राजस्थानः पायलट-गहलोत, कांग्रेस-बीजेपी, आख़िर किसने क्या खोया, क्या पाया?

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- Author, नारायण बारेठ
- पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिन्दी के लिए
राजस्थान में कोई एक महीने से जारी राजनीतिक संकट में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मज़बूत क़िलेबंदी से अपनी सरकार को महफूज़ बचा ले गए, पर सत्तारूढ़ पार्टी में छिड़ी लड़ाई का यह पटाक्षेप नहीं है और प्रेक्षक कहते हैं कि सत्ता पर वर्चस्व को लेकर संघर्ष अभी रुकेगा नहीं.
इस पूरे घटनाक्रम में अशोक गहलोत ने जहाँ अपनी नेतृत्व क्षमता की बानगी प्रस्तुत की, वहीं बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी राज्य की राजनीति में अपना स्थान बनाये रखा.
मगर पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत के लिए यह लम्हा सीखने के लिए अहम है.
यह सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी का आंतरिक संघर्ष था, मगर केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी भी इससे अछूती नहीं रही.
राज्य में जैसे ही कांग्रेस की लड़ाई सतह पर आई, आयकर, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जैसी केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ हरक़त में आ गईं. मुख्यमंत्री गहलोत ने इसे मुद्दा बनाया और आरोप लगाया कि केंद्र की बीजेपी सरकार इन संस्थाओ का सियासी उपयोग कर रही है.
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विद्रोही गुट और कोरोना काल
बीजेपी ने इसका प्रतिवाद किया, लेकिन गहलोत ने इसके लिए केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियो का नाम लेकर कहा कि वे किसी भी क़ीमत पर सरकार गिराने को आमादा हैं.
बीजेपी की स्थिति उस समय हास्यास्पद हो गई, जब उसे भी अपने विधायकों की बाड़ेबंदी करनी पड़ी क्योंकि पहले बीजेपी कांग्रेस के विधायकों को होटल में बंद रखने की आलोचना करती रही थी.
राज्य की सियासत में यह सब कुछ यकायक नहीं हुआ, बल्कि इसकी इबारत पिछले डेढ़ साल से लिखी जा रही थी. लेकिन कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यह इबारत पढ़ नहीं पाया.
सियासी पंडित मानते थे कि कांग्रेस का असतुंष्ट धड़ा किसी समय बग़ावत ज़रूर करेगा. मगर सभी यह मानकर चल रहे थे कि यह विद्रोही गुट कोरोना काल समाप्त होने का इंतज़ार करेगा.
लेकिन गहलोत को अंदेशा था और वे हालात पर नज़र रखे हुए थे. इसीलिए कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने 9 जून को राज्य पुलिस में शिक़ायत दर्ज करवाई कि उनकी सरकार गिराने के लिए विधायकों को प्रलोभन दिया जा रहा है.
इसी कड़ी में गहलोत ने अचानक विधायकों को इक्क्ठा किया और राज्यसभा चुनावों के लिए अपने सदस्यों की एक होटल में बाड़ेबंदी कर दी. इसके उल्ट बागी गुट सरकार गिराने की धमकी को काल्पनिक भय बताता रहा.
जैसे ही राज्यसभा चुनाव संपन्न हुए, कांग्रेस में गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. फिर 13 जुलाई को वो घड़ी आई, जब सचिन पायलट अपने विधायकों को लेकर राज्य से रवाना हो गये और दावा किया कि उनके साथ 30 विधायक हैं, गहलोत सरकार ने बहुमत खो दिया है.

