कोरोना संकट: पश्चिम बंगाल नर्सों के सामूहिक पलायन से परेशान

    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी
    • पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

पश्चिम बंगाल के निजी अस्पतालों में काम करने वाली बाहरी राज्यों की नर्सों के सामूहिक पलायन ने इस क्षेत्र पर एक नया और गंभीर खतरा पैदा कर दिया है.

ये समस्या इसलिए भी काफ़ी गंभीर है, क्योंकि पश्चिम बंगाल पहले से ही स्वास्थ्य क्षेत्र में आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहा है.

इससे कोरोना महामारी से निपटने के तरीक़ों पर आरोपों से जूझ रही ममता बनर्जी सरकार के लिए एक नई समस्या पैदा हो गई है.

सरकार ने कोलकाता के विभिन्न निजी अस्पतालों को पत्र लिख कर काम छोड़ कर लौटने वाली इन नर्सों का ब्योरा और पलायन के बाद उपजी स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है.

बीते चार दिनों के दौरान मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और ओडीशा की 500 से ज्यादा नर्सें काम छोड़ कर अपने गृह राज्य लौट चुकी हैं.

नर्सों का सामूहिक पलायन

यह सिलसिला लगातार तेज़ हो रहा है. राज्य सरकार ने कोरोना संक्रमितों के लिए कोलकाता के जिन 68 अस्पतालों को तैयार किया है उनमें से 52 निजी क्षेत्र के हैं.

बाहरी राज्यों की नर्सों के काम छोड़ कर जाने की वजह से बढ़ते संकट से परेशान निजी अस्पतालों के संगठन द एसोसिएशन ऑफ़ हास्पिटल्स ऑफ़ ईस्टर्न इंडिया (एएचईआई) ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक पत्र लिख कर इस मामले में हस्तक्षेप की गुहार लगाई है.

संगठन का कहना है कि शायद गृह राज्यों में बेहतर ऑफ़र मिलने की वजह से ही नर्सों का सामूहिक पलायन हो रहा है.

इससे पहले यह बात सामने आई थी कि मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने राज्य के नर्सो को तत्काल लौटने के लिए एक एडवाइजरी जारी की है.

इसकी वजह यह थी कि मणिपुर की 300 से ज्यादा नर्सों की वापसी के लिए वहां की सरकार ने ही बसों और जरूरी परमिट का इंतजाम किया था.

कोरोना महामारी

लेकिन बीरेन सिंह ने इस आरोप को निराधार बताया है. उनका कहना है कि सरकार ने ऐसी कोई एडवायजरी जारी नहीं की है.

नर्सों की अपील पर ही सरकार ने उनकी वापसी की व्यवस्था की थी.

लेकिन रोजी-रोटी के लिए अपने घरों से हज़ारों किमी दूर आकर बरसों से काम करने वाली नर्सें अचानक कोरोना के महामारी बनने के दो महीने बाद आख़िर सामूहिक तौर पर अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ कर क्यों लौट रही हैं?

इनमें से कुछ नर्सों से बातचीत से जो वजहें सामने आई हैं उनमें नौकरी और वेतन की अनिश्चितता के अलावा पड़ोसियों के ताने और सामाजिक भेदभाव शामिल हैं.

पूर्वोत्तर की रहने वाली इन नर्सों को उनको घरों के आस-पास के लोग कोरोना कह कर बुलाने लगे थे.

सामूहिक पलायन

नर्सों के इस सामूहिक पलायन की वजह से खासकर कोलकाता के निजी अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों की भारी किल्लत पैदा हो गई है.

इन अस्पतालों में औसतन 70 फ़ीसदी नर्सें पूर्वोत्तर राज्यों की हैं. नर्सों के पलायन का सिलसिला लगातार तेज होने की वजह से निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे के ठप होने का खतरा बढ़ रहा है.

कुछ नर्सें इस्तीफा देकर जा रही हैं तो कुछ बिना इस्तीफा दिए ही. कई अस्पतालों की नर्सें तो प्रबंधन को सूचित किए बिना ही अपने राज्य में लौट गई हैं और कई बिना छुट्टी के ही काम पर नहीं आ रही हैं. इससे अस्पतालों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.

एएचईआई के उपाध्यक्ष और महानगर के एएमआरआई अस्पताल के सीईओ रूपक बरुआ कहते हैं, "मणिपुर सरकार ने नर्सों की वापसी की व्यवस्था की थी. इसलिए पहले यह धारणा बनी थी कि मणिपुर सरकार अपने लोगों को वापस बुलाना चाहती है. लेकिन अब पता चला है कि वापसी की इच्छुक नर्सों ने ही मणिपुर सरकार से संपर्क किया था."

वह बताते हैं कि कोलकाता के ज्यादातर निजी अस्पताल पूर्वोत्तर से आने वाली नर्सों पर ही निर्भर थे. ऐसे में उनके सामूहिक तौर पर काम छोड़ने से परिस्थिति बेहद गंभीर हो गई है.

सुरक्षा का अभाव

एएचईआई के अध्यक्ष प्रदीप लाल मेहता ने सरकार को भेजे अपने पत्र में कहा है, "संगठन को अचानक भारी तादाद में काम छोड़ कर नर्सों के लौटने की सटीक वजह की जानकारी नहीं है. लेकिन सुरक्षा के अभाव और गृह राज्यों से मिलने वाली मदद की वजह से ही यह लोग काम छोड़ कर जा रही हैं."

नर्सों के सामूहिक पलायन से चिंतित स्वास्थ्य विभाग ने कोलकाता के तमाम निजी अस्पतालों को पत्र भेज कर काम छोड़ कर जाने वाली नर्सों की तादाद और इससे उपजे संकट का ब्योरा मांगा है.

विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "सरकार इस मामले से काफी चिंतित है. संकट के इस दौर में बाहरी राज्यों के स्वास्थ्यकर्मियों के लौटने से परिस्थिति गंभीर हो सकती है. इस मामले पर निगाह रखी जा रही है."

कोलकाता के भागीरथी नेवटिया वुमैन एंड चाइल्ड केयर सेंटर के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, "कई नर्सों ने इस्तीफा दे दिया है. कई अन्य ने बिना इस्तीफा दिए ही काम पर आने से मना कर दिया है. कुछ नर्सें बिना इस्तीफा दिए ही अपने घरों को लौट गई हैं."

असुरक्षा की भावना

महानगर के जिन निजी और कॉरपोरेट अस्पतालो में नर्सें काम छोड़ कर लौट रही हैं उनमें अपोलो के अलावा पीयरलेस, रूबी, एएमआरआई, आरएन टैगोर, टाटा मेमोरियल, मेडिका, औऱ फोर्टिस जैसे बड़े नाम शामिल हैं.

मणिपुर लौटने वाली एक नर्स ने कहा कि सुरक्षा की चिंता और घरवालों की दबाव के चलते ही उन्होंने लौटने का फ़ैसला किया है.

वह कहती हैं, "कोलकाता में कोरोना संक्रमण के लगातार बढ़ने की वजह से हमें अपनी सुरक्षा की चिंता तो थी ही, घरवाले भी लगातार वापसी के लिए दबाव बना रहे थे. फ़िलहाल अपनी सुरक्षा और परिवार ही हमारी प्राथमिकता है. मणिपुर में कोरोना के मामले बहुत कम हैं."

सामाजिक भेदभाव का सामना

काम छोड़ कर लौटने वाली ख़ासकर पूर्वोत्तर की ज़्यादातर नर्सों का आरोप है कि जान हथेली पर लेकर दिन-रात काम करने के बावजूद उनको सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था.

संक्रमण बढ़ने के बाद उनको अक्सर कोरोना कह कर बुलाया जाता था. इसके साथ ही नौकरी छूटने का भी ख़तरा सता रहा था.

एक निजी अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में काम करने वाली मणिपुर की लेसराम रोमिया चानू कहती हैं, "कोविड-19 के मरीज़ों की भर्ती शुरू होते ही काम का दबाव कई गुना बढ़ गया था. इसके अलावा हमें सामाजिक भेदभाव और तीखी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता था. मोहल्ले वाले तिरछी निगाहों से देखते थे और कई बार तो दुकानदार तक सामान देने से इनकार कर देते थे. आख़िर हम कब तक यह सब सहते?"

एक अन्य नर्स कमलिनी देवी बताती हैं, "हम जहाँ रहते थे वहां हमसे बेहद रूखा व्यवहार होने लगा था. लॉकडाउन के दौरान हमें जितना अपमान सहना पड़ा उतना इस महानगर में बीते चार साल के दौरान कभी नहीं सहना पड़ा था. मणिपुरी होना हमारे लिए अभिशाप बन गया था."

इन नर्सों का कहना है कि वेतन की अनिश्चितता और कम पैसे मिलना भी उनकी वापसी की प्रमुख वजह है.

यहां सरकारी अस्पतालों में नर्सों को जहां 25 हज़ार रुपये मिलते हैं वहीं निजी अस्पतालों में यह रकम 16 से 18 हज़ार के बीच है.

ऐसे में समय पर वेतन नहीं मिलने की स्थिति में भुखमरी की नौबत आ सकती थी.

नर्सों का वेतन

कोलकाता में मणिपुरियों के संगठन मणिपुरी इन कोलकाता के अध्यक्ष केएसएच सैमकेशो बताते हैं, "कई अस्पतालों में नर्सों का वेतन अनियमित हो गया था. सरकारी अस्पतालों के मुक़ाबले निजी अस्पतालों में वेतन भी कम था. पूर्वोत्तर से होने की वजह से उनको सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ता था. ऐसे में मणिपुरी नर्सें यहाँ असुरक्षित महसूस कर रही थीं."

पीयरलेस अस्पताल के सुदीप्त मित्र कहते हैं, "पूर्वोत्तर की नर्सों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव के मामले में प्रबंधन हमेशा ज़रूरी कार्रवाई करता था."

नर्सों का सामूहिक पलायन रोकने के लिए कई अस्पतालों ने उनकी काउंसलिंग शुरू की है. साथ ही उनको वेतन वृद्धि का ऑफ़र भी दिया गया है. कुछ अस्पतालों ने उनके लिए अतिरिक्त बीमा भी करवाया है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को निजी अस्पतालों के साथ मिल कर नर्सो के पलायन पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र ज़रूरी क़दम उठाना चाहिए. ऐसा नहीं होने की स्थिति में स्वास्थ्य व्यवस्था के ठप होने का ख़तरा पैदा हो जाएगा.

जाने-माने चिकित्सक अर्जुन दासगुप्ता कहते हैं, "तमाम संबंधित पक्षों को मिल कर इस समस्या पर क़ाबू पाने की पहल करनी चाहिए. नर्सों से बात कर उनकी समस्याओं का पता लगा कर उनको दूर करने के उपाय किए जा सकते हैं."

एक अन्य चिकित्सक सुनील सेनगुप्ता कहते हैं, "भविष्य में ऐसी समस्या से निपटने के लिए राज्य में नर्सिंग कॉलेजों की तादाद बढ़ाने पर विचार करना चाहिए."

लेकिन फ़िलहाल सरकार और निजी अस्पतालों की सबसे बड़ी चिंता इन नर्सों के पलायन पर अंकुश लगाना है. और उनको इसका कोई ठोस उपाय नहीं सूझ रहा है.

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