अयोध्या राम मंदिर भूमि पूजन में पीएम मोदी के जजमान बनने के मायने क्या: नज़रिया

नरेंद्र मोदी

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    • Author, रामदत्त त्रिपाठी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं जजमान बने थे, जजमान के तौर पर उन्होंने पूजा की. जजमान बनना अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है. यह उनके भाषण से भी महत्वपूर्ण है.

हम समझ रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जो ट्रस्ट बना है, ये उसका कार्यक्रम है, उसका कोई ट्रस्टी या अध्यक्ष पूजन करेगा और प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि होंगे, जैसा कि होता है.

लेकिन प्रधानमंत्री ने अपनी समझ से खुद जजमान बनना उचित समझा. जब स्वयं प्रधानमंत्री जजमान बनते हैं तो उसकी व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि यह सरकार का प्रोजेक्ट है.

जो भाषण उन्होंने दिए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जो कहा, वो काफ़ी आश्वस्त करने वाले हैं. इस दौरान हम देख रहे हैं कि सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें हो रही हैं और कई मुद्दे उछाले जा रहे हैं जिनमें मथुरा, बनारस और हिंदू राष्ट्र का भी मुद्दा है. ये सब मुद्दे उछाले जा रहे हैं.

उस माहौल में उनका भाषण आश्वासन देने वाला है क्योंकि उन्होंने कहा कि भेदभाव नहीं होगा किसी के साथ और सबका ख्याल रखा जाएगा.

उन्होंने राम के आदर्शों की बार-बार व्याख्या की और जो जयश्री राम का नारा था, यह थोड़ा डराने वाला नारा था उसकी जगह उन्होंने जय सिया राम बार-बार कहा. हम लोग रामलीला में जय सिया राम का नारा ही लगाते थे.

यह सब बातें अपनी जगह तो हैं ही, उन्होंने ये भी कहा कि इससे भारत एक शक्ति के रूप में बनकर उभरेगा.

चूंकि इस मुद्दे से देश के लोगों की आस्था जुड़ी है, भावनाएं जुड़ीं थीं. तमाम जगहों से मिट्टी, जल और शिलाएं आई हैं तो उससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा हुई है, अब प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी हैं कि वो इस ऊर्जा को सही दिशा में ले जाएं. वरना पहले की तरह विवादित एजेंडा सामने आता है जो पहले था तो समस्याएं होंगी.

दूसरे एक बात यह भी है कि आज जो मंदिर निर्माण की शुभ घड़ी आयी वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से आयी. क़ानून से परे जाकर शांति की भावना से सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला दिया था. क़ानून के मुताबिक तो इसी परिसर में मस्जिद के लिए ज़मीन दी जानी चाहिए थी लेकिन यह पूरा परिसर दिया गया. उम्मीद की जा रही थी कि ये राष्ट्र के प्रतीक के तौर पर सबको जोड़ने वाली जगह बनेगी. क्योंकि राम किसी एक जाति या धर्म के नहीं हैं. वे भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

डराने की ज़रूरत नहीं है

जो ट्रस्ट बना उसमें ऐसा देखने को नहीं मिला. कई संगठनों का प्रतिनिधित्व नहीं है. तमाम लोगों के बयान आए जो निराश हुए. राम राज्य परिषद, राम जन्मभूमि पुर्णोद्वार समिति, शिवसेना, हिंदू महासभा का कोई सदस्य नहीं है.

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ऐसे में यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और बीजेपी के एक गुट का कार्यक्रम रह गया है. क्योंकि इसमें लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह और उमा भारती जैसे नेता शामिल नहीं थे.

कई लोगों के मन चिंता है, उम्मीद करते हैं वो ग़लत साबित हो, वो चिंता ये है कि दुनियाभर में कई शासक धर्म के बहाने सत्ता पर अपने एकाधिकार की ओर बढ़ रहे हैं, कहीं भारत में वैसा ना हो. यह आशंका है.

एक आशंका और है. तमाम बातों के साथ जब प्रधानमंत्री ने कहा कि बिन भय होए न प्रीत, ये पता नहीं किस संदर्भ में कहा उन्होंने. वो किसे डराना चाहते हैं. जिन लोगों से ज़मीन छिनी है उसे डराना चाहते हैं या पाकिस्तान को डराना चाहते हैं या फिर चीन को.

लेकिन उन्होंने एक तरह से शक्ति का अहसास कराया कि मैं शक्तिमान हूं. लेकिन शक्ति के साथ संयम बहुत ज़रूरी है. जितनी हाईस्पीड की गाड़ी होती है ब्रेक उतने मजबूत होने चाहिए.

विपक्षी दल जो सत्ता में नहीं हैं, अगर वे व्यक्तिवादी हों तो उतना ख़तरा नहीं है लेकिन आज सत्ताधारी दल में एक व्यक्ति के हाथों में सारी ताक़त आती जा रही है तो हम उम्मीद करें कि भगवान राम सबको सन्मति देते हैं.

अनुरूप राम राज्य में भी कल्पना है कि कोई दुखी ना हो, दरिद्र ना हो और निर्भय हो लोग. तो शक्ति से डराने की ज़रूरत नहीं है, आश्वस्त करने की ज़रूरत है.

उम्मीद यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस अच्छी भावनाओं की बातें कहीं हैं, उसे वो व्यवहार रूप में भी परिणत करेंगे.

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित, आलेख में लेखक के निजी विचार हैं)

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