भारत-नेपाल तनाव: बिहार में नदियों पर मरम्मत का काम रोके जाने का पूरा सच

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
बीती 22 जून को जब बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने अपने ट्विटर हैंडल पर ये जानकारी दी कि नेपाल गंडक, ललबेकिया, कमला नदी के तटबंधों पर मरम्मती का काम नहीं करने दे रहा है, तो इसे नेपाल और भारत के रिश्तों में तनातनी के साथ साथ बिहार में बाढ़ का ख़तरा बढ़ जाने के संदर्भ में देखा गया.
संजय झा का ट्वीट था, "गंडक, ललबेकिया, कमला आदि नदी के अपस्ट्रीम नेपाल भाग में सालों से बाढ़ से सुरक्षा के लिए सुरक्षात्मक कार्य किया जाता रहा है. लेकिन इस साल नेपाल द्वारा आपत्ति के कारण सुरक्षात्मक कार्य की गति अवरुद्ध हुई है. इसको लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर और जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत को पत्र लिखा है."
ये ट्वीट ऐसे वक्त में था जब बीती 12 जून को बिहार के सीतामढ़ी ज़िले के सोनबरसा क्षेत्र में भारत नेपाल सीमा पर स्थानीय मुददे को लेकर गोली चली थी. जिसमें एक स्थानीय व्यक्ति की मौत हो गई थी.
नेपाल ने ख़ारिज किया बिहार सरकार का दावा
लेकिन बिहार सरकार की तरफ से दी जा रही इन जानकारियों को नेपाल ने ख़ारिज किया.
नेपाल के जल संसाधन और सिंचाई विभाग के महानिदेशक मधुकर प्रसाद राजभंडारी ने नेपाल के स्वतंत्र पत्रकार सुरेन्द्र फुयाल से बातचीत में बिहार सरकार के दावों को ख़ारिज करते हुए कहा कि बिहार ने ही गंडक बराज पर काम करने वालों की सूची देर से मुहैया कराई.
पत्रकार सुरेन्द्र फुयाल ने बीबीसी हिंदी को बताया, "डीजी मधुकर प्रसाद ने बताया है कि नेपाली अधिकारी, भारतीय अधिकारियों के संपर्क में है और कोरोना की इस मुश्किल घड़ी में इंडो-नेपाल बार्डर पर हम मूवमेंट को सुचारू करने में लगे है. गंडक बैराज पर बिहार सरकार ने अपने वकर्स और इक्वीपमेंटस की सूची भेजने में वक्त लगाया, अब उन्होने हमें सूची दे दी है, तो वहाँ काम सुचारू रूप से हो सकता है."

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बीबीसी ने जब इस बाबत संजय झा से बात की तो उन्होंने कहा, "बिहार सरकार ने तटबंध के हालात को लेकर जानकारी दी थी और अपने नागरिकों के बारे में चिंता जाहिर की थी, हमारा मक़सद किसी तरह का विवाद पैदा करना नहीं था."
उन्होने आगे कहा, "विवाद की बात तो मैं कर ही नहीं कर रहा हूँ. गंडक बराज के रखरखाव का काम हम लोग दोनों तरफ करते हैं. अब अगर वहाँ आने-जाने में दिक्कत होगी तो काम कैसे होगा. हम नया बांध बनाने नहीं गए थे, बल्कि वहीं करने गए थे जो बीते कई सालों से कर रहे है. हमें वहाँ काम करने में समस्या हो रही थी तो उसको हमने ज़ाहिर किया."
वहीं नेपाल के सिंचाई विभाग के डीजी मधुकर प्रसाद ने सुरेन्द्र फुयाल से बातचीत में कहा, "हमारी तरफ़ से कोई परेशानी नहीं है. गंडक के बाद नेपाल अब ललबेकिया, कमला और अन्य नदियाँ, जहाँ बाढ़ से जुड़ी आपदा दोनो देश झेलते हैं, वहाँ पर भी नेपाली अधिकारी, भारतीय अधिकारियों के साथ समन्वय बना रहे है."
गंडक पर काम शुरू
हालाँकि बाद में नेपाल ने 23 जून को ही गंडक बराज पर नेपाल की तरफ़ काम करने की सहमति दे दी. संजय कुमार झा ने बताया, "गंडक पर काम शुरू हो गया है. वही ललबेकिया और कमला नदी पर हमने फ्लड फाइटिंग का सामान जमा कर लिया है. वहाँ पर हमारे इंजीनियर्स का मानना है कि भारतीय हिस्से की तरफ तटबंधों की मज़बूती के चलते बाढ़ का ख़तरा कम है. हालाँकि बाढ़ इस बात पर निर्भर करती है कि नेपाल के कैटमेंट एरिया में कितनी बारिश होती है."
उन्होंने साथ में यह भी कहा, "लेकिन हम चाहते है कि नेपाल के साथ ये सभी मामले सुलझाएँ जाए, ताकि भविष्य में किसी तरह की दिक्कत नही हो."
बगहा एसडीएम विशाल राज ने बीबीसी हिंदी से बताया, "नेपाल ने बस ये शर्त रखी है कि जो भी भारतीय नेपाली इलाके में जाएँ, उनकी कोरोना जाँच पहले की जाए."
गंडक के तटबंध
गंडक बराज के 18 गेट बिहार में और 18 गेट नेपाल में है. वाल्मीकि नगर फाटक (पश्चिम चंपारण) में काम रोका गया था.
स्थानीय पत्रकार मृदुल मयंक बताते है, "नेपाल के हिस्से में राइट ऑफ्लॉक्स (दायें तटबंध) पर काम होना था. लॉकडाउन के बाद काम रूका. जो अब चालू हो गया है. इस जगह अगर रख रखाव नहीं होगा तो अधिक असर नेपाल पर ही पडेगा."