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पायलट की हमदर्द बीजेपी
यह घटना सत्ता से वनवास काट रही राजस्थान बीजेपी के लिए 'एक अच्छा मौक़ा' लेकर आई. राज्य में बीजेपी प्रमुख सतीश पुनिया, प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया, उप-नेता राजेंद्र राठौड़ के साथ केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत ख़ासे सक्रिय दिखाई दिये.
राज्य के लोगों ने देखा कि कैसे कुछ बीजेपी नेता उप-मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट के लिए हमदर्दों वाला रवैया दिखाने लगे. इसी बीच कुछ ऑडियो टेप जारी हुए जिन्होंने इस सियासी संग्राम को एक नया मोड़ दिया.
इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक किसी गजेंद्र सिंह से बात करते सुनाई दिये और ऑडियो में विधायकों को अपने पाले में लाने की बात की जा रही है.
राज्य की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप पुलिस ने इस मामले में मुक़दमा दर्ज किया, पर इसमें राजद्रोह की धारा भी जोड़ दी गई. इसे लेकर पुलिस ने पुछताछ और बयान के लिए मुख्यमंत्री गहलोत के साथ पायलट का भी नाम लिखा.
इसे पायलट ने बड़ा मुद्दा बनाया, लेकिन इस घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके समर्थक या तो चुपी साधे हुए थे या राज्य नेतृत्व ने उन्हें दूर ही रखा. मगर बीजेपी की आंतरिक राजनीति में मचा द्वंद्व तब बाहर आ गया जब राजे समर्थक कुछ प्रमुख नेताओ ने कहा वे किसी भी चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के पक्ष में नहीं हैं.
इस मामले में बीजेपी ने जब भी राज्य स्तरीय नेताओं की बैठक बुलाई, राजे उन बैठकों में मौजूद नहीं रहीं.
हालांकि, प्रतिपक्ष के नेता कटारिया ने बीबीसी से बातचीत में यह दावा किया कि राजे लगातार पार्टी के संपर्क में रही हैं. इस तरह की बात उठाना ग़लत है.
कटारिया के मुताबिक़ राजे ने उन्हें कह रखा था कि वे तीन घंटे के नोटिस पर बैठक के लिए उपलब्ध रहेंगी.

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'राजे चुप रहीं, पर अब संगठन में और मज़बूत पकड़'
क्या पूरे घटनाक्रम में बीजेपी को कोई नुक़सान नहीं हुआ? इस पर कटारिया कहते हैं, "यह कांग्रेस का आंतरिक झगड़ा था. हमारा इससे कोई सरोकर नहीं था. बेशक हम प्रतिपक्ष के नाते नज़र रखे हुए थे और कोई भी निर्णय होता तो हम सामूहिक रूप से लेते."
इस दौरान केंद्रीय एजेंसियो ने गहलोत के भाई और उनके क़रीबी लोगों पर छापे मारे और कार्यवाही की. गहलोत इसे सियासी कार्यवाही बताते हैं.
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस की एक सभा में यह भी कहा कि ''इन छापों के लिए नामों की सूची किसने बनाकर दी, यह सबको पता है." यहाँ उनका इशारा अपनी ही पार्टी के एक नेता की तरफ था.
प्रेक्षक कहते हैं कि राज्य बीजेपी ने राजे को अलग रखना अपनी सियासी सूझ-बूझ समझा, मगर यह उनकी बड़ी भूल थी.
गहलोत ने भी बीजेपी के इन आंतरिक समीकरणों को देखकर बार-बार कहा कि इस पूरे मामले में राजे ख़ामोश हैं.
राजे और उनके समर्थकों ने केंद्रीय नेतृत्व से कुछ मुद्दों पर अपनी नाराज़गी भी व्यक्त की.
दरअसल, राज्य में बीजेपी की सहयोगी, राष्ट्रीय लोकतंत्रिक पार्टी के सांसद हनुमान बेनीवाल राजे पर निशाना साधते रहे हैं. बेनीवाल कहते रहे हैं कि राजस्थान में गहलोत और राजे की मिली-भगत है.
बेनीवाल के इस बयान पर राजे समर्थकों ने कड़ी आपत्ति व्यक्त की. सूबे की सियासत के जानकार कहते हैं कि बीजेपी और कांग्रेस, दोनों एक दूसरे के संगठन में उभरी फूट का अपने हक़ में इस्तेमाल करने का प्रयास करते रहे हैं.
राज्य की राजनीति पर निगाह रखते रहे पत्रकार अवधेश आकोदिया कहते हैं कि गहलोत अपनी सियासी कुशलता से सरकार को सुरक्षित बचा ले गए. इससे उनका क़द बढ़ा है, मगर गहलोत के कुछ बयानों से उनकी छवि को भी नुक़सान हुआ है.
अकोदिया कहते हैं कि इस घटनाक्रम में जहाँ गहलोत और राजे अपने-अपने संगठन में मज़बूत होकर उभरे हैं. वहीं पायलट और केंद्रीय मंत्री शेखावत को क्षति पहुँची है.

