बाढ़ से बदहाल बिहार में सरकारी कोशिशों पर सवाल

बाढ़ में फंसे लोग

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    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, बिहार से, बीबीसी हिंदी के लिए

पिछड़े राज्यों की सूची में खड़ा बिहार इस वक़्त कोरोना वायरस के दिन-ब-दिन रिकॉर्डतोड़ बढ़ते मामलों से जूझ रहा है. वहीं, सालाना आने वाली बाढ़ ने इस राज्य को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है.

कोरोना संक्रमण से अब तक राज्य में 41 हज़ार लोग संक्रमित हो चुके हैं. वहीं, इससे मौतों का आंकड़ा 269 को पार कर गया है.

दूसरी ओर एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसकी लड़ाई कोरोना वायरस के साथ-साथ बाढ़ से भी चल रही है.

हज़ारों लोगों के घर-मकान पानी में बह चुके हैं, लाखों लोग बेघर होकर अपने जान-माल के साथ ऊंचे स्थानों पर शरण लेने के लिए विवश हैं.

बीबीसी से फ़ोन पर बातचीत में बंजरिया के एक ग्रामीण ने कहा, "स्थिति बहुत ख़राब है. लोग भूखे-प्यासे हैं. हाल जानने के लिए स्थानीय मुखिया तक भी हमारे पास नहीं आए और न ही राहत और बचाव दल से कोई हमारी मदद करने आ रहा है."

बाढ़ में डूबा इलाक़ा

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विभाग की वेबसाइट पर मंगलवार शाम को हुए अपडेट के मुताबिक बाढ़ से 12 ज़िलों के 101 प्रखंडों की 837 पंचायतों के क़रीब 30 लाख लोग प्रभावित हैं. वहीं, दो लाख 62 हज़ार से अधिक लोग बेघर हो गए हैं.

लेकिन सरकार ने जो 26 राहत शिवर लगाए हैं उसमें लगभग 23 हज़ार लोग ही रह रहे हैं. इसके अलावा 808 सामुदायिक रसोई में चार लाख 19 हज़ार के क़रीब लोग भोजन कर रहे हैं.

बिहार का आपदा प्रबंधन विभाग जो कुछ दिनों पहले तक लॉकडाउन के दौरान बाहर से आ रहे प्रवासियों के क्वारंटीन की व्यवस्था और रखने-खिलाने के इंतज़ाम में जुटा था, इन दिनों बाढ़ से बचाव और राहत कार्यों में लगा है. एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की कुल 26 टुकड़ियां राहत और बचाव कार्यों में लगी हुई हैं.

फिलहाल जितनी बड़ी आबादी बाढ़ से प्रभावित है उस हिसाब से सरकार के इंतज़ाम तो नाकाफ़ी लगते ही हैं, उसमें भी हैरान करने देने वाली बात ये है कि जैसे-जैसे बाढ़ का दायरा बढ़ता जा रहा है सरकारी इंतज़ामों में कमी भी होती दिख रही है.

आपदा प्रबंधन विभाग की वेबसाइट पर 25 जुलाई शाम चार बजे तक के जो आंकड़े जारी किए गए हैं, उनके मुताबिक 10 ज़िलों की क़रीब 10 लाख आबादी प्रभावित थी और राहत शिविरों की संख्या 32 थी, जबकि ताज़ा अपडेट में राहत शिविरों की संख्या घटकर 26 हो गई है. इस तरह प्रभावितों की संख्या 20 लाख बढ़ जाने पर भी नए राहत शिविर चलाने के बजाए छह राहत शिविर कम कर दिए गए हैं.

बाढ़ में डूबा इलाक़ा

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सबसे अधिक प्रभावित इलाके

वैसे तो बाढ़ का ख़तरा पूरे बिहार पर मंडरा रहा है क्योंकि अभी तक की बरसात में ही सूबे में सामान्य से 46 फ़ीसदी अधिक वर्षा हो चुकी है और मौसम विभाग ने इस साल और अधिक बारिश की संभावना जताई है.

मगर इस वक़्त उत्तर बिहार का इलाका ख़ास तौर पर नेपाल से निकलने वाली नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में भारी बरसात होने के कारण लगभग सारी नदियां खतरे के निशान को पार कर गई हैं.

