की तरह ही गायक के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी और फिर सिल्वर स्क्रीन की तरफ़ रुख़ कर लिया.

भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री का टर्न ओवर सालाना 500 करोड़ रुपये से ज़्यादा है और भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री का टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये है.

यहां हर साल क़रीब 300-400 फ़िल्में बनती हैं. रंजन सिन्हा कहते हैं, "हमारे पास बहुत सारे दर्शक हैं लेकिन हमारे ग्राहक रिक्शावाले और प्रवासी मज़दूर हैं जो बी ग्रेड हिंदी फ़िल्मों के दर्शक हुआ करते थे. हमारे लोग उनकी भाषा को पसंद नहीं करते."

रंजन के मुताबिक़, भोजपुरी फ़िल्म और म्यूज़िक इंडस्ट्री के क़रीब 26 करोड़ दर्शक हैं और फ़िल्म और एल्बम नेपाल, पंजाब, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में भी रिलीज़ होती हैं.

इनके दर्शक ज़्यादातर वो प्रवासी मज़दूर होते हैं जिन्हें घर की याद हमेशा सताती है और इन फ़िल्मों में हमेशा एक हीरो होता है जो समाज के निचले तबके से आता है, इसलिए ये फ़िल्में उन्हें हमेशा पसंद आती हैं.

जब मनोज तिवारी की फ़िल्म ससुरा बड़ा पैसेवाला आई, तो उसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इस तरह की फ़िल्मों की झड़ी लग गई. इन फ़िल्मों में उन लोगों ने पैसा लगाया जो खूब पैसा कमाना चाहते थे.

हालांकि 2012 के बाद से चीज़ें धीरे-धीरे बदल रही हैं.

क्या बदल रहा है

यशी फ़िल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के कंटेंट हेड कुमार सौरभ सिन्हा कहते हैं, उनकी कंपनी भोजपुरी वर्ल्ड में यशराज फ़िल्म की तरह है और अब वो "अच्छा कंटेंट" बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सके.

कुमार सौरभ सिन्हा

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मिसाल के लिए 2015 के बाद की खेसारी लाल यादव की फ़िल्में कम अश्लील होती हैं. ये भी एक विडंबना है कि ज़्यादातर एल्बम और फ़िल्में मुंबई के स्टूडियो में शूट की जाती हैं और बिहार में कोई फ़िल्म स्टूडियो नहीं है.

अश्लील गानों के बारे में रंजन कहते हैं कि इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन और यूट्यूब के आ जाने की वजह से अब हर कोई गाने अपलोड कर सकता है और इस पर कोई सेंसरशिप भी नहीं है.

वो कहते हैं कि इन गानों को पूरी इंडस्ट्री की तस्वीर नहीं माना जा सकता, जो अब दूसरे दर्शकों को भी लुभाने की कोशिश कर रही है.

खेसारी लाल यादव

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इमेज कैप्शन, खेसारी लाल यादव भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री के जाने-माने अभिनेता हैं

सौरभ कहते हैं कि नेटफ्लिक्स और दूसरे ओटीटी प्लेटफॉर्म भोजपुरी कंटेंट को लेने के बहुत ज़्यादा इच्छुक नहीं है, इसलिए इस साल के अंत तक वो भोजपुरी कंटेंट के लिए अपना ख़ुद का ओटीटी प्लेटफॉर्म लॉन्च करने जा रहे हैं.

सौरभ कहते हैं, "भोजपुरी फ़िल्म और म्यूज़िक इंडस्ट्री में काफ़ी मुनाफा है. पंजाब के बाद ये दूसरे नंबर पर आती है."

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से फ़िल्म की डिग्री हासिल करने और फिर अपने अंकल की कंपनी के साथ काम शुरू करने वाले सौरभ कहते हैं कि भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री शुरुआत में दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के पदचिह्नों पर चली और रजनीकांत की फ़िल्मों से प्रेरणा ली, जिनमें उन्होंने एक आम आदमी का किरदार निभाया था.