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'पायलट की वापसी, पर घाटे में'
अकोदिया कहते हैं कि पायलट को एक माह की बग़ावत के बाद शिक़ायतें सुनने के लिए सिर्फ़ एक कमेटी के गठन की उपलब्धि मिली है. पर इसके बदले उन्हें उप-मुख्यमंत्री पद और प्रदेश अध्यक्ष का ओहदा गँवाना पड़ा है.
वे कहते हैं कि अभी यह तोहमत उनका लम्बे समय तक पीछा करती रहेगी कि पायलट पार्टी के प्रति वफ़ादार नहीं हैं.
पायलट की वापसी की ख़बर संगठन के भीतर बहुत उत्साह से नहीं सुनी गई. बल्कि कांग्रेस विधायक दल में विधायकों ने विद्रोह करने वाले सदस्यों की वापसी का विरोध ही किया है.
राज्य के स्वायत शासन मंत्री शांति धारीवाल कहते हैं कि ऐसे लोगों को वापस नहीं लेना चाहिए.
राज्य में पूरे एक माह तक होटल और रिसॉर्ट सियासी आम्दो-रफ़्त से गुलज़ार रहे, जबकि राजनीतिक पार्टियों के दफ़्तर सन्नाटे से गुज़रते रहे.
जयपुर में वरिष्ठ पत्रकार राकेश गोस्वामी कहते हैं कि इस घटनाक्रम ने यह साफ़ कर दिया कि कोई गहलोत और राजे से सहमत भले ना हो पर राज्य की सियासत में उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता. इन दोनों का अपना स्थान है और उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती.
गोस्वामी कहते हैं कि कांग्रेस की यह लड़ाई अभी ख़त्म नहीं होने वाली. पायलट की वापसी को युद्ध-विराम समझना एक भूल होगी.
गोस्वामी कहते हैं, "सौ विधायकों के प्रबल समर्थन, कुछ सबूत और घटनाओं के बावजूद गहलोत पूर्व उप-मुख्यमंत्री पायलट को राज्य की राजनीति में अप्रसांगिक नहीं कर पाये हैं."
वे कहते हैं कि राज्य में राजे के विकल्प के रूप में उभर रहे बीजेपी के दूसरे नेताओ को भी नुक़सान हुआ है. सूबे में यह संदेश गया है कि वे राजनीतिक रूप से बहुत परिपक्वता नहीं दिखा पाये.

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'शेखावत को क्षति पहुँची'
गहलोत के गढ़ जोधपुर में कांग्रेस को परास्त कर संसद पहुँचे केंद्रीय मंत्री शेखावत बीजेपी आला कमान की पसंद रहे हैं, लेकिन जब उन्हें राज्य पार्टी का अध्यक्ष बनाने का मौक़ा आया तो राजे ने अवरोध पैदा कर दिया.
शेखावत को राजे के विकल्प में देखा जा रहा था. मगर प्रेक्षक कहते हैं कि इस विवाद में शेखावत को क्षति पहुँची है.
जहाँ केंद्रीय एजेंसियों ने गहलोत के नज़दीकी लोगों पर छापे मारे, वहीं राज्य पुलिस ने शेखावत के ख़िलाफ़ एक आपराधिक मामले में जाँच शुरू की है.
शेखावत कहते हैं कि यह बदले की कार्यवाही है, क्योंकि उन्होंने गहलोत के पुत्र को लोकसभा चुनाव में शिकस्त दी थी. पर मुख्यमंत्री गहलोत कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने मंत्री पर लगे आरोपों के बाद पद से हटा देना चाहिए.
वे कहते हैं कि केंद्रीय एजेंसियों को शेखावत के विरुद्ध जाँच करनी चाहिए. मगर शेखावत अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताते हैं.
इस संकट के दौरान राज्य में ऐसा कोई मक़ाम और मोर्चा नहीं बचा, जहाँ लड़ाई ना लड़ी गई हो. पर इसके बावजूद यह संघर्ष अब भी अनिर्णीत है.
पत्रकार अवधेश अकोदिया कहते हैं कि राजस्थान ऐसे राज्य के रूप में उभरकर सामने आया है, जहाँ 'ऑपरेशन लोटस' सफ़ल नहीं हो पाया.
बहरहाल, धुंध कुछ हटी है, मगर सियासी फलक ने अब भी कुहांसे की चादर ओढ़ रखी है. सांस्कृतिक तौर पर राजस्थान को सतरंगी कहा जाता है, पर बीते एक महीने में सियासत ने जितने रंग दिखाये, वो इस सूबे ने पहले कभी नहीं देखे.
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