बांग्लादेश को भारत की वैक्सीन देने की घोषणा की वजह चीन तो नहीं?

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- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये साल बांग्लादेश और भारत संबंधों के लिए शायद एक ख़ास साल होता क्योंकि ये बांग्लादेश की आज़ादी के नायक शेख़ मुजीबुर्रहमान की जन्मशती का वर्ष है जिसे बांग्लादेश ने 'मुजीब वर्ष' मनाने की तैयारी की हुई थी. बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम में भारत का योगदान दोनों देशों के रिश्तों में एक भावुक अध्याय रहा है.
17 मार्च को, शेख़ मुजीब की जयंती के दिन ढाका के नेशनल परेड ग्राउंड में एक भव्य आयोजन होना था. जिन विदेशी नेताओं को आमंत्रित किया गया उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे.
शेख़ मुजीब की बेटी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भी न्यौता भेजा था, जो बांग्लादेश की संसद के एक विशेष सत्र को संबोधित करने वाले थे.
भारत कितना उत्सुक था इस आयोजन को लेकर, उसकी एक झलक इस बात से भी मिलती है कि भारतीय विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला प्रधानमंत्री मोदी के दौरे की तैयारियों के लिए 2 मार्च को ही ढाका पहुँच गए थे.
लेकिन आयोजन के दसेक दिन पहले बांग्लादेश में कोरोना संक्रमण के तीन मामलों का पता चला और बांग्लादेश सरकार ने आयोजन को काफ़ी सीमित कर दिया. प्रधानमंत्री मोदी का दौरा भी टल गया.

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पाँच महीने बाद अचानक ये ख़बर आई कि हर्षवर्धन श्रृंगला महामारी के शुरू होने के बाद पहली बार कोई विदेश यात्रा करने जा रहे हैं. और वो देश बांग्लादेश था. वो ख़ुद बांग्लादेश में तीन साल तक भारत के उच्चायुक्त रह चुके हैं.
दो दिन के अपने दौरे के आख़िरी दिन बांग्लादेश के विदेश सचिव के साथ बैठक के बाद श्रृंगला ने पत्रकारों से कहा, "मैं यहाँ इसलिए आया क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री को लगा कि कोविड दौर में हमारे बीच उतना संपर्क नहीं हो सका था, लेकिन हमारे रिश्ते जारी रहने चाहिए."
श्रृंगला ने कहा कि 'दोनों देशों के बीच पिछले किसी भी वक़्त की तुलना में अभी अच्छा संबंध है, ये एक स्वर्णिम अध्याय है, जिसे हम आगे भी बनाए रखेंगे".
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भारतीय विदेश सचिव ने वहाँ एक और अहम बात कही. उन्होंने कहा कि जैसे ही भारत में कोरोना का टीका विकसित होता है तो उसे देने में बांग्लादेश को प्राथमिकता दी जाएगी. उन्होंने कहा कि भारत कोविड-19 के टीके के परीक्षण में काफ़ी आगे के दौर में है और वो बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन करेगा.
हर्षवर्धन श्रृंगला ने कहा,"वैक्सीन बनी, तो हमारे दोस्त, सहयोगी, पड़ोसी सबको बिना बोले मिलेगी और हमारे लिए बांग्लादेश हमेशा से प्राथमिकता में रहा है."
लेकिन श्रृंगला के अचानक हुए इस दौरे को लेकर कुछ सवाल पैदा होते हैं. पहला तो यही कि अचानक से बांग्लादेश इतना ख़ास क्यों हो गया भारत का?
बांग्लादेश में भारत की उच्चायुक्त रह चुकीं वीणा सीकरी कहती हैं कि पड़ोसियों में बांग्लादेश का स्थान अलग है क्योंकि दोनों देशों के बीच जितनी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है, वैसी किसी देश के साथ नहीं होती.

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वीणा सीकरी ने कहा, "बांग्लादेश में भारत का उच्चायोग हर साल 15 लाख वीज़ा जारी करता है, जब मैं वहाँ थी (2003-2006) तो केवल 5 लाख लोगों को वीज़ा दिया जाता है. तो ये संख्या तीन गुना हो गई है."
उनका मानना है कि 'ये घोषणा रणनीतिक तौर से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत ने ये संकेत दिया है कि हमारी पहली प्राथमिकता हमारे पड़ोसी होंगे और बांग्लादेश उनमें सबसे आगे होगा'.
हालाँकि, दिल्ली के जेएनयू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध के अध्यापक प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का मानना है कि भारतीय विदेश सचिव के बांग्लादेश दौरे की एक बड़ी वजह चीन की वहाँ बढ़ती सक्रियता है.
वो बताते हैं कि चीन ने पिछले साल के अंत में बांग्लादेश में 6.4 अरब डॉलर का एक अनुबंध किया था, और इस साल फ़रवरी में कहा कि वो एक अरब डॉलर दे देगा, यानी वो उस कॉन्ट्रैक्ट को बड़ी तेज़ी से बढ़ाना चाहता है.
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह ने कहा, "चीन का वहाँ जो बढ़ता प्रभाव है उसका सीधा असर भारत की नीति पर है और जिस तरह से बांग्लादेश में चीन का रूझान और रफ़्तार बदल रहा है उसी की वजह से ये यात्रा हुई है और कई लोग इसे 2015 में हुई सार्क यात्रा से भी जोड़कर देख रहे हैं कि शायद अब विदेश सचिव दूसरे देशों में भी जाएँगे और कहेंगे कि इस महामारी का हम मिलकर कैसे सामना करें."

