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कोरोना: पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश के बीच कारोबार पर कितनी राजनीति?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए
कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से जारी लॉकडाउन के कारण देश में तमाम व्यापारिक गतिविधियों के साथ पश्चिम बंगाल की पेट्रापोल सीमा से बांग्लादेश के साथ होने वाला सीमा व्यापार भी बंद था.
केंद्र सरकार ने बीते 30 अप्रैल को इसे दोबारा शुरू करने की इजाज़त दी थी लेकिन कोरोना के आतंक की वजह से आयात-निर्यात से जुड़े मजदूरों और स्थानीय बाशिंदों के बीच गतिरोध के बाद रविवार शाम को यह काम फिर ठप हो गया.
हालांकि इसके पीछे राजनीति और केंद्र-राज्य संबंधों पर आरोप लग रहे हैं. स्थानीय लोगों की दलील है कि सीमा पार पेट्रापोल से लगे बेनापोल में कोरोना संक्रमितों की तादाद अधिक है. ऐसे में विभिन्न वस्तुएं लेकर सीमा पार करने वाले ट्रक के ड्राइवर और खलासी संक्रमित होकर इधर भी ख़तरा बढ़ा सकते हैं.
गांववालों ने सीमा की ओर जाने वाली सड़क की नाकेबंदी कर दी थी. नतीजतन कस्टम्स से लेकर इमीग्रेशन तक के अधिकारी सीमा चौकी तक नहीं पहुंच सके.
अचानक लॉकडाउन होने की वजह से पेट्रोपल सीमा पर लगभग सवा महीने से ढाई हजार ट्रक फंसे थे.
नियम के मुताबिक, दूसरे देशों से लौटने वाले ट्रक चालकों और खलासियों को 14 दिनों के लिए क्वारंटीन में जाना होता.
इसी वजह से दोनों देशों के अधिकारियों और सीमा व्यापार से जुड़े संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक में एक नए फार्मूले पर सहमति बनी. इसके तहत पहले जो ट्रक सामान लेकर बांग्लादेश में पद्मा नदी के तट पर बने ट्रक टर्मिनल तक जाते थे उनको अब नो मेंस लैंड तक ही जाने की अनुमति दी गई.
वहां से इन ट्रकों का सामान उतार कर बांग्लादेशी ट्रकों में लोड किया जा रहा था. ट्रकों के बांग्लादेश की सीमा के भीतर नहीं जाने की स्थिति में वापसी में ड्राइवरों को क्वारंटीन में नहीं भेजना पड़ेगा.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य सरकार से सलाह-मशविरा किए बिना पेट्रापोल सीमा को ट्रकों के लिए खोलने पर नाराज़गी जताते हुए कहा था कि सरकार सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ों की आवाजाही की ही अनुमति देगी.
सीमा व्यापार
इस सीमा से होकर भारत धागों के अलावा वाहनों के चिचिस नंबर, नान-एलाय स्टील, आयरन और स्टील उत्पाद, फैब्रिक्स, सिंथेटिक फाइबर दो-पहिया वाहन, जूट के बीज, मशीनों के पुर्जों, पुस्तकों, कागज और खाद्य उत्पादों का निर्यात करता है. उधर, बांग्लादेश से जूट, मशहूर जामदानी साड़ियां, रेडीमेड कपड़ें, सुपारी और चावल की भूसी यानी राइस ब्रान का आयात किया जाता है.
दोनों देशों का आपसी व्यापार लगातार बढ़ रहा है. वर्ष 2013 में यह छह अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2018 में 10 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. वर्ष 2020 में इसके बढ़ कर 15 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान था. इसमें ज्यादातर हिस्सा निर्यात का है. बांग्लादेश से लगभग एक अरब डॉलर की कीमत की वस्तुओं का आयात किया जाता है. लेकिन कोरोना ने तमाम समीकरण गड़बड़ा दिए हैं. इस आपसी व्यापार का लगभग 60 फीसदी पेट्रापोल-बेनापोल कॉरिडोर के ज़रिए ही होता है.
विरोध
बीते गुरुवार को सीमा व्यापार शुरू होने के बाद ही ट्रकों की लोडिंग-अनलोडिंग में जुटे मज़दूरों ने यह कहकर विरोध प्रदर्शन शुरू किया कि उनको सूचित किए बिना सीमा कैसे खोल दी गई है.
उसके बाद शनिवार को सीमा व्यापार तत्काल रोकने की मांग में स्थानीय छयघरिया ग्राम पंचायत के तमाम लोग भी प्रदर्शन और नाकेबंदी में शामिल हो गए. उन लोगों की दलील दी थी कि सीमा पार जाने वाले ट्रक ड्राइवरों की वजह से इलाके में कोरोना संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा.
