नई जगह, नया पता, कैसी होगी नई बाबरी मस्जिद?

धन्नूपुर गांव में जिस जगह ज़मीन देने का प्रस्ताव किया गया है, उसके पास ही एक दरगाह है

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अयोध्या में मंदिर मस्जिद विवाद ख़त्म हो गया है. पाँच अगस्त को अयोध्या में मंदिर का भूमिपूजन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ.

कार्यक्रम में ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शामिल हुए थे. इसके साथ ही भव्य मंदिर बनने का काम शुरू हो चुका है.

श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की तरफ़ से कहा गया है कि सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीबीआरआई) रुड़की, आईआईटी मद्रास और लार्सन एंड टूब्रो के इंजीनियर मिट्टी की जांच करके मंदिर निर्माण का काम शुरू कर चुके हैं.

36 से 40 महीने के अंदर मंदिर का निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा.

अब ख़बर आ रही है कि अयोध्या डवलपमेंट अथोरिटी की तरफ़ से मंदिर का नक़्शा भी पास कर दिया गया है. 29 अगस्त को इस बारे में बैठक हुई थी.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद

दूसरी तरफ़ मस्जिद बनाने के काम में भी तेज़ी आई है. सुन्नी वक़्फ बोर्ड ने पाँच एकड़ ज़मीन पर क्या काम होना है इसके लिए इंडो इस्लामिक कल्चरल फ़ाउंडेशन बनाया था. इसी फ़ाउंडेशन को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि इस पाँच एकड़ ज़मीन का कैसे इस्तेमाल होना है.

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फैसला सुनाते हुए राम मंदिर के लिए केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया था और यूपी सरकार को मस्जिद के लिए पांच एकड़ जगह देने का फै़सला सुनाया था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या के पास धन्नीपुर गांव में ही यूपी सरकार ने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ ज़मीन दी है. यह ज़मीन कृषि विभाग के 25 एकड़ वाले एक फ़ार्म हाउस का हिस्सा है जहां इस समय धान की फ़सल की रोपाई हुई है. यहाँ अभी एक दरगाह है. यह जगह विवादित स्थल से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर है.

हालाँकि अयोध्या के कई मुसलमान और इस विवाद में पक्षकार रहे कई लोग इतनी दूर ज़मीन देने के प्रस्ताव का और मस्जिद बनाने का विरोध कर रहे थे.

प्रोफेसर एसएम अख़्तर
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कौन हैं प्रोफेसर एसएम अख़्तर

इंडो इस्लामिक कल्चरल फ़ाउंडेशन ने ज़मीन पर मस्जिद बनाने के लिए डिज़ाइन करने वाले आर्किटेक्ट का नाम फाइनल कर लिया है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के प्रोफे़सर एसएम अख़्तर को इस काम के लिए चुना गया है.

प्रोफेसर अख़्तर जामिया में आर्किटेक्टर विभाग के डीन भी हैं. तीस साल से इस फील्ड से जुड़े हैं और इंडो इस्लामिक नक़्शे डिज़ाइन करने में उन्हें महारत हासिल है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया कि इस काम के लिए उन्होंने कोई एप्लीकेशन नहीं भरी थी. उनके मुताबिक़ उनका चयन उनकी काबियलत के आधार पर किया गया है क्योंकि उनका काम ही बोलता है.

एक सितंबर को ही उन्हें फोन पर इस बारे में सूचना दी गई कि उन्हें पाँच एकड़ की ज़मीन पर मस्जिद के साथ जो कुछ बनेगा, उसका डिज़ाइन तैयार करना है.

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दुनिया भर में साल 2007 से इस्लामिक आर्ट एंड आर्किटेक्चर पर एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस चलती आ रही है.

ईरान, पाकिस्तान सहित दुनिया के कई देशों में इसका आयोजन हो चुका है. तीन बार दिल्ली में भी उसका आयोजन हुआ है. प्रोफेसर अख़्तर दिल्ली में उन कांफ्रेंस के संयोजक रहे हैं. उनका मानना है कि हो सकता है इस वजह से उनके काम के बारे में फ़ाउंडेशन वालों पता चला हो.

उनका दावा है कि प्रोफेसर बनने के पहले उन्होंने कई कंपनियों में बतौर कंसलटेंट काम किया है. जामिया के काफ़ी बिल्डिंग का डिज़ाइन उन्होंने किया है.

प्रोफेसर अख़्तर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट उत्तर प्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष और सचिव दोनों रह चुके हैं और लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं.

राम मंदिर का एक प्रस्तावित मॉडल

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कैसा होगा मस्जिद का नक्शा?

