नेपाल-चीन सीमा विवाद: क्या नेपाल भारत की तरह चीन के ख़िलाफ़ भी सख़्त रवैया अपनाएगा?

नेपाल और चीन

इमेज स्रोत, ETIENNE OLIVEAU/GETTY IMAGES

    • Author, सुरेंद्र फ़ुयाल
    • पदनाम, काठमांडू से बीबीसी हिंदी के लिए

नेपाल की सरकार के ऊपर इस बात का दबाव बढ़ रहा है कि वो चीन के साथ सीमा के मुद्दों को लेकर वैसा ही रुख़ अख़्तियार करे जैसा कि भारत के साथ अपनाया है. नेपाल और भारत की मीडिया में आई कई रिपोर्टों में यह कहा गया है कि "कई नेपाली गांव चीन के क्षेत्र में आते हैं."

अभी मुश्किल से एक हफ़्ते पहले ही नेपाल में नए राजनीतिक नक़्शे के आधार पर नए प्रतीक को आधिकारिक रूप से अपनाया गया था. इस नए नक़्शे में 1816 की सुगौली संधि के मुताबिक़ लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को जगह दी गई थी. ये क्षेत्र पहले से भारत के नक़्शे में शामिल रहे हैं और फ़िलहाल इन पर भारत का क़ब्ज़ा है.

लेकिन नेपाल की सरकार ने चीन और नेपाल सीमा मुद्दे पर अब तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है. उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासभा में च्यांग और लुंगडेक गांव कथित तौर पर 1960 के दशक से चीन के क़ब्ज़े में हैं.

लेकिन बीबीसी हिंदी से बातचीत में भूमि प्रबंधन मंत्री पद्मा कुमारी आर्यल (सीमा मुद्दों के लिए भी तकनीकी तौर पर इनकी ही ज़िम्मेदारी बनती है) बताती हैं कि नेपाल-चीन के बीच सीमा संबंधी ज़्यादातर मुद्दों को सुलझा लिया गया है लेकिन "अगर कोई नया मुद्दा आता है तो इसे कूटनीतिक बातचीत के ज़रिए सुलझाया जाएगा."

उनके मुताबिक़ नेपाल और चीन ने अपने सारे सीमा संबंधी मुद्दों को सुलझा लिया है "सिर्फ़ तीन मामलों को छोड़कर. इसमें से एक दोलखा में है और दो माउंट एवरेस्ट के नज़दीक भीषण ठंड वाले दुर्गम इलाक़े."

वो उम्मीद जताती हैं कि जल्दी ही नेपाल के विदेश मंत्री मीडिया में जो सीमा मुद्दों को लेकर रिपोर्ट आ रही हैं, उस पर प्रतिक्रिया देंगे. इसके साथ ही आगे क्या क़दम उठाए जाएंगे यह स्पष्ठ करेंगे.

उठते सवाल

नेपाली फ़ौज

इमेज स्रोत, Getty Images

दक्षिण एशिया में जहां एक ओर भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में तनाव की स्थिति बनी हुई है तो वहीं दूसरी तरफ़ लिपुलेख में नेपाल और भारत के बीच तनाव पैदा हो गया है. नेपाल के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बिमलेंद्र निधी माँग करते हैं कि ऐसे वक़्त में सरकार को जल्द से जल्द अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "नेपाल के कुछ गांव चीनी के अधिकार वाले तिब्बत में पड़ते हैं, इसे लेकर मीडिया में सवाल उठाए जा रहे हैं. इसके अलावा माउंट एवरेस्ट के उत्तर में हुवेई के 5जी टावर, चीनी भाषा पढ़ाने वाले शिक्षकों के नेपाल में बड़ी संख्या में आने और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को चीनी कम्युनिस्टों की ट्रेनिंग को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं."

वो कहते हैं, "हमारे कम्युनिस्ट नेताओं को वीडियो कॉफ्रेंस के ज़रिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से ट्रेनिंग की ज़रूरत क्यों है?"

वो हाल में बार-बार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की ओर से नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को दिए जा रहे ट्रेनिंग का ज़िक्र करते हैं.

आख़िरी वीडियो कॉफ्रेंस पिछले हफ्ते के अंत में हुआ था जिसमें वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता प्रचंड ने भी भाग लिया था.

वीडियो कैप्शन, चीन और नेपाल के साथ भारत के ख़राब होते रिश्तों पर क्या बोले नितिन गडकरी?