गांववालों का दावा है कि सीमा पार स्थित बेनापोल में इस वायरस की चपेट में आने वालो की तादाद बहुत ज्यादा है. ट्रक लोडिंग-अनलोडिंग मज़दूर यूनियन के कार्यवाहक अध्यक्ष अमित कुमार बसु कहते हैं, "कुछ व्यापारियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए निर्यात शुरू किया था. लेकिन सीमा पार बड़े पैमाने पर कोरोना फैला है. सीमा व्यापार को तुरंत नहीं रोकने की स्थिति में इस पार भी संक्रमण फैल सकता है."
राजनीति भी
मज़दूरों और स्थानीय लोगों के विरोध प्रदर्शन को स्थानीय तृणमूल कांग्रेस नेताओं का भी समर्थन हासिल है.
राजनीतिक हलके में इसे सीमा व्यापार शुरू करने के केंद्र के फैसले का ममता बनर्जी के विरोध से जोड़ कर देखा जा रहा है.
तृणमूल कांग्रेस के कब्ज़े वाली छयघरिया ग्राम पंचायत के तहत रहने वाले गोपाल हालदार कहते हैं, "बांग्लादेश के बेनापोल में कोरोना के सैकड़ों मरीज़ हैं. हमारा गांव बेनापोल से कुछ ही दूरी पर है. सीमा व्यापार जारी रहने पर संक्रमण के इधर भी फैलने का ख़तरा है."
ग्राम पंचायत के प्रमुख प्रसेनजित घोष भी फिलहाल सीमा व्यापार को बंद रखने के पक्ष में हैं.
घोष कहते हैं, "हमारे ग्राम पंचायत में अब तक कोरोना का एक भी मामला सामने नहीं आया है. केंद्र के निर्देशों का पालन करने के लिए स्थानीय लोगों का जीवन दांव पर नहीं लगाया जा सकता."
बनगांव के पूर्व विधायक गोपाल सेठ कहते हैं, "बांग्लादेश के बेनापोल और सारसा इलाके में 42 लोग कोरोना की चपेट में हैं. वहां लोग सोशल डिस्टेंसिंग का भी पालन नहीं कर रहे हैं. ऐसे में सीमा व्यापार के जरिए इधर भी संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा. हमने कस्टम्स विभाग के अलावा सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और पुलिस अधिकारियों को भी ज्ञापन सौंप कर अपनी चिंता से अवगत कराया है."
पेट्रापोल क्लीयरिंग एजेंट स्टाफ़ वेलफ़ेयर एसोसिएशन के सचिव कार्तिक चक्रवर्ती कहते हैं, "सीमा पार कोरोना का भारी आतंक है. इसलिए मैं इलाके के लोगों की मांग का समर्थन करता हूं."
लेकिन भाजपा को इसमें राजनीति नज़र आ रही है. उत्तर 24-परगना जिला बीजेपी के नेता देवदास मंडल कहते हैं, "गांववालों के विरोध प्रदर्शन के पीछे तृणमूल का हाथ है. केंद्र ने सीमा व्यापार चालू करने का फ़ैसला किया है. इसी वजह से तृणमूल कांग्रेस ने मज़दूरों और स्थानीय लोगों को भड़का दिया है."
लंबे समय से सीमा बंद होने की वजह से इलाके में भारी तादाद में ट्रक जुट गए थे. इनमें से चार सौ ट्रकों में आवश्यक वस्तुएं लदी थीं. उसके बाद दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत में सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने का फैसला किया गया.
पेट्रापोल एक्पोर्टर्स एंड इम्पोर्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष परितोष विश्वास बताते हैं, "हमने संक्रमण रोकने के लिए ही नो मोंस लैंड में माल उतारने और वहां से बांग्लदेशी ट्रकों में भरकर आगे भेजने का प्रस्ताव दिया था."
उस बैठक में बांग्लादेश की ओर से निर्यात समिति के उपाध्यक्ष अमीनुल हक़ के अलावा सी एंड एफ़ एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कमालुद्दीन और सी एंड एफ़ स्टाफ़ एजंट वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव साजिद-उर-रहमान शामिल थे. उसी बैठक में सीमा व्यापार दोबारा खोलने का फैसला किया गया था. लेकिन अब इस पर कोरोना, राजनीति और अनिश्चतता के काले बादल दोबारा मंडराने लगे हैं.
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