अयोध्या में जो मंदिर बन रहा है उसकी भव्यता की हर जगह काफ़ी चर्चा है. विश्व हिंदू परिषद के साथ मिलकर कुछ साल पहले राम मंदिर का मॉडल गुजरात के रहने वाले वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा ने तैयार किया है, जिसमें थोड़े बदलाव के साथ अब स्वीकृति मिल चुकी है.

तो क्या मस्जिद का नक्शा भी उतना ही भव्य होगा?

इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर अख़्तर कहते हैं, "हमारे प्रोफेशन में कहा जाता है, आर्किटेक्चर कभी दोहराया नहीं जाता. उसे हमेशा समय के साथ विकसित किया जाता है. जो मर चुका है वो पुरात्तव हो जाता है और जो जीवित है वो आर्किटेक्चर यानी वास्तुशिल्प है. जो भी चीज़ समसामियक होगी, जीवित होगी और वाइब्रेंट होगी - हम वैसा ही डिज़ाइन करेंगे. जब इस सोच के साथ हम करते हैं तो नई चीज़ बनाते हैं, पुराने चीज़े दिमाग से निकल जाती है. विश्व में हर जगह ये हो रहा है."

तो क्या नए मस्जिद का ढ़ाचा पुरानी बाबरी मस्जिद से बिलकुल अलग होगा? इस पर प्रोफेसर अख़्तर साफ़ साफ़ शब्दों में कहते हैं कि नई मस्ज़िद बिल्कुल ही अलग होगी. उसमें गुम्बदनुमा कोई हिस्सा नहीं होगा.

तो क्या इस सिलसिले में सुन्नी वक़्फ बोर्ड से उन्हें इजाजत मिल गई है? इस पर वो कहते हैं कि डिजाइन पर काम करने से पहले किसी से इजाजत लेने की ज़रूरत नहीं हैं. उनके मुताबिक़ विश्व में यूरोप और दूसरे देशों में ऐसे कई नई थीम पर काम हो रहा है, जिसमें मस्जिद 'ज़ीरो एनर्जी' पर काम करती है. हर कुछ वहाँ रिसाइकल होता है.

साथ ही प्रोफेसर अख्तर ने ये भी साफ़ किया कि फिलहाल मस्जिद की कोई तस्वीर उनके जेहन में नहीं है. अभी उन्होंने सोचना शुरू ही किया है, और जब सोते जागते उसी के ख्याल आएंगे, तो ही वो उस डिजाइन पर काम शुरू कर पाएंगे.

बाबरी मस्जिद

स्पिरिट ऑफ इंडिया की मिसाल

दरअसल पाँच एकड़ की ज़मीन पर केवल मस्जिद का ही निर्माण नहीं किया जाएगा. वहाँ एक पूरा कॉम्प्लेक्स तैयार करने की योजना है जिसमें मस्जिद एक बड़ा हिस्सा होगा. कॉम्प्लेक्स की थीम होगी 'ख़िदमत-ए- ख़ल्क' जिसका मतलब है मानवता की सेवा.

प्रोफेसर अख़्तर के मुताबिक़ इसमें इस्लाम की छाप होगी, साथ ही भारतीयता की बात भी होगी, जिसका मूल मंत्र ही लोगों की सेवा करना है. वो कहते हैं कि आप लोगों की मदद करके ये हासिल कर सकते हैं. इसके लिए वो कुछ मिसाल भी देते हैं. कुछ लोगों को स्वास्थ्य सेवा अगर नहीं मिल रही, तो उनका दर्द महसूस करके आप उन्हें अस्पताल की सुविधा दे पाएँ तो ये मानवता की सेवा है. अगर आप पढ़ाई से वंचित लोगों के लिए पढ़ने का इंतज़ाम कर पाएँ तो ये मानवता की सेवा है. कुछ इसी तरह की डिमांड उस कॉम्प्लेक्स को बनाने की भी है.

इस वजह से कॉम्प्लेक्स में अस्पताल भी बनेगा और पढ़ाने पढ़ाने की बात भी होगी. लेकिन ये जरूरी नहीं की स्कूल जैसा ही हो. वो कहते हैं हम इतिहास दिखा कर भी लोगों को पढ़ा सकते हैं. आज के समाज में जो लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं उनको पाटते का काम करेगी ये कॉम्प्लेक्स.

हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि मस्जिद का नक़्शा कब तक बन कर तैयार होगा. ना ही इस सवाल का जवाब दिया कि मस्जिद का नाम क्या रखेंगे और नींव रखते समय किन्हें निमंत्रण भेजेंगे.

लेकिन अंत में उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मेरे लिए इस मस्जिद का डिज़ाइन तैयार करना गर्व की बात है और उससे भी बड़ी बात है कि मुझे ये कार्यभार सौंपा गया. पूरी कोशिश होगी कि डिज़ाइन ऐसा बनाऊं की दुनिया में इसकी मिसाल दी जाए.

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