डेक्सामेथासोन: कोरोना की 'लाइफ़ सेविंग' दवा का भारत से क्यों है गहरा नाता

डेक्सामेथासोन

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मंगलवार शाम से जो डेक्सोना के पत्ते और इंजेक्शन बिकने शुरू हुए हैं तो पूछिए मत. हालाँकि ये दवा पहले भी कॉमन रही है लेकिन अब तो जिस किसी के पास पर्चे पर है वो एक-एक महीने की डोज़ लिए जा रहा है."

फ़ोन पर बात हो रही थी उत्तर प्रदेश में लखनऊ शहर के एक मेडिकल स्टोर के मालिक रोहन कपूर से.

उन्होंने आगे बताया, "0.5 एमजी पॉवर वाली डेक्सोना की 30 गोली सात रुपए में मिलती है बस. शहर ही नहीं सप्लाई तो गाँवों-देहातों में भी ख़ासी है."

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दिल्ली से सटे नोएडा में भी इस नाम से मिलती-जुलती दवाओं के बारे में उत्सुकता बढ़ गई है.

बुधवार शाम को दवा की एक दुकान पर दो लोग दुकानदार से इस दवा के बारे में पता कर रहे थे.

दुकानदार ने उनसे कहा, "दवा तो सस्ती है सर, लेकिन आपको बिना डॉक्टर के पर्चे के दे नहीं सकता क्योंकि इसमें स्टेरॉयड होता है. ये क्रोसीन या कोमबिफ़्लैम जैस दवा नहीं है जिसे आसानी से, जितना चाहे ख़रीद सकते हैं."

दरअसल डेक्सोना और इसी नाम से मिलती जुलती दर्जनों दवाइयाँ भारत में बेहद प्रचलित हैं, जिन्हें डॉक्टर लंबे समय से मरीज़ों को देते आए हैं. इन सभी में होता है डेक्सामेथासोन नाम का सॉल्ट या दवा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला केमिकल मिश्रण.

आमतौर पर टैबलेट या इंजेक्शन के ज़रिए इस्तेमाल होने वाली इस दवा को डॉक्टर गठिया, दमा, शरीर के भीतर की सूजन या एलर्जी जैसे तकलीफ़ों के लिए देते रहे हैं. सेप्सिस जैसी गंभीर मेडिकल अवस्था में भी इस दवा को दिया जाता है.

डेक्सामेथासोन की माँग क्यों?

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हाल ही में ब्रिटेन के विशेषज्ञों ने दावा किया है कि दुनिया भर में बेहद सस्ती और आसानी से मिलने वाली दवा डेक्सामेथासोन कोरोना वायरस से संक्रमित और गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों की जान बचाने में मदद कर सकती है.

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अगर इस दवा का इस्तेमाल ब्रिटेन में संक्रमण के शुरुआती दौर से ही किया जाता तो क़रीब पाँच हज़ार लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक टीम ने अस्पतालों में भर्ती 2000 मरीज़ों को यह दवा दी और उसके बाद इसका तुलनात्मक अध्ययन उन 4000 हज़ार मरीज़ों से किया, जिन्हें दवा नहीं दी गई थी.

जो मरीज़ वेंटिलेटर पर थे, उनमें इस दवा के असर से 40 फ़ीसदी से लेकर 28 फ़ीसदी तक मरने का जोखिम कम हो गया और जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत थी उनमें ये जोख़िम 25 फ़ीसदी से 20 फ़ीसदी तक कम हो गया.

शोधकर्ताओं के मुताबिक़ कोरोना वायरस इनफ़ेक्शन शरीर में इनफ़्लेमेशन (सूजन) बढ़ाने की कोशिश करता है. जबकि डेक्सामेथासोन इस प्रक्रिया को धीमी करने में असरदार पाई गई.

वेंटिलेटर पर कोरोना मरीज़

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ग़ौरतलब है कि ये दवा उन्हीं मरीज़ों को दी जानी चाहिए जो अस्पताल में भर्ती हों और जिन्हें आक्सीजन या वेंटिलेटर पर रखा गया हो.

चूँकि यह दवा सस्ती भी है, इसलिए ग़रीब देशों के लिए भी काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ ने भी इस शोध पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हम डेक्सामेथासोन पर हुई रिसर्च का स्वागत करते हैं जो कोरोना वायरस से होने वाली मृत्यु दर में कमी ला सकती है. हमें जीवन को बचाने और नए संक्रमण को फैलने से रोकने पर ध्यान देना होगा."

ज़ाहिर है, ब्रिटेन में हुए इस शोध के बाद से कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में ये दवा एक बड़ी कामयाबी बताई जा रही है.

भारत और डेक्सामेथासोन

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भारत में डेक्सामेथासोन का इस्तेमाल 1960 के दशक से जारी है और जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई, इसका चलन भी बढ़ा.

अनुमान है कि भारत में डेक्सामेथासोन की सालाना बिक्री 100 करोड़ रुपए से भी ज़्यादा है और जानकार इस बिक्री को ख़ासा बड़ा इसलिए बताते हैं क्योंकि दवाई बेहद सस्ती है.

भारत सरकार के 'ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर' पॉलिसी (आव्यशक दवाओं के दामों को नियंत्रित करने की नीति) के तहत इस दवा की गोलियों के पत्ते और इंजेक्शन पाँच रुपए से लेकर 10 रुपए के भीतर ख़रीदे जा सकते हैं.

ड्रग रिसर्च और मैन्युफ़ैक्चरिंग विशेषज्ञ डॉक्टर अनुराग हितकारी बताते हैं, "डेक्सामेथासोन सोडियम फ़ॉस्फ़ेट एक स्टेरॉयड है जो भारत में बहुत कॉमन है."

