क्या भूटान में दावा कर भारत को परेशान करना चाहता है चीन?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भूटान के सकतेंग वन्यजीव अभयारण्य पर चीन के दावों का विरोध करने के कुछ दिन बाद ही चीन ने भूटान के पूर्वी सेक्टर को सीमा विवाद से जोड़ दिया है.
भूटान और चीन के बीच सीमा निर्धारित नहीं है और सीमा विवाद सुलझाने के लिए अब तक दोनों देशों के बीच 24 बार वार्ता हो चुकी है. इनमें कभी भी इस क्षेत्र के मुद्दे को चीन ने नहीं उठाया था.
भूटान के साथ सीमा विवाद में चीन की ओर से नए इलाक़ों पर दावा करने को विश्लेषक भारत को निशाना बनाकर उठाए गए क़दम के तौर पर देखते हैं.
इस समय मुख्यतः दो देश हैं, एक भारत और एक भूटान जिनके साथ चीन की सीमा निर्धारित नहीं हुई है और कई सालों से इसे लेकर विवाद है. भारत के साथ नियंत्रण रेखा पर चीन का तनाव जारी है जिसमें हुए हिंसक संघर्ष में बीस भारतीय सैनिकों की मौत हाल ही में हुई है.
चीन का भूटान के साथ पश्चिम की तरफ़ और पूर्वी तरफ़ सीमा विवाद है. इस विवाद के समाधान के लिए भूटान और चीन के बीच में सुनियोजित ढंग से बातचीत चल रही है.
भूटान में भारत के पूर्व राजदूत पवन वर्मा मानते हैं कि भूटान के साथ चीन का ताज़ा सीमा विवाद भारत के रणनीतिक हितों को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है.
पवन वर्मा कहते हैं, "मुझे लगता है कि ये भूटान पर दबाव बनाने का चीन का तरीक़ा है. चीन जानता हैं कि भूटान के साथ जहां उसकी सीमारेखा तय होगी, ख़ासतौर पर भूटान के पश्चिम की तरफ़, जहां चीन-भूटान और भारत के बीच में एक ट्राइ-जंक्शन बनता है, वहां किस जगह सीमा निर्धारित हो, उससे भारत के रणनीतिक हितों पर असर होगा.'
साल 2017 में भूटान को लेकर ही चीन और भारत आमने सामने आए थे और दोनों देशों के बीच 75 दिनों तक सैन्य गतिरोध हुआ था. तब भी चीन ने भूटान के हिस्से को नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी.
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विस्तारवादी मोड में है चीन
भूटान में भारत के पूर्व राजदूत इंद्र पाल खोसला मानते हैं की चीन इस समय विस्तारवादी मोड में है और हर ओर दावे कर रहा है.
बीबीसी बांग्ला सेवा से बात करते हुए इंद्र पाल खोसला ने कहा, "मेरे नज़रिए में चीन विस्तारवादी मोड में है, चीन ने भूटान के ऐसे हिस्से पर दावा ठोका है जो अब तक दोनों देशों के बीच हुई वार्ता में नहीं उठाया गया था. सीमा विवाद को लेकर भूटान और चीन के बीच 24 बार बातचीत हुई है और इस इलाक़े पर कभी चर्चा नहीं हुई है. इन सालों के दौरान चीन ने कभी भी इस इलाक़े का मुद्दा नहीं उठाया.
वो कहते हैं, हाल ही में चीन की ओर से रूस के व्लादिवोस्तोक तक पर दावा किया गया है, ऐसा लगता है कि चीन अब ऐसी दशा में है जब वो किसी समझौते या आपसी समझ या इतिहास में हुए समझौतों पर ध्यान नहीं दे रहा है. वो अब विस्तारवादी मोड में है."
भूटान ने सकतेंग अभ्यारण्य पर चीन के दावे का विरोध करते हुए चीन को डीमार्श जारी किया है, आमतौर पर भूटान अपने सीमा विवादों को लेकर मुखर नहीं है और कम ही टिप्पणी करता है. ऐसे में भूटान के इस राजनीतिक क़दम की वजह क्या है?
ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन यानी ओआरएफ़ से जुड़े विश्लेषक मिहिर भोंसले कहते हैं कि भूटान डर महसूस कर रहा है.
भोंसले कहते हैं, "जिस इलाक़े में भूटान समझता है कि वो सीमा विवाद चीन के साथ ख़त्म कर पाया है उसमें चीन ने विवाद खड़ा किया है. भूटान आमतौर पर सीमा विवादों पर बहुत बोलता नहीं हैं. भूटान के एक ओर चीन है और दूसरी ओर भारत है."
"आमतौर पर भूटान शांत रहता है लेकिन चीन ने भूटान के अभ्यारण्य पर सवाल उठाया तो भूटान ने चीन की डीमार्श जारी किया है, जो एक नई बात है. आमतौर पर भूटान सीमा विवादों पर टिप्पणी नहीं करता है. भूटान ने डीमार्श जारी किया है जिसका सीधा मतलब है कि भूटान ख़तरा महसूस कर रहा है."

