अयोध्या में राम मंदिर बनने का असर क्या काशी-मथुरा पर भी होगा?

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राम मंदिर आधारशिला कार्यक्रम के ठीक पाँचवे दिन, यानी 10 अगस्त को, अयोध्या से क़रीब 533 किलोमीटर दूर वृंदावन के सुदामा कुटी में हिंदू साधु-संतों की एक बैठक हुई.
यहां राम मंदिर निर्माण की शुरुआत पर हर्षोल्लास की अभिव्यक्ति के साथ-साथ मथुरा और काशी पर 'रणनीति बनाने' और 'मुहिम चलाने' को लेकर बातचीत हुई.
सुदामा कुटी और काशी विद्वत परिषद की ओर से जारी बयान में 'अतीत में सनातन धर्म और मंदिरों पर आक्रांताओं के कुठाराघात', 'मंदिरों पर क़ब्ज़े', 'दो महापुरुषों मोदी और योगी के हाथ मज़बूत करने,' जैसी बातों का उल्लेख है.
साथ ही कहा गया - 'अयोध्या तो झांकी थी मथुरा और काशी बाक़ी है' का नारा अब चारों तरफ़ गूंजता दिखाई देगा.
हालांकि बैठक में शामिल मनोज मोहन शास्त्री के मुताबिक़ हिंदुओं के देवता कृष्ण के जन्मोत्सव, जन्माष्टमी के ठीक दो दिन पहले आयोजित मीटिंग मुद्दे का 'प्रारंभ' भर थी.
वहीं काशी विद्वत परिषद के पश्चिम भारत के प्रभारी नागेंद्र महाराज ने कहा कि पूरे मामले में किस तरह के क़दम उठाए जाएंगे, अदालत जाएंगे या क्या करेंगे ये सब निर्णय लिए जाने में अभी समय है. काशी विद्वत परिषद हिंदू धर्माचार्यों और विद्वानों की सर्वोच्च संस्था बताई जाती है.
हिंदुओं के एक बड़े वर्ग की आस्था है कि कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा ही है. शहर के कटरा केशव देव इलाक़े में जहां इस वक़्त कृष्ण से जुड़े कई मंदिर और ईदगाह हैं. माना जाता है कि इसी स्थान पर कृष्ण के माता-पिता को मामा कंस ने क़ैद कर रखा था.

1968 का समझौता
अयोध्या राम मंदिर निर्माण के लिए तैयार ट्रस्ट श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास ने 11 अगस्त को मथुरा में कहा कि अयोध्या के बाद अब मथुरा का नंबर है.
नृत्य गोपाल दास ने वृंदावन में हुई बैठक के बारे में पूछे जाने पर कहा कि साधु-संतों की जहां ज़रूरत हुई वहीं जाएंगे लेकिन उन्होंने 'कृष्ण जन्मभूमि' को लेकर किसी तरह के आंदोलन की बात से ये कहते हुए इनकार किया कि मंदिर-मस्जिद का कोई विवाद नहीं है और दोनों की जगह अलग-अलग हैं.
मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद और कृष्ण जन्मभूमि मंदिर की दीवारें एक दूसरे से लगी हुई हैं लेकिन दोनों पक्षों- शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के बीच 51 साल पहले 12 अक्टूबर,1968, में समझौता हो चुका है.
इसके अनुसार मुस्लिमों ने अपने क़ब्ज़े के कुछ हिस्से हिंदू पक्ष के लिए ख़ाली किए थे और दोनों धार्मिक स्थलों में अपने-अपने मज़हबी रीति-रिवाज के मुताबिक़ पूजा और नमाज़ जारी है.

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के साथ-साथ श्री कृष्ण जन्मभूमि न्यास के भी अध्यक्ष पद पर मौजूद नृत्य गोपाल दास के हवाले से कहा गया है कि मथुरा के इस दौरे में वो साथ में अयोध्या से सरयू नदी का जल भी लाए थे जिसका इस्तेमाल जन्माष्टमी उत्सव के दौरान किया गया.
ख़बरों में कहा गया है कि जब नृत्यगोपाल दास से पूछा गया कि क्या सरयू का जल लाये जाने को किसी संकेत की तरह देखा जाना चाहिए, तो उन्होंने कहा कि जल कहीं का हो अभिषेक होना चाहिए.
इक़रारनामे का विरोध
इस बीच श्री कृष्ण जन्मभूमि न्यास के सचिव कपिल शर्मा और एक सदस्य गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी मुस्लिमों के साथ हुए इक़रारनामे को मानने से इनकार कर रहे हैं.
दूसरी तरफ़ एक संत देवमुरारी बापू ने बयान दिया है कि 'मंदिर बनाने के लिए मस्जिद को हटाना पड़ेगा.'
देवमुरारी बापू के ख़िलाफ़ पुलिस ने उकसाने के इरादे से भड़काऊ भाषण देने का मुक़दमा दर्ज किया है.