दरभंगा में बागमती, कमला बलान और अधवारा समूह की नदियां उफान पर हैं. मुज़फ़्फ़रपुर, चंपारण, गोपालगंज में गंडक और बूढ़ी गंडक का पानी शहर के निचले इलाकों तक में घुस गया है.

सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों की सूची में पूर्वी चंपारण (15 प्रखंडों की सात लाख से अधिक आबादी), दरभंगा (14 प्रखंडों की 11 लाख से अधिक आबादी), मुज़फ़्फ़रपुर (13 प्रखंडों में तीन लाख से अधिक आबादी) और गोपालगंज (पांच प्रखंडों की क़रीब दो लाख आबादी) शामिल है.

बाढ़ में फंसे लोग

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सामान्य से अधिक बारिश

गौर से देखें तो बाढ़ग्रस्त इलाकों के बारे में बिहार आपदा प्रबंधन विभाग की तरफ से जारी आंकड़े बताते हैं कि उन्हीं इलाकों में बाढ़ का कहर अधिक है जहां बरसात सामान्य से बहुत अधिक हुई है.

उदाहरण के लिए दरभंगा जहां सामान्य वर्षा 410.1 मिलीमीटर होती है, वहां इस साल अब तक 931.4 मिमी यानी 127 फ़ीसदी अधिक बारिश हुई है. उसी तरह पूर्वी चंपारण में सामान्य वर्षा 509.4 मिमी होती है जो इस साल अभी तक 1032.7 मिमी दर्ज की जा चुकी है. सुपौल, मधुबनी, मुज़फ़्फ़रपुर, गोपालगंज, पश्चिमी चंपारण आदि में भी इसी तरह सामान्य से 60 फ़ीसदी तक अधिक बारिश हुई है.

पूर्वी चंपारण में जहां इस वर्ष सबसे अधिक बारिश हुई है वहां के लोगों का कहना है कि यह चंपारण के इतिहास की सबसे विनाशकारी बाढ़ है. ज़िले की 405 पंचायतों के 267 गांव बाढ़ की चपेट में हैं. यहां गंडक, बूढ़ी गंडक, सिकरहना, ललबकेया, बागमती, तिलावे, मसान, मरघर, धनौती सहित दर्जनों नदियों ने तबाही मचा रखी है.

ज़िले के सबसे निचले इलाक़े बंजरिया प्रखंड की सभी 13 पंचायत बाढ़ में डूब चुकी हैं. लेकिन, पिछले एक हफ़्ते से इलाक़े में राहत सामग्री नहीं पहुंच सकी है.

शिविरों में रह रहे लोग

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राहत और बचाव कार्यों में कमी क्यों?

केवल चंपारण ही नहीं बल्कि मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा के पीड़ित भी राहत और बचाव कार्यों में कोताही की शिकायत कर रहे हैं. जबकि ये ज़िले सबसे अधिक प्रभावित ज़िलों की सूची में शामिल है, मगर फिर भी यहां एक भी राहत शिविर नहीं चलाया जा रहा है.

एक निजी टीवी न्यूज चैनल के रिपोर्टर जो पिछले कई दिनों से लगातार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को कवर कर रहे हैं, बताते हैं, "इस बार पहले की तरह राहत शिवर नहीं लगाए गए हैं और न ही पीड़ितों के लिए इंतज़ाम हैं. लोग अपने इंतज़ाम पर अपने भरोसे रह रहे हैं. ऐसा लगता है मानो सरकार ने यह तय कर लिया हो कि ये लोग हर साल की तरह इस साल भी बाढ़ से लड़ लेंगे."

चूंकि यह कोविड का दौर भी है इसलिए पीड़ितों और प्रभावितों को संक्रमण होने का डर भी है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह तो कह दिया है कि राहत शिविरों और कम्युनिटी किचेन में सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना से बचने के उपायों पर अमल किया जाए. लेकिन, बाढ़ प्रभावित इलाकों में रिपोर्टिंग कर रहे ये रिपोर्टर बताते हैं, "ज़मीन पर कुछ भी नहीं हो रहा है. सबसे अहम बात है कि अगर लोग शिविरों में रहेंगे और उनके लिए ज़्यादा शिविर लगाए जाएंगे तभी तो सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना से बचने के दूसरे अन्य उपायों पर अमल किया जा सकेगा, यहां तो लोग खुद के इंतजाम से समूह बनाकर ऊंचे स्थानों पर रह रहे हैं. न किसी के पास मास्क है न ही सैनिटाइज़र."