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वहीं पवन वर्मा का ये भी मानना है कि हो सकता है कि चीन अपने अंदरूनी हालातों से देश के लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भी सीमा विवादों को हवा दे रहा है.
वर्मा कहते हैं, "आजकल जिस दौर में चीन है, मुझे ऐसा लगता है कि अपनी अंदरूनी समस्याओं से नागरिकों का ध्यान हटाने के लिए, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐसा सोचा है कि चीन की आक्रामक छवि बनाई जाए जिसमें चाहे दक्षिण चीन सागर विवाद हो, चाहे ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ आक्रामकता हो, चाहे दक्षिण एशिया में भारत और भूटान के साथ विवाद हो, ये दिखाया जाए कि चीन भविष्य में दुनिया का सबसे प्रभावशाली राष्ट्र बन रहा है. ऐसी कोशिश यही दिखती है."
वहीं मिहिर भोंसले का मानना है कि भूटान के साथ सीमा विवाद को हवा देने का मक़सद भारत को परेशान करना भी हो सकता है.
वो कहते हैं, "भारत के पड़ोस में भूटान एकमात्र ऐसा देश है जो हमेशा भारत के साथ रहा है, जबकि चीन के साथ भूटान के राजनयिक रिश्ते भी नहीं है. चीन को लगता है कि भूटान को परेशान करके वह भारत को तनाव दे सकता है."
"डोकलाम में भी हमने देखा कि भूटान की ज़मीन पर चीन ने दावा किया था जिसके बाद भारत के साथ तनाव बढ़ गया था. ऐसा लगता है कि चीन भूटान का हाथ मरोड़कर भारत को दर्द देना चाहता है."

क्या डोकलाम जैसे होंगे हालात?
2017 में जब चीन ने भूटान की ओर क़दम बढ़ाया था तो भारतीय सेना बीच में आ गई थी. भारत और चीन के बीच डोकलाम में 75 दिनों तक सैन्य तनाव रहा था. क्या ताज़ा विवाद उस स्थिति तक पहुंच सकता है?
पवन वर्मा कहते हैं, "ये संभव है कि ये विवाद डोकलाम जैसी स्थिति तक पहुंच जाए, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो ही. भारत और भूटान के बीच बेहद क़रीबी रिश्ते हैं. चीन के साथ भूटान के राजनयिक रिश्ते भी नहीं है."
"चीन की ये कोशिश होगी कि भूटान पर दबाव डालकर अपने नक़्शे क़दम पर चलाए और भारत पर दबाव बनाए. लेकिन मुझे लगता नहीं कि ऐसा होगा. लेकिन अगर भूटान पर और दबाव बढ़ेगा तो भारत को भूटान के साथ खड़ा होना होगा. भारत को भूटान के साथ, चीन के ख़िलाफ़ खड़ा होना होगा क्योंकि भूटान भारत का घनिष्ठ मित्र है."
इसी सवाल पर मिहिर भोंसले कहते हैं, "यदि भूटान के साथ चीन का सीमा विवाद और बढ़ा तो एक बार फिर डोकलाम जैसा स्टेंड ऑफ़ हो सकता है. डोकलाम भारत, चीन और भूटान के बीच एक ट्राइजंक्शन हैं, उसके अलावा सकतेंग अभ्यारण्य अरुणाचल सीमा के बहुत क़रीब है, वहां भी एक ट्राइजंक्शन एरिया बन सकता है. यहां भविष्य में तनाव और बढ़ सकता है."

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पड़ोसियों का इस्तेमाल करना चीन की स्थापित रणनीति
पवन वर्मा का मानना है कि इस समय भारत के साथ सीमा विवाद में उलझा चीन भारत के पड़ोसी देशों का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है.
वो कहते हैं, "भारत को ये समझना होगा कि चीन का निरंतर ये प्रयत्न रहेगा कि भारत पर दबाव बना रहे. भारत के साथ रिश्ते तो हों लेकिन भारत को नियंत्रण में रखा जाए क्योंकि चीन समझता है कि एक लोकतांत्रिक भारत, जिसमें 130 करोड़ लोग हैं, वो कभी न कभी चीन को चुनौती दे सकता है."
"अब इसको कार्यान्वित करने के लिए नेपाल, भूटान का इस्तेमाल, भारत के अन्य पड़ोसी देशों का इस्तेमाल, ये चीन की एक जानीमानी रणनीति है, ये भारत को समझना होगा और एक उत्तर चीन तक पहुंचाना होगा कि भारत इन कोशिशों को नाकाम करेगा."
वहीं मिहिर भोंसले का मानना है कि भूटान पर दबाव बनाना चीन का रणनीतिक फ़ैसला हो सकता है.
वो कहते हैं, "अभी जो भूटान के साथ विवाद है वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. भूटान सकतेंग अभ्यारण्य में ग्लोबल एन्वायरंमेंट फ़ंड का इस्तेमाल करना चाहता था जिसका चीन ने विरोध कर दिया."
"ये तकनीकी मुद्दा है जिसका इस्तेमाल चीन भारत के ख़िलाफ़ दबाव बनाने के लिए करना चाहता है. इससे संकेत मिलता है कि चीन भारत के ख़िलाफ़ हर संभव मोर्चे पर प्रयास कर रहा है."
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