कोरोना वायरस: शहरों के बाद गाँवों में बड़ी चुनौती बन जाएगी

सब्जी ख़रीदती महिला

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में अब तक साढ़े तीन लाख से भी ऊपर कोरोना पॉज़िटिव मामले सामने आ चुके हैं और ग्यारह हज़ार से भी ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं.

भारत अब इस महामारी के बहुत ही संवेदनशील चरण में प्रवेश कर चुका है. लाखों की संख्या में महानगरों से देश के ग्रामीण अंचल की ओर लौटे प्रवासी मज़दूरों की मजबूरी ने कोरोना के प्रसार के ख़तरे को भी ग्रामीण भारत की ओर मोड़ दिया है.

सवाल यह है कि क्या ग्रामीण भारत आने वाले दिनों में कोरोना के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए तैयार है?

मज़दूरों की वापसी और कोरोना की बढ़ती लहर के ग्रामीण भारत पर पड़ने वाले इस असर को समझने के लिए बीबीसी ने जन-स्वास्थ्य नीति के साथ-साथ वायरोलॉजी से जुड़े विश्वस्तरीय विशेषज्ञों से बात की.

इस बातचीत में जितने जवाब मिले उससे कहीं अधिक सवाल उठ खड़े हुए हैं.

हॉर्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट के निदेशक और जनस्वास्थ नीति के ग्लोबल विशेषज्ञों में शुमार डॉक्टर आशीष झा ने बॉस्टन से एक स्काइप इंटरव्यू के ज़रिए बीबीसी से बातचीत में कहा कि वो ग्रामीण भारत में कोरोना के संक्रमण को लेकर बहुत चिंतित हैं.

क्या लॉकडाउन का इस्तेमाल टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया?

कोरोना महामारी को महानगरों से गाँवों की ओर बढ़ने वाला संक्रमण बताते हुए आशीष झा कहते हैं, "लॉकडाउन स्वास्थ्य नीति के लिहाज़ से बिल्कुल सही क़दम था और उसकी वजह से हम वायरस के फैलाव को रोकने में भी कामयाब रहे. लेकिन लॉकडाउन की असली सफलता तब मानी जाती जब सरकार इस वक़्त का इस्तेमाल देश भर में टेस्टिंग की क्षमता बढ़ाने, सोशल डिस्टेंसिंग को सुनिश्चित करने और संक्रमित लोगों को एकांत में रखने के पूरी व्यवस्था कर पाती - जो कि अभी तक नहीं हो पाया है."

वीडियो कैप्शन, कोरोनावायरस: क्यों कंडक्टर से मज़दूर बना एक शख्स

प्रति दस लाख की जनसंख्या पर हो रहे दो हज़ार से भी कम टेस्ट के साथ कोविड टेस्टिंग रेट के मामले में भारत, अमरीका और यूरोपीय देशों से बहुत नीचे आता है. हालांकि इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) के आँकड़ों के अनुसार भारत अब तक साठ लाख से ऊपर कोविड टेस्ट कर चुका है लेकिन संक्रमण के फैलाव और जनसंख्या के अनुपात में विशेषज्ञ इसे बहुत कम मान रहे हैं.

बिहार के अपने गृह ज़िले मधुबनी का उदाहरण देते हुए आशीष कहते हैं, "अगर मधुबनी में किसी को कोरोना के लक्षण आते हैं तो वह उन स्थानीय स्वास्थ्य कर्मचारियों के पास जाएगा जो दशकों से उसका इलाज करते रहे हैं. कई बार इन्हें 'झोला छाप डॉक्टर' भी कहा जाता है.

ग्रामीण स्तर पर काम करने वाले यह स्वास्थ्य कर्मचारी यूं तो उतने पेशेवर नहीं होते लेकिन इस वक़्त सरकार को उन्हें कोरोना टेस्टिंग में प्रशिक्षण देकर अपने मेडिकल कर्मचारियों की फ़ौज में शामिल करना चाहिए क्योंकि रातोंरात हम ग्रामीण भारत में डॉक्टरों की कमी को नहीं भर सकते."

जर्जर है भारत की जनस्वास्थ् व्यवस्था

ग्रामीण भारत

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जन स्वास्थ्य दो प्रतिशत से भी कम पैसे ख़र्च करने वाला भारत मूलतः प्राथमिक, सामुदायिक और ज़िला स्वास्थ्य केंद्रों की तीन परतीय प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर काम करता है.

लेकिन नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में यह 'थ्री-टियर' सिस्टम नाकाम रहा है.

सीएमसी वेल्लोर से लंबे समय तक जुड़े रहे भारत के जाने माने वायरोलॉजिस्ट डॉक्टर जैकब जॉन कहते हैं कि जनस्वास्थ्य में दशकों तक निवेश न करने की वजह से आज हमें डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की इतनी क़िल्लत झेलनी पड़ रही है.

बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं, "जन स्वास्थ्य नीति के विशेषज्ञ और स्वास्थ्य से जुड़े लोग दशकों से यह बात उठाते रहे हैं कि देश में व्यवस्था को ग्रास रूट से मज़बूत बनाना होगा. ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य का भार अपने कंधों पर उठाने वाले प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मज़बूत होने चाहिए. लेकिन असलियत में यहां हालात इतने ख़राब हैं कि इनके पास न कोविड-19 टेस्टिंग की कोई क्षमता है, न संक्रमित लोगों की पहचान करने की और न ही इलाज की."