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क्या चीन भी देगा बांग्लादेश को वैक्सीन
भारत की घोषणा को लेकर ये भी क़यास चल रहे हैं कि कुछ समय पहले चीन ने भी बांग्लादेश को टीका देने की बात की थी, तो कहीं भारत की सक्रियता इस वजह से तो नहीं है?
पिछले दिनों ख़बर आई थी कि बांग्लादेश की संस्था बांग्लादेश मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने चीन की एक कंपनी सिनोवैक बायोटेक लिमिटेड के बनाए टीके को अपने देश में परीक्षण करने की मंज़ूरी दे दी है.
चीन ने इससे पहले जून में अपनी एक मेडिकल टीम को भी बांग्लादेश में महामारी की तैयारी का जायज़ा लेने भेजा था.
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं कि ये उस संस्था की घोषणा भर है, लेकिन बांग्लादेश सरकार ने इसपर खुलकर कुछ नहीं कहा है. पर भारत की स्थिति अलग है क्योंकि बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी किया है कि वो भारत में बने टीके के ट्रायल से जुड़ेगा.
प्रोफ़ेसर सिंह कहते हैं कि 'इसलिए ये कह सकते हैं कि भारत ने इस बारे में चीन से एक क़दम आगे बढ़ा दिया है'.

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वीणा सीकरी कहती हैं, "जो चीन की वैक्सीन है उसका ट्रायल हो या ना हो, ये तो बांग्लादेश सरकार फ़ैसला करेगी, लेकिन मेरा ख़याल है उनको स्वीकृति नहीं मिल पाई है जबकि हर्षवर्धन श्रृंगला की यात्रा अच्छी रही, मुझे लगता है धीरे-धीरे अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी उनकी यात्रा शुरू हो जाएगी."
प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह ये भी ध्यान दिलाते हैं कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में वैक्सीन विकसित करने पर काम चल रहा है और आधा दर्जन कंपनियाँ ऐसी हैं जो तीसरे स्टेज के परीक्षण तक पहुँच चुकी हैं.
उन्होंने कहा, "अगर भारत और चीन दोनों बांग्लादेश जाकर वैक्सीन देना चाह रहे हैं तो इसे केवल द्विपक्षीय भिड़ंत के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए, पूरी दुनिया में ऐसी होड़ लगी हुई है."
बांग्लादेश का कितना क़रीबी है चीन
भारत की विदेश नीति पर अक्सर एक आम धारणा ये दिखती है कि भारत के पड़ोसी धीरे-धीरे चीन के प्रभाव में जा रहे हैं. इसे लेकर चिंता तब और बढ़ जाती है जब ऐसी ख़बरें आती हैं कि चीन को बांग्लादेश में अरबों रुपए की परियोजनाओं का ठेका मिल गया.
पूर्व उच्चायुक्त वीणा सीकरी कहती हैं कि चीन और बांग्लादेश के संबंध कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन चीन का मक़सद बांग्लादेश से दोस्ती से ज़्यादा भारत को घेरने और परेशान करने का रहा है.
वीणा सीकरी ने कहा, "चीन ने तो बांग्लादेश को मान्यता तक नहीं दी थी, उनकी आज़ादी की लड़ाई में उन्होंने पाकिस्तान का साथ दिया था. शेख़ मुजीब की हत्या के 15 दिन बाद उन्होंने बांग्लादेश को मान्यता दी. इसके बाद जब वहाँ जनरल ज़ियाउर्रहमान और जनरल इरशाद जैसे सैन्य शासक आए तो उन्होंने चीन के साथ सैन्य संबंध बनाए और बांग्लादेश की सेना का ज़्यादातर साज़ो-सामान चीन से आता रहा है."

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प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह भी मानते हैं कि चीन, बांग्लादेश के साथ जिन परियोजनाओं पर क़दम बढ़ा रहा है वो भारत के लिए संवेदनशील मुद्दे हैं.
वो कहते हैं, "चीन 6.4 अरब डॉलर की योजनाओं में से जो एक अरब डॉलर अभी दे रहा है वो तीस्ता नदी परियोजना के लिए है जो भारत की एक दुखती रग है, 2011 में ही समझौते का मसौदा बन गया था लेकिन वो आज तक अटका पड़ा है, 2015 में जब मोदी जी बांग्लादेश गए थे तो कहा गया था कि बस हस्ताक्षर होने वाले हैं, पर वो आज भी नहीं हो पाया है."
वो बताते हैं कि इनके अलावा भी चीन वहाँ सड़कों, पुलों की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है और हाल के समय में उनकी रफ़्तार में तेज़ी दिखाई देती है जिसकी एक वजह ये भी है कि चीन दावा करता है कि वो कोरोना संकट से बाहर निकल चुका है, जबकि दूसरे देश अभी भी इसमें उलझे हैं.
प्रोफ़ेसर सिंह ने कहा, "चीन ने अभी अपनी विदेश नीति को आक्रामक बनाया हुआ है, वो अपनी चिकित्सा सुविधाएँ या दूसरे उपकरण पूरी दुनिया में पहुँचा रहा है ताकि उसे इस बीमारी का जन्मदाता समझने की धारणा बदले, और इसकी जगह पर उसे महामारी से दुनिया को बचाने वाला देश समझा जाए."
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