चीन से तनाव के बीच नरेंद्र मोदी के लेह दौरे के क्या हैं मायने

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'सरप्राइज' देने में माहिर माने जाते है. फिर चाहे नोटबंदी का एलान हो या फिर चार घंटे के नोटिस में पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की बात हो.
3 जुलाई की सुबह भी वो अचानक लेह पहुँच गए.
15-16 की रात भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में दोनों देशों के बीच हुई हिंसक झड़प में भारतीय सेना के 20 जवानों की मौत हो गई थी. उस घटना के 17 दिन बाद भारत के प्रधानमंत्री के इस तरह से अचानक उस क्षेत्र में जाने को बड़ी बात माना जा रहा है.
टीवी चैनलों पर चल रही तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता था कि प्रधानमंत्री को अधिकारी सीमा सुरक्षा की पूरी जानकारी दे रहे थे. उनके साथ मौके पर सेना प्रमुख जनरल नरवणे और सीडीएस बिपिन रावत दोनों मौजूद थे.
उन्होंने वहाँ सेना के जवानों को संबोधित करते हुए कहा भारत के दुश्मनों ने आपकी फ़ायर भी देखी है और आपकी फ़्यूरी भी. चीन का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि विस्तारवाद का युग ख़त्म हो चुका है.
प्रधानमंत्री के संबोधन से ठीक पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तीन मिनट का वीडियो पोस्ट करते हुए कहा कि कोई तो झूठ बोल रहा है. वीडियो में लद्दाख के लोग वहाँ के हालात बता रहे हैं.
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इसके दौरे के मायने सिर्फ़ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात जवानों के लिए हो, ऐसा भी नहीं है. जानकार प्रधानमंत्री मोदी का ये क़दम भारतीय सेना के जवानों के लिए हौसले को बुलंद करने वाला बता रहे है. लेकिन दोनों देशों के रिश्तों पर भी इस दौरे का असर होगा, देश की राजनीति पर भी और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भी.
जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री का इस तरह अचानक से स्थिति का जायज लेने के लिए सीमा के पास पहुँचना एक साथ कई संकेत देता है.
चीन के लिए मायने
रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा प्रधानमंत्री के इस दौरे को चीन के लिए एक कड़े संकेत के दौर पर देखते हैं. रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा, सितंबर, 2016 में उत्तरी कमान के मुखिया थे, जब भारत ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक का दावा किया था. उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक के नायक के तौर पर देखा जाता है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि भले ही ये इलाक़ा हिंसक झड़पों वाली जगह से दूर हो, लेकिन ये उसी क्षेत्र में आता है. फ़िलहाल प्रधानमंत्री इन झड़पों में घायल हुए जवानों से मिल कर स्थिति का जायज़ा ले रहे हों लेकिन उनके वहाँ जाने से ये संकेत चीन तक पहुँच गया कि भारत पूरे मामले को बहुत ही ज़्यादा गंभीरता से ले रहा है.

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा का ये भी मानना है कि इससे सीमा पर तैनात सैनिकों के हौसले भी बुलंद होंगे. मुश्किल की इस घड़ी में जिस देश के लिए वो लड़ रहे हैं, उस देश का प्रधानमंत्री उनके साथ खड़ा है.
सर्जिकल स्काइक की बात हो या फिर बालाकोट हमला हो या पुलवामा हमला, ये सभी प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में हुई हैं. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इस तरह का क़दम पहले नहीं उठाया था.
इस पर रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल हुड्डा कहते हैं कि वो घटना चरमपंथी हमले जैसी बात थी. वो सीमा विवाद से जुड़ा मसला नहीं था. उनके मुताबिक़ प्रधानमंत्री का वहाँ जाना ये बताता है कि भारत-चीन सीमा विवाद की गंभीरता क्या है.