जैकब कहते हैं, "यूं तो हर साल ही क्षेत्रीय महामारियों और फ़्लू से सैकड़ों लोग इसलिए मर जाते हैं क्योंकि हमारी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की आधारभूत संरचना ठीक नहीं है. इस साल कुछ हज़ार मौतें अधिक होने की आशंका है. और कई मामलों में तो टेस्टिंग न होने की वजह से हमारे पास ग्रामीण भारत में जान से जाने वाले लोगों के ठीक-ठीक रिकॉर्ड भी नहीं होंगे".

कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में है भारत?

आशा कर्मी

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डॉक्टर जैकब जॉन और डॉक्टर आशीष झा के साथ-साथ अन्य कई बड़े आपदा विशेषज्ञ डॉक्टरों का मानना है कि भारत अब कोरोना वायरस के कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में चल रहा है.

डॉक्टर जैकब कहते हैं, "दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में जिस गति से वाइरस फैल रहा है -उससे साफ़ है कि संक्रमित व्यक्ति के संक्रमण स्रोत का ठीक-ठीक पता लगाना अब उतना सम्भव नहीं रहा. भले ही सरकार आधिकारिक रूप से स्वीकार करे न करे, इसमें कोई शक नहीं की अब हम कम्युनिटी ट्रांसमिशन के दौर में हैं."

दशकों से बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले में काम करने आपदा विशेषज्ञ डॉक्टर अरुण शाह के अनुसार सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क के नियमों का पालन न किया जाना ग्रामीण भारत में संक्रमण के बढ़ने का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण बन कर उभरेगा.

डॉक्टर शाह का कहना है, "हमारे ज़िले में भी दिल्ली से लौटकर आने वाले मज़दूरों की बड़ी संख्या है. लेकिन मेरे क्लिनिक तक पर लोग बिना मास्क के आ रहे हैं. यहां बाज़ार में आपको एक भी आदमी मास्क लगाए या सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करता नज़र नहीं आएगा. इस स्वास्थ्य आपदा के दौरान हाइजीन के पालन को लेकर अभी लोगों की कोई मानसिक और सामाजिक ट्रेनिंग ही नहीं हुई है. यहां सबसे स्थिति को इतना हल्के में लिया हुआ है जबकि सच यह है कि यह वायरस किसी को नहीं बख्शेगा. सबसे ज़्यादा नुक़सान होगा बुज़ुर्गों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को. इसलिए सरकार को मास्क के इस्तेमाल की अनिवार्य समझते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में सघन प्रचार करना चाहिए".

कम्युनिटी ट्रांसमिशन के इस दौर में कैसे बचाई जा सकती हैं जानें?

थर्मल स्केनिंग करती महिला स्वास्थ्यकर्मी

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जनस्वास्थ नीति में कुछ महत्वपूर्ण फेरबदल करके कोरोना वायरस को ग्रामीण भारत में क़हर बरपाने से रोका जा सकता है. डॉक्टर झा भारत की विस्तृत बायोटेक्नोलॉजी ताक़त की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "भारत के पास बायोटेक्नोलॉजी में निपुण कर्मचारियों की एक विशाल और मज़बूत टीम है. सरकार इनकी मदद से देश की टेस्टिंग क्षमता को तुरंत बढ़ा सकती है. इस वक़्त हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता देश में टेस्टिंग क्षमता को न सिर्फ़ बढ़ाना - बल्कि टेस्टिंग की सुविधा को पटना के साथ-साथ मधुबनी जैसे छोटे सेंटर पर भी उपलब्ध करवाना होना चाहिए."

प्राइवेट और सरकारी अस्पताल करें मिलकर काम

दूसरी महत्वपूर्ण बात सरकारी अस्पतालों को ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध करवाना है. डॉक्टर झा कहते हैं, "दवाइयाँ, एंटी-बायोटिक्स, वेंटिलेटिर, पीपीई किट जैसे सभी ज़रूरी उपकरणों की उपलब्धता ग्रामीण क्षेत्रों - या कम से कम ज़िला मुख्यालयों के सभी अस्पतालों में - सरकार को सुनिश्चित करनी चाहिए. डॉक्टरों को काम करने के लिए ज़रूरी सभी सुविधाएँ छोटे से छोटे स्वास्थ्य केंद्र तक पर उपलब्ध करवाई जानी चाहिए.

साथ ही, बड़ा सवाल मरीज़ों को रखने का है. इसके लिए इस आपदा के समय में सरकार को निजी अस्पतालों की मदद लेनी होगी. यह सच है कि निजी अस्पतालों का बिज़नेस मॉडल पैसा ख़र्च कर सकने वाले मरीज़ों पर केंद्रित है.

डॉक्टर झा कहते हैं, "इस आपदा के समय सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि निजी अस्पताल मरीज़ों को दाख़िल करें और सरकारी दर से ज़्यादा पैसे न लें. इस राष्ट्रीय आपदा के वक़्त में स्वास्थ्य सेक्टर से जुड़े लोग और सरकार के नौकरशाह - सभी को अपनी निजी फ़ायदों से ऊपर उठकर व्यवहार करना होगा".

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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कोरोना वायरस के बारे में जानकारी

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