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कोरोना: बंगाल में तेज़ी से बढ़ता संक्रमण, सुस्त होती सरकार
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
"अब यह मेरे हाथ नहीं है. अब मैं कुछ नहीं कर सकती. आप कोरोना को साथ लेकर सो सकते हैं. इसे अपना तकिया बना सकते हैं. आई एम सॉरी......"
एक अंग्रेजी अखबार में छपी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की यह टिप्पणी राज्य में कोरोना की बेकाबू होती स्थिति का सबसे बड़ा सबूत है.
प्रवासियों की वापसी के बाद राज्य में संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़े हैं और अंफन तूफान ने इस संक्रमण की आग में घी डालने का काम किया है.
अब बीते एक सप्ताह से नए मरीजों का ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा है और शुक्रवार पांच जून को तो यह तादाद पहली बार चार सौ के आंकड़े को पार करते हुए 427 तक पहुंच गई.
बंगाल शायद देश का अकेला राज्य है जहां पहले दिन से ही कोरोना से ज्यादा सुर्खियां इस पर होने वाले विवादों और राजनीति ने बटोरी है. कभी मरीजों और मृतकों के आंकड़ों पर विवाद गरमाता रहा तो कभी जांच पर और कभी कोरोना की जमीनी परिस्थिति का जायज़ा लेने आए केंद्रीय टीम के दौरे पर.
कोरोना के मरीज़ों की लगातार बढ़ती तादाद के बीच सरकार ने पहली जून से तमाम रियायतों का ऐलान कर दिया था.
उसके बाद सड़कों, बाजारों और बसों में उमड़ने वाली भीड़ ने स्थिति को और गंभीर बनाया है.
लॉकडाउन में ढील के बाद से नए मामले तेज़ी से बढ़े हैं. लेकिन अब शायद सरकार के पास भी करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है.
ऊपर ममता की जिस टिप्पणी का जिक्र है वह शायद इसी हताशा की उपज थी.
ममता ने राज्य में बिना सोचे-समझे और राज्य सरकार की सलाह के बिना प्रवासियों से भरी ट्रेनें भेज कर संक्रमण बढ़ाने का आरोप लगा चुकी हैं. वे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों को कोरोना एक्सप्रेस भी करार दे चुकी हैं.
दूसरी ओर, राज्यपाल जगदीप धनखड़ औऱ तमाम विपक्षी दल सरकार पर संक्रमण और मौतों के मामले छिपाने और लॉकडाउन में बेवजह ज्यादा ढील देने के आरोप लगा रहे हैं.
राज्य में स्वास्थ्य का आधारभूत ढांचा तो पहले से ही कमज़ोर था. लेकिन कोरोना ने इस कमज़ोरी को पूरी तरह उजागर कर दिया है.
सरकार के तमाम दावों के बावजूद पीपीई किट और जांच सुविधाओं पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. कभी सुरक्षा के अभाव में स्वास्थ्यकर्मियों की नाराजगी सुर्खियां बनती हैं तो कभी डाक्टरों, नर्सों और पुलिसवालों में बढ़ता संक्रमण.
इसके अलावा निजी अस्पतालों से मणिपुरी और दूसरे राज्यों के नर्सों के सामूहिक पलायन ने भी बीते महीने काफी सुर्खियां बटोरी थीं.
संक्रमण की तादाद बढ़ने की वजह से सरकार ने विभिन्न जिलों में 15 नए कोरोना अस्पताल बनाने का फै़सला किया है. फिलहाल राज्य में 68 कोरोना अस्पताल हैं जिनमें 53 निजी क्षेत्र के हैं.
छह जून तक ताजा स्थिति यह है कि राज्य में कोरोना के मरीजों की तादाद 7732 हो गई है और मृतकों की तादाद 311 हो गई है.
बावजूद इसके ममता, जिनके जिम्मे स्वास्थ्य मंत्रालय भी है, का दावा है कि राज्य में बीते दो महीनों के दौरान हालात काफी हद तक नियंत्रण में आ चुके हैं.
वह कहती हैं, "केंद्र ने प्रवासी मजदूरों से भरी ट्रेनें भेज कर यहां संक्रमण बढ़ा दिया है. अब तक लगभग साढ़े आठ लाख प्रवासी देश के विभिन्न हिस्सों से यहां लौट चुके हैं. 10 जून तक यह तादाद दस लाख तक पहुंच जाएगी."
उनका आरोप है कि भाजपा इस महामारी का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर रही है. सबसे ज्यादा खराब हालत गुजरात की है. लेकिन पार्टी अपने सियासी फायदे के लिए बंगाल को ही मुद्दा बना रही है.
वैसे, प्रवासियों की वजह से संक्रमण बढ़ने की मुख्यमंत्री का दावा निराधार नहीं है. इसकी वजह यह है कि उन जिलों में संक्रमण तेजी से बढ़ा है जहां सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर लौटे हैं.