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देवमुरारी बापू का कहना है कि वो लोग जो आज अचानक से मुखर हो गए हैं उन्हें लगा कि 'कृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास का आंदोलन बड़ा हो जाएगा' तो उन्होंने दबाव बनाकर मेरे ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करवाया है.
गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि जिन लोगों ने 1968 का इक़रारनामा किया था 'उन्हें स्थानीय कमिटी ने अधिकृत ही नहीं किया था' और 'जब ये विषय आएगा तो वो इसे अदालत में देखेंगे'.
विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हुए गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी इस बात को भी ग़लत बताते हैं कि वो कृष्ण जन्मभूमि मामले पर लंबे समय तक ख़ामोश रहे और कहते हैं कि तय था कि पहले अयोध्या का मसला हल हो जाए, जब तक वो न होगा तब तक दूसरे की बात नहीं करेंगे.

ज़ी टेलीवीज़न चैनल से एक बातचीत में उन्होंने हिंदुत्ववादी संगठनों के उस दावे को फिर से दोहराया कि हालांकि चालीस हज़ार मंदिरों को तोड़ा गया था लेकिन हिंदू सिर्फ़ तीन काशी, मथुरा और अयोध्या की मांग कर रहे हैं और सवाल भव्य मंदिर का नहीं है मुद्दा है भूमि के पवित्र होने का.
कपिल शर्मा का कहना है कि अयोध्या में विवाद ज़मीन के मालिकाना हक़ का था, पर मथुरा में तो भूमि का स्वामित्व श्री कृष्ण जन्मस्थान न्यास के पास है, इस मामले में संत समाज जो फ़ैसला करेगा वो सभी को मानना होगा.
श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट
मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि से संबंधित जो मंदिर या स्थल है उनका निर्माण बीसवीं सदी में हुआ जिसकी पहल मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई थी जब उनके प्रयास से फ़रवरी 1944 में ज़मीन ख़रीदी गई और फिर 1951 में श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट का गठन हुआ और 'कटरा केशव देव' पर उसका अधिकार हो गया.
ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के नाम से हुआ.
मुसलमानों के साथ जो इक़रारनामा 1968 में हुआ वो शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के बीच में ही था.
सर्वपल्ली गोपाल की मशहूर किताब 'एनाटोमी ऑफ़ कन्फ्रन्टेशन: अयोध्या एंड द राइज़ ऑफ़ कम्युनिल पॉलिटिक्स इन इंडिया' में भी इस इक़रारनामे का ज़िक्र है.

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किताब में छपे इक़रारनामे में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ की ओर से देवधर शास्त्री को अधिकृत व्यक्ति और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट की तरफ़ से शाह मीर मलीह और अब्दुल ग़फ्फ़ार को प्रतिनिधि नियुक्त करने की बात दर्ज है.
बाद में मनोहर लाल शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने 1968 में हुए इक़रारनामे को अदालत में चैलेंज भी किया था लेकिन वो मामला शायद आगे तक नहीं जा पाया.
मुस्लिम पक्ष ये मानता है कि इक़रारनामा के बाद ज़मीन के स्वामित्व का दाख़िल-ख़ारिज कई कोशिशों के बावजूद वो ईदगाह ट्रस्ट के नाम से नहीं करवा पाए.
शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के अध्यक्ष ज़ेड हसन कहते हैं कि साल 2017 में भी कचहरी के माध्यम से स्वामित्व को मस्जिद के नाम से करवाने की कोशिश की गई थी लेकिन वो किसी न किसी वजह से ये टलता रहा.

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लेकिन वीएचपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल का कहना है कि फ़िलहाल उनके संगठन का पूरा ध्यान अयोध्या पर केंद्रित है और वो कहीं और ध्यान नहीं दे रहे.
हालांकि वो कहते हैं कि 'काशी और मथुरा हमारे संकल्प का हिस्सा है और वो ख़त्म नहीं हुआ'.
ख़बर है कि वाराणसी में भी कुछ संगठन काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मुद्दा उठा रहे हैं जबकि वहां 600-करोड़ रुपए की लागत से काशी विश्वनाथ कॉरीडर प्रोजेक्ट का काम तेज़ी से जारी है.
आरएसस का रुख़
नौ नवंबर, 2019 को राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बयान दिया था कि संघ मथुरा और काशी को लेकर किसी तरह के आंदोलन में शामिल नहीं होगा.
उनका कहना था कि 'संघ आंदोलनों में शामिल नहीं होता ... उसका काम चरित्र-निर्माण है.'
लेकिन 1990 के दशक में आरएसएस-बीजेपी-वीएचपी ने खुलकर अयोध्या मामले की कमान अपने हाथों में ली थी. इस मामले को पहले राम राज्य परिषद, हिंदू महासभा और दूसरे संगठन भारत की आज़ादी के बाद से ही लगातार उठाते रहे थे.

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इसी दौरान जून में विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ नाम की एक संस्था ने उपासना स्थल क़ानून, 1991 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में लाए गए इस क़ानून के मुताबिक़ किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप (जो 15 अगस्त, 1947 की स्थिति) से छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता है. अयोध्या को इस क़ानून की परिधि से बाहर रखा गया था.
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