बिहार चुनाव: मिथिला मास्क से वोटरों को लुभाने की कोशिश

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
26 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' में मधुबनी पेंटिंग के मास्क का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, "बिहार में कई विमेन सेल्फ़ हेल्प ग्रुप्स ने मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क बनाना शुरू किया है और देखते ही देखते, ये ख़ूब पॉपुलर हो गए हैं."
स्पष्ट है कि चुनावी मोड में जाते बिहार की मधुबनी या मिथिला पेंटिंग का ये ज़िक्र, सिर्फ़ एक 'जिक्र' भर नहीं है. बल्कि इसके कई राजनीतिक मायने और संकेत हैं.

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मिथिला मास्क की डिमांड
बिहार महिला उद्योग संघ की अध्यक्ष उषा झा पेटल्सक्राफ़्ट नाम की संस्था चलाती है. जिसमें मिथिला पेंटिंग के 300 कलाकार काम करते है.
उषा झा बताती हैं, "हमें दो तरह से लोग अप्रोच कर रहे है. नेता ख़ुद बनवा रहे है या फिर सप्लायर हमें मास्क का आर्डर दे रहे है. जिसमें पार्टी सिम्बल के साथ मिथिला पेंटिंग की जा रही है. जेडीयू, राजद, बीजेपी सहित सभी पार्टियों के मास्क हम लोग बना रहे है."
वहीं मधुबनी में काम कर रही संस्था क्राफ़्टवाला के राकेश कुमार झा बताते हैं,"मिथिला पेंटिंग के मास्क की डिमांड दूसरे प्रदेशों और विदेशों में ख़ूब अच्छी है. पालिटिकल पार्टियाँ भी अब इसका ऑर्डर दे रही हैं. क्योंकि वो जानते है कि ये ग्रुप ऑफ़ आर्टिस्ट ही इलेक्शन टाइम में वोटर है. और फिर मिथिला पेंटिंग से एक भावनात्मक पक्ष भी जुड़ा है."

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थोक ऑर्डर पर प्रति मास्क 25 रुपए क़ीमत पड़ रही है. वहीं खुदरा की क़ीमत 7 से 75 रुपए तक है. उषा एक और दिलचस्प बात बताती हैं. वो कहती हैं, "नेता जो आर्डर दे रहे है, उसमें से कई ऐसे है जो मास्क पर कोई सिम्बल नहीं बनवा रहे है."
दरअसल बिहार की राजनीति में चुनावी की घोषणा से लेकर टिकट बँटवारा होना अभी बाक़ी है. ऐसे में नेता ख़ुद को पार्टी सिम्बल का इंतज़ार कर रहे है. कई बार गठबंधन की राजनीति में नेता को ऐन वक़्त में चुनाव लड़ने के लिए पार्टी बदलनी पड़ती है.

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आपदा में अवसर बने मास्क
बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव और कोरोना में मास्क इस्तेमाल करने की मजबूरी मिथिला पेंटिंग के कलाकारों के लिए आपदा में अवसर साबित हो रही है. 46 साल के सोनू और सीमा निशांत मिथिला पेंटिंग के कलाकार हैं.
मधुबनी में रहने वाली ये दंपती आजकल रोज़ाना 75 मास्क बना ले रही है, जिनमें मिथिला पेंटिंग करने के लिए प्रति मास्क उन्हें 30 से 40 रुपए मिलते हैं.
बिहार के मधुबनी ज़िले में रहने वाले सोनू ने बीबीसी को बताया, "कोरोना से पहले हम पति-पत्नी मिलकर 35 से 40 हज़ार रुपए कमा लेते थे. लेकिन लॉकडाउन की शुरूआत में सारी कमाई ठप हो गई. मधुबनी पेंटिंग वाला मास्क जब प्रचार में आया, तो फिर से काम मिलने लगा. मास्क ने हम कलाकारों की जान बचाई है."
हालाँकि मिथिला पेंटिंग के मूल स्वरूप को राजनीतिक दलों की मांग के अनुरूप ढालना एक मुश्किल काम है. युवा मिथिला कलाकार अनिता बताती है, "पार्टियाँ चाहती हैं कि उनके सिम्बल के साथ मिथिला पेंटिंग बनाई जाए. ऐसे में इस आर्ट फ़ॉर्म में नए पैटर्न डेवलेप करना मुश्किल और चुनौती भरा है."