शिविरों में रह रहे लोग

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प्रभावितों में संक्रमण फ़ैलने का डर

बिहार में कोविड 19 का संक्रमण जिस तेज़ गति से बढ़ रहा है उससे यह भी डर है कि संक्रमण की यह कड़ी बाढ़ पीड़ितों तक न पहुंच जाए.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, "पानी में घिरे लोगों की पहली प्राथमिकता जान और माल बचाकर ऊंचे स्थानों पर जाने की है. इसलिए बहुत संभव है कि उन्हें उस वक्त कोविड के ख़तरे का उतना अहसास न हो लेकिन, यह अहसास सरकार को तो होना चाहिए था."

पुष्यमित्र कहते हैं, "यह बहुत हैरान कर देने वाली बात है कि सरकार का फोकस अधिक से अधिक राहत शिविर चलाने पर नहीं है. न ही लोगों को संक्रमण के प्रति सचेत करने पर है. हालांकि, बाढ़ पूर्व की तैयारियों में सभी को यह ट्रेनिंग दी गई थी कि कोरोना काल में राहत और बचाव कार्य कैसे करना है. मगर जो तस्वीरें आ रही हैं उसमें ग्राउंड पर उस ट्रेनिंग की कोई झलक नहीं मिलती. जिन जगहों पर पीड़ित समूह बनाकर रह रहे हैं यदि वहां संक्रमण फ़ैलता है तो संक्रमण की बाढ़ आ जाएगी और फिर उसे रोकना किसी के बस में नहीं रहेगा."

पुष्यमित्र के मुताबिक इस वक्त ज़रूरत है कि बाढ़ प्रभावितों को ऐसी जगहों पर रखा जाए जहां लगातार उनपर नज़र रखी जा सके. यह शिविरों के जरिए ही संभव है. वरना ख़तरा उन लोगों के लिए भी है जो बाढ़ से राहत और बचाव कार्यों में लगे हुए हैं.

राहत-बचाव कार्य

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बाढ़ प्रभावित हर परिवार को 6 हज़ार नकद

बिहार सरकार ने बाढ़ से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए हर परिवार को छह-छह हज़ार रुपये नकदी देने की घोषणा की है. सूची बनाने का काम राहत शिविरों में किया जा रहा है.

बिहार आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव के रामचंद्रुडु ने बताया कि और राहत शिविर बनाने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है. जिन जगहों से राहत शिविर हटाए गए हैं वहां अब पानी कम हो चुका है.

उन्होंने कहा, "ज़िलों से मिल रही सूची के अनुसार आपदा प्रबंधन हर परिवार को 6 हज़ार नकद देगा. जबकि मुख्यमंत्री राहत कोष से लोगों को बर्तन और कपड़ा मद में भी सहायता दी जाएगी. नकदी के अलावा बाढ़ग्रस्त इलाके में फ़सल क्षति से लेकर मकान और मवेशी नुकसान में भी सहायता का प्रावधान है.

बाढ़ में फंसे लोग

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किन मदों में मिलेगी सहायता

  • 4 लाख (मौत होने पर) परिजनों को
  • 6000 नकदी हरेक परिवार को
  • 1800 कपड़ा मद में
  • 2000 बर्तन के लिए
  • 6800 प्रति हेक्टेयर न्यूनतम
  • 30 हज़ार प्रति गाय, भैंस में
  • 3 हज़ार प्रति बकरी, भेड़, सुअर
  • 25 हज़ार प्रति घोड़ा पर
  • 50 रुपये प्रति मुर्गा, अधिकतम 5 हज़ार
  • 95,100 कच्चा-पक्का मकान नुकसान में
  • 5200 पक्का मकान के आंशिक क्षतिग्रस्त में
  • 3200 कच्चा मकान के आंशिक क्षतिग्रस्त में
  • 4100 झोपड़ी के पूर्ण नुकसान होने पर
  • 2100 जानवर के शेड नुकसान मद में

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