वो कहते हैं, "अब हम बॉलीवुड की तरह शहरों पर केंद्रित फ़िल्में बना रहे हैं. निरहुआ रिक्शावाला 10 साल पहले बनी थी. यहां तक कि तेलुगू और अन्य क्षेत्रीय फ़िल्म इंडस्ट्री में भी वलगेरिटी थी और बाद में अच्छा कंटेंट बनाया गया."

निरहुआ रिक्शावाला का पोस्टर

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वो कहते हैं, लेकिन अब भी रास्ता बहुत लंबा है. लोग आसानी से आलोचना कर देते हैं. लोग स्वीकार नहीं करना चाहते. वो ये नहीं समझना चाहते हैं कि गाने और वीडियो क्यों अश्लील हो गए हैं.

रिया पर लिखे गए आपत्तिजनक गाने

11 अगस्त को राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयरमैन रेखा शर्मा ने विकास गोर उर्फ़ यादव जी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर ट्वीट किया, क्योंकि इस भोजपुरी गायक ने अपने गाने में बॉलीवुड अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के ख़िलाफ़ गालियों का इस्तेमाल किया.

रिया मूल रूप से बिहार के रहने वाले अपने कथित बॉयफ्रेंड सुशांत सिंह राजपूत के खुदकुशी कर लेने के बाद मीडिया ट्रायल का सामना कर रही हैं.

2 मिनट 36 सेकंड का गाना 'रिया तो र**** है' (रिया वेश्या है) 9 अगस्त को बनडमरू नाम के यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया. ये उन तमाम गानों में से एक था जो अभिनेता की मौत के तुरंत बाद रिलीज़ किए गए थे. इस चैनल के 6.68 हज़ार सब्सक्राइबर हैं.

उसी दिन अपलोड किए गए एक अन्य गाने में अभिनेत्री को मां की गाली दी गई. ये गाना गायक राम जनम यादव ने अपलोड किया था और इस गाने के क़रीब तीन लाख व्यूज़ हैं.

एक अन्य गाना एस म्यूज़िक 2 चैनल पर अपलोड किया गया जिसे 'प्रमोद एलआईसी' ने गया था, इसमें रिया को कहा गया है कि 'वेश्या तुम क्या भागोगी?'

राष्ट्रवाद और स्त्री द्वेष से इंडस्ट्री का वास्ता

शारदा सिन्हा और मालिनी अवस्थी

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लेकिन भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री का राष्ट्रवाद और स्त्री द्वेष से वास्ता कोई नई बात नहीं है.

गुड्डू रंगाली जो ख़ुद को डायमंड स्टार कहते हैं, उन्होंने एक गाना बनाया जिसमें उन्होंने एक महिला के लहंगे में कोरोना वायरस घुस जाने की बात कही.

डबल मीनिंग बातें, सेक्सिज़्म और हाइपर सेक्शुएलिटी बहुत लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही है लेकिन 1990 के दशक में रंगीला के आने के बाद से ही इस तरह के कई सारे गायक आए जिन्होंने रंगीला की तरह ही गालियों का इस्तेमाल किया और फूहड़पन को प्रोडक्शन का एक अहम हिस्सा बना लिया.

रंगीला साफ़तौर पर फूहड़पन के संरक्षक रहे हैं. हालांकि उनके पहले और उनके बाद भी लोगों ने इस तरीक़े को अपनाया. उनके बाद के गायकों जिनमें खेसारी लाल यादव और पवन सिंह शामिल हैं, उन्हें रंगीला के भद्दे गाने के बोल और विज़ुअल्स को विरासत की तरह लिया.

रंगीला उत्तर प्रदेश और बिहार में बेहद लोकप्रिय हैं और उन्हें होली सम्राट कहा जाता है. उनके गानों में अक्सर "लहंगा" और "भौजी" जैसे शब्द सुनाई देते हैं.

