राजस्थान का संकट: गहलोत-पायलट-कलराज मिश्र के रूप में चेहरे बदले, कहानी पुरानी है

अशोक गहलोत

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

राजनीतिक मंच वही है, पटकथा भी वही है मगर इस बार पात्र अलग हैं. राजस्थान में जो कुछ हो रहा है वो नब्बे के दशक की शुरुआत यानी 1993 में भी हो चुका है. फिर यही सबकुछ 1996 में भी हुआ.

वर्ष 1993 में केंद्र में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी जब भारतीय जनता पार्टी के भैरों सिंह शेखावत की सरकार बहुमत में थी.

कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन की दावे को लेकर कांग्रेस ने सरकार गिराने के लिए पूरी कोशिश की थी. तब राजस्थान के राज्यपाल बलिराम भगत हुआ करते थे.

राज भवन के रवैये का भारतीय जनता पार्टी के विधायक और मुख्यमंत्री विरोध करते रहे और अंततः राज्यपाल को मुख्यमंत्री की बात सुननी पड़ी थी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी रही. लेकिन राज्यपाल को तब भी फ़ैसला लेने में काफ़ी समय लगा था.

उस वक़्त भारतीय जनता पार्टी के 95 विधायक थे जबकि कांग्रेस के पास 75 और बाक़ी के 20 निर्दलीय विधायक थे.

भैरों सिंह शेखावत की सरकार को गिराने का एक और प्रयास भी 1996 में हुआ था जिसका नेतृत्व कांग्रेस के भंवरलाल शर्मा कर रहे थे. भंवरलाल शर्मा सचिन पायलट के खेमे में हैं.

ध्यान में रखने वाली बात यह है कि उस समय अशोक गहलोत प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष थे मगर वो भारतीय जनता पार्टी की सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं थे.

अब परिदृश्य बदला. हालांकि पटकथा वही है. इस बार बहुजन समाज पार्टी के सारे के सारे छह विधायकों ने कांग्रेस में विलय की घोषणा कर दी. जिसे पहले भारतीय जनता पार्टी ने स्पीकर के यहाँ चुनौती दी और फिर उसने इस विलय के ख़िलाफ़ राजस्थान उच्च न्यायलय का दरवाज़ा खटखटाया है.

मायावती

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भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान प्रदेश के अध्यक्ष सतीश पुनिया कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी एक राष्ट्रीय पार्टी है जिसका विलय राष्ट्रीय पार्टी में ही हो सकता है.

वो संविधान का हवाला देते हुए कहते हैं कि अगर विलय की बात होती है तो पूरी की पूरी बहुजन समाज पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय होना ज़रूरी है. उनका आरोप है कि इसी बात को उनकी पार्टी के विधायक मदन दिलावर ने अदालत में चुनौती दी है.

जयपुर से मिल रही जानकारी के अनुसार अब बहुजन समाज पार्टी ने भी अपने विधायकों के कांग्रेस में विलय से संबंधित याचिका दायर की है जिसे मदन दिलावर की याचिका के साथ सुना जाएगा.

दिलावर कहते हैं कि उन्होंने इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के सामने भी उठाया था और लिखित आपत्ति दर्ज की थी. उनका कहना है कि जब विधानसभा अध्यक्ष ने उनके प्रतिवेदन पर कोई संज्ञान नहीं लिया तो फिर उन्हें अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा.

राज्यपाल ने मांगा स्पष्टीकरण

इस बीच राज्यपाल कलराज मिश्र ने दूसरी बार राजस्थान सरकार के मंत्रिमंडल के विधानसभा को आहुत करने के प्रस्ताव को वापस लौटाकर कुछ बिंदुओं पर फिर से स्पष्टीकरण माँगा है.

राज्यपाल ने सरकार के प्रस्ताव पर टिप्पणी करते हुए पूछा है कि "क्या राज्य सरकार विधानसभा का सत्र विश्वास प्रस्ताव के लिए आहुत करना चाहती है? ये स्पष्ट नहीं है. ये सिर्फ़ मीडिया में कहा जा रहा है."

कलराज मिश्र- अशोक गहलोत

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इसके अलावा राज्यपाल ने तेज़ी से फैल रहे कोरोनावायरस के संक्रमण का भी उल्लेख करते हुए सरकार को अपनी टिप्पणी में में कहा है कि महामारी की वजह से सभी विधायकों को सत्र के लिए विधानसभा में बुलाना उचित नहीं होगा. उन्होंने पूछा, "क्या सत्र बुलाने के लिए सभी विधायकों को को 21 दिनों का नोटिस नहीं दिया जाना चाहिए?"

वैसे, दूसरी बार ऐसा भी हुआ कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दोबारा बात की और उन्होंने राज्यपाल के रवैये की शिकायत भी की.

ऐसा उन्होंने जयपुर के होटल में रुके हुए अपने खेमे के विधायकों को संबोधित करते हुए दावा किया. इसके अलावा गहलोत ने सोमवार को राष्ट्रपति को भी चिट्ठी लिखने की बात कही जिसमें उन्होंने 'राजस्थान में संविधान की धज्जियाँ उड़ाए जाने' पर रामनाथ कोविंद से हस्तक्षेप का अनुरोध किया है.

राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डेटसारा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है जब पूर्ण बहुमत की सरकार के मंत्रिमडल द्वारा विधानसभा के सत्र को आहुत करने के प्रस्ताव को राज्यपाल ने वापस भेजा हो.