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इसी तरह पूर्वी चंपारण में ललबकैया नदी के बलुआ गुआबाड़ी तटबंध पर 3600 मीटर पर काम होना था.
स्थानीय पत्रकार राजेश कुमार बताते है, "तटबंध पर 3100 किलोमीटर काम हो चुका है, 500 मीटर काम नहीं हो पाया है. नेपाल ने 25 मई को ही ये आपत्ति दर्ज की थी कि नो मैन्स लैंड पर जियो बैग ( बालू से भरे बैग) ना रखे जाएँ. जिसको लेकर बाद में ज़िलाधिकारी शीर्षत कपिल ने जीएसआई (जियोल़जिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) को पत्र लिखकर नापी की मांग की है. इस तटबंध पर अगर पानी का स्तर बढ़ने से दबाव बढता है तो ज़िले के ढाका, पताही, चिरैया ब्लॉक सबसे अधिक प्रभावित होगे."
तीसरा तटबंध जिसको लेकर आपत्ति है. वो कमला नदी का है.
जयनगर (मधुबनी) के स्थानीय पत्रकार दुर्गेश ने बताया, "1960 में कमला रिंग बांध बना था. पिछले साल जब बाढ़ आई थी तो पूर्वी रिंग बांध, पश्चिमी रिंग बांध टूट गया था. अबकी बार जल संसाधन विभाग ने 4 जगह जहाँ पूर्वी रिंग बांध टूटा था, उसको ठीक करने की प्रक्रिया चालू की तो नेपाल ने कोई आपत्ति नहीं की. लेकिन पश्चिमी रिंग बांध में इनरवा बाज़ार के पास अकोनहा गांव में जहाँ बाँध ख़त्म होता है, वहाँ नेपाल सरकार नो मैन्स लैंड को छोड़कर बाँध बनाने को कह रही है. अब अगर पानी का स्तर बढ़ता है तो जनजीवन का बीते साल तुलनात्मक रूप से ज़्यादा नुक़सान होगा."

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उन्होंने यह भी बताया, "भारत नेपाल रेल मैत्री योजना जो 800 करोड़ रूपए बजट की है, उसके भी रेलवे ट्रैक नुक़सान पहुँचेगा."
वहीं जयनगर के एसडीओ शंकर सरन ओमी ने कहा, "सर्वे ऑफ़ इंडिया की तरफ से नापी हुई है. जिसके बाद हम अपनी ज़मीन पर काम कर रहे है. यहाँ स्थिति बिल्कुल ठीक है. बाक़ी नो मैन्स लैंड में कंस्ट्रक्शन का काम नहीं होता है."
भारत को कोशिश करनी चाहिए

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बीपी कोइराला सेंटर फॉर नेपाल स्टडीज के निदेशक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी कहते है,"दोनो देशों के बीच नक्शे को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसको डिप्लौमैटिक कोशिशों से सुलझाया जाना चाहिए. बाक़ी तटबंध का काम तो दोनों देशों के नागरिकों के जीवन और मृत्यु का सवाल है. उसको किसी भी देश में रोका नहीं जाना चाहिए. भारत को पहल करते हुए नेपाल को विश्वास में लेकर बातचीत करनी चाहिए. क्योंकि हमारे संबंध सिर्फ़ सरकार-सरकार के बीच नहीं है, बल्कि हमारा संबंध तो रोटी बेटी और क्रांति का है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर की चिंताए भी नवल किशोर चौधरी जैसी हैं. वो कहते हैं, " नेपाल और भारत के संबंधों में जाहिर तौर पर खटास आई है. नेपाल अपना हित कहीं और देख रहा है. इसे हमारी विदेशी नीति की चूक और भारत की उदासीनता ही कही जा सकती है कि हमने अपने एक अच्छे मित्र को अमित्र होने का मौक़ा दिया. भारत नेपाल के बीच जो रोटी बेटी का संबंध था उसमें खटास पड़ने से स्थानीय लोगों के जीवन पर असर पड़ेगा. अभी ये हमारे रिश्तों में छोटा सा घाव है. हम लोगों को इसे जल्दी ठीक कर लेना चाहिए, वर्ना ये भविष्य में बहुत अधिक तकलीफ़देह होगा."
बाढ़ लाती है नेपाल की नदियाँ