मिसाल के तौर पर नदिया, मालदा, कूचबिहार, अलीपुरदुआर और नदिया जैसे जो जिले पहले ग्रीन जोन में थे वह बीते एक सप्ताह के दौरान आरेंज जोन में पहुंच गए हैं.
झारखंड से सटा पुरुलिया जिला 25 मई तक ग्रीन जोन में था. लेकिन शुक्रवार को एक दिन में ही वहां 43 नए मामले सामने आए. उनमें से 42 ऐसे लोग थे जो हाल में महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली से लौटे थे.
राज्य सरकार की ओर से कोरोना पर गठित सलाहकार बोर्ड के सदस्य डा. सुकुमार मुखर्जी कहते हैं, "अब तक दो हजार से ज्यादा प्रवासियों की रिपोर्ट पाज़िटिव आई है. आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं."
लॉकडाउन में ढील के बाद ज्यादातर जगहों पर सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन नहीं हो रहा है. राज्य में जांच कम होने और जांच रिपोर्ट काफी देरी से आने के आरोप भी लग रहे हैं. इससे असली तस्वरी सामने नहीं आने के दावे किए जा रहे हैं.
राज्यपाल जगदीप धनखड़ कोरोना के मुद्दे पर शुरू से ही सरकार के खिलाफ हमलावर रहे हैं.
उनका आरोप है, "सरकार मरीजों के आंकड़े छिपा रही है. 40 हजार लोगों की जांच रिपोर्ट अब तक नहीं आई है. वह तथ्यों की सही जानकारी नहीं दे रही है."
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष भी कहते हैं, "जांच बहुत कम हो रही है और लगभग 40 हजार लोगों की रिपोर्ट अब तक नहीं मिली है. सरकार जांच कम कर तस्वीर बेहतर होने का दावा कर रही है."
सीपीएम के प्रदेश सचिव सूर्यकांत मिश्र, जो खुद भी डाक्टर हैं, कहते हैं, "अस्पतालों में पर्याप्त सुरक्षा उपकरण (पीपीई) नहीं हैं. इलके अलावा स्वास्थ्य का आधारभूत ढांचा भी जर्जर है. खासकर सरकारी अस्पतालों में तो बेहद बुरी स्थिति है. कई मामलों में मरीजों की ढंग से देखभाल नहीं होने और समुचित सुविधाएं नहीं होने की शिकायतें मिली हैं."
उनका कहना है कि जांच की संख्या और बढ़ाई जानी चाहिए.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्र आरोप लगाते हैं, "केंद्र की बीजेपी और राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार की वजह से ही बंगाल में कोरोना की स्थिति बिगड़ी है. बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस सुनियोजित तरीके से इस महामारी पर अंकुश लगाने की बजाय राजनीति में उलझी हैं. इसका खामियाजा आम लोगों को भरना पड़ रहा है. इन दोनों की निगाहें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों पर हैं."
दूसरी ओर, सरकार ने इन आरोपों को निराधार बताया है.
गृह सचिव आलापान बनर्जी कहते हैं, "राज्य में एक्टिव मामलों की तादाद 4,025 (5 जून तक) है. यहां मरीजों के स्वस्थ होकर घर लौटने की दर 39.8 फीसदी है. चार जून तक 2.42 लाख नमूनों की जांच की गई थी."
वह बताते हैं कि सरकार प्रति लाख पर 2,795 लोगों की जांच कर रही है और इनमें 2.9 फीसदी की रिपोर्ट पाजीटिव आ रही है.
राज्य में 42 लैबोरेटरियों में कोरोना की जांच की जा रही है. सरकार का दावा है कि रोजोना लगभग दस हजार नमूनों की जांच की जा रही है. फिलहाल राज्य में ब्लाक स्तर पर 11,500 क्वारंटीन केंद्र हैं जिनमें से 582 सरकारी हैं. लेकिन प्रवासी मजदूरों की वापसी के बाद बढ़ते संक्रमण को ध्यान में रखते हुए इनकी तादाद बढ़ाने पर विचार चल रहा है.
वायरोलाजिस्ट अमिताभ नंदी कहते हैं, "बंगाल में संक्रमितों की तादाद तेजी से बढ़ने का सिलसिला महीनों नहीं तो भी अगले कई सप्ताहों तक जारी रहने की आशंका है. लॉकडाउन में बड़े पैमाने पर ढील के साथ ही प्रवासी मजदूरों की वापसी ने परिस्थिति को जटिल बना दिया है."
एक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डा.पी.के. बनर्जी कहते हैं, "हमें कोरोना के साथ ही जीना सीखना होगा. राज्य में लॉकडाउन में ढील दी गई है. लेकिन लोग मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे एहतियाती उपायों को भी भूलने लगे हैं. यह सिलसिला जारी रहा तो हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं."
विशेषज्ञों का कहना है कि सोमवार से शॉपिंग माल्स और तमाम सरकारी-निजी दफ्तरों के पूरी तरह खुलने के बाद संक्रमितों की संख्या में अप्रत्याशित उछाल की आशंका है.
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