राज्यपाल द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में वो कहते हैं, "राज्यपाल ने बहुत कम समय की सूचना पर सत्र नहीं बुलाना चाहिए और 21 दिनों का नोटिस दिया जाना चाहिए. इससे पहले इस सरकार ने चार सत्र बुलाए थे और सभी दस दिनों के अंदर ही बुलाए गए."

राज्यपाल ने यह भी पूछा है कि सत्र किस लिए बुलाया जा रहा है और किन किन कार्यों को इस सत्र के दौरान संपादित होना है? इसपर राज्य सरकार कहती है कि ये तो विधानसभा की 'बिज़नस एडवाइजरी कमिटी' तय करेगी कि क्या क्या काम संपादित होगा?

जहां तक बहुजन समाज पार्टी के विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने की बात है तो वर्ष 2008 से लेकर 2013 तक जो सरकार थी उसमें भी छह के छह बहुजन समाज पार्टी के विधायकों का विलय हुआ था.

'जो हो रहा है वो अप्रत्याशित है'

संवैधानिक विशेषज्ञों की राय राजस्थान के मुद्दे पर अलग अलग है. याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना है कि बहुमत वाली सरकार मंत्रिमंडल की बैठक के बाद विधानसभा के सत्र का आह्वान करने का प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेजती है.

यह अधिकार उसे संविधान के अनुछेद 174 (1) के तहत मिला हुआ है और राज्यपाल पर भी अनिवार्य है कि वो इसका अनुमोदन करें.

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लेकिन जाने माने वकील संग्राम सिंह कहते हैं कि राज्यपाल के ऊपर भी निर्भर करता है कि वो क्या करें. राज्यपाल को अगर लगता है कि सरकार अल्पमत में है या उनको किसी मुद्दे पर संशय हो तो वो राज्य सरकार से जवाब मांग सकते हैं.

इस पूरे मामले में विधानसभा के अध्यक्ष की अधिकार को लेकर भी बहस चल रही है. वैसे इस मामले में राजस्थान की विधानसभा के अध्यक्ष सीपी जोशी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जो याचिका दायर की थी उसे उन्होंने वापस ले लिया है. जोशी ने सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को लेकर याचिका दायर की थी.

इस मामले में डेटसारा कहते हैं कि विधायी कार्य पूरी तरह से विधानसभा अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र है.

मगर संग्राम सिंह कहते हैं कि अलग अलग समय पर अदालतों ने विधायी कार्यों को लेकर विधानसभा के अध्यक्षों के लिए दिशा निर्देश भी जारी किए हैं. दल-बदलू क़ानून की व्याख्या भी अदालतें अलग करती रहीं हैं जिसके कई उदाहरण सामने हैं.

वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ कहते हैं कि दुसरे राज्यों की तुलना में राजस्थान में राजनीति बिलकुल अलग तरीक़े की होती रही है. लेकिन इस बार जो कुछ हो रहा है वो अप्रत्याशित है. वो कहते हैं कि दल बदलू क़ानून की व्याख्या अलग मामले के लिए अलग तरीक़े से नहीं की जा सकती है.

गहलोत और पायलट खेमे के अपने अपने दावे

वो कहते हैं कि जो मध्यप्रदेश या गोवा में संवैधानिक है वो राजस्थान में ग़ैर संवैधानिक कैसे हो सकता है? मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम से राजस्थान के लोग भी चिंतिंत हैं क्योंकि उससे राज्य की छवि धूमिल भी हो रही है. हालांकि सरकारें गिराने के प्रयास कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से होते रहे हैं. लेकिन उनका कहना है कि इस बार जो कुछ हो रहा है वो गंभीर है.

हालांकि सोमवार की शाम राज भवन से बयान जारी कर कहा गया कि राज्यपाल सत्र आहुत करने के ख़िलाफ़ नहीं हैं. इस बयान में तीन बिन्दुओं पर ज़ोर दिया गया. पहला ये कि सत्र का क्यों आह्वान किया गया यह मंत्रिमंडल के प्रस्ताव में स्पष्ट नहीं है. अगर सत्र के दौरान बहुमत हासिल करने की मंशा है तो फिर उसका टीवी पर सीधा प्रसारण सुनिश्चित होना चाहिए.

रणदीप सुरजेवाला

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इसके अलावा यह भी कहा गया है कि सरकार स्पष्ट करे कि अगर सत्र आहुत होता है तो उसके लिए सोशल डिस्टेंसिंग की क्या व्यवस्था की जाएगी. राजस्थान विधानसभा में काम करने वालों के संख्या 1000 के आस पास है जबकि 200 के क़रीब विधायक हैं.

अशोक गहलोत 31 जुलाई तक सत्र बुलाए जाने की मांग कर रहे हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि राजस्थान कि मंत्रिमंडल की बैठक आहुत कर राज भवन की जिज्ञासाओं का उत्तर दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है.

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि 31 जुलाई तक सत्र आहुत करने की संभावनाएं बन जाएंगी क्योंकि उस दिन तक सभी विधायक जयपुर पहुँच पाएंगे कहना मुश्किल है.

इस बीच सोमवार को सचिन पायलट और अशोक गहलोत के खेमे पुराने दावों को दोहराते हुए नज़र आए. गुरुग्राम से पायलट गुट के विधायकों ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि उनसे अशोक गहलोत के कई विधायक संपर्क में हैं. यही दावा कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी किया.

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