उनके कुछ गानों के बोल हैं "अपना लहंगा में एनआरसी लागू होखे ना देम" और "हमारा लहंगा में कोरोना वायरस घुसल बा."

रंगीला से पहले गायक बालेश्वर यादव थे, जो बहुत लोकप्रिय थे और अपने संगीत कार्यक्रमों में मंच पर लड़कियों से डांस करवाते थे.

फ़िल्मकार नितिन नीरा चंद्रा

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बिहार से आने वाले फ़िल्मकार नितिन नीरा चंद्रा कहते हैं कि शुरू में उनकी इस वजह से आलोचना हुई, लेकिन फिर उच्च वर्ग और ऊंची जाति के लोग भोजपुरी भाषा से दूर होते चले गए और उस परित्याग के कारण भाषा की स्थिति बिगड़ती गई और इसके साथ फूहड़पन और वलगेरिटी जैसे टैग जुड़ गए.

मिथिला मखान के लिए राष्ट्रीय अवार्ड जीतने वाले चंद्रा हिंदी भाषा के आधिपत्य को भोजपुरी म्यूज़िक और सिनेमा की स्थिति का ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

शुरू के गाने कैसे थे

मिथिला मखान

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1970 के दशक में जब बालेश्वर यादव पहली बार आए तो वो सिस्टम और शायद राज्य की विफलता की बात करने वाले गाने बनाते थे.

1970 और 1980 के दशक में जब शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई और बेरोज़गारी आसमान छूने लगी तो उन्होंने एक गाना लिखा, 'बिकाई ए बाबू बीए पास घोड़ा' इस गाने में उस दिनों के युवाओं का दर्द झलका था.

उन्होंने एक घोड़े की उपमा का इस्तेमाल किया, जो पढ़ा लिखा है और ये उन युवाओं के ग़ुस्से और परेशानी को दिखा रहा था जिनके पास डिग्री तो है पर नौकरी नहीं.

बालेश्वर ने प्यार के गाने भी लिखे, लेकिन इनमें प्रेमियों की उदासीनता और प्यार में मिले दर्द की बात नहीं थी. बल्कि इन गानों में प्रेमी एक दूसरे को चिढ़ाते थे. इनमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक झलक होती थी. मिसाल के तौर पर एक गाने में एक पुरुष अपने पत्नी से कह रहा है कि वो कोयले की खदान में काम करने चला जाएगा (हम कोइलरी चली जाइब ए ललमुनिया के माई).

ये गाना बताता है कि उन दिनों में कइयों के पास बस कोयले की खदान ही एक विकल्प थी. और उनके गानों में एक बेपरवाह कामुकता का पुट था, जिनमें एक तरह से महिलाओं के लिए आज़ादी की बात थी. जो आज के दौर के अश्लील गानों में कम ही नज़र आती है.

आज के गानों में तो महिलाओं को इस हद तक किसी सामान की तरह पेश किया जाता है कि एक लोकप्रिय हीरो का सिग्नेचर स्टाइल है कि वो महिला की नाभि पर चाबी लगाता है. या महिलाएं ही ख़ुद को उन दर्शकों के सामने सामान की तरह पेश कर रही हैं जो अश्लीलता को पसंद करते हैं.

इन गीतों की आक्रामक कामुकता भोजपुरी संगीत उद्योग की पहचान बन गई है. बालेश्वर अपने मार्केट को जानते थे. स्टेज शो और दर्शकों के सामने नृत्य करती लड़कियां और बाद में जानकारी का दौर और इंटरनेट का एक ट्रेंड आया, जो सालों तक जारी रहा.

निराला बिदेसिया

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पत्रकार निराला बिदेसिया ’आखर’ नाम के भोजपुरी प्रचार और साहित्यिक विकास की पहल से जुड़े हैं. वो कहते हैं कि इसका विरोध नहीं होता था क्योंकि महिलाओं को गाने और अभिनय करने की अनुमति नहीं थी.