लेकिन एक अन्य वरिष्ठ नेता झलनाथ खनाल ने इस पर अचरज जताया है कि उन्हें इसके बारे में कुछ भी नहीं बताया गया. बीबीसी नेपाली को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने इसे 'अचानक लिया गया फ़ैसला और चौंकाने' वाला बताया.

नेपाल को चीन से मिलने वाली मदद में होने वाले इज़ाफ़े पर बिमलेंद्र निधी कहते हैं कि, "ऐसी रिपोर्ट है कि जल्द ही क़रीब 2000 चीनी अधिकारी कोरोना के ख़िलाफ़ अभियान में मदद करने के लिए नेपाल आने वाले हैं."

"इतनी संख्या में वो क्यों आ रहे हैं? हर चीज़ में चीन का इतना दख़ल क्यों है? ये सवाल पूछे जा रहे हैं. सरकार को इनका जवाब देना चाहिए और सभी मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए."

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त

नेपाल-चीन सीमा विवाद

नेपाल और चीन की तिब्बत क्षेत्र में 1439 किलोमीटर लंबी सीमा एक-दूसरे के साथ लगी हुई है. 1963 में दो साल के सर्वे के बाद इस सीमा का निर्धारण किया गया था. इस सीमा निर्धारण के अनुसार माउंट एवरेस्ट की चोटी नेपाल में है और इसका उत्तरी हिस्सा चीन में पड़ता है.

नेपाल के सर्वे विभाग के पूर्व महानिदेशक बुद्धि नारायण श्रेष्ठ के अनुसार 1979 और 1988 में दो बार सीमा की समीक्षा की गई थी.

उन्होंने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "जब हमने चीन-नेपाल सीमा पर 1960 के दशक में मुहर लगाई तब दोनों ही तरफ़ ज़मीन और नेपाल के उत्तरी ज़िलों के गांवों का आदान प्रदान हुआ था. इस दौरान नेपाल ने चीन को 1836 वर्ग किलोमीटर ज़मीन दी थी और चीन ने नेपाल को 2140 वर्ग किलोमीटर ज़मीन दी थी. नतीजतन नेपाल को 302 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त ज़मीन मिली थी."

चीन में नेपाल के गांव

महाकाली नदी

बुद्धि नारायण श्रेष्ठ का मानना है कि हो सकता है नेपाल को कुछ इंसानी बस्तियां चीन के हाथों पहाड़ों और घाटियों वाले क्षेत्रों के बदले इस दौरान गंवानी पड़ी हो.

वो कहते हैं, "यह ऐतिहासिक जानकारी नहीं होने और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्रों में इन इंसानी बस्तियों के बारे में नहीं पता होने की वजह से हुआ हो."

वो याद दिलाते हैं कि हाल ही में 'चीनी क्षेत्र में नेपाली गांवों' का मुद्दा चीन विदेश मंत्रालय के नोटिस में भी आया था.

वो बताते हैं कि इसके बारे में चीन ने कहा था कि चीन और नेपाल के बीच नदी और जल सीमा 1963 की सीमा संधि के आधार पर ही होगा.

उन्हें इस बात का डर है कि नदी और जल सीमा पिछले साठ सालों में हिमालय क्षेत्र में हुए प्राकृतिक बदलावों की वजह से बदल सकते हैं और "भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है."

क्या है समाधान?

नेपाल के प्रधानमंत्री

इमेज स्रोत, NURPHOTO

नेपाल से आने वाली रिपोर्टों में इस ओर साफ़ इशारा किया गया है कि उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासा में च्यांग और लुंगडेक गांव में नेपाली आबादी रह रही है. उनके पास नेपाली दस्तावेज़ और रसीद मौजूद हैं.

नेपाल को ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए और वो क्या कर सकता है?

बुद्धि नारायण श्रेष्ठ कहते हैं कि दोनों ही पक्षों को बिना किसी देरी के फ़ौरन बातचीत के लिए समाने आना चाहिए.

वो कहते हैं, "अगर हमारा क्षेत्र वाक़ई में चीन के क्षेत्र में आ रहा है तो दोनों पक्षों को बातचीत शुरू करनी चाहिए. यह वार्ता चीन-नेपाल सीमा प्रोटोकॉल के अनुरुप होना चाहिए. अगर दोनों पक्षों के सर्वे करने वाले हिमालय के इस विवादित क्षेत्र का साक्षा निरीक्षण कर सकते हैं तो पारस्परिक रूप से सहमती वाले समाधान तक पहुँचा जा सकता है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)