जापान के पीएम शिंज़ो आबे के इस्तीफ़े का भारत पर क्या असर होगा? - प्रेस रिव्यू

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जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे के अचानक पद छोड़ने के निर्णय का असर अगले महीने भारत और जापान के बीच होने वाली शिखर-वार्ता पर नहीं पड़ेगा.
अंग्रेज़ी अख़बार इकोनॉमिक टाइम्सने सूत्रों के हवाले से यह ख़बर दी है.
लंबे वक़्त तक जापान के प्रधानमंत्री रहे शिंज़ो आबे ने शुक्रवार को ऐलान किया कि वे स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफ़ा दे रहे हैं.
दोनों देशों के बीच प्रस्तावित शिखर-वार्ता अब वीडियो लिंक के ज़रिए होगी.
ये वार्ता भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि इस समय सीमा पर चीन के साथ उसके रिश्ते तो तनावपूर्ण हैं ही, इसके अलावा वो हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता से भी चिंतित है.
पहले इस शिखर-वार्ता को सीएए विरोध प्रदर्शनों की वजह से अप्रैल तक टालना पड़ा था और फिर कोरोना महामारी की वजह से इसे सितंबर तक टाल दिया गया.
शिंज़ो आबे और उनकी कैबिनेट तब तक सरकार चलायेंगे, जब तक नया प्रधानमंत्री नहीं चुन लिया जाता. हालांकि, इस बीच कैबिनेट किसी नई नीति का ऐलान नहीं कर सकती.

अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सिंतबर में होने वाली शिखर-वार्ता की तारीख़ आगे बढ़ाने के लिए अब तक कोई ख़बर सामने नहीं आई है, इसलिए मुमकिन है कि ये अपने निर्धारित समय पर हो.
आबे के इस्तीफ़ा सौंपने के बाद सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी (एलडीपी) में प्रधानमंत्री पद के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का अनुमान लगाया जा रहा है.
नए चुने गए प्रधानमंत्री आबे की बाकी टीम के साथ काम करेंगे.
प्रस्तावित शिखर-वार्ता में जो मुद्दा सबसे अहम होगा, वो है- एक्विज़िशन एंड क्रॉस सर्विसिंग अग्रीमेंट (एसीएस).
इसके तहत भारतीय नौसेना को जिबूती में जापानी मिलिट्री बेस का एक्सेस मिलेगा और जापान की नौसेना अंडमान निकोबार द्वीप में प्रवेश कर सकेगी.
इसके अलावा शिखर-वार्ता में भारत में जापान के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) बढ़ाने और जापानी कंपनियों के चीन से भारत आने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है.

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लोकसभा स्पीकर की चिट्ठी से सांसदों में 'खलबली'
संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से पहले लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सभी संसदीय समितियों के अध्यक्षों को एक चिट्ठी भेजी है.
इस चिट्ठी में उन्होंने अपील की है कि ‘समितियों में उन मसलों पर चर्चा या पड़ताल ना हो जो पहले से अदालतों में लंबित हैं.’
इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में छपी रिपोर्ट के अनुसार, 25 अगस्त को भेजे इस पत्र से सांसदों और विशेषज्ञों में बहस पैदा हो गई है.
उनका कहना है कि अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब अदालत में लंबित मामलों पर संसदीय समितियों में चर्चा हुई.
विरोधियों का कहना है कि इस चिट्ठी से अजीब मानक बना दिये जाएंगे.
संसदीय समितियों के अध्यक्ष रहे लोगों का मानना है कि संसदीय समितियाँ संसद का ही एक रूप होती हैं और ये एक मौलिक नियम है कि 'संसद सर्वोच्च है.'
विरोधियों का कहना है कि यही नियम संसदीय समितियों पर भी लागू होता है.
प्रस्ताव का विरोध करने वालों का तर्क है कि 'अदालतों में तो ना जाने कितने मामले लंबित हैं, इसलिए संसदीय समितियों में उनपर चर्चा आख़िर कैसे रोकी जा सकती है?'

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अल्पसंख्यक कौन? सुनवाई के लिए तैयार सुप्रीम कोर्ट
भारतीय सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है कि क्या किसी समुदाय को किसी राज्य में इसकी आबादी के आधार पर, उसके धार्मिक या भाषाई रूप से अल्पसंख्यक माना जा सकता है?
अगर ऐसा हुआ तो ये समुदाय राज्य में अपनी पसंद की अल्पसंख्यक संस्थाएं जैसे स्कूल और कॉलेज बना सकेंगे. यह ख़बर टाइम्स ऑफ़ इंडियामें है.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक ऐसी ही याचिका ख़ारिज कर दी थी जिसमें राज्यों में आबादी के आधार पर समुदायों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की माँग की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “राज्यों का गठन भाषाई आधार पर हुआ था, धार्मिक आधार पर नहीं. जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं, लेकिन बाकी देश में अल्पसंख्यक. इसी तरह लक्षद्वीप में महज़ दो फ़ीसदी हिंदू है, लेकिन बाकी देश वो बहुसंख्यक हैं.”
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