जो डांस करती थीं या वीडियो का हिस्सा होती थीं उनमें से ज़्यादातर बिहार के भोजपुरी क्षेत्र से बाहर की होती थीं.

चंदन तिवारी उस वक़्त को याद करती हैं कि जब उनके पिता उनके संगीत के ख़िलाफ़ थे.

चंदन तिवारी

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वो बचपन में अपनी नानी के साथ रहती थीं जो गांव के मंदिर में भोजपुरी भजन और शादियों में लोक गीत गाया करती थीं. चंदन ने इस तरह गाना सीखा था. बाद में जब उनका परिवार बोकारो स्टील सिटी चला गया तो वो अपनी मां के साथ स्थानीय जागरणों में जाया करती थीं, जहां वो गाना गाती थीं.

वहीं उन्हें अपने शिक्षक मिले, जिन्होंने उन्हें मुफ़्त में सिखाने की पेशकश की.

वो कहती हैं कि उनके लिए उस इंडस्ट्री का हिस्सा बनना आसान नहीं था, जो कामुक फूहड़पन की सामग्री से भरी हुई थी.

हाल में उन्हें कलाकार मियां रसूल के गाने राम के सेहरा गाने के लिए ट्रोल किया गया. लेकिन उन्हें इस बात की फ़िक्र नहीं.

भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री

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बिदेसिया कहते हैं, "भोजपुरी ने सिर्फ हीरो और पुरुष गायक दिए हैं. इसलिए हम यहां हैं."

गुड्डू रंगीला के मैनेजर फ़ोन पर बहाने बनाते रहे और कहते रहे कि फ़ोन रंगीला के पास नहीं था या वो कहीं गए हुए हैं और बाद में आएंगे. बाद में उन्होंने फिर कहा कि वो दोबारा बाहर चले गए हैं. शायद स्टार ऐसे ही होते हैं. और वो एक स्टार हैं. एक डायमंड स्टार.

"250 से ज़्यादा एल्बम रिकॉर्ड करने वाले" और "200 से ज़्यादा गाने गाने वाले" रंगीला 1999 में 33 साल की उम्र में तब लोकप्रिय हुए थे जब उनकी पांचवी एल्बम जा झार के (क्या स्वैगर है) आई.

फिर एक के बाद एक कामयाब एल्बम आई जैसे हमरा हउ चाही (मुझे 'वो' चाहिए), जीन्स ढीला कर, हम लेम (मैं ले लूंगा) और रसदार होली. ये गाने फूहड़ और सेक्शुअल बातों से भरे थे.

2004 में बड़ी भारतीय म्यूज़िक कंपनी टी-सीरीज़ ने उन्हें डायमंड स्टार का नाम दिया. 2006 में गायन के साथ-साथ उन्होंने भोजपुरी फ़िल्मों में अभिनय करना भी शुरू किया. उनकी कंपनी संजीवनी एंटरटेनमेंट ऑनलाइन और ऑफलाइन एल्बम की बिक्री के साथ-साथ यू-ट्यूब राजस्व के माध्यम से पैसे कमाती है.

भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री

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रंगीला का जन्म बिहार के सिवान ज़िले के चैनपुर में हुआ था और उन्हें सिद्धेश्वर नंद गिरी कहा जाता था. वो कभी कुमार सानू की तरह प्लेबैक सिंगर बनना चाहते थे.

उन्होंने 11 साल की उम्र में अष्टजाम गीतों के साथ गाना शुरू किया और बाद में राम लीला और शिव लीला में गाया. 1993 में वो 17 साल की उम्र में दिल्ली आ गए और कीर्तन के गीत गाए और गारमेंट फ़ैक्ट्री में काम किया.