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चीन और भारत के बीच इस वक़्त सीमा पर जो तनाव है उसका स्केल भी अलग है और नेचर भी अलग है. यानी व्यापकता और तरीका दोनों में बहुत फ़र्क है.
लद्दाख की गलवान घाटी में इस वक़्त जो चल रहा है, वो वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदलने की एक कोशिश के तौर पर दोनों देशों में देखा जा रहा है. इसलिए चीन के साथ भारत के तनाव की स्थिति पुलवामा, पठानकोट या फिर उड़ी हमले से बिल्कुल अलग है.
पिछले दिनों भारतीय मीडिया में सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए ये बताया गया कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जस का तस खड़ा है और भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी पीछे नहीं हटा है.
लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा के मुताबिक़ ये इस बात को दर्शाता है कि स्थिति बहुत नाज़ुक है, आगे स्थितियाँ और भी बदतर होने की आशंका है, और इस वजह से आज के वक़्त में स्थिति पर नियंत्रण रखने की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री की है. इस दौरे में वो उसी ज़िम्मेदारी को निभाते हुए दिख रहे हैं.
भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव दूर करने के लिए बातचीत का दौर जारी है. ऐसे समय में अगर मोदी उस इलाक़े में हो तो क्या बातचीत पर इसका कोई भी देखने को मिल सकता है?
इस सवाल पर लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा कहते हैं कि तनाव कम करने के लिए दोनों देशों के बीच हो रही बातचीत का कोई असर भारत को ग्राउंड पर देखने को नहीं मिल रहा. ये भी एक वजह हो सकती है कि सरकार अपनी तरफ़ से हर मोर्चे पर तैयार दिखना चाहती हो. अगर बातचीत का असर सकारात्मक होता तो शायद प्रधानमंत्री को वहाँ जाने की नौबत ही नहीं आती.
हालाँकि समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि भारत और चीन बातचीत और समझौते से सीमा पर तनाव को दूर करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. तब दोनों देशों को ऐसे क़दम नहीं उठाने चाहिए जिससे स्थिति और ख़राब हो.
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देश की राजनीति के जानकार भी सैन्य मामलों के जानकारों से इत्तेफ़ाक रखते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी के मुताबिक़ भारत में एक नेरेटिव ये भी है कि आज एलओसी पर पाकिस्तान की तरफ़ से जो हो रहा है, पिछले दिनों नेपाल जिस तरह से भारत के साथ बर्ताव कर रहा है, सबके पीछे चीन का ही हाथ है. तो जाहिर सी बात है, मामला जितना दिख रहा है उससे ज्यादा गंभीर है. इसलिए भारत को चीन के सामने और गंभीरता से पेश आना होगा. नीरजा के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने लेह जा कर वही संदेश सबको दिया है.
भारत की तैयारी
लेकिन वो मानती हैं कि इसके भारतीय राजनीति के लिए मायने हैं. उनके मुताबिक़ निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का ये फ़ैसला अचानक किया गया फैसला है. इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लेह जाने वाले थे लेकिन उनका दौरा गुरुवार को रद्द हो गया था और शुक्रवार को ख़ुद प्रधानमंत्री ही पहुँच गए.नीरजा का कहना है कि चीन को प्रधानमंत्री संदेश भेज रहे हैं कि भारत की तैयारी पूरी है. भारत सीमा पर इस तनाव को हल्के में नहीं ले रहा है. चीफ और डिफेंस स्टॉफ को अपने साथ ले जाने से इस बात को और बल मिलता है.
अगर केवल रक्षा मंत्री वहाँ जाते और स्थिति का जायजा लेते तो बात और होती. अब मंत्री के स्तर से बात ऊपर उठ कर प्रधानमंत्री के स्तर पर आ गई है. ये अपने आप में पूरे मामले को बड़ा और गंभीर बना देता है.
नीरजा कहती है कि प्रधानमंत्री के इस दौरे को हमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एक दिन पहले दिए गए बयान से जोड़ कर देखना चाहिए. चीन के साथ तनाव के बीच डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल कि गुरुवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के अध्यक्षता में बैठक हुई.
इस बैठक में 38900 करोड़ रुपए की रक्षा ख़रीद को मंज़ूरी दी गई. इस बैठक में 21 मिग-29 विमान की ख़रीद के साथ 59 मिग-29 विमान के अपग्रेडेशन को मंज़ूरी दी गई.
इसके अलावा 12 सुखोई एसयू-30 एमकेआई एयरक्राफ़्ट की ख़रीद को भी मंज़ूरी दी गई. मिग-29 की ख़रीद पर 7418 करोड़ रुपए की लागत आएगी, जो रूस से ख़रीदा जा रहा है. सुखोई एसयू-30 एमकेआई हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से ख़रीदा जाएगा, जिस पर 10730 करोड़ रुपए की लागत आएगी.
इससे भी साफ़ हो जाता है कि भारत हर मोर्चे पर तैयारी में जुट गया है. वो साथ में ये भी जोड़ती हैं कि एक दिन में ये सब भारत हासिल तो नहीं कर लेगा, लेकिन उस दिशा में भारत बढ़ रहा है, ये बात बताना भी अपने आप में अहम है.
आज के दौरे के बाद ये संदेश जनता में जाएगा कि प्रधानमंत्री निजी तौर पर पूरी तैयारी की देखरेख ख़ुद कर रहे हैं, सिर्फ़ रक्षा मंत्री के हवाले नहीं छोड़ा है. वो ये बताना चाहते हैं कि भारत के पहले के रवैए में और अब के रवैए में बहुत फ़र्क है.

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भारतीय राजनीति के लिए मायने
इस पूरे घटनाक्रम में भारत की अंदरूनी राजनीति से जोड़ कर देखने की भी सलाह नीरजा देती हैं. इसको समझने के लिए 15 जून के बाद भारतीय राजनीति में हुए तमाम पहलुओं पर ग़ौर करना होगा.19 जून को सीमा विवाद को लेकर हुए ऑल पार्टी मीटिंग में प्रधानमंत्री के भाषण में कहा गया था कि भारत की सीमा में कोई नहीं घुसा, इसके बाद से कांग्रेस और विपक्षी दलों के साथ एक नेरेटिव ये भी बना कि दिया कि सरकार कुछ छिपा रही है या फिर सो रही है और स्थिति की गंभीरता सरकार को नहीं मालूम.
नीरजा को लगता है कि प्रधानमंत्री लेह जाकर उस बात को भी झूठा साबित करना चाहते हैं. विपक्ष को ख़ास कर कांग्रेस को भी इसके ज़रिए एक संदेश देने की कोशिश है. नीरजा मानती हैं कि चाहे अनचाहे में एक जो छवि उस बयान से प्रधानमंत्री की बनी, ख़ुद लेह जाकर वो उसे भी तोड़ने की एक कोशिश उन्होंने की है. हालाँकि प्रधानमंत्री की वो छवि कितनी मिट पाती है इसके लिए हमें विपक्ष के बयान का इंतजार करना होगा.
15-16 जून के बाद से भारत सरकार ने चीन के खिलाफ़ कई फ़ैसले किए हैं. जैसे चीन के 59 ऐप्स को बैन करना, कई रेल और दूसरी परियोजनाओं के कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करना, लेकिन आर्थिक सारे रिश्ते तोड़ना एकदम से भारत के लिए थोड़ा मुश्किल फ़ैसला ज़रूर होगा. इसलिए नीरजा का मानना है कि भारत किश्तों में चीन को संदेश भेज रहा है.
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