उन्होंने कहा, "छोटे-बड़े मिलाकर भारत में इस मूल दवा के आठ उत्पादक हैं. जबकि इस दवा के अलग-अलग फ़ॉर्म्युलेशन (टैबलेट और इंजेक्शन वग़ैरह) बनाने वाली कंपनियाँ 15 से अधिक हैं. साथ ही इस दवा के लिए ज़रूरी सॉल्ट्स विदेशों से आयात भी किए जाते हैं."

क्योंकि तमाम स्टेरॉयड में से एक ये भी है इसलिए भारत में डेक्सामेथासोन दवा के फ़ॉर्म्युलेशन का इस्तेमाल ब्लड कैंसर या कुछ अन्य कैंसर मरीज़ों के इलाज के दौरान भी होता आया है.

इंद्रप्रस्थ अपोलो और मेदांता अस्पताल में कैंसर विभाग के प्रमुख रह चुके डॉक्टर राकेश चोपड़ा ने बताया, "स्टेरॉयड का इस्तेमाल कारगर ऐसे होता है कि ये मानव शरीर में मौजूद कैंसर सेल्स को टारगेट करता है जिससे कीमोथेरेपी ज़्यादा असर कर सके."

डेक्सामेथासोन दवा का एक गहरा नाता खिलाड़ियों और एथलीटों से भी रहा है.

खेल से जुड़ी हल्की या गंभीर चोटों से उबरने की प्रक्रिया में इस दवा का इस्तेमाल किया जाता रहा है, ख़ासतौर से खिलाड़ियों को जल्दी बेहतर होने के लिए.

हालाँकि अंतरराष्ट्रीय डोपिंग एजेंसी ने डेक्सामेथासोन को उन दवाओं की श्रेणी में रखा है, जिसे किसी भी प्रतियोगिया के दौरान लिए जाने पर पूरी पाबंदी है, लेकिन प्रतियोगिता से पहले या बाद में उपचार के सिलसिले में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित नहीं है.

डेक्सामेथासोन से सावधानी

गर्भवती महिलाएँ

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क्योंकि डेक्सामेथासोन एक सस्ती और कारगर दवा है, इसलिए देश के दूर-दराज़ इलाक़ों में भी इसका प्रचलन काफ़ी है.

और इसी से जुड़ा है इसके दुरुपयोग का ख़तरा भी.

जेएनएमसी एएमयू मेडिकल कॉलेज ट्रॉमा सेंटर के मेडिकल अफ़सर डॉक्टर असद महमूद का मानना है कि "डेक्सामेथासोन भारत की सबसे मिस्यूज़्ड (दुरुपयोग) दवाओं में से एक है."

उन्होंने बताया, "दवा कई मेडिकल तकलीफ़ों पर तुरंत असर कर राहत देती है. मिसाल के तौर पर ब्रेन ट्यूमर मरीज़ों की सूजन वग़ैरह इससे कम तो हो जाती है लेकिन वो पूर्ण इलाज नहीं है क्योंकि असर थोड़े समय के लिए होता है. यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ आज भी क्वैक्स (बिना डिग्री वाले लेकिन ख़ुद को डॉक्टर बताने वाले) की भरमार है, वहाँ लगभग हर मर्ज़ के लिए इस दवा को पर्चे पर लिख दिया जाता है."

ज़ाहिर है, अगर इस दवा के दुरुपयोग की भी बात होती रही है तो उसके विपरीत परिणाम भी होंगे.

दिल्ली के मैक्स हेल्थकेयर के वरिष्ठ एनेस्थेसिस्ट डॉक्टर मनोज सिन्हा ने बताया, "स्किन एलर्जी से लेकर गठिया तक की शिकायत में इसे इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन डेक्सामेथासोन के लंबे इस्तेमाल से मानव शरीर की इम्यूनिटी घट जाती है जो अच्छी बात नहीं है."

इस दवा के अत्याधिक इस्तेमाल के कारण मरीज़ों में बेचैनी, नींद में कमी, वज़न बढ़ना और शरीर में पानी के जमाव की दिक़्क़तें भी सामने आती रही हैं.

भारत में डेक्सामेथासोन दवा का इस्तेमाल उन गर्भवती महिलाओं के इलाज में भी होता आया है जिन्हें प्रीमैच्योर लेबर (समय से पहले प्रसव) में जाना पड़ता है.

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डॉक्टर असद महमूद ने बताया, "इस दौरान महिलाओं को अत्याधिक कमज़ोरी की शिकायत बढ़ जाती है और ये दवा तत्काल राहत देती है. लेकिन दवा की मात्रा किसी पेशेवर डॉक्टर को ही लिखनी चाहिए वरना बुरे प्रभाव भी दिख सकते हैं."

रहा सवाल ब्रिटेन के विशेषज्ञों के उन दावों का, जिनमें कहा गया है कि डेक्सामेथासोन कोरोना वायरस से संक्रमित और गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों की जान बचाने में मदद कर सकती है तो काउन्सिल ऑफ़ साइंटिफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च यानी सीएसआईआर अभी "इस शोध के संपूर्ण परिणामों की स्टडी करेगी."

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉक्टर शेखर मांडे ने कहा, "शोध में ऐसा बताया गया है कि कोरोना वायरस के अत्याधिक संक्रमण से जूझ रहे कई मरीज़ों पर इस दवा का असर दिखा है. दूसरी बात ये कि इस दवा का उतना असर उन मरीज़ों पर नहीं दिखा जिनमें लक्षण कम थे. हम पूरी स्टडी के छपने का इंतज़ार करेंगे लेकिन लोगों को ये दवा ख़ुद से बिलकुल भी नहीं लेनी चाहिए."

उन्होंने बताया कि इसके लिए मेडिकल सुपरविज़न अनिवार्य है.

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