उन्होंने एक गंगा म्यूज़िक नाम की एक नई म्यूज़िक कंपनी के साथ डील की और अपनी पहली एल्बम जवानी का तूफ़ान रिलीज़ की. 1998 में टी-सीरीज़ में उन्हें अपने साथ जोड़ लिया और उनके साथ जा झार के रिलीज़ की.

और इस तरह गुड्डू रंगाली भोजपुरी म्यूज़िक इंडस्ट्री के पोस्टर चाइल्ड बन गए और फूहड़पन और अश्लीलता सुपरहिट एल्बम के फ़ॉर्मूला बन गए.

2003 में मनोज तिवारी की ससुरा बड़ा पैसेवाला की रिलीज़ के साथ भोजपुरी सिनेमा ने सबका ध्यान खींचा. फ़िल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर 4.5 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई की.

फ़िल्म का पोस्टर

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पुनर्जीवन की कहानी

बॉलीवुड की फ़िल्में बहुत ज़्यादा शहरों पर केंद्रित थीं और प्रदेश के दर्शक ख़ुद से जुड़ी फ़िल्में देखना चाहते थे और भोजपुरी सिनेमा और म्यूज़िक के पुनर्जीवन की कहानी यहीं से शुरू हुई.

बिहार के प्रवासी मज़दूरों की वजह से इस तरह के सिनेमा और संगीत का मार्केट देश भर में फैला है. यू-ट्यूब और सस्ते इंटरनेट और मोबाइल फोन के आने के साथ भोजपुरी गाने लोकप्रिय होते चले गए. जिसकी वजह से ऐसे और गाने बनने लगे. हालांकि इन गानों का अपना संदर्भ होता हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है.

मिसाल के तौर पर लोक गीतों में कुछ अश्लीलता होती है और बिहारी शादियों में गाए जाने वाले गाली गीत.

1990 के दशक में भोजपुर ज़िले के सहार में एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल आरा से सहार जाने वाली बस में बैठने में असहज महसूस करने लगी थीं. शांति सिन्हा कहती हैं कि उन्हें क़रीब दो घंटे तक अश्लील भोजपुरी गाने सुनने पड़ते थे.

उस वक़्त बसों और ऑटों में तेज़ आवाज़ में अश्लील भोजपुरी गाने बजते थे.

अब रिटायर हो चुकीं रीना सिन्हा कहती हैं कि मैं अक्सर ड्राइवर से लड़ती थी और गाने बंद करने को कहती थी. गाने सालियों के बारे में और सेक्शुएलिटी के बारे में होते थे.

लेकिन अधिकतर उच्च जाति के अमीर बिहारियों की तरह वो भी हिंदी में बात करती हैं. वो कहती हैं कि मेरी मां मगही बोलती थीं और मैं हिंदी.

हमारे जैसे और भी कई लोग हैं जिन्होंने भोजपुरी को अपनी भाषा के तौर पर अपनाने से इनकार कर दिया.

नितिन नीरा चंद्रा

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लंबे समय तक ऐसे गाने बाज़ार में छाए रहे. ये बिहार की खंडित पहचान की ओर इशारा करते हैं जहां संपन्न और शिक्षित बिहारियों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां ग़रीब लोगों से बहुत अलग होती हैं.

संपन्न बिहारियों का भोजपुरी को छोड़ना ही भोजपुरी की इस स्थिति का कारण बना. जिसकी वजह से लोकगीतों की चंचलता, अश्लीलता और स्पष्ट कामुकता के चलते बहुत पीछे छूट गई.

दिनेश लाल यादव निरहुआ, पवन सिंह और खेसारी लाल यादव के आने के बाद तस्वीर पूरी बदल गई.

2003 में आई मनोज तिवारी की फिल्म की कामयाबी के बाद कई प्रोड्यूसर्स ने इंडस्ट्री में निवेश किया जहां महिलाओं को सेक्स सिंबल में इस्तेमाल किया जाता था. प्राइवेट एल्बम में भोजपुरी को और ज़्यादा वलगर बना दिया गया.

1990 के दशक के शुरुआत में नीलम कैसेट और चंदा कैसेट आने लगीं. शुरुआत में वो शिव विवाह और शिव कलेवा पर एल्बम बनाते थे.

सिर्फ पटना में 100 से ज़्यादा रिकॉर्डिंग स्टूडियो थे. फिर वेव आई और फिर टी-सीरीज़. जब गुड्डू ने महिलाओं पर गाने बनाए तो लोगों ने उन्हें पसंद किया. उन्होंने हर चीज़ को सेक्शुअलाइज़ किया.

उन्हें बर्दाश्त क्यों किया गया? हमारा बुद्धिजीवी और मध्यम वर्ग क्यों चुप रहा?

बिहार के मुन्ना पांडे दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं. वो कहते हैं, "विनय बिहारी तब बिहार के संस्कृति मंत्री थे और वो इस तरह के गाने लिखते थे. कोई विरोध नहीं हुआ."

नितिन चंद्रा कहते हैं, "शिक्षा, व्यापार और आधिकारिक कामकाज में भाषाएं थोपे जाने से भोजपुरी का विध्वंस शुरू हुआ."

वीडियो कैप्शन, केंद्र सरकार के बड़े नोट बंद करने के ऐलान के बाद इससे जुड़े भोजपुरी गीत धूम मचा रहे हैं.

चंद्रा कहते हैं कि हिंदी की वजह से भोजपुरी विस्थापित हो गई. मैथिली का हाल भोजपुरी की तरह इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैथिली ब्राह्मण अपनी संस्कृति को लेकर बहुत सजग थे.

इस शोर और फूहड़पन के बीच चंदन तिवारी चुपचाप शोध कर रही हैं और उन गीतों को संग्रहित कर रही हैं, जिन्हें वो गाना चाहती हैं.

फ़िलहाल वो अपने परिजनों के साथ बोकारो में रह रही हैं. फ़ोन पर वो कहती हैं, "चीज़ें बदल रही हैं. हमारे लोक गीत महिलाएं गा रही हैं. मैं महिला विरोधी गाने नहीं गाना चाहती और जब लोग भोजपुरी के बारे में ग़लत तरीक़े से बात कर रहे हैं, तब मुझे भोजपुरी को अच्छे लहज़े में पेश करना होगा."

वो कहती हैं कि उनकी संस्कृति का एक सुंदर पहलू है और उन्हें कई बार बुरा लगता है जब अश्लील गानों को ही भोजपुरी क्षेत्र का संगीत समझा जाता है.

वो लोगों को इस संगीत के दूसरे पहलू या कहें कि सुंदर पहलू से रूबरू करवाना चाहती हैं.

वो कहती हैं, "मुझे ऐसे कई गाने मिले हैं, जो महिलाओं ने चंपारण सत्याग्रह के वक़्त गाए. हमें अपने लोक गीत गाने के लिए यहां रहना होगा. शारदा सिन्हा बिहार में रहती हैं. मैं भी यहीं हूं."

शायद लहंगा और भौजी वाले गाने और ऑटोट्यून इन आवाज़ों को नहीं दबा पाएंगे. इन्होंने अपनी भाषा को बचाने के लिए नई पिच के साथ बोलना शुरू कर दिया है.

उन्होंने खुद नितिन नीरा चंद्रा की तरह भाषा सीखी है.

एक आंदोलन शुरू हो चुका है और तिवारी कहती हैं कि वो संगीत की सफ़ाई करेंगे और अश्लीलता के टैग को हटाएंगे और इसे अपने मूल गौरव पर लौटाएंगे, जब महिलाओं ने सशक्तिकरण के गीत गाए और राम ने ट्रोलिंग और हर चीज़ के बावजूद सेहरा पहना.

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