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कलाकारों को संरक्षण देने की कोशिश- राजनीतिक दल
इस सवाल पर कि राजनीतिक दल या नेता ये मास्क क्यों बनवा रहे है, सभी दलों से एक जैसा रटा रटाया जवाब मिलता है. और वो ये कि कोरोना के वक़्त में मिथिला कलाकारों ख़ासतौर पर ग़रीब महिलाओं को मदद करना चाहते है.
लोजपा पहली ऐसी पार्टी है, जिसने मिथिला पेंटिंग के दो लाख मास्क के आर्डर दिए हैं. पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बिनोद कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, "हमारी पार्टी का विजन डॉक्यूमेंट बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट है जिसमें मिथिला पेंटिंग को बढ़ावा देना हमारा एक एजेंडा है. इसी के तहत हमने ये मास्क ख़रीदे हैं और अपने कार्यकर्ताओं को भेज रहे है."
राजद प्रवक्ता चितरंजन गगन कहते हैं, "हमारे नेता तेजस्वी जी तो ख़ूब मिथिला मास्क पहनते है. हमारी पार्टी लालू जी की है जो ज़मीन से जुड़ी है, इसलिए हमें अपने बिहारी कलाकारों की चिंता है."

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वहीं बीजेपी ने इन सबसे आगे बढ़ते हुए बिहार की सभी कला विधाओं को साधने की कोशिश की है. कला संस्कृति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष बरूण कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, "हम लोग बिहार की सभी कला यानी सिर्फ़ मिथिला ही नहीं बल्कि मंजुषा और भोजपुरी पेंटिंग में भी मास्क बनवा रहे है. इससे हमारे कलाकारों को आर्थिक सहयोग मिल रहा है."
गौरतलब है कि भोजपुर इलाक़े में होने वाली पेंटिंग के लिए नया नाम 'भोजपुरी पेंटिंग' प्रचलित हो रहा है.

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मिथिलांचल को साधने की कोशिश
पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान
ये पंक्तियाँ मिथिलांचल को परिभाषित करने वाली मानी जाती हैं. 1969 से मिथिलांचल पर केंद्रित पत्रिका मिथिला भारती प्रकाशित हो रही है. इसके सह संपादक और रिसर्चर भैरव लाल दास बताते हैं, "मिथिलांचल बिहार में पश्चिम चंपारण से लेकर किशनगंज तक है और बिहार में 144 विधानसभा क्षेत्रों में मैथिली बोलने वालों का प्रभाव है."
भैरव लाल दास बताते हैं कि दूसरे किसी भी समाज की तरह मिथिलांचल के समाज में अपनी संस्कृति से विचलन है. लेकिन मैथिल समाज में इस विचलन के समानान्तर बुद्धिजीवियों का एक दूसरा वर्ग भी काम कर रहा है, जो यहाँ नियंत्रण रखता है. इसलिए बिहार के किसी अन्य समाज से इतर यहाँ आपको फूहड़ता तुलनात्मक तौर पर कम मिलेगी.

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उनके मुताबिक़, "अभी भी मैथिल लोगों के लिए उनका खान पान, वेश भूषा, रहन सहन, गीत, पेंटिंग बहुत महत्वपूर्ण है. और उसके प्रति वो बहुत संवेदनशील भी हैं."
वहीं मिथिलांचल को नज़दीक से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, "मिथिलांचल में सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया, बेगूसराय, खगड़िया आते हैं. अगर इलेक्टोरल पॉलिटिक्स के लिहाज से देखें, तो जगन्नाथ मिश्र के बाद यानी 90 के दशक में यहाँ लालू यादव का यादव मुस्लिम समीकरण प्रभावी हुआ. और इधर कुछ सालों में अतिपिछड़ा का उभार हुआ है जो जेडीयू को चुनाव जिताता है. जहाँ तक मास्क की बात है, तो पाग पहनने पर भी ये समाज ख़ुश हो जाता है, मिथिला मास्क से भी ख़ुश हो जाएँगे."
हालांकि भैरव लाल दास कहते हैं कि कांग्रेस के प्रभाव वाले मिथिलांचल में 74 के आंदोलन के बाद ही अगड़ी राजनीति पर पिछड़ों की राजनीति हावी होनी शुरू हो गई थी.
तकरीबन चार सालों से बिहार में पेंटिंग कला के ज़रिए क्षेत्रीय अस्मिता का उभार देखने को मिलता है. इसमें सबसे आक्रामक तरीक़े से मिथिला पेंटिंग पर काम होता दिख रहा है.
रेलवे स्टेशन से लेकर शहर की दीवारे इसके रंग में रंगी जा रही हैं. कोरोना के समय की ज़रूरत बने मास्क पर मिथिला पेंटिंग और राजनीति में उसकी बढ़ती डिमांड इस क्षेत्रीय अस्मिता को संतुष्ट करने का एक तरीक़ा है.
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