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पूरे उत्तर बिहार में अररिया, गोपालगंज, कटिहार, पूर्णिया, सहरसा, सीतमढ़ी समेत 21 ज़िले आते हैं, जिनका क्षेत्रफल 52928 वर्ग किलोमीटर है. जल संसाधन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक़ बिहार भारत का सबसे अधिक बाढ़ ग्रस्त राज्य है और यहाँ देश का 17.2 फ़ीसदी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है. बिहार के 38 में से 28 ज़िले बाढग्रस्त हैं. उत्तर बिहार की अधिकतर नदियों जैसे कोसी, गंडक, बागमती, कमला, बूढ़ी गंडक आदि का उद्गम नेपाल है. और हर साल ये बिहार में बाढ़ की वजह भी बनती है.
ललबकेया, बागमती, कमला और खंडो नदियों पर नेपाली क्षेत्र में तटबंध का विस्तार भारत और नेपाल के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम द्वारा तैयार किया जाता है. कोसी को लेकर 1954 और 1966 में भारत नेपाल समझौता हुआ है. वहीं गंडक को लेकर 1959 और 1964 में समझौता हुआ है. बिहार और नेपाल के बीच 700 किलोमीटर का बार्डर है.
बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा कहते हैं, "बाढ़ से निपटने की हमारी पूरी तैयारी है. हर साल 15 जनवरी से 15 मई के बीच एंटी इरोजन का काम होता था. इस बार लॉकडाउन, मज़दूरों और मैटेरियल की कमी के चलते हमारे पास वक्त कम था, लेकिन हमने लगभग सारा काम पूरा कर लिया है."
नेपाल-भारत विवाद

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पिछले कुछ दिनों से भारत और नेपाल में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को लेकर विवाद चल रहा है. पिछले दिनों नेपाल की संसद ने नया नक़्शा जारी करते हुए इसे नेपाल का हिस्सा बताया है. जबकि भारत इसे अपना हिस्सा मानता है.
भारत का कहना है कि ये ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं हैं और ना ही इसका कोई मतलब है.
नेपाल की कैबिनेट ने इसे अपना जायज़ दावा क़रार देते हुए कहा कि महाकाली (शारदा) नदी का स्रोत दरअसल लिम्पियाधुरा ही है. जो फ़िलहाल भारत के उत्तराखंड का हिस्सा है.
भारत इससे इनकार करता रहा है. इससे पहले भारत की ओर से लिपुलेख इलाक़े में सीमा सड़क का उद्घाटन किया गया था. लिपुलेख से होकर ही तिब्बत चीन के मानसरोवर जाने का रास्ता है. इस सड़क के बनाए जाने के बाद नेपाल ने कड़े शब्दों में भारत के क़दम का विरोध किया था.
भारत के क़दम का विरोध काठमांडू में नेपाल की संसद से लेकर काठमांडू की सड़कों तक दिखा था.
दरअसल छह महीने पहले भारत ने अपना नया राजनीतिक नक़्शा जारी किया था जिसमें जम्मू और कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ के रूप में दिखाया गया था.
इस मैप में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को भारत का हिस्सा बताया गया था. नेपाल इन इलाक़ों पर लंबे समय से अपना दावा जताता रहा है.
इससे पहले नेपाल ने कहा था कि भारत ने जिस सड़क का निर्माण 'उसकी ज़मीन' पर किया है, वो ज़मीन भारत को लीज़ पर तो दी जा सकती है लेकिन उस पर दावा नहीं छोड़ा जा सकता है.

इस बीच एक और फ़ैसले में नेपाली संसद की प्रतिनिधि सभा की राज्य व्यवस्था समिति ने नागरिकता क़ानून में संशोधन के सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पाटी के प्रस्ताव को बहुमत से पारित कर दिया है.
नए प्रस्ताव के तहत नेपाली पुरुषों के साथ विवाह करने वाली विदेशी महिलाओं को शादी के बाद नेपाल की नागरिकता पाने के लिए सात साल का लंबा इंतज़ार करना होगा.
हालाँकि समिति से अधिकतर सदस्यों ने इस प्रस्ताव को सहमति दे दी है लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाली कांग्रेस और कुछ अन्य पार्टियों ने इस विवादित संशोधन प्रस्ताव का विरोध किया है.
इस फ़ैसले को भी भारत-नेपाल रिश्तों से जोड़कर देखा जा रहा है. हालाँकि ये प्रस्ताव पिछले दो साल से विचाराधीन है. लेकिन एकाएक इसे क़ानून बनाने की कोशिशें तेज़ हुई हैं.
वैसे ये प्रस्ताव क़ानून बना, तो ये भारत समेत अन्य देशों की महिलाओं पर भी